BARC संकट से IPL तक, Connected TV कैसे बन रहा है विज्ञापन का नया बादशाह?

स्मार्ट टीवी की गिरती कीमतें, तेज ब्रॉडबैंड-5G और OTT कंटेंट की भरमार ने Connected TV (CTV) को भारतीय मीडिया इंडस्ट्री की सबसे तेजी से बढ़ती कैटेगरी बना दिया है।

Vikas Saxena by
Published - Monday, 06 July, 2026
Last Modified:
Monday, 06 July, 2026
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देश में टेलीविजन देखने का तरीका बदल रहा है और साथ ही बदल रही है विज्ञापनदाताओं की सोच भी। स्मार्ट टीवी की गिरती कीमतें, तेज ब्रॉडबैंड-5G और OTT कंटेंट की भरमार ने Connected TV (CTV) को भारतीय मीडिया इंडस्ट्री की सबसे तेजी से बढ़ती कैटेगरी बना दिया है। 2026 में यह ट्रेंड और तेज हो गया है- IPL के रिकॉर्ड आंकड़े, BARC रेटिंग्स पर लगी अभूतपूर्व रोक और FIFA वर्ल्ड कप 2026 के भारतीय प्रसारण अधिकारों को लेकर हुआ विवाद, तीनों मिलकर बता रहे हैं कि टीवी विज्ञापन का केंद्र धीरे-धीरे CTV की तरफ खिसक रहा है।

Connected TV आखिर है क्या?

Connected TV का मतलब है इंटरनेट से जुड़ा टेलीविजन सेट, जिस पर OTT और स्ट्रीमिंग कंटेंट सीधे देखा जा सकता है। पारंपरिक केबल-डीटीएच टीवी में सिग्नल सैटेलाइट या केबल नेटवर्क से आता है, जबकि CTV में कंटेंट इंटरनेट के जरिए स्ट्रीम होता है- चाहे बिल्ट-इन स्मार्ट टीवी हो या Fire TV Stick, Android TV, Google TV जैसे बाहरी डिवाइस से जुड़ा सामान्य टीवी। CTV की ताकत यही है कि यह टीवी जैसा बड़ा, इमर्सिव क्रिएटिव फॉर्मेट और डिजिटल जैसी सटीक टारगेटिंग-मीजरमेंट क्षमता, दोनों एक साथ देता है।

भारत में कितनी तेजी से बढ़ रहा है CTV?

CTV के आकार पर अलग-अलग एजेंसियां अलग आंकड़े देती हैं, जो इस बात पर निर्भर करता है कि वे "एक्टिव यूजर", "वीकली एक्टिव घर" या "कुल पहुंच वाले घर", किसे माप रही हैं। मीडिया रिसर्च एजेंसी Ormax के मुताबिक, भारत में एक्टिव CTV यूजर बेस लगभग 129.2 मिलियन तक पहुंच गया है, जो करीब 35-40 मिलियन CTV घरों के बराबर है और एक ही साल में इसमें 87 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई। इसी दौर में भारत के कुल OTT यूजर्स 600 मिलियन को पार कर गए, जो देश की आबादी का लगभग 41 प्रतिशत है।

मार्च 2026 में आई FICCI-EY मीडिया एंड एंटरटेनमेंट रिपोर्ट 2026 इसे थोड़ा अलग तरीके से मापती है, इसके मुताबिक 2025 में भारत में करीब 68 मिलियन CTV घर थे, जिनमें से लगभग 40 मिलियन वीकली तौर पर एक्टिव थे (2024 के 30 मिलियन से बड़ी बढ़ोतरी) और CTV विज्ञापन रेवेन्यू सालाना 42 प्रतिशत बढ़कर लगभग ₹9,900 करोड़ तक पहुंच गया। यही रिपोर्ट बताती है कि 2028 तक CTV घर 90 मिलियन से ज्यादा हो सकते हैं, जिनमें से करीब 67 मिलियन वीकली एक्टिव होंगे। भारतीय दर्शक अब रोजाना औसतन 3.5 घंटे से ज्यादा टीवी स्क्रीन पर बिताते हैं और भारत का स्मार्ट टीवी-OTT बाजार 2026 में लगभग 26.39 अरब डॉलर का है, जो 2031 तक करीब 60 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।

विज्ञापनदाता CTV की तरफ क्यों भाग रहे हैं?

जवाब सीधा है- टारगेटिंग और मेजरेबिलिटी। पारंपरिक टीवी में एक ही विज्ञापन सभी को एक जैसा दिखता है, जबकि CTV पर एक ही शो देख रहे दो घरों को उम्र, शहर, इनकम या पसंद के हिसाब से अलग विज्ञापन दिखाया जा सकता है, इसे "एड्रेसेबल टीवी" कहते हैं। CTV विज्ञापन खर्च के अनुमान भी रिपोर्ट-दर-रिपोर्ट काफी अलग हैं- dentsu-e4m इसे 2025 में ₹1,500-1,800 करोड़ के आसपास आंकता है, जबकि FICCI-EY 2026 रिपोर्ट इसे 42 प्रतिशत सालाना ग्रोथ के साथ लगभग ₹9,900 करोड़ तक ले जाती है, क्योंकि अलग-अलग एजेंसियां "CTV विज्ञापन" की परिभाषा और स्कोप अलग-अलग रखती हैं। IPL 2026 में बेस CTV CPM 10-सेकंड स्पॉट के लिए लगभग ₹600 रहा, जबकि बड़े मुकाबलों की बंडल डील में यह ₹21 लाख तक भी पहुंचा। यह अंतर बताता है कि CTV की अपनी अलग प्राइसिंग लॉजिक है।

अमेरिका में यह बदलाव और आगे है। CTV खर्च 2026 में लगभग 37.95 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले साल से 14-14.5 प्रतिशत ज्यादा है और वहां का 84 प्रतिशत CTV इन्वेंटरी प्रोग्रामेटिक तरीके से बिकता है। ग्लोबल स्तर पर लीनियर टीवी की हिस्सेदारी घटकर लगभग 12 प्रतिशत रह गई है, जबकि CTV 2030 तक वीडियो विज्ञापन खर्च के 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से तक पहुंचने की राह पर है।

BARC रेटिंग्स पर रोक- मौका या चुनौती?

2026 की सबसे बड़ी न्यूज स्टोरी टीवी मीजरमेंट को लेकर रही। सरकार की नई TV Ratings Policy 2026 के तहत रेटिंग एजेंसियों के लिए सख्त गवर्नेंस नियम अनिवार्य किए गए और जुलाई 2026 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने BARC इंडिया को निर्देश दिया कि लाइसेंस रिन्यू होने तक वह किसी भी जॉनर की वीकली रेटिंग्स प्रकाशित नहीं कर सकता। इस "डेटा-डार्क पीरियड" का सीधा असर विज्ञापनदाताओं-एजेंसियों पर पड़ रहा है, जो प्लानिंग-प्राइसिंग के लिए BARC डेटा पर निर्भर रहते थे। FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लीनियर टीवी का विज्ञापन रेवेन्यू 2025 में करीब ₹26,300 करोड़ का था (जो लगातार चौथे साल गिरा) और मीजरमेंट करेंसी का अचानक गायब होना इतने बड़े मार्केट के लिए बड़ी चुनौती है। जानकारों का मानना है कि इस अनिश्चितता में कुछ बजट उन प्लेटफॉर्म की तरफ शिफ्ट हो सकता है जहां मीजरमेंट पहले से डिजिटल-नेटिव और भरोसेमंद है, यानी CTV को अप्रत्यक्ष फायदा मिल सकता है।

इसी बीच BARC और Nielsen ने मिलकर एक क्रॉस-मीडिया टूल- BARC | Nielsen ONE Ads लॉन्च किया है, जो लीनियर टीवी-OTT-मोबाइल-डेस्कटॉप को मिलाकर डीड्युप्लिकेटेड रीच देता है। JioHotstar इसे अपनाने वाला पहला प्लेटफॉर्म बना और IPL 2026 इसका सबसे बड़ा परीक्षण रहा। पिछले ICC T20 वर्ल्ड कप पायलट में टीवी-डिजिटल ऑडियंस का ओवरलैप 10 प्रतिशत से कम पाया गया, यानी विज्ञापनदाताओं को इंक्रीमेंटल रीच का भरोसा मिलता है।

IPL 2026 ने CTV को कैसे मजबूत किया

क्रिकेट भारत में CTV ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन है। IPL 2026 के ओपनिंग वीकेंड में टीवी-डिजिटल मिलाकर 51.5 करोड़ से ज्यादा दर्शकों तक पहुंच बनी, जो पिछले ओपनर से 26 प्रतिशत ज्यादा थी। CTV पर रीच में 30 प्रतिशत और पीक कंकरेंसी में 61 प्रतिशत की उछाल दर्ज हुई। मई 2026 में JioStar ने बताया कि सीजन ने 110 करोड़ दर्शकों की सबसे बड़ी संयुक्त पहुंच हासिल की, जिसमें CTV रीच में 25 प्रतिशत और वॉच-टाइम में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। क्षेत्रीय भाषाओं में वॉच-टाइम 42 प्रतिशत तक बढ़ा, यानी ग्रोथ इंजन अब हिंदी-अंग्रेजी तक सीमित नहीं रहा। सीजन में पिछले साल के मुकाबले 125 नए विज्ञापनदाता जुड़े। 2025 सीजन ने ही 840 अरब मिनट व्यूइंग और 100 करोड़ से ज्यादा यूनीक व्यूअर्स का रिकॉर्ड बनाया था, जो Reliance-Disney के विलय से बने JioStar की AVOD-SVOD हाइब्रिड रणनीति का नतीजा है। आईपीएल का पूरा इकोसिस्टम अब लगभग 18.5 अरब डॉलर आंका जाता है।

FIFA वर्ल्ड कप 2026 ने क्या सिखाया?

यहां कहानी उम्मीद से अलग निकली। शुरुआती अनुमान था कि JioHotstar जैसा बड़ा प्लेटफॉर्म ही FIFA वर्ल्ड कप 2026 के भारतीय अधिकार खरीदेगा, आखिर 2022 कतर वर्ल्ड कप के अधिकार भी उसकी पूर्ववर्ती कंपनी Viacom18 के पास ही थे। FIFA ने भारत के लिए 2026 और 2030 वर्ल्ड कप के बंडल अधिकारों की शुरुआती मांग करीब 100 मिलियन डॉलर रखी थी, जिसे बाद में घटाकर लगभग 60 मिलियन डॉलर कर दिया गया। लेकिन उत्तर अमेरिका में हो रहे मुकाबलों का समय भारतीय घड़ी के हिसाब से आधी रात के बाद का होने के कारण, जो प्राइम टाइम विज्ञापन के लिए बेहद प्रतिकूल है, JioStar ने सिर्फ करीब 20 मिलियन डॉलर का ऑफर दिया, जिसे FIFA ने नाकाफी मानकर ठुकरा दिया और JioStar बातचीत से बाहर हो गया। आखिरकार किकऑफ से सिर्फ दस दिन पहले, 1 जून 2026 को, Zee Entertainment ने करीब 30-40 मिलियन डॉलर की डील के साथ भारत में प्रसारण अधिकार हासिल किए, यह डील कुल 39 FIFA इवेंट्स को कवर करती है, जिसमें 2026-2030 वर्ल्ड कप और 2027 महिला वर्ल्ड कप शामिल हैं और 2034 तक वैध है।

नतीजतन भारत में FIFA का विज्ञापन प्रदर्शन क्रिकेट टूर्नामेंट जैसा बड़ा नहीं रहा। Zee ने लगभग एक दर्जन विज्ञापनदाता जोड़े, महिंद्रा, डियाजियो, एपल, पर्नोड रिकार्ड, मोंडेलेज जैसे ब्रांड, जो क्रिकेट प्रॉपर्टीज के मुकाबले काफी छोटा आंकड़ा है। यह घटनाक्रम एक अहम सबक देता है: CTV और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म भारत में विज्ञापन इन्वेंटरी की कीमत सिर्फ ऑडियंस साइज से नहीं, बल्कि "समय" और सांस्कृतिक जुड़ाव के हिसाब से भी तय करते हैं।

FAST चैनल्स और नई भूमिका

Samsung TV Plus, LG Channels, Xiaomi TV+, Google TV जैसे FAST (Free Ad-Supported Streaming TV) चैनल भारत में नया विज्ञापन इन्वेंटरी सोर्स बन रहे हैं, दर्शक को कंटेंट मुफ़्त मिलता है, कीमत विज्ञापनों से वसूली जाती है। ग्लोबल FAST चैनल रेवेन्यू के 2027 तक 12 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है और भारत में बढ़ती स्मार्ट टीवी पैठ इसके लिए उपजाऊ जमीन तैयार कर रही है।

किन सेक्टर्स का सबसे ज्यादा दांव?

IPL जैसी बड़ी स्पोर्ट्स प्रॉपर्टीज पर सबसे ज्यादा विज्ञापन देने वाले सेक्टर्स में ऑटो, FMCG, स्मार्टफोन, ई-कॉमर्स, BFSI, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, रियल एस्टेट, गेमिंग, एजुकेशन और हेल्थकेयर शामिल हैं। Pitch Madison Advertising Report (PMAR) 2026 के मुताबिक भारत का कुल विज्ञापन खर्च 2025 में लगभग ₹1.55 लाख करोड़ के पार पहुंच गया, जिसमें डिजिटल विज्ञापन की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत रही, यानी CTV जैसे फॉर्मेट, जो टीवी जैसा बड़ा स्क्रीन अनुभव देते हुए डिजिटल जैसी टारगेटिंग क्षमता रखते हैं, आने वाले वर्षों में बजट का बड़ा हिस्सा खींच सकते हैं।

CTV ऐडवरटाइजिंग में AI की एंट्री

दुनिया भर में AI-पर्सनलाइज्ड क्रिएटिव के 2027 तक कुल CTV विज्ञापनों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा बनने का अनुमान है। भारत में ब्रांड जियो-एक्सपेरिमेंट्स जैसे तरीकों से यह मापने की कोशिश कर रहे हैं कि पर्सनलाइज्ड क्रिएटिव जेनरिक स्पॉट से कितना बेहतर काम करता है। हालांकि भाषाई-सांस्कृतिक विविधता के चलते सही पर्सनलाइजेशन अभी चुनौती है, ज्यादातर ब्रांड एक ही जेनरिक हिंदी स्पॉट पूरे देश में चलाते हैं, जो क्षेत्रीय दर्शकों से पूरी तरह नहीं जुड़ पाता।

भारत बनाम बाकी दुनिया

अमेरिका में CTV बाजार 2026 में लगभग 38 अरब डॉलर, यूके में 3.25 अरब डॉलर, चीन में 3.47 अरब डॉलर और जापान में करीब 1 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। इनके मुकाबले भारत का CTV बाजार अभी शुरुआती चरण में है, पर ग्रोथ रेट के मामले में उभरते बाजार वैश्विक औसत से आगे निकल सकते हैं। परिपक्व बाजारों में CTV ग्रोथ स्थिर होकर 11-17 प्रतिशत पर आ गई है, जबकि भारत में शिफ्ट अभी पूरा नहीं हुआ, इसलिए यहां लंबे समय तक तेज ग्रोथ की गुंजाइश बनी रहेगी।

चुनौतियां जो अब भी बाकी हैं

CTV की तेज ग्रोथ के बीच कुछ चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी है मीजरमेंट स्टैंडर्ड की, अलग-अलग प्लेटफॉर्म अपने तरीके से आंकड़े देते हैं, जिससे तुलना मुश्किल होती है। एक ही व्यक्ति स्मार्ट टीवी-मोबाइल दोनों पर एक OTT ऐप इस्तेमाल करे तो उसे दो अलग डिवाइस गिना जा सकता है, जिससे फ्रीक्वेंसी कैपिंग गड़बड़ाती है और एक ही दर्शक को बार-बार वही विज्ञापन दिखाया जा सकता है। DoubleVerify की 2026 की ग्लोबल रिपोर्ट के मुताबिक 2026 की पहली तिमाही में CTV ऐड फ्रॉड स्कीमों की संख्या पिछले साल की इसी तिमाही से 140 प्रतिशत बढ़ी, क्योंकि धोखाधड़ी करने वाले तत्व अब AI टूल्स की मदद से प्रीमियम वीडियो इन्वेंटरी की तरफ रुख कर रहे हैं। प्राइवेसी नियमों का पालन, बंटा हुआ इन्वेंटरी और प्रीमियम इन्वेंटरी की सीमित उपलब्धता भी बड़ी बाधाएं हैं।

आगे क्या होगा?

FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में CTV घर 2028 तक 90 मिलियन से ज्यादा हो सकते हैं, जिनमें से करीब 67 मिलियन वीकली एक्टिव होंगे, जबकि 2030 तक पे टीवी, फ्री टीवी और CTV मिलाकर कुल टीवी सब्सक्रिप्शन 212 मिलियन तक पहुंच सकते हैं। ग्लोबल स्तर पर CTV 2030 तक वीडियो विज्ञापन खर्च के 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से तक पहुंच सकता है। आने वाले वर्षों में शॉपेबल ऐड, इंटरैक्टिव कॉमर्स और एड्रेसेबल टीवी जैसे फॉर्मेट और मजबूत होंगे, बशर्ते मीजरमेंट के सवालों का समाधान निकले।

कुल मिलाकर भारत में CTV अब निच सेगमेंट नहीं, मुख्यधारा की मीडिया प्लानिंग का हिस्सा बन चुका है। BARC रेटिंग्स पर रोक ने मीजरमेंट को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया है, IPL ने दिखाया है कि CTV कितनी तेजी से बड़े पैमाने पर दर्शक जोड़ सकता है और FIFA वर्ल्ड कप के मामले ने साफ किया है कि सिर्फ ग्लोबल स्केल किसी प्रॉपर्टी को भारतीय विज्ञापन बाजार में सफल नहीं बना सकता, समय, सांस्कृतिक जुड़ाव और स्थानीय आदतें उतनी ही अहम हैं। रफ्तार साफ तौर पर स्क्रीन के इस नए रूप की तरफ ही है।

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सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया से जुड़े कौशिक के मिश्रा

कौशिक के मिश्रा (Kausik K Misra) ने सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया (Sony Pictures Networks India) में सोनी आथ (Sony AATH) के हेड – प्रोग्रामिंग (नॉन-फिक्शन) के रूप में नई जिम्मेदारी संभाली है।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 04 July, 2026
Last Modified:
Saturday, 04 July, 2026
kaushikkmishra

करीब एक साल के ब्रेक के बाद टेलीविजन इंडस्ट्री के वरिष्ठ प्रोफेशनल कौशिक के मिश्रा (Kausik K Misra) ने सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया (Sony Pictures Networks India) में नई पारी शुरू की है।

उन्हें सोनी आथ (Sony AATH) का हेड – प्रोग्रामिंग (नॉन-फिक्शन) (Head – Programming, Non-fiction) नियुक्त किया गया है। इस नई भूमिका के साथ उन्होंने मुंबई (Mumbai) से कोलकाता (Kolkata) का रुख किया है।

कौशिक के मिश्रा (Kausik K Misra) ने लिंक्डइन (LinkedIn) पोस्ट के जरिए अपनी नई जिम्मेदारी की जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा कि नई भूमिका को लेकर वह उत्साहित हैं, हालांकि मन में थोड़ी घबराहट भी है। उन्होंने इसे अपने करियर के साथ-साथ व्यक्तिगत जीवन का भी नया अध्याय बताया।

उन्होंने अपनी वापसी का श्रेय अंबेश तिवारी (Ambesh Tiwari) को देते हुए कहा कि उनके भरोसे और समर्थन ने उन्हें एक बार फिर टेलीविजन इंडस्ट्री में लौटने का आत्मविश्वास दिया। सोनी (Sony) से जुड़ने से पहले कौशिक के मिश्रा (Kausik K Misra) लगभग 15 वर्षों तक ज़ी एंटरटेनमेंट (Zee Entertainment) के साथ जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने मैनेजमेंट ट्रेनी (Management Trainee) के रूप में शुरुआत की और बाद में हेड – नॉन-फिक्शन कंटेंट (Head – Non-fiction Content) तक का सफर तय किया।

वह करीब 140 करोड़ रुपये के वार्षिक बजट का प्रबंधन करते थे और कई प्रमुख नॉन-फिक्शन कार्यक्रमों को मल्टी-प्लेटफॉर्म फ्रेंचाइजी (Multi-platform Franchise) के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने अप्रैल 2025 में ज़ी एंटरटेनमेंट (Zee Entertainment) छोड़ दिया था। इसके बाद उन्होंने लगभग एक वर्ष का ब्रेक लिया, जिसके दौरान उन्होंने एकल यात्राएं (Solo Travels) कीं, विपश्यना (Vipassana) रिट्रीट में हिस्सा लिया और परिवार के साथ समय बिताया।

अपने पोस्ट में कौशिक के मिश्रा (Kausik K Misra) ने यह भी कहा कि करियर ब्रेक के दौरान कई बार अनिश्चितता महसूस होती है, लेकिन वर्षों में बनाई गई पेशेवर साख और रिश्ते सही समय पर नई संभावनाओं के रूप में सामने आते हैं। अब वह सोनी आथ (Sony AATH) के साथ नॉन-फिक्शन कंटेंट के क्षेत्र में नई जिम्मेदारियों के लिए तैयार हैं।

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BARC रेटिंग्स पर रोक से टीवी रेटिंग मार्केट में निवेशकों की रुचि हो सकती है कम

नई टीवी रेटिंग पॉलिसी लागू होने के कई महीने बाद भी देश में एक भी नई टीवी ऑडियंस मीजरमेंट एजेंसी ने लाइसेंस के लिए आवेदन नहीं किया है।

Samachar4media Bureau by
Published - Friday, 03 July, 2026
Last Modified:
Friday, 03 July, 2026
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इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

नई टीवी रेटिंग पॉलिसी लागू होने के कई महीने बाद भी देश में एक भी नई टीवी ऑडियंस मीजरमेंट एजेंसी ने लाइसेंस के लिए आवेदन नहीं किया है। इस साल सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम में बड़ा बदलाव करते हुए ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) के एकाधिकार को खत्म करने और कई रेटिंग एजेंसियों के लिए रास्ता खोलने का फैसला किया था। लेकिन इस मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक, अब तक किसी भी कंपनी ने टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सेवा शुरू करने के लिए औपचारिक आवेदन नहीं किया है।

यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब मंत्रालय ने BARC को नई टेलीविजन रेटिंग एजेंसीज़ पॉलिसी 2026 के तहत लाइसेंस का नवीनीकरण होने तक सभी टीवी रेटिंग जारी करने से रोक दिया है। इस फैसले के बाद पूरे टीवी इंडस्ट्री में पहली बार सभी श्रेणियों की रेटिंग्स पर रोक लग गई है। इससे ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री में यह चिंता बढ़ गई है कि टीवी रेटिंग सिस्टम से जुड़ा नियामकीय माहौल अब पहले से ज्यादा अनिश्चित हो गया है, जिससे इस क्षेत्र में नए निवेशकों की रुचि कम हो सकती है।

एक वरिष्ठ मीडिया अधिकारी ने कहा कि नई पॉलिसी का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा बढ़ाना था, लेकिन अगर लाइसेंस नवीनीकरण का आवेदन देने के बावजूद किसी मौजूदा रेटिंग एजेंसी का काम प्रशासनिक आदेश से रोका जा सकता है, तो नई कंपनियां निश्चित रूप से इस क्षेत्र में निवेश से पहले नियामकीय जोखिम पर सवाल उठाएंगी।

मंत्रालय ने BARC को निर्देश दिया है कि जब तक उसे नई पॉलिसी के तहत नया लाइसेंस नहीं मिल जाता, तब तक वह कोई भी टीवी रेटिंग जारी न करे। जबकि BARC पहले ही लाइसेंस नवीनीकरण के लिए आवेदन कर चुकी है। इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि लाइसेंस का नवीनीकरण एक सामान्य नियामकीय प्रक्रिया है, लेकिन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही कामकाज रोक देना पूरे सेक्टर के लिए अनिश्चितता पैदा करता है।

1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा निवेश की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में एक भरोसेमंद टीवी ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम तैयार करना पहले से ही बेहद महंगा काम है। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, देशभर में ऐसी व्यवस्था खड़ी करने के लिए 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करना पड़ सकता है।

इसके लिए हजारों घरों में पीपल मीटर लगाने, पूरे देश में फील्ड ऑपरेशन चलाने, डेटा प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने और लगातार सैंपल का दायरा बढ़ाने जैसी बड़ी व्यवस्थाएं करनी पड़ती हैं। डिजिटल बिजनेस की तरह इसमें शुरुआत से ही भारी पूंजी निवेश करना पड़ता है और आमदनी आने में कई साल लग सकते हैं।

एक अन्य इंडस्ट्री अधिकारी ने कहा कि यह कोई साधारण सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म शुरू करने जैसा नहीं है। यह देश के सबसे बड़े डेटा कलेक्शन नेटवर्क में से एक तैयार करने जैसा है। ऐसे में निवेशक सबसे पहले यह देखेंगे कि नियामकीय माहौल कितना स्थिर है।

हालांकि नई पॉलिसी में कागजों पर कई रेटिंग एजेंसियों को काम करने की अनुमति देकर प्रवेश आसान बनाया गया है, लेकिन इंडस्ट्री का मानना है कि अगर संचालन के दौरान भी इस तरह के हस्तक्षेप होंगे तो कारोबार का पूरा गणित बदल जाएगा।

संचालन में हस्तक्षेप पर उठे सवाल

इंडस्ट्री विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा विवाद सिर्फ लाइसेंस नवीनीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात से भी जुड़ा है कि सरकार किसी ऑडियंस मीजरमेंट कंपनी के रोजमर्रा के संचालन में कितनी भूमिका निभा सकती है।

दुनिया भर में सरकारें रेटिंग एजेंसियों के लिए नियम, मानक और लाइसेंस तय करती हैं, लेकिन यदि संचालन भी प्रशासनिक आदेशों पर निर्भर हो जाए, तो यह निवेशकों के लिए बड़ा जोखिम बन जाता है।

ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री के एक वरिष्ठ विशेषज्ञ ने कहा कि अगर सभी नियमों का पालन करने के बावजूद किसी कंपनी का संचालन प्रशासनिक आदेशों पर निर्भर रहेगा, तो निवेशक उस जोखिम को ध्यान में रखकर ही निवेश करेंगे।

कई अधिकारियों ने यह भी सवाल उठाया कि क्या भविष्य में भी इसी तरह के हस्तक्षेप ऑडियंस मीजरमेंट कंपनियों के कामकाज का हिस्सा बन सकते हैं। उनका कहना है कि चिंता सिर्फ मौजूदा रेटिंग ब्लैकआउट की नहीं है, बल्कि इस बात की भी है कि क्या आगे भी ऐसा माहौल बना रहेगा।

प्रतिस्पर्धा अभी सिर्फ कागजों तक सीमित

इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि सरकार का मकसद टीवी रेटिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना था, लेकिन मौजूदा हालात में यह लक्ष्य हासिल करना और मुश्किल हो सकता है।

नई टीवी रेटिंग एजेंसीज़ पॉलिसी में पहले वाली उस व्यवस्था को खत्म किया गया, जिसके तहत पूरे देश में प्रभावी रूप से सिर्फ एक ही रेटिंग एजेंसी काम कर रही थी। उम्मीद थी कि अब देशी और विदेशी कंपनियां भारतीय बाजार में आने पर विचार करेंगी।

लेकिन इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, अब तक किसी भी नई रेटिंग एजेंसी ने लाइसेंस के लिए औपचारिक आवेदन नहीं किया है।

इंडस्ट्री अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा घटनाक्रम निवेशकों की दिलचस्पी और कम कर सकता है। एक अधिकारी ने कहा कि यदि कोई कंपनी 1,000 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा का निवेश करने पर विचार करेगी, तो वह सबसे पहले यह देखेगी कि मौजूदा एजेंसी के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है। निवेशकों के लिए सबसे अहम चीज़ भरोसेमंद और अनुमानित नियामकीय व्यवस्था होती है।

पूरे इंडस्ट्री पर पड़ रहा असर

रेटिंग्स बंद होने का असर सिर्फ टीवी चैनलों तक सीमित नहीं है। टीवी रेटिंग्स विज्ञापनदाताओं, मीडिया एजेंसियों और ब्रॉडकास्टर्स के लिए सबसे अहम आधार होती हैं। इन्हीं के आधार पर विज्ञापन दरें तय होती हैं, मीडिया प्लानिंग होती है और कार्यक्रमों की रणपॉलिसी बनाई जाती है।

साप्ताहिक रेटिंग्स नहीं आने से न्यूज चैनलों के पास दर्शकों के प्रदर्शन को मापने का अहम पैमाना नहीं बचा है, जबकि विज्ञापनदाताओं के लिए भी अपने अभियानों की सफलता का निष्पक्ष आकलन करना मुश्किल हो गया है।

ब्रॉडकास्टर्स का कहना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो विज्ञापन सौदों, मीडिया प्लानिंग और नए कार्यक्रमों में निवेश पर भी असर पड़ सकता है।

यह ताजा रोक ऐसे समय आई है, जब इससे पहले न्यूज चैनलों की रेटिंग्स चार सप्ताह तक बंद रहने के बाद जून के आखिर में दोबारा शुरू हुई थीं। अब नए निर्देश के बाद सभी टीवी श्रेणियों की रेटिंग्स अगली सूचना तक रोक दी गई हैं।

पॉलिसी और अमल में दिख रहा विरोधाभास

मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति सरकार की मंशा और उसके क्रियान्वयन के बीच विरोधाभास को सामने लाती है। एक तरफ सरकार कई रेटिंग एजेंसियों को अनुमति देकर प्रतिस्पर्धा बढ़ाना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ लाइसेंस और संचालन को लेकर बनी अनिश्चितता उसी कारोबार को कम आकर्षक बना रही है, जिसमें नई कंपनियों को आने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

एक वरिष्ठ टीवी अधिकारी ने कहा कि प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के उद्देश्य पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन प्रतिस्पर्धा तभी आएगी जब निवेश होगा। निवेश तभी होगा जब भरोसा होगा और भरोसा तभी बनता है, जब नियामकीय व्यवस्था स्पष्ट और स्थिर हो।

इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि जब तक लाइसेंस प्रक्रिया और संचालन को लेकर स्पष्टता नहीं आती, तब तक भारत का टीवी ऑडियंस मीजरमेंट बाजार ऐसा क्षेत्र बना रह सकता है, जहां प्रतिस्पर्धा केवल पॉलिसी में दिखाई दे, लेकिन व्यवहार में नहीं।

 

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''जी मीडिया'' ने कुणाल चित्रवंशी को एवीपी-ब्रैंड सॉल्यूशंस किया नियुक्त

‘जी मीडिया’ से जुड़ने से पहले वह ‘टीवी9 नेटवर्क’ (TV9 Network) में असिस्टेंट जनरल मैनेजर (Creative Brand Solutions) के पद पर कार्यरत थे।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 02 July, 2026
Last Modified:
Thursday, 02 July, 2026
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मीडिया प्रोफेशनल कुणाल चित्रवंशी ने जी मीडिया (Zee Media) में Ideation Lead, Assistant Vice President (AVP)– Brand Solutions के पद पर जॉइन किया है। उन्होंने दो जुलाई से अपनी नई जिम्मेदारी संभाल ली है।

कुणाल चित्रवंशी के पास ब्रैंड सॉल्यूशंस और कंटेंट क्रिएशन के क्षेत्र में एक दशक से अधिक का अनुभव है। ‘जी मीडिया’ से जुड़ने से पहले वह ‘टीवी9 नेटवर्क (TV9 Network) में असिस्टेंट जनरल मैनेजर (Creative Brand Solutions) के पद पर कार्यरत थे।

वहां उन्होंने क्रिएटिव इंटीग्रेशन का नेतृत्व किया और कई प्रमुख ब्रैंड्स के लिए प्रभावशाली कैंपेन विकसित किए।

अपने करियर के दौरान कुणाल रेडियो, इवेंट्स, डिजिटल और एडवरटाइजिंग एजेंसियों समेत मीडिया के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर चुके हैं। उन्हें आइडिएशन, कॉन्सेप्चुअलाइजेशन और इंटीग्रेटेड ब्रैंड कैंपेन तैयार करने का व्यापक अनुभव है।

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BARC रेटिंग्स पर रोक, टीवी इंडस्ट्री में अनिश्चितता; विज्ञापन व प्रोग्रामिंग पर पड़ेगा असर

इस फैसले के बाद अब सिर्फ न्यूज चैनल ही नहीं, बल्कि जनरल एंटरटेनमेंट, स्पोर्ट्स, मूवी, रीजनल और इन्फोटेनमेंट समेत सभी टीवी चैनलों की साप्ताहिक TRP रेटिंग्स पर रोक लग गई है।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 02 July, 2026
Last Modified:
Thursday, 02 July, 2026
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देश की टेलीविजन इंडस्ट्री पिछले एक दशक की सबसे बड़ी ऑडियंस मेजरमेंट चुनौती का सामना कर रही है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) को निर्देश दिया है कि वह टीवी रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत नया लाइसेंस मिलने तक सभी टीवी चैनलों की रेटिंग जारी करना बंद कर दे।

इस फैसले के बाद अब सिर्फ न्यूज चैनल ही नहीं, बल्कि जनरल एंटरटेनमेंट, स्पोर्ट्स, मूवी, रीजनल और इन्फोटेनमेंट समेत सभी टीवी चैनलों की साप्ताहिक TRP रेटिंग्स पर रोक लग गई है। यानी फिलहाल टीवी इंडस्ट्री के पास दर्शकों की संख्या मापने का कोई साझा और आधिकारिक पैमाना नहीं रहेगा।

इससे पहले 'एक्सचेंज4मीडिया' ने सबसे पहले खबर दी थी कि MIB ने BARC को तब तक सभी रेटिंग्स जारी करने से रोक दिया है, जब तक उसका लाइसेंस नए नियमों के तहत रिन्यू नहीं हो जाता और वह पूरी तरह नए नियमों का पालन नहीं करता।

हालांकि मंत्रालय का कहना है कि BARC नया लाइसेंस मिलने के बाद ही रेटिंग्स दोबारा जारी कर सकेगा। लेकिन ब्रॉडकास्टिंग, विज्ञापन और मीडिया एजेंसियों से जुड़े एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसका सीधा असर विज्ञापन सौदों, मीडिया प्लानिंग, प्रोग्रामिंग रणनीति और निवेशकों के साथ होने वाले संवाद पर पड़ेगा।

इससे पहले भी दो बार पूरे टीवी इंडस्ट्री की रेटिंग्स रोकी जा चुकी हैं। पहली बार 2015 में, जब TAM से BARC की प्रणाली लागू की जा रही थी। दूसरी बार 2019 में, जब TRAI के न्यू टैरिफ ऑर्डर (NTO) के लागू होने के बाद दर्शकों के देखने के पैटर्न में बड़े बदलाव आए थे।

टीवी इंडस्ट्री की 'करेंसी' पर लगा ब्रेक

TRP रेटिंग्स को टीवी इंडस्ट्री की सबसे अहम "करेंसी" माना जाता है। इन्हीं के आधार पर विज्ञापन दरें तय होती हैं, स्पॉन्सरशिप डील होती हैं, नए कार्यक्रमों में निवेश होता है और चैनलों के बीच प्रतिस्पर्धा का आकलन किया जाता है।

अब जब हर हफ्ते आने वाली रेटिंग्स बंद हो गई हैं, तो चैनलों के पास अपनी लोकप्रियता साबित करने का स्वतंत्र पैमाना नहीं रहेगा। वहीं विज्ञापनदाता और मीडिया एजेंसियां भी यह तय नहीं कर पाएंगी कि किस चैनल पर कितना विज्ञापन खर्च करना है।

एक बड़े टीवी नेटवर्क के वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "सबसे बड़ा नुकसान फैसले लेने की प्रक्रिया को होगा। टीवी विज्ञापन पूरी तरह मापे जा सकने वाले नतीजों पर आधारित होता है। जब वही मापदंड नहीं रहेगा, तो हर चैनल अपने-अपने आंकड़े पेश करेगा और बातचीत अधिक व्यक्तिपरक हो जाएगी।"

एक बड़ी मीडिया एजेंसी के अधिकारी ने इस स्थिति की तुलना शेयर बाजार से करते हुए कहा, "यह ऐसा है जैसे स्टॉक एक्सचेंज में शेयरों की कीमत तय करने वाली पूरी व्यवस्था ही बंद कर दी जाए।"

FIFA World Cup के दौरान बढ़ी चुनौती

BARC रेटिंग्स पर रोक ऐसे समय लगी है, जब इस साल का सबसे बड़ा खेल आयोजन 2026 FIFA World Cup भी होने वाला है। भारत में इसके मीडिया अधिकार Zee Entertainment के पास हैं।

हालांकि वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में विज्ञापनदाता आमतौर पर TRP से ज्यादा इवेंट की लोकप्रियता को देखते हैं, लेकिन अभियान खत्म होने के बाद उसके असर को मापना, विज्ञापन की कीमत तय करना और दर्शकों तक पहुंच साबित करना अब पहले की तुलना में ज्यादा मुश्किल हो सकता है।

Zee ने 2034 तक होने वाले 39 FIFA टूर्नामेंट्स के प्रसारण अधिकार हासिल किए हैं। ऐसे में कंपनी को अब BARC डेटा की जगह डिजिटल एनालिटिक्स, रीच के अनुमान और विज्ञापनदाताओं के लिए तैयार किए गए विशेष आंकड़ों का सहारा लेना पड़ सकता है।

विज्ञापनदाता तलाशेंगे नए पैमाने

मीडिया एक्सपर्ट्स का मानना है कि TRP नहीं मिलने तक कंपनियां अब अपने कैंपेन के नतीजों, बिक्री के आंकड़ों, डिजिटल डेटा और ब्रॉडकास्टर्स द्वारा उपलब्ध कराए गए एनालिटिक्स पर ज्यादा भरोसा करेंगी।

एक बड़ी उपभोक्ता वस्तु कंपनी के वरिष्ठ मार्केटिंग अधिकारी ने कहा, "ब्रांड टीवी पर विज्ञापन देना बंद नहीं करेंगे, लेकिन हर हफ्ते TRP देखकर बजट बदलने की जो रणनीति होती थी, वह अब संभव नहीं होगी।"

एजेंसियों का कहना है कि पहले से तय वार्षिक और तिमाही विज्ञापन योजनाएं तुरंत प्रभावित नहीं होंगी, लेकिन नए कैंपेन, स्पॉन्सरशिप और चैनल-वार बजट तय करने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है, खासकर अगर यह रोक लंबी चली।

चैनलों की रणनीति पर भी असर

TRP रेटिंग्स बंद होने का असर चैनलों की रणनीति पर भी पड़ेगा। जिन चैनलों की रेटिंग हाल के महीनों में बेहतर हुई थी, वे अब अपनी बढ़त विज्ञापनदाताओं को नहीं दिखा पाएंगे। वहीं कमजोर प्रदर्शन करने वाले चैनलों पर भी फिलहाल सार्वजनिक दबाव कम रहेगा।

टीवी वितरण क्षेत्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "फिलहाल ऐसी स्थिति बन गई है जिसमें न कोई आधिकारिक तौर पर जीत रहा है और न हार रहा है। लेकिन जिन चैनलों ने रैंकिंग सुधारने में बड़ा निवेश किया था, उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान होगा क्योंकि वे उसका फायदा नहीं उठा पाएंगे।"

प्रोग्रामिंग टीमों के लिए भी यह चुनौती होगी, क्योंकि नए शो लॉन्च करना, कार्यक्रमों का समय बदलना, रियलिटी शो का फॉर्मेट तय करना और स्पोर्ट्स कंटेंट की रणनीति बनाना काफी हद तक साप्ताहिक TRP पर निर्भर करता है। अब उन्हें सोशल मीडिया, डिजिटल डेटा और उपभोक्ता सर्वे जैसे अन्य स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ेगा।

केबल और DTH कंपनियों पर भी असर

इसका असर केबल और DTH कंपनियों पर भी पड़ सकता है। चैनलों की पैकेजिंग, उनकी पोजिशनिंग और कैरिज फीस से जुड़े कई फैसले TRP के आधार पर लिए जाते हैं। ऐसे में डेटा की जगह व्यक्तिगत संबंधों और आपसी बातचीत की भूमिका बढ़ सकती है, जो लंबे समय तक टिकाऊ व्यवस्था नहीं मानी जाती।

पहले भी लग चुकी है TRP पर रोक

पूरे टीवी इंडस्ट्री की रेटिंग्स बंद होने की घटनाएं बेहद कम रही हैं। पहली बार अप्रैल 2015 में TAM से BARC की नई व्यवस्था लागू होने के दौरान सभी रेटिंग्स अस्थायी रूप से रोक दी गई थीं।

दूसरी बार 2019 में TRAI के न्यू टैरिफ ऑर्डर लागू होने के बाद चैनलों की पैकेजिंग और दर्शकों की आदतों में बड़े बदलाव के कारण BARC ने कुछ समय के लिए रेटिंग्स जारी करना बंद कर दिया था।

इसके बाद 2020 में कथित TRP हेरफेर विवाद के दौरान न्यूज चैनलों की रेटिंग्स लगभग 17 महीने तक बंद रहीं और 2022 में नई पद्धति के साथ दोबारा शुरू हुईं।

इस बार मामला अलग क्यों है?

इस बार की रोक पहले से अलग है। पहले रेटिंग्स तकनीकी बदलाव या बाजार में आए बदलावों की वजह से रोकी गई थीं, लेकिन इस बार कारण नया नियामकीय ढांचा है। नई टीवी रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत सभी रेटिंग एजेंसियों को नया पंजीकरण लेना अनिवार्य किया गया है। जब तक BARC को नया लाइसेंस नहीं मिलता, वह रेटिंग्स जारी नहीं कर सकती।

सबसे बड़ा सवाल- रेटिंग्स कब लौटेंगी?

मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े एक्सपर्ट्स का कहना है कि सबसे बड़ी जरूरत अब स्पष्ट समय-सीमा की है। एक सीनियर पॉलिसी एक्सपर्ट ने कहा, "अगर यह रुकावट कुछ समय की है तो इंडस्ट्री इसे संभाल सकता है। लेकिन सबसे बड़ी चिंता अनिश्चितता है। त्योहारी सीजन की विज्ञापन योजनाएं जल्द बननी हैं और सभी जानना चाहते हैं कि रेटिंग्स कब दोबारा शुरू होंगी।"

एक अन्य प्रसारण अधिकारी का कहना है कि यह पूरा घटनाक्रम भारत में केवल एक ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम पर निर्भरता को भी उजागर करता है। उनका मानना है कि यदि यह रोक लंबी चली तो देश में एक से अधिक ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम या वैकल्पिक डेटा स्रोत विकसित करने की बहस और तेज होगी।

फिलहाल स्थिति यह है कि टीवी चैनल, विज्ञापनदाता और मीडिया एजेंसियां इंडस्ट्री के सबसे अहम पैमाने के बिना काम करने को मजबूर हैं। जब तक BARC को नए नियमों के तहत लाइसेंस नहीं मिल जाता, तब तक भारत का टीवी इंडस्ट्री ऐसे दौर से गुजरेगा जहां अरबों रुपये के विज्ञापन सौदे तो होंगे, लेकिन उन्हें परखने के लिए साप्ताहिक TRP रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होगी।

 

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जी एंटरटेनमेंट ने FDI निवेश की खबरों का किया खंडन, कहा- रिपोर्ट का आधार नहीं पता

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) ने कंपनी में 418 करोड़ रुपये के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की खबरों को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया है।

Vikas Saxena by
Published - Thursday, 02 July, 2026
Last Modified:
Thursday, 02 July, 2026
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जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) ने कंपनी में 418 करोड़ रुपये के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की खबरों को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया है। कंपनी ने कहा है कि मीडिया में प्रकाशित खबर का आधार उसे नहीं पता और संबंधित अवधि में OFI Global China Fund LLC की ओर से कंपनी में कोई निवेश नहीं किया गया है।

कंपनी ने यह स्पष्टीकरण BSE और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की ओर से मांगे गए जवाब के बाद जारी किया। दोनों एक्सचेंजों ने The Economic Times में प्रकाशित "Zee Entertainment shares jump 6% after Rs 418 crore FDI approval" शीर्षक वाली खबर पर कंपनी से स्थिति स्पष्ट करने को कहा था।

जी एंटरटेनमेंट ने अपने जवाब में कहा कि उसे यह जानकारी नहीं है कि इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित खबर किस आधार पर तैयार की गई है। कंपनी ने साफ किया कि खबर में जिस अवधि का जिक्र किया गया है, उस दौरान OFI Global China Fund LLC ने कंपनी में कोई निवेश नहीं किया।

कंपनी ने यह भी कहा कि वह SEBI के लिस्टिंग नियमों का हमेशा पालन करती रही है और आगे भी नियामकीय प्रावधानों के अनुसार सभी जरूरी जानकारियां समय-समय पर सार्वजनिक करती रहेगी।

इस स्पष्टीकरण के साथ जी एंटरटेनमेंट ने निवेशकों और शेयर बाजार को यह संदेश दिया है कि कंपनी से जुड़ी किसी भी महत्वपूर्ण जानकारी के लिए केवल आधिकारिक खुलासों पर ही भरोसा किया जाना चाहिए।

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MIB का बड़ा फैसला, लाइसेंस रिन्यू होने तक जारी नहीं होंगी BARC की टीवी रेटिंग्स

इस पूरे घटनाक्रम पर ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) की ओर से किसी तरह की आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 01 July, 2026
Last Modified:
Wednesday, 01 July, 2026
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देश की टेलीविजन ऑडियंस मेजरमेंट प्रणाली को बड़ा झटका लगा है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) को निर्देश दिया है कि नई टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के तहत लाइसेंस का नवीनीकरण और सभी जरूरी अनुपालनों (Compliance) की प्रक्रिया पूरी होने तक किसी भी श्रेणी की टीवी रेटिंग (TRP) जारी नहीं की जाए।

मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय के इस निर्देश के बाद BARC की रेटिंग्स से जुड़ी पूरी प्रक्रिया फिलहाल प्रभावी रूप से ठप हो गई है। इसका मतलब है कि अब केवल न्यूज चैनलों ही नहीं, बल्कि नॉन-न्यूज सहित किसी भी टीवी जॉनर की ऑडियंस रेटिंग जारी नहीं होगी, जब तक कि मंत्रालय नए नियामकीय ढांचे के तहत BARC के लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं कर देता।

इससे पहले भी न्यूज चैनलों की रेटिंग्स पर रोक लगी हुई थी। अब मंत्रालय के ताजा निर्देश के बाद यह रोक सभी टीवी श्रेणियों तक बढ़ा दी गई है। ऐसे में प्रसारकों (Broadcasters), विज्ञापनदाताओं और मीडिया एजेंसियों के बीच बनी अनिश्चितता और गहरा गई है।

दरअसल, टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 के प्रावधानों के अनुसार, मौजूदा रेटिंग एजेंसियों को नए नियमों का पूरी तरह पालन करना अनिवार्य है। पॉलिसी के क्लॉज 14.2 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी रेटिंग एजेंसी तब तक रेटिंग तैयार या प्रकाशित नहीं कर सकती, जब तक वह नए ढांचे के सभी प्रावधानों का अनुपालन नहीं कर लेती।

गौरतलब है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने हाल ही में टेलीविजन रेटिंग्स पॉलिसी-2026 लागू कर वर्ष 2014 की नीति को प्रतिस्थापित किया था। नई नीति के तहत ऑडियंस मेजरमेंट प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कई कड़े प्रावधान किए गए हैं। इनमें बोर्ड के गठन से जुड़े नए मानदंड, विस्तृत ऑडिट व्यवस्था, सुरक्षा मंजूरी, अधिक संख्या में पीपल मीटर लगाने की अनिवार्यता और नए अनुपालन तंत्र शामिल हैं।

नई नीति लागू होने के बाद BARC ने अपने लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था। इससे पहले मंत्रालय ने मौजूदा रेटिंग एजेंसियों को नए नियमों के अनुरूप होने के लिए निर्धारित 30 दिनों की समयसीमा बढ़ाकर 60 दिन कर दी थी। यह फैसला BARC, इंडियन ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल फाउंडेशन (IBDF) और सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव के बीच हुई चर्चाओं के बाद लिया गया था, जिसमें प्रसारकों ने मूल समयसीमा के भीतर नए नियम लागू करने में व्यावहारिक कठिनाइयों की ओर ध्यान दिलाया था।

इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, BARC का मौजूदा पंजीकरण समाप्त हो चुका है और अब उसका नवीनीकरण नई नीति के तहत मंत्रालय की मंजूरी पर निर्भर है।

इंडस्ट्री की ओर से मिले सुझावों के बाद मंत्रालय ने नई नीति के कुछ प्रावधानों में राहत भी दी थी। इसके तहत बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों (Independent Directors) की अनिवार्य हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से घटाकर 33 प्रतिशत कर दी गई। वहीं, 80 हजार पीपल मीटर लगाने की समयसीमा बढ़ाई गई और एस्टैब्लिशमेंट सर्वे को हर वर्ष कराने की जगह तीन वर्ष में एक बार करने का प्रावधान किया गया।

हालांकि इन राहतों के बावजूद मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि BARC की लाइसेंस नवीनीकरण प्रक्रिया पूरी होने और नए नियामकीय ढांचे के अनुरूप पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित होने तक किसी भी प्रकार की टीवी रेटिंग जारी नहीं की जा सकती।

इस फैसले का सीधा असर उन प्रसारकों पर पड़ेगा जो हर सप्ताह आने वाली ऑडियंस रेटिंग्स के आधार पर अपने चैनलों के प्रदर्शन का आकलन करते हैं, विज्ञापन दरें तय करते हैं और कार्यक्रमों की स्ट्रैटेजी बनाते हैं। इसके अलावा मीडिया खरीदार (Media Buyers) और विज्ञापनदाता भी अपने विज्ञापन अभियानों की योजना, मूल्यांकन और टीवी निवेश संबंधी फैसलों के लिए BARC के आंकड़ों का व्यापक उपयोग करते हैं।

नई नीति के तहत रेटिंग एजेंसियों को अब अधिक सख्त प्रशासनिक मानकों के अनुसार काम करना होगा। उन्हें नियमित आंतरिक और बाहरी ऑडिट कराने, अपनी कार्यप्रणाली और स्वामित्व ढांचे में अधिक पारदर्शिता रखने, शिकायत निवारण से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक करने और मंत्रालय द्वारा समय-समय पर किए जाने वाले निरीक्षणों का पालन करना होगा।

नीति में यह भी प्रावधान किया गया है कि नियमों के उल्लंघन की स्थिति में सरकार चरणबद्ध कार्रवाई कर सकती है। इसमें रेटिंग्स पर अस्थायी रोक लगाने से लेकर बार-बार नियमों का उल्लंघन होने पर पंजीकरण रद्द करने तक की व्यवस्था शामिल है। उधर, इस पूरे घटनाक्रम पर BARC की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है।

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जी एंटरटेनमेंट 3,143 करोड़ रुपये जुटाएगी, बोर्ड ने वारंट जारी करने को दी मंजूरी

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) के बोर्ड ने कंपनी में पूंजी बढ़ाने के लिए बड़ा फैसला लिया है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 01 July, 2026
Last Modified:
Wednesday, 01 July, 2026
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जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEEL) के बोर्ड ने कंपनी में पूंजी बढ़ाने के लिए बड़ा फैसला लिया है। बोर्ड ने प्रमोटर ग्रुप की कंपनी Sunbright Mauritius Investments Ltd को 3,143.52 करोड़ रुपये तक के फुली कन्वर्टिबल वारंट (Fully Convertible Warrants) जारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही बोर्ड ने कर्मचारियों के लिए ESOP 2026 (एम्प्लॉयी स्टॉक ऑप्शन प्लान) शुरू करने को भी हरी झंडी दी है।

हालांकि, इन दोनों प्रस्तावों को लागू करने से पहले शेयरधारकों और संबंधित नियामकीय संस्थाओं की मंजूरी लेना जरूरी होगा।

कंपनी के मुताबिक, 24.95 करोड़ तक फुली कन्वर्टिबल वारंट जारी किए जाएंगे। प्रत्येक वारंट की कीमत 126 रुपये तय की गई है। हर वारंट को आवंटन की तारीख से 18 महीने के भीतर 1 रुपये फेस वैल्यू वाले एक इक्विटी शेयर में बदला जा सकेगा।

कंपनी ने बताया कि वारंट लेने वाली प्रमोटर ग्रुप कंपनी Sunbright Mauritius Investments Ltd को आवेदन के समय प्रति वारंट 31.50 रुपये (25%) का भुगतान करना होगा। बाकी 94.50 रुपये (75%) वारंट को शेयर में बदलते समय देने होंगे। यदि 18 महीने के भीतर वारंट को शेयर में नहीं बदला गया, तो वह स्वतः समाप्त हो जाएगा और पहले से जमा राशि जब्त कर ली जाएगी।

ZEEL के अनुसार, वारंट के शेयरों में बदलने के बाद Sunbright Mauritius Investments Ltd की हिस्सेदारी कंपनी की पूरी डाइल्यूटेड शेयर पूंजी का करीब 20% तक हो सकती है। फिलहाल इस कंपनी के पास ZEEL का कोई शेयर नहीं है।

कंपनी ने यह भी बताया कि 126 रुपये प्रति वारंट का इश्यू प्राइस SEBI के नियमों के तहत तय कीमत से करीब 11.86% अधिक है। वहीं, 1 जुलाई 2026 को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर ZEEL के शेयर के बंद भाव की तुलना में यह कीमत करीब 16.33% प्रीमियम पर तय की गई है। कंपनी के अनुसार, यह मूल्यांकन पंजीकृत वैल्यूअर की रिपोर्ट और SEBI के नियमों के अनुरूप तय किया गया है।

बोर्ड ने इसके अलावा ESOP 2026 को भी मंजूरी दी है। इस योजना के तहत कंपनी कर्मचारियों को 3.74 करोड़ तक स्टॉक ऑप्शन दे सकेगी। प्रत्येक स्टॉक ऑप्शन को 1 रुपये फेस वैल्यू वाले एक इक्विटी शेयर में बदला जा सकेगा और इसकी एक्सरसाइज प्राइस 126 रुपये प्रति शेयर रखी गई है। योजना से जुड़ी अन्य शर्तें, जैसे वेस्टिंग पीरियड और एक्सरसाइज की समय-सीमा, शेयरधारकों की मंजूरी मांगते समय साझा की जाएंगी।

इन दोनों प्रस्तावों पर मंजूरी लेने के लिए कंपनी जल्द ही शेयरधारकों की बैठक भी बुलाएगी। ZEEL ने स्पष्ट किया है कि कन्वर्टिबल वारंट जारी करने और ESOP 2026 लागू करने के लिए शेयरधारकों के साथ-साथ आवश्यक नियामकीय और सरकारी मंजूरियां भी प्राप्त करनी होंगी।

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क्या फिर जारी होंगी टीवी न्यूज रेटिंग्स? BARC के अगले कदम पर सबकी नजर

मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) ब्लैकआउट पीरियड समाप्त होने के बाद गुरुवार को टीवी न्यूज व्यूअरशिप डेटा जारी कर सकता है।

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Published - Wednesday, 01 July, 2026
Last Modified:
Wednesday, 01 July, 2026
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टेलीविजन न्यूज चैनलों की रेटिंग्स (TRP) इस सप्ताह दोबारा जारी होने की संभावना जताई जा रही है। मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) ब्लैकआउट पीरियड समाप्त होने के बाद गुरुवार को टीवी न्यूज व्यूअरशिप डेटा जारी कर सकता है।

सूत्रों के अनुसार, जारी होने वाली रेटिंग्स में 28 जून को समाप्त हुई अवधि का व्यूअरशिप डेटा शामिल हो सकता है। गौरतलब है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के निर्देश पर एक जून से टीवी न्यूज की साप्ताहिक टीआरपी रेटिंग्स का प्रकाशन अस्थायी रूप से रोक दिया गया था, ताकि ऑडियंस मापन प्रणाली में प्रस्तावित बदलावों को लागू किया जा सके।

हालांकि, यदि इस सप्ताह रेटिंग्स दोबारा जारी होती हैं तो BARC को केरल हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश का पालन करना होगा। अदालत ने टीवी रेटिंग्स से लैंडिंग पेज व्यूअरशिप डेटा को बाहर करने से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रावधान के अमल पर फिलहाल रोक लगा रखी है। ऐसे में कानूनी स्थिति स्पष्ट होने तक BARC की मौजूदा व्यवस्था के तहत ही रेटिंग्स जारी करने की संभावना है।

दरअसल, लैंडिंग पेज व्यूअरशिप लंबे समय से टीवी इंडस्ट्री में विवाद का विषय बनी हुई है। यह वह व्यूअरशिप होती है, जब किसी वितरण प्लेटफॉर्म पर कोई चैनल स्वत: डिफॉल्ट चैनल के रूप में खुलता है। कुछ न्यूज ब्रॉडकास्टर्स इसे रेटिंग्स से बाहर करने के पक्ष में हैं, जबकि अन्य का कहना है कि इस तरह का बदलाव व्यापक इंडस्ट्री परामर्श और वैज्ञानिक आधार पर ही किया जाना चाहिए। इस पूरे मामले पर BARC की ओर से किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

BARC ने शुल्क संबंधी निर्देश वापस लेने का भी किया अनुरोध: मामले से परिचित लोगों के मुताबिक, BARC ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से उस निर्देश को वापस लेने का भी अनुरोध किया है, जिसके तहत ब्लैकआउट पीरियड के दौरान न्यूज ब्रॉडकास्टर्स से सब्सक्रिप्शन या रेटिंग्स से संबंधित कोई शुल्क नहीं लेने को कहा गया था।

BARC का कहना है कि रेटिंग्स का अस्थायी रूप से प्रकाशित न होना, ऑडियंस मापन प्रणाली के संचालन और रखरखाव पर आने वाले खर्च को समाप्त नहीं करता। इसलिए इस अवधि के दौरान शुल्क नहीं लेने का निर्देश वापस लिया जाना चाहिए। इस मुद्दे पर मंत्रालय और BARC के बीच अलग से चर्चा होने की संभावना है।

इंडस्ट्री की नजर BARC के अगले कदम पर: ब्लैकआउट पीरियड समाप्त होने के बाद अब पूरे मीडिया इंडस्ट्री की नजर इस बात पर है कि क्या BARC इस सप्ताह फिर से टीवी न्यूज टीआरपी रेटिंग्स जारी करेगा। न्यूज ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाता और मीडिया एजेंसियां BARC के आंकड़ों का उपयोग विज्ञापन स्ट्रैटेजी, इन्वेंट्री की कीमत तय करने और प्रतिस्पर्धी आकलन के लिए करती हैं।

हालांकि, ऑडियंस मापन प्रणाली में प्रस्तावित बदलाव और लैंडिंग पेज व्यूअरशिप को लेकर जारी कानूनी एवं नियामकीय प्रक्रिया के बीच यह देखना अहम होगा कि BARC इस सप्ताह रेटिंग्स जारी करता है या नहीं और यदि करता है तो किस कार्यप्रणाली के तहत उन्हें प्रकाशित किया जाएगा।

(मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित इस खबर को आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं।) 

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हर दिन अगले 10 साल के लिए काम कर रहा है GTC Network: रबिन्द्र नारायण

GTC Network के प्रेजिडेंट रबिन्द्र नारायण का मानना है कि आने वाले समय में मीडिया इंडस्ट्री में सफलता सिर्फ बड़े बजट से नहीं मिलेगी, बल्कि मजबूत विचार, भरोसे, अच्छी स्टोरीटेलिंग और संस्कृति से तय होगी।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 29 June, 2026
Last Modified:
Monday, 29 June, 2026
RabindraNarayan874

GTC Network के संस्थापक, मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रेजिडेंट रबिन्द्र नारायण का मानना है कि आने वाले समय में मीडिया इंडस्ट्री में सफलता सिर्फ बड़े बजट से नहीं मिलेगी, बल्कि मजबूत विचार (Ideas), भरोसे (Trust), अच्छी स्टोरीटेलिंग और संस्कृति (Culture) से तय होगी।

रबिन्द्र नारायण ने लिंक्डइन पर एक पोस्ट के जरिए कंपनी के भविष्य के विजन को साझा किया। उन्होंने कहा कि GTC Network अगले कुछ महीनों के लिए नहीं, बल्कि आने वाले पूरे दशक को ध्यान में रखकर काम कर रहा है।

उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि मीडिया का भविष्य उन कंपनियों का नहीं होगा जिनके पास सबसे बड़ा बजट है, बल्कि उन कंपनियों का होगा जिनके पास सबसे मजबूत और अलग सोच होगी।

रवींद्र नारायण के मुताबिक, तकनीक हर साल बदलती रहती है और मीडिया प्लेटफॉर्म भी समय-समय पर बदलते रहते हैं। लेकिन भरोसा, अच्छी कहानियां सुनाने की कला (Storytelling) और संस्कृति जैसे मूल्य कभी पुराने नहीं पड़ते। यही चीजें किसी मीडिया ब्रांड को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखती हैं।

उन्होंने कहा कि GTC Network में हर दिन ऐसा काम किया जा रहा है जो सिर्फ अगले तिमाही (Quarter) के नतीजों के लिए नहीं, बल्कि अगले 10 वर्षों को ध्यान में रखकर हो। उनका कहना है कि कंपनी का लक्ष्य लंबी अवधि में मजबूत और टिकाऊ विकास करना है।

रवींद्र नारायण ने अपनी पोस्ट में यह भी कहा कि कंपनी की विरासत (Legacy) उसे मजबूत आधार देती है, जबकि इनोवेशन (Innovation) उसे आगे बढ़ने की ताकत देता है। उन्होंने कहा कि GTC Network का यह सफर अभी शुरू ही हुआ है और आने वाले वर्षों में कंपनी नए विचारों और नवाचार के दम पर आगे बढ़ने पर फोकस करेगी।

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MIB के प्रतिबंध के बावजूद BARC ने जारी की Chardikla की रेटिंग, शिकायत दर्ज

टेलीविजन रेटिंग जारी करने वाली संस्था BARC (Broadcast Audience Research Council) एक बार फिर विवादों में आ गई है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 29 June, 2026
Last Modified:
Monday, 29 June, 2026
BARC9854

इमरान फजल, असिसटेंट एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

टेलीविजन रेटिंग जारी करने वाली संस्था BARC (Broadcast Audience Research Council) एक बार फिर विवादों में आ गई है। BARC ने हाल ही में Chardikla चैनल की टीवी रेटिंग (TV Ratings) जारी की है, जबकि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) का निर्देश अभी भी लागू है कि अगले आदेश तक न्यूज चैनलों की रेटिंग प्रकाशित नहीं की जाए।

इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, इस मामले को लेकर MIB और BARC दोनों के पास औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई है। शिकायत में कहा गया है कि Chardikla को न्यूज कैटेगरी में लाइसेंस मिला हुआ है, फिर भी उसकी व्युअरशिप रेटिंग जारी करना मंत्रालय के निर्देशों के खिलाफ हो सकता है। साथ ही यह मामला फिलहाल केरल हाई कोर्ट में भी विचाराधीन (Sub Judice) है।

शिकायत में क्या कहा गया?

शिकायतकर्ता का कहना है कि BARC की ताजा रेटिंग रिपोर्ट में Chardikla की ऑडियंस रेटिंग प्रकाशित की गई, जबकि मंत्रालय ने साफ निर्देश दिया था कि न्यूज चैनलों की रेटिंग अगले आदेश तक जारी नहीं की जाए।

शिकायत में मंत्रालय से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की गई है। साथ ही BARC से प्रकाशित रेटिंग वापस लेने और यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि आखिर किस आधार पर यह डेटा जारी किया गया।

पूरा विवाद क्या है?

यह विवाद केंद्र सरकार की Television Ratings Policy, 2026 से जुड़ा हुआ है। इस नई नीति में टीवी रेटिंग की गणना के तरीके में बदलाव किया गया है। खास तौर पर Landing Page Viewership को रेटिंग से बाहर रखने का फैसला लिया गया है।

इस फैसले को लेकर All India Digital Cable Federation (AIDCF) और DEN Networks ने केरल हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मई में हाई कोर्ट ने इस नीति के एक अहम प्रावधान पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी थी और फिलहाल यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया था।

इसी बीच मंत्रालय ने BARC को निर्देश दिया था कि जब तक मामला अदालत में विचाराधीन है, तब तक न्यूज चैनलों की रेटिंग प्रकाशित न की जाए, ताकि किसी तरह की कानूनी या नियामकीय जटिलता पैदा न हो।

इंडस्ट्री में क्यों उठ रहे हैं सवाल?

मीडिया इंडस्ट्री के कई अधिकारियों का कहना है कि अगर मंत्रालय के निर्देश के बावजूद किसी न्यूज चैनल की रेटिंग जारी की जाती है, तो इससे सरकारी आदेशों के पालन और नियामकीय प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो सकते हैं।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि अगर कुछ न्यूज चैनलों की रेटिंग जारी होती है और बाकी की नहीं, तो इससे ऑडियंस मापन प्रणाली (Audience Measurement System) की निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है। इससे न्यूज ब्रॉडकास्टर्स, विज्ञापनदाताओं और डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म्स के बीच भ्रम की स्थिति भी पैदा हो सकती है।

लाइसेंस और कंटेंट को लेकर भी बहस

इस विवाद ने एक और मुद्दे को सामने ला दिया है। कुछ ऐसे चैनल हैं जिन्हें MIB ने 'न्यूज व करंट अफेयर्स' कैटेगरी में लाइसेंस दिया है, लेकिन वे न्यूज के साथ-साथ एंटरटेनमेंट (Entertainment), स्पोर्ट्स (Sports) और अन्य तरह के कार्यक्रम भी दिखाते हैं।

हालांकि उनकी प्रोग्रामिंग मिश्रित होती है, लेकिन लाइसेंस के आधार पर उन्हें अब भी न्यूज चैनल माना जाता है। ऐसे चैनलों की रेटिंग BARC लगातार न्यूज कैटेगरी में प्रकाशित करता रहा है। इंडस्ट्री का कहना है कि इससे मंत्रालय के निर्देशों को समान रूप से लागू किए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं।

BARC की ओर से नहीं आया जवाब

इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया लेने के लिए BARC से संपर्क किया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक संस्था की ओर से कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया गया।

फिलहाल यह मामला मंत्रालय और केरल हाई कोर्ट दोनों के स्तर पर महत्वपूर्ण बना हुआ है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि मंत्रालय इस शिकायत पर क्या कदम उठाता है और BARC इस विवाद पर क्या सफाई देता है।

 

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