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सोशल मीडिया की लत पर ऐतिहासिक ट्रायल शुरू, क्या भारत पर भी पड़ेगा असर?
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म TikTok ने इस मामले में वादी से समझौता कर लिया है। इसके बाद अब TikTok इस हाई-प्रोफाइल सोशल मीडिया ट्रायल का हिस्सा नहीं रहेगा।
Vikas Saxena 1 month ago
अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ एक बड़ा मुकदमा शुरू हो गया है, जिसका केंद्रबिंदु है कि Instagram और YouTube जैसे सोशल मीडिया और वीडियो ऐप्स का डिजाइन इस तरह से किया गया है, इससे उनकी मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचता है। आरोप है कि ये ऐप्स लोगों को लत की हालत तक पहुंचा देते हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म TikTok ने इस मामले में वादी से समझौता कर लिया है। इसके बाद अब TikTok इस हाई-प्रोफाइल सोशल मीडिया ट्रायल का हिस्सा नहीं रहेगा। यह ट्रायल मंगलवार से अमेरिका के लॉस एंजिलिस की एक अदालत में शुरू हो गया है। वहीं अब मुकदमा Meta और YouTube के खिलाफ आगे बढ़ेगा।
ये मामला लॉस एंजिलिस की अदालत में चल रहा है और इसमें 19 साल की एक अमेरिकी लड़की ने दावा किया है कि TikTok, Instagram और YouTube जैसे प्लेटफॉर्म्स ने उनके डिजाइन फीचर्स से युवाओं को लत लगाई, जिसकी वजह से मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा।
यह ट्रायल 6-8 हफ्तों तक चल सकता है और Meta जैसे बड़े टेक कंपनी के अधिकारी भी गवाही देने जा रहे हैं। मुकदमे में कहा गया है कि इन प्लेटफॉर्म्स के फीचर्स लोगों को लंबे समय तक ऐप पर रखकर लाभ कमाने की सोच से डिजाइन किए गए थे और इस वजह से युवाओं की मानसिक सेहत प्रभावित हो सकती है।
क्या भारत पर भी हो सकता है इसका असर?
यह मामला सीधे-सीधे भारत में लागू नहीं होगा, लेकिन इसका असर बड़े तरीके से महसूस हो सकता है। भारत में भी पिछले कुछ समय से बच्चों और युवाओं की सुरक्षा को लेकर कानून-व्यवस्था पर विचार हो रहा है। कुछ राज्य और विशेषज्ञ सोशल मीडिया पर रेगुलेशन की मांग कर रहे हैं ताकि बच्चों को लत और मानसिक तनाव से बचाया जा सके।
यदि अमेरिका जैसे बड़े बाजार में कंपनियों पर इसके लिए जिम्मेदारी तय होती है, तो Meta, YouTube, TikTok जैसे प्लेटफॉर्म वैश्विक स्तर पर अपनी नीतियों को बदल सकते हैं, जिससे सुरक्षा-फोकस्ड फीचर्स भारत में भी देखने को मिल सकते हैं।
वैसे भारत में TikTok पर पहले से प्रतिबंध जारी है और सरकार ने साफ किया है कि इस पर बैन हटाने का कोई फैसला अब तक नहीं लिया गया है। हालांकि अमेरिकी और वैश्विक खबरें जब-जब टॉप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी आती हैं, तो भारत में भी सोशल मीडिया यूजर्स और विशेषज्ञों में चर्चाएं तेज होती हैं।
यदि कोर्ट यह तय करती है कि सोशल मीडिया कंपनियों की डिजाइन पॉलिसीज युवाओं के लिए हानिकारक हैं, तो भारत जैसा बड़ा डिजिटल बाजार अपने कानूनों में सुधार या कड़े नियम ला सकता है- खासकर बच्चों की सुरक्षा में।
अमेरिका का यह केस सिर्फ एक मुकदमा नहीं है, इसे टेक्नोलॉजी और मानसिक स्वास्थ्य के बीच के रिश्ते पर वैश्विक बहस का हिस्सा माना जा रहा है। यदि कोर्ट के फैसले में कंपनियों की जिम्मेदारी तय होती है, तो यह सोशल मीडिया कंपनियों के वैश्विक संचालन, सुरक्षा नियमों और बच्चों-युवा सुरक्षा नीतियों पर बड़ा असर डाल सकता है और इसका असर भारत जैसे देशों में भी दिख सकता है।
वैसे, यह ट्रायल 2026 में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ चलने वाले कई बड़े मामलों में पहला है। इन मामलों की तुलना 1990 के दशक में तंबाकू कंपनियों के खिलाफ हुए बड़े मुकदमों से की जा रही है।
वादी पक्ष का कहना है कि ऐप्स को जानबूझकर इस तरह डिजाइन किया गया ताकि यूजर्स ज्यादा समय तक जुड़े रहें। यह रणनीति उन दलीलों को कमजोर करने के लिए है जिनमें टेक कंपनियां कहती हैं कि उनके प्लेटफॉर्म पर दिखने वाला कंटेंट कानून की धारा 230 के तहत सुरक्षित है।
पिछले हफ्ते Snapchat की पैरेंट कंपनी Snap ने भी वादी से समझौता कर लिया था और वह भी अब इस ट्रायल का हिस्सा नहीं है। हालांकि वकीलों ने साफ किया है कि TikTok अभी भी दूसरे व्यक्तिगत नुकसान से जुड़े मामलों में आरोपी बना हुआ है।
अगले हफ्ते न्यू मैक्सिको के सैंटा फे में Meta से जुड़ा एक और बड़ा ट्रायल शुरू होने वाला है। इस मामले में राज्य के अटॉर्नी जनरल का आरोप है कि Meta ने अपने ऐप्स को सुरक्षित नहीं रखा जिसके चलते बच्चों का ऑनलाइन शोषण हुआ।
इसके अलावा साल के अंत में कैलिफोर्निया में एक और बड़ा फेडरल ट्रायल शुरू होगा, जिसमें TikTok Meta YouTube और Snap सभी शामिल होंगे। इस केस में आरोप होगा कि इन ऐप्स के डिजाइन की वजह से बच्चों और किशोरों में अस्वस्थ और लत से जुड़े व्यवहार बढ़े।
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