समाज में हर क्षेत्र के पूर्वजों के प्रति इतनी उदासीनता शायद ही किसी अन्य देश में होगी

राजेश बादल 6 years ago


दिल्ली चुनाव में अब लगभग सौ घंटे बचे हैं। डेढ़-दो महीने तक प्रचार की हड़बोंग में इस बार पत्रकारिता की अनेक परंपराएं और नियम टूट गए और आत्म अनुशासन के किले ढह गए

राजेश बादल 6 years ago


पत्रकारिता धर्म भी विकट है। अगर किसी जन आंदोलन का कवरेज छोड़ दिया जाए तो आरोप लगने लगते हैं।

राजेश बादल 6 years ago


इस कॉलम के जरिये मैंने कई बार इसका इजहार किया कि अब मीडिया को अपनी आचार संहिता तैयार करने का समय आ गया है

राजेश बादल 6 years ago


अगर हमारी मानसिक सीमाएं सिकुड़कर केवल टीआरपी की होड़ पर टिक जाएंगीं तो इसका खामियाजा कौन भुगतेगा?

राजेश बादल 6 years ago


सत्ता के शिखरों ने अपने हित साधने में पत्रकारों और पत्रकारिता का भरपूर इस्तेमाल किया और हम खड़े-खड़े ग़ुबार देखते रहे

राजेश बादल 6 years ago


लगातार मिल रहे इस तरह के संकेतों को संयुक्त कर देखें तो साफ है कि अब हमें अपना घर ठीक करने की नौबत आ गई है

राजेश बादल 6 years ago


जब न्याय विलंब से मिलता है या चांदी के सिक्कों में खरीदा-बेचा जाता है तो समाज सड़कों पर अपने तरीके से मुजरिम को सजा देता है

राजेश बादल 6 years ago


सिर्फ अपने गाल बजाने के लिए अपने आप को हम चौथा स्तंभ कहते हैं, अन्यथा कोई भी संवैधानिक प्रावधान हमें चौथे खंभे के रूप में संरक्षण नहीं देता

राजेश बादल 6 years ago


राजनीति में किसी भी घटना के अनेक पहलू होते हैं। पत्रकार के रूप में काम करते हुए हर कदम पर इन पहलुओं का ध्यान रखना पड़ता है

राजेश बादल 6 years ago