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संतुलित अंदाज में ग्लोबल स्तर की ओर बढ़ रहा भारत का डिजिटल विज्ञापन बाजार: सैम बलसारा

मैडिसन वर्ल्ड की ओर से जारी की गई पिच मैडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट (PMAR) 2026) ने भारत के विज्ञापन बाजार की बदलती तस्वीर को साफ तौर पर सामने रख दिया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 hours ago

'मैडिसन वर्ल्ड' की ओर से जारी की गई पिच मैडिसन ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट (PMAR) 2026) ने भारत के विज्ञापन बाजार की बदलती तस्वीर को साफ तौर पर सामने रख दिया है। 24 फरवरी को जारी हुई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि पिछला दशक डिजिटल के बढ़ने का था, तो 2025 वह साल है जब डिजिटल पूरी तरह से मुख्यधारा बन गया। यानी अब डिजिटल कोई विकल्प नहीं, बल्कि डिफॉल्ट बन चुका है।

“Media 2026: What Broke, What Scaled, What Still Matters” नाम के सेशन में 'मैडिसन वर्ल्ड' के चेयरमैन सैम बलसारा ने बताया कि इंडस्ट्री में जो बदलाव हो रहे हैं, वह सिर्फ चर्चा या ट्रेंड नहीं हैं, बल्कि बजट के असली बंटवारे में बड़ा बदलाव है। उन्होंने कहा, “ऊपर से देखने पर लग सकता है कि बाजार की रफ्तार कम हुई है, लेकिन यदि गहराई से देखें तो विज्ञापन जगत में काफी कुछ बदल चुका है।”

उन्होंने पिछले 10 साल का आंकड़ा सामने रखा। साल 2016 में भारत का विज्ञापन बाजार ₹49,480 करोड़ का था। उस समय लगभग तीन-चौथाई हिस्सा पारंपरिक मीडिया (टीवी, प्रिंट आदि) के पास था और डिजिटल पीछे था। लेकिन धीरे-धीरे तस्वीर बदलती गई। 2025 तक पुरानी परिभाषा के हिसाब से AdEx बढ़कर ₹1,15,291 करोड़ हो गया, जिसमें 7% की ग्रोथ दर्ज हुई। इसमें पारंपरिक मीडिया की हिस्सेदारी 54% और डिजिटल की 46% हो गई।

अब 2025 से PMAR ने अपनी परिभाषा को और बड़ा कर दिया है। इसमें ई-कॉमर्स विज्ञापन और MSM (माइक्रो, स्मॉल और मीडियम) डिजिटल खर्च को भी शामिल किया गया है। इस नए दायरे में बाजार का आकार ₹1,55,105 करोड़ आंका गया है, जो 12% की बढ़त दिखाता है। इसमें डिजिटल की हिस्सेदारी बढ़कर 60% हो गई है, जबकि पारंपरिक मीडिया 40% पर आ गया है।

सैम बलसारा ने कहा, “2025 की यही नई हकीकत है। डिजिटल अब 50% से ऊपर निकल चुका है और एक बार जब 50% पार हो जाता है तो पूरा संतुलन बदल जाता है।” उन्होंने बताया कि डिजिटल की हिस्सेदारी 2023 में 52%, 2024 में 55% और अब 2025 में 60% हो गई है। दुनिया भर में 1.19 ट्रिलियन डॉलर के विज्ञापन बाजार में डिजिटल की हिस्सेदारी 79% है। भारत भी उसी दिशा में बढ़ रहा है, लेकिन अपने संतुलित तरीके से।

रिपोर्ट के मुताबिक 2025 का सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि बाजार में सिर्फ विस्तार नहीं हुआ, बल्कि बजट का बंटवारा बदला। महामारी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि पारंपरिक मीडिया का खर्च असल रकम में घटा। इसमें ₹739 करोड़ की गिरावट आई, जबकि कुल बाजार बढ़ा। दूसरी ओर डिजिटल ने करीब ₹17,000 करोड़ का इजाफा किया।

बलसारा ने साफ कहा, “भारत अब विस्तार से ज्यादा बजट के पुनर्बंटवारे के दौर में है। विज्ञापनदाता अब डिजिटल के साथ प्रयोग नहीं कर रहे, बल्कि पारंपरिक मीडिया से पैसा निकालकर डिजिटल में डाल रहे हैं।”

लीनियर टीवी को सबसे ज्यादा झटका लगा। AdEx 5% गिरा, वॉल्यूम 10% कम हुआ और करीब 500 विज्ञापनदाताओं ने टीवी छोड़ दिया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा, “टीवी खत्म नहीं हुआ है। ब्रैंड्स सस्ता वॉल्यूम कम कर रहे हैं, स्क्रीन नहीं छोड़ रहे।”

FMCG कंपनियों ने भी 2025 में पारंपरिक मीडिया से ₹779 करोड़ कम किए। सैम बलसारा ने कहा, “यह बजट कटौती नहीं, बल्कि बजट का स्थानांतरण है।” यह पैसा अब स्पोर्ट्स, रिटेल मीडिया, क्विक कॉमर्स और परफॉर्मेंस डिजिटल की ओर जा रहा है।

डिजिटल की 60% हिस्सेदारी के पीछे तीन बड़े कारण रहे- क्विक कॉमर्स, MSM डिजिटल खर्च और कनेक्टेड टीवी (CTV)। क्विक कॉमर्स विज्ञापन 2023 में ₹300 करोड़ से बढ़कर 2025 में ₹4,000 करोड़ हो गया है और 2026 में इसके ₹6,000 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। सैम बलसारा ने कहा, “क्विक कॉमर्स अब प्रयोग नहीं, बल्कि जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बन चुका है,” जो खोज, विचार और तुरंत खरीद- तीनों को जोड़ता है।

MSM डिजिटल खर्च 2025 में ₹35,814 करोड़ तक पहुंच गया, जो कुल डिजिटल का 38% है। बलसारा ने कहा, “यह एक समानांतर दुनिया है, जिसे बड़े विज्ञापनदाता अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।” ये विज्ञापनदाता परफॉर्मेंस आधारित और हमेशा एक्टिव रहते हैं, जिससे कीमतों और प्लेटफॉर्म की दिशा तय होती है।

CTV का बाजार भी 2025 में दोगुना होकर ₹6,000 करोड़ हो गया। जब इसे लीनियर टीवी के साथ जोड़ा गया तो बड़े स्क्रीन पर विज्ञापन असल में बढ़े हैं। उन्होंने कहा, “वीडियो बजट खत्म नहीं हो रहे, बल्कि नए प्लेटफॉर्म में बंट रहे हैं।”

हालांकि डिजिटल 60% पर पहुंच गया है, फिर भी सैम बलसारा ने चेतावनी दी कि ज्यादा एकतरफा झुकाव ठीक नहीं। उन्होंने कहा, “ब्रैंडिंग के बिना सिर्फ परफॉर्मेंस पर ध्यान देना चीनी जैसा है- तुरंत असर देता है, लेकिन लंबे समय में महंगा पड़ता है।” उन्होंने 60:40 के ब्रैंड और एक्टिवेशन संतुलन को आज भी जरूरी बताया।

उन्होंने कहा कि भारत अब ‘एलोकेशन एरा’ में प्रवेश कर चुका है। “सवाल अब यह नहीं है कि हम कितना खर्च कर रहे हैं, बल्कि यह है कि हर रुपया कहां जा रहा है।” उन्होंने साफ कहा कि अब साफ-साफ फैसले लेने होंगे, इंटीग्रेटेड मापदंड अपनाने होंगे और अलग-अलग KPI की बजाय पूरे सिस्टम की सोच रखनी होगी। तेजी से बढ़ते बाजार में गलतियां छिप जाती हैं, लेकिन परिपक्व बाजार में गलत बजट बंटवारा तुरंत नुकसान पहुंचाता है।

PMAR 2026 के मुताबिक अब बहस डिजिटल बनाम पारंपरिक की नहीं रही। असली मुद्दा है समझदारी से बजट का बंटवारा, क्योंकि डिजिटल का दबदबा अब आने वाला नहीं, बल्कि आ चुका है।


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