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सर्वजन की ओर बहनजी की वापसी सियासी विडंबना: भूपेंद्र चौबे
भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच करने और समानता को बढ़ावा देने के लिए सभी संस्थानों द्वारा 'समानता समितियां' गठित करने को अनिवार्य बनाने संबंधी नए नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 month ago
यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले पर विपक्षी नेताओं के भी रिएक्शन आने शुरू हो गए हैं। केंद्र सरकार को नसीहत देते हुए बसपा प्रमुख मायावती ने कहा, अगर यूजीसी नियमों में सवर्णों को भी कमिटी में रख लिया जाता तो बवाल नहीं होता। इस मामले में सामाजिक तनाव आदि का वातावरण पैदा ही नहीं होता अगर यूजीसी नये नियम को लागू करने से पहले सभी पक्ष को विश्वास में ले लेती।
मायावती के इस बयान को वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे ने सियासी विडंबना करार दिया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर लिखा, मैंने अब अपनी ज़िंदगी में सब कुछ देख लिया है। दलित राजनीति की प्रमुख नेता मायावती का ऊँची जातियों के लिए न्याय की मांग वाला यह ट्वीट राजनीतिक विडंबना का सबसे बड़ा उदाहरण है।
दरअसल, बहनजी 2007 की उस रणनीति को दोहराने की कोशिश कर रही हैं, जब उन्होंने ‘बहुजन’ से ‘सर्वजन’ की राजनीति की ओर कदम बढ़ाया था और उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। यह भी दिलचस्प है कि कैसे यूजीसी के नियम अब यूपी की राजनीति का मैदान बन गए हैं।
यह पूरा मामला राजनीतिक सिद्धांतकारों के लिए एक बेहतरीन अध्ययन का विषय बन गया है। आपको बता दें, उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच करने और समानता को बढ़ावा देने के लिए सभी संस्थानों द्वारा 'समानता समितियां' गठित करने को अनिवार्य बनाने संबंधी नए नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे।
I have now seen everything in my life. This tweet from dalit supremo @Mayawati , asking for justice for upper castes is the most stark case of political irony. Behen ji is trying a repetition of 2007 when she converted bahujan into sarvjan and rose to supremacy with her only full… https://t.co/pqI4ysm7U3
— bhupendra chaubey (@bhupendrachaube) January 29, 2026
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