हर गुरुवार की सुबह टीवी इंडस्ट्री के लिए बेहद अहम होती थी। इसी दिन आने वाली रेटिंग्स कई चैनलों की किस्मत तय करती थीं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
भारत में टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम पिछले कई वर्षों के सबसे बड़े बदलावों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर, मीडिया एजेंसीज और पॉलिसी मेकर्स सभी इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि आखिर आगे क्या होगा। लेकिन असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि रेटिंग्स कब वापस आएंगी। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय मीडिया इंडस्ट्री दर्शकों को मापने के बिल्कुल नए तरीके के लिए तैयार है?
हर गुरुवार की सुबह देशभर के टेलीविजन एग्जिक्यूटिव्स, मीडिया प्लानर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए एक खास दिन हुआ करता था। यह सिर्फ रेटिंग्स जारी होने का दिन नहीं होता था, बल्कि ऐसा दिन होता था जब कई चैनलों की किस्मत बनती और बिगड़ती थी। कोई शो अगर रैंकिंग में ऊपर पहुंच जाता तो वह ज्यादा विज्ञापन दरें वसूल सकता था, जबकि रैंकिंग में नीचे आने वाले शो के सामने स्पॉन्सरशिप, मार्केटिंग सपोर्ट या यहां तक कि अपने प्रसारण स्लॉट को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो जाती थी।
करीब दो दशकों तक ऑडियंस रेटिंग्स भारत के टेलीविजन कारोबार की साझा भाषा रही हैं। इन्हीं के आधार पर प्रोग्रामिंग से जुड़े फैसले लिए गए, हजारों करोड़ रुपये के विज्ञापन निवेश तय हुए और यह निर्धारित हुआ कि कौन-से चैनल मार्केट के लीडर बनेंगे। लेकिन आज यह पूरी भाषा बदल रही है।
टेलीविजन रेटिंग्स सिस्टम में हो रहे बदलावों और बदलती नियामकीय अपेक्षाओं के बीच इंडस्ट्री एक अहम मोड़ पर खड़ी है। लगभग सभी इस बात पर सहमत हैं कि ऑडियंस मीजरमेंट विश्वसनीय, पारदर्शी और प्रतिनिधिक होना चाहिए। लेकिन भविष्य का सिस्टम कैसा होगा और उसे तय करने का अधिकार किसके पास होगा, इस पर अभी भी स्पष्ट सहमति नहीं है। रेटिंग्स को लेकर बनी अनिश्चितता ने चर्चा को सिर्फ मीजरमेंट तक सीमित नहीं रखा है। इसने पूरी इंडस्ट्री को भरोसे, गवर्नेंस, तकनीक और तेजी से बदलती टीवी देखने की आदतों जैसे बड़े सवालों का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया है।
शायद पहली बार, जब से भारत में ऑडियंस मीजरमेंट को संस्थागत रूप मिला है, बहस सिर्फ रेटिंग्स तक सीमित नहीं रह गई है। अब चर्चा इस बात की है कि टेलीविजन इंडस्ट्री की सबसे कीमती करेंसी का भविष्य आखिर क्या होगा।
रेटिंग्स: टेलीविजन कारोबार की असली करेंसी
अखबारों की सर्कुलेशन या डिजिटल पेज व्यूज की तरह टेलीविजन दर्शकों की संख्या को रियल टाइम में सीधे नहीं गिना जा सकता। इसके लिए वैज्ञानिक सैंपलिंग का सहारा लिया जाता है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि कौन, क्या और कितना देख रहा है। यही अनुमान आगे चलकर वह करेंसी बन जाता है, जिसके आधार पर विज्ञापन कारोबार चलता है। इस करेंसी पर पूरी इंडस्ट्री निर्भर करती है।
ब्रॉडकास्टर्स रेटिंग्स के जरिए अपने कार्यक्रमों की सफलता का आकलन करते हैं और विज्ञापन दरें तय करते हैं। ऐडवर्टाइजर इन्हीं के आधार पर यह निर्णय लेते हैं कि अपना मार्केटिंग बजट कहां खर्च करना है। मीडिया एजेंसीज चैनलों की तुलना करती हैं, मीडिया प्लान तैयार करती हैं और अपने ग्राहकों को दी गई सलाह को सही ठहराती हैं। वहीं निवेशक और मार्केट एनालिस्ट भी रेटिंग्स को किसी नेटवर्क की प्रतिस्पर्धी ताकत का महत्वपूर्ण संकेत मानते हैं।
कई मायनों में रेटिंग्स टेलीविजन इंडस्ट्री के लिए वही महत्व रखती हैं, जो शेयर मार्केट में शेयरों की कीमत रखती है। इसलिए सिर्फ आंकड़े ही महत्वपूर्ण नहीं होते, बल्कि पूरे सिस्टम पर भरोसा होना उससे भी ज्यादा जरूरी होता है। जब भरोसा कमजोर पड़ता है तो हर तरह का व्यावसायिक लेनदेन अधिक जटिल हो जाता है।
मीजरमेंट से जवाबदेही तक
ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम कभी भी आलोचनाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं रहा। सैंपल किस तरह चुने जाते हैं, शहर और गांव के बीच संतुलन कितना है, अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कितना सही है और पैनल में हेरफेर की संभावना जैसे सवाल समय-समय पर उठते रहे हैं। कुछ वर्ष पहले सामने आए कथित टीआरपी हेरफेर विवाद ने इस मुद्दे को केवल इंडस्ट्री की बहस से निकालकर राष्ट्रीय स्तर की चर्चा बना दिया।
इसके बाद न्यूज रेटिंग्स को निलंबित किया गया और नियामकीय निगरानी भी काफी बढ़ गई। यही वह मोड़ था जिसने पूरे सिस्टम की दिशा बदल दी।
पॉलिसी मेकर्स के लिए यह सिर्फ ऑडियंस मीजरमेंट का मामला नहीं रह गया था। यह उस सिस्टम की विश्वसनीयता का सवाल बन गया था, जो विज्ञापनों पर खर्च होने वाले अरबों रुपये के फैसलों को प्रभावित करता है।
इसके बाद से इंडस्ट्री का ध्यान गवर्नेंस को मजबूत करने, मीजरमेंट की कार्यप्रणाली में सुधार लाने और पैनल का विस्तार करने पर केंद्रित रहा है। हालांकि सुधारों पर लगातार चर्चा हो रही है, लेकिन अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि नया ढांचा कब लागू होगा, उसका स्वरूप क्या होगा और क्या भविष्य का ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम मौजूदा व्यवस्था से पूरी तरह अलग होगा।
सरकार चाहती है विश्वसनीयता, इंडस्ट्री चाहती है निश्चितता
अगर ब्रॉडकास्टर्स यह जानना चाहते हैं कि स्थिर और भरोसेमंद रूप में रेटिंग्स कब वापस आएंगी, तो पॉलिसी मेकर्स एक अलग सवाल पूछते नजर आते हैं। उनका सवाल है कि ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम पर लोगों का भरोसा और मजबूत कैसे बनाया जाए?
इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों का मानना है कि सरकार का फोकस आगे भी पारदर्शिता, मजबूत गवर्नेंस व्यवस्था और बेहतर निगरानी तंत्र पर रहेगा। भविष्य में बड़े और ज्यादा प्रतिनिधिक सैंपल, मजबूत कार्यप्रणाली, बेहतर सुरक्षा उपाय और सुदृढ़ संस्थागत प्रक्रियाएं सुधारों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं। दूसरी ओर, ब्रॉडकास्टर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए एक और चिंता लगातार बढ़ती जा रही है- निश्चितता।
टेलीविजन विज्ञापन कारोबार तभी सबसे बेहतर तरीके से चलता है, जब पूरी इंडस्ट्री एक ही मीजरमेंट करेंसी पर भरोसा करती हो। 75 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के टीवी विज्ञापन मार्केट और करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये के कुल विज्ञापन मार्केट, जो आगे बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है, के लिए भारत को एक ऐसी बुनियादी, भरोसेमंद और सभी की ओर से स्वीकार की गई ऑडियंस मीजरमेंट करेंसी की जरूरत है, जो ब्रॉडकास्टर्स को स्पष्टता, ऐडवर्टाइजर्स को भरोसा, मीडिया एजेंसियों को स्थिरता और हर साल अरबों रुपये निवेश करने वाले ब्रैंड्स को विश्वसनीयता प्रदान करे। अगर मीजरमेंट सिस्टम कई हिस्सों में बंट जाता है या लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रहती है, तो इससे विज्ञापन दरों पर बातचीत मुश्किल हो सकती है, कैंपेन प्लानिंग में देरी हो सकती है और पूरे इकोसिस्टम का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
यही वजह है कि इंडस्ट्री के सामने एक नाजुक संतुलन बनाने की चुनौती है। सुधार जरूरी हैं, लेकिन वे विश्वसनीयता की कीमत पर नहीं होने चाहिए। वहीं दूसरी ओर, लंबे समय तक बनी रहने वाली अनिश्चितता की भी अपनी आर्थिक कीमत होती है।
BARC के सामने सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि भरोसा है
इस पूरी बहस के सबसे करीब अगर कोई संस्था है तो वह है BARC India. पिछले कुछ वर्षों में BARC ने ऑडियंस मीजरमेंट का दायरा बढ़ाया है, नई तकनीकों को अपनाया है और पैनल विस्तार पर भी निवेश किया है। लेकिन अगला दौर कितना सफल होगा, यह सिर्फ तकनीक तय नहीं करेगी। असल मुद्दा अब भरोसा बन चुका है।
क्या ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर और मीडिया एजेंसीज फिर से एक ही आंकड़ों को पूरी इंडस्ट्री की साझा करेंसी के रूप में स्वीकार करेंगी? क्या मीजरमेंट की कार्यप्रणाली इतनी तेजी से बदलेगी कि वह लोगों की बदलती टीवी देखने की आदतों को सही तरीके से दिखा सके? क्या गवर्नेंस में होने वाले सुधार सभी हितधारकों को यह भरोसा दिला पाएंगे कि यह सिस्टम किसी भी तरह के प्रभाव या दबाव से पूरी तरह सुरक्षित है?
संभव है कि आने वाले समय में ये सवाल किसी भी तकनीकी सुधार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हों।
ब्रॉडकास्टर्स अब अलग-अलग सवाल पूछ रहे हैं
रेटिंग्स को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि पूरी ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री एक जैसी सोच रखती है। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। अलग-अलग ब्रॉडकास्टर्स की प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं।
बड़े जनरल एंटरटेनमेंट नेटवर्क स्थिरता और अनुमानित सिस्टम चाहते हैं, क्योंकि उनका विज्ञापन कारोबार लगातार और भरोसेमंद मीजरमेंट पर निर्भर करता है। वहीं क्षेत्रीय चैनलों का कहना है कि अलग-अलग भाषाई मार्केट्स में दर्शकों की आदतों को ज्यादा बेहतर तरीके से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। न्यूज चैनल अब भी इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या पारंपरिक टेलीविजन मीजरमेंट आज के डिजिटल न्यूज इकोसिस्टम में उनके वास्तविक प्रभाव को सही तरीके से माप पाता है।
स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टर्स के सामने अलग तरह की चुनौती है। बड़े खेल आयोजनों के दौरान दर्शकों की संख्या अचानक बहुत तेजी से बढ़ती है, लेकिन यह बढ़ोतरी कुछ समय के लिए ही होती है। इसलिए ऐसे मीजरमेंट सिस्टम की जरूरत है, जो अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर दर्शकों के व्यवहार को सटीक तरीके से रिकॉर्ड कर सके। यानी ब्रॉडकास्टर्स की कोई एक जैसी राय नहीं है। कुछ चाहते हैं कि रेटिंग्स जल्द से जल्द वापस आ जाएं। जबकि कुछ का मानना है कि रेटिंग्स लौटने से पहले सिस्टम को पूरी तरह बेहतर बनाया जाना चाहिए।
ऐडवर्टाइजर्स को सिर्फ आंकड़े नहीं, जवाबदेही भी चाहिए
ऐडवर्टाइजर्स के लिए रेटिंग्स हमेशा से जवाबदेही का आधार रही हैं। हर मार्केटिंग बजट के सामने आखिरकार एक ही सवाल आता है- क्या निवेश सही दर्शकों तक पहुंचा या नहीं?
पारंपरिक रूप से टेलीविजन इस सवाल का जवाब ऑडियंस मीजरमेंट के जरिए देता रहा है। लेकिन अब दर्शक अपना समय ब्रॉडकास्ट टीवी, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, कनेक्टेड टीवी और मोबाइल स्क्रीन के बीच बांट रहे हैं। ऐसे में ऐडवर्टाइजर दर्शकों के व्यवहार की कहीं ज्यादा व्यापक तस्वीर देखना चाहते हैं।
आज कई मार्केटर्स किसी कैंपेन का मूल्यांकन सिर्फ टीवी रेटिंग्स के आधार पर नहीं करते। वे डिजिटल एनालिटिक्स, फर्स्ट-पार्टी कंज्यूमर डेटा, सोशल मीडिया एंगेजमेंट और बिक्री के आंकड़ों को भी साथ में देखते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि रेटिंग्स की अहमियत कम हो गई है। बल्कि उनकी भूमिका बदल रही है।
अब टेलीविजन रेटिंग्स सफलता का अकेला पैमाना नहीं रह गई हैं, बल्कि वे एक बड़े और व्यापक मीजरमेंट इकोसिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही हैं।
ऐडवर्टाइजर, मार्केटर्स, इंडियन सोसाइटी ऑफ एडवरटाइजर्स (ISA), नए ब्रैंड मालिक और ऐडवर्टाइजर्स के संगठन, जो मीडिया और ऑडियंस पर निवेश करते हैं, उन्हें मिलकर इस नई रेटिंग्स करेंसी की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। यह ऐसी करेंसी होनी चाहिए, जो अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म और फॉर्मेट पर होने वाली व्यूअरशिप और एंगेजमेंट दोनों को माप सके।
ब्रैंड्स और मार्केटर्स मिलकर हर साल लगभग 1.75 लाख करोड़ रुपये का विज्ञापन निवेश करते हैं। अगर वे सामूहिक रूप से इस राशि का लगभग 0.6 प्रतिशत यानी करीब 1,000 करोड़ रुपये ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम पर खर्च करें, तो इसका सबसे बड़ा लाभ उन्हें खुद मिलेगा और साथ ही पूरे मीडिया इकोसिस्टम को भी इसका फायदा होगा।
मीडिया एजेंसीज चुपचाप बदल रही हैं अपनी प्लानिंग का तरीका
अगर इस बदलाव के दौर में किसी ने सबसे तेजी से खुद को बदला है, तो वह मीडिया एजेंसीज हैं। मीडिया खपत के लगातार बिखरते स्वरूप को देखते हुए मीडिया प्लानर्स अब अपने ग्राहकों को सलाह देने के लिए कई तरह के डेटा का इस्तेमाल कर रहे हैं। ब्रॉडकास्ट टीवी कैंपेन की योजना बनाने में आज भी टेलीविजन रेटिंग्स की अहम भूमिका है, लेकिन अब उनके साथ डिजिटल व्यूअरशिप, कनेक्टेड टीवी की खपत, ऑनलाइन वीडियो के आंकड़े और एजेंसियों के अपने ऑडियंस टूल्स का भी विश्लेषण किया जा रहा है।
यह बदलाव पूरी इंडस्ट्री की एक बड़ी सच्चाई को दिखाता है। आज के दर्शक "टेलीविजन" और "वीडियो" के बीच कोई फर्क नहीं करते। वे सिर्फ वही कंटेंट देखते हैं, जो उन्हें जिस स्क्रीन पर सबसे सुविधाजनक लगता है। लेकिन मीजरमेंट सिस्टम अभी भी इस बदलाव की रफ्तार से काफी पीछे चल रहे हैं।
रेटिंग्स से कहीं ज्यादा तेजी से बदले हैं दर्शक
शायद सबसे बड़ा बदलाव रेटिंग्स इंडस्ट्री के भीतर नहीं, बल्कि भारतीय घरों के अंदर आया है। अब टेलीविजन ही एकमात्र ऐसी स्क्रीन नहीं रह गई है, जो लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती हो। एक ही परिवार का कोई सदस्य प्राइम टाइम का ड्रामा टीवी पर देख सकता है, दूसरा मोबाइल पर क्रिकेट मैच की हाइलाइट्स देख सकता है, तीसरा ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्म स्ट्रीम कर सकता है और उसी दिन कई बार शॉर्ट वीडियो भी देख सकता है।
पारंपरिक ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम उस दौर के लिए बनाया गया था, जब घरों में मनोरंजन का मुख्य माध्यम केवल टेलीविजन हुआ करता था। लेकिन आज दर्शकों की देखने की आदतें पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बिखरी हुई और विविध हो चुकी हैं। यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है।
क्या भारत आज भी सिर्फ टेलीविजन दर्शकों को माप रहा है, या अब उसे कुल वीडियो खपत को मापना शुरू कर देना चाहिए? इसी सवाल का जवाब आने वाले दशक में मीडिया प्लानिंग की दिशा तय कर सकता है।
क्या भारत को एक ही रेटिंग्स करेंसी चाहिए या कई?
ऑडियंस मीजरमेंट को लेकर एक और बहस तेजी से आगे बढ़ रही है। यह बहस इस बात को लेकर है कि भविष्य में मीजरमेंट सिस्टम का ढांचा कैसा होना चाहिए।
कई वर्षों से भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री इस सोच के साथ काम करती रही है कि एक ही मीजरमेंट करेंसी सबसे ज्यादा प्रभावी होती है। ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर और मीडिया एजेंसीज सभी एक ही डेटा सेट के आधार पर कारोबार करते हैं।
लेकिन तकनीक के विकास के साथ कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर एक से ज्यादा मीजरमेंट सिस्टम होंगे, तो इससे नई तकनीकों को बढ़ावा मिलेगा और इंडस्ट्री को ज्यादा गहरी और समृद्ध जानकारी मिल सकेगी।
वहीं दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग मीजरमेंट करेंसी से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे मीडिया खरीदने की प्रक्रिया पहले की तुलना में और ज्यादा जटिल हो जाएगी, खासकर भारत जैसे बड़े मार्केट में, जहां वर्षों से एक भरोसेमंद साझा करेंसी के आधार पर ब्रॉडकास्टर्स, मीडिया एजेंसियों और ब्रैंड्स के बीच कारोबार होता आया है।
दुनिया के कई देशों में इस समय अलग-अलग मॉडल पर प्रयोग किए जा रहे हैं। वहां पारंपरिक टेलीविजन पैनल के साथ रिटर्न-पाथ डेटा, कनेक्टेड टीवी एनालिटिक्स और डिजिटल मीजरमेंट को जोड़कर नए समाधान विकसित किए जा रहे हैं। संभव है कि आने वाले समय में भारत के सामने भी ऐसे ही विकल्प हों।
वह दर्शक जिसकी सबसे कम चर्चा होती है
दिलचस्प बात यह है कि रेटिंग्स को लेकर होने वाली बहस में जिस सबसे महत्वपूर्ण पक्ष की सबसे कम चर्चा होती है, वह है- दर्शक। हर ब्रॉडकास्टर दावा करता है कि वह अपने दर्शकों को समझता है। हर ऐडवर्टाइजर उन्हीं तक पहुंचना चाहता है। हर मीडिया एजेंसी उनका अध्ययन करती है। हर मीजरमेंट सिस्टम उन्हें सही तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। लेकिन यह चर्चा शायद ही कभी होती है कि खुद दर्शक चाहते क्या हैं और उन्हें किस तरह मापा जाना चाहिए।
असल में दर्शकों की प्राथमिकता सिर्फ अच्छी सामग्री, आसान पहुंच और ज्यादा विकल्प होती है। रेटिंग्स उनके लिए सीधे तौर पर महत्वपूर्ण नहीं होतीं।लेकिन यही रेटिंग्स तय करती हैं कि कौन-सा कार्यक्रम बनाया जाएगा, कौन-सा शो ऑन एयर बना रहेगा और किस तरह के कंटेंट में निवेश किया जाएगा।
इस तरह देखा जाए तो ऑडियंस मीजरमेंट सिर्फ कारोबारी फैसलों को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि उन करोड़ों भारतीयों तक पहुंचने वाले कंटेंट की दिशा भी तय करता है, जिसे वे हर दिन देखते हैं। यह बदलाव सिर्फ रेटिंग्स का नहीं, पूरे सिस्टम का है। अक्सर कहा जाता है कि टेलीविजन इंडस्ट्री बदलाव के दौर से गुजर रही है। लेकिन इस बार का बदलाव किसी अस्थायी रुकावट या केवल नियामकीय बदलाव से कहीं बड़ा है। यह उस पूरी सोच का पुनर्मूल्यांकन है कि ऐसे समय में दर्शकों को किस तरह मापा जाए, जब कंटेंट बिना किसी रुकावट के ब्रॉडकास्ट टीवी, कनेक्टेड टीवी, मोबाइल डिवाइस और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के बीच लगातार घूम रहा है।
आज पॉलिसी मेकर्स, ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर्स, मीडिया एजेंसियों और ऑडियंस मीजरमेंट कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ रेटिंग्स पर भरोसा बहाल करना नहीं है। बल्कि ऐसी मीजरमेंट व्यवस्था तैयार करना है, जो यह सही तरीके से दिखा सके कि भारत आज कंटेंट कैसे देखता है और आने वाले वर्षों में उसे किस तरह देखेगा। भविष्य में यह व्यवस्था एक मजबूत और अधिक सक्षम BARC के नेतृत्व में आगे बढ़ेगी, किसी अधिक तकनीक-आधारित ऑडियंस मीजरमेंट फ्रेमवर्क के जरिए विकसित होगी या फिर अलग-अलग प्लेटफॉर्म को जोड़ने वाली एक व्यापक और साझा मीजरमेंट करेंसी के रूप में सामने आएगी, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन एक बात अब बिल्कुल साफ है कि ऑडियंस मीजरमेंट के अगले दौर का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर नहीं होगा कि उसके आंकड़े कितने सटीक हैं, बल्कि इस बात पर भी होगा कि वह पूरी इंडस्ट्री में कितना भरोसा पैदा कर पाता है। कई वर्षों तक रेटिंग्स यह तय करती रही हैं कि इंडस्ट्री में कौन आगे है और कौन पीछे। लेकिन अब इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आने वाले समय में इस पूरे खेल के नियम कौन तय करेगा।
BARC को नए नेतृत्व, नई सोच और ज्यादा मानवीय, सक्रिय तथा विनम्र कार्यशैली की जरूरत है। लंबे समय से यह धारणा रही है कि BARC के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) इंडस्ट्री की चिंताओं और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (I&B Ministry) के उन निर्देशों के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा पाए, जो पूरे मीडिया उद्योग, ऐडवर्टाइजर्स और व्यापक इकोसिस्टम के हित में थे।
आगे बढ़ते हुए एक API आधारित मॉडल भी तैयार किया जा सकता है, जिसे अपेक्षाकृत कम निवेश में लागू करना संभव है। हालांकि, इसके लिए जरूरी होगा कि Meta, Facebook और अन्य बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इसमें शामिल हों, ताकि मार्केटर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए सभी माध्यमों को जोड़ने वाली एक साझा और एकीकृत मीजरमेंट करेंसी तैयार की जा सके। अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रह गया है कि रेटिंग्स कब वापस आएंगी। असल सवाल यह है कि रेटिंग्स सिस्टम में सुधार और बदलाव की अगुवाई कौन करेगा, उसके नए नियम कौन तय करेगा और यह प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होगी।
भारतीय मीडिया इंडस्ट्री को जितनी जल्दी हो सके एक भरोसेमंद, पारदर्शी और सभी की ओर से स्वीकार की गई साझा रेटिंग्स व्यवस्था की जरूरत है। क्योंकि इस तरह का लंबा खालीपन या अनिश्चितता पूरे मीडिया और विज्ञापन उद्योग के लिए किसी भी तरह से अच्छी नहीं मानी जा सकती।
English Headline जागरण प्रकाशन को हरियाणा के हिसार के एक्साइज व टैक्सेशन ऑफिसर की ओर से ₹21.73 लाख के कथित GST बकाये को लेकर कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) मिला है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जागरण प्रकाशन (Jagran Prakashan Limited) को हरियाणा के हिसार के एक्साइज व टैक्सेशन ऑफिसर की ओर से ₹21.73 लाख के कथित GST बकाये को लेकर कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) मिला है। कंपनी ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि यह नोटिस 26 अगस्त 2026 को प्राप्त हुआ है।
यह नोटिस Central Goods and Services Tax Act, 2017 की धारा 74 के तहत जारी किया गया है। इसमें कंपनी से पूछा गया है कि कथित GST मांग के साथ धारा 50 के तहत ब्याज और धारा 74 के तहत जुर्माना क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए।
2020-21 की अवधि से जुड़ा है मामला
कंपनी के मुताबिक, यह मामला वित्त वर्ष 2020-21 की अवधि से संबंधित है। नोटिस में मुख्य तौर पर कंपनी की ओर से लिए गए Input Tax Credit (ITC) की पात्रता को लेकर टैक्स भुगतान या स्पष्टीकरण मांगा गया है। हालांकि, जागरण प्रकाशन ने कहा है कि कानूनी सलाह लेने के बाद उसका मानना है कि यह कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) टिकाऊ नहीं है और मामले में कंपनी का पक्ष मजबूत है।
तय समय में देगी जवाब
कंपनी ने बताया कि वह निर्धारित समय सीमा के भीतर इस नोटिस का उचित जवाब दाखिल करेगी। साथ ही, जरूरत पड़ने पर कंपनी इस मामले के खिलाफ दूसरे कानूनी विकल्पों पर भी विचार करेगी।
कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन पर असर नहीं
जागरण प्रकाशन ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा स्थिति में इस नोटिस का कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, कारोबार या अन्य गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़ा है। कंपनी के अनुसार, कानूनी सलाह के आधार पर उसका मानना है कि नोटिस में उठाई गई मांग उचित नहीं है और उसके पास मामले में मजबूत आधार हैं। इसलिए फिलहाल इस नोटिस से किसी वित्तीय प्रभाव की आशंका नहीं है।
कंपनी ने यह जानकारी SEBI Listing Regulations के Regulation 30 के तहत शेयर बाजारों को दी है।
भारत में अगले तीन से चार महीनों में तीन नए फाइनेंशियल डेली लॉन्च होने की उम्मीद है। एक्सप्रेस पब्लिकेशंस, कुमुदम और दिनमलर बिजनेस न्यूज सेगमेंट में उतरने की तैयारी में हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारतीय मीडिया इंडस्ट्री में फाइनेंशियल न्यूज सेगमेंट में प्रतिस्पर्धा बढ़ने वाली है। अगले तीन से चार महीनों के दौरान तीन नए बिजनेस डेली लॉन्च होने की संभावना है। Express Publications (Madurai), Kumudam और Dinamalar अपने-अपने बिजनेस अखबार शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं।
एक्सप्रेस पब्लिकेशंस (Express Publications), जो The New Indian Express का प्रकाशन करता है, अक्टूबर के अंत तक एक नया राष्ट्रीय बिजनेस अखबार लॉन्च करने की योजना बना रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इसे राष्ट्रीय वित्तीय दैनिक के तौर पर पेश किया जाएगा। इसके लॉन्च के बाद देश में राष्ट्रीय स्तर के फाइनेंशियल डेली की संख्या छह हो जाएगी।
नए अखबार के संपादकीय नेतृत्व की जिम्मेदारी फिलहाल The New Indian Express के तमिलनाडु एडिटर रंजनाथन को दिए जाने की बात सामने आई है। वह कोच्चि से नए बिजनेस डेली के एडिटर के तौर पर काम संभाल सकते हैं।
वहीं, कुमुदम (Kumudam) सितंबर के मध्य तक चेन्नई से तमिल और अंग्रेजी भाषा में बिजनेस डेली शुरू करने की तैयारी कर रहा है। समूह की यह पहल दक्षिण भारत के बिजनेस न्यूज मार्केट में उसकी मौजूदगी को मजबूत कर सकती है।
इसके अलावा दिनमलर (Dinamalar) भी बिजनेस अखबारों के सेगमेंट में प्रवेश करने की योजना बना रहा है। समूह साल के अंत तक तमिल भाषा में अपना बिजनेस डेली लॉन्च कर सकता है।
एचटी मीडिया लिमिटेड (HT Media Limited) ने 3,87,87,137 वारंट आवंटित किए हैं। कंपनी के बोर्ड की शेयर अलॉटमेंट कमेटी ने 20 अगस्त 2026 को सर्कुलेशन के जरिए हुई बैठक में इस आवंटन को मंजूरी दी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
एचटी मीडिया लिमिटेड (HT Media Limited) ने 3,87,87,137 वारंट आवंटित किए हैं। कंपनी के बोर्ड की शेयर अलॉटमेंट कमेटी ने 20 अगस्त 2026 को सर्कुलेशन के जरिए हुई बैठक में इस आवंटन को मंजूरी दी। इन वारंट की इश्यू कीमत 24.57 रुपये प्रति वारंट तय की गई है।
कंपनी ने यह जानकारी BSE और NSE को भेजी गई सूचना में दी है। यह आवंटन 11 जुलाई 2026 को कंपनी की ओर से दी गई पिछली सूचना और 7 अगस्त 2026 को हुई असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों की मंजूरी के बाद किया गया है।
कंपनी को इस वारंट इश्यू के लिए BSE और NSE से इन-प्रिंसिपल अप्रूवल भी मिल चुका है।
कंपनी को मिले 23.82 करोड़ रुपये
HT Media ने बताया कि प्रस्तावित निवेशकों से वारंट की कुल कीमत का 25 फीसदी हिस्सा यानी 23,82,49,989.02 रुपये मिल चुका है। प्रेफरेंशियल इश्यू (Preferential Issue) के तहत कुल वारंट की कीमत करीब 95.30 करोड़ रुपये है।
हर वारंट की कीमत 24.57 रुपये है। इन वारंट के बदले कंपनी को अभी कुल रकम का 25 फीसदी हिस्सा मिला है, जबकि बाकी 75 फीसदी रकम बाद में वारंट को इक्विटी शेयर में बदलने के समय देनी होगी।
इन 6 निवेशकों को मिले वारंट
कंपनी ने कुल 3.88 करोड़ वारंट छह प्रस्तावित निवेशकों को आवंटित किए हैं। इनमें सबसे ज्यादा वारंट The Hindustan Times Limited को मिले हैं।
इन सभी वारंट की कुल कीमत 95,29,99,956.09 रुपये है, जिसमें से 25 फीसदी यानी 23,82,49,989.02 रुपये कंपनी को मिल चुके हैं।
एक वारंट पर मिलेगा एक इक्विटी शेयर
कंपनी के मुताबिक, हर वारंट धारक को एक वारंट के बदले HT Media का एक पूरी तरह चुकता इक्विटी शेयर लेने का अधिकार होगा। इस शेयर की फेस वैल्यू 2 रुपये है।
हालांकि, इसके लिए वारंट धारक को कुल वारंट कीमत की बाकी 75 फीसदी रकम का भुगतान करना होगा। यानी मौजूदा आवंटन के बाद भविष्य में इन वारंट को शेयरों में बदलने पर कंपनी की इक्विटी पूंजी में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
HT Media ने बताया कि यह पूरा Preferential Issue SEBI के ICDR Regulations, 2018 के Chapter V के तहत किया गया है। कंपनी ने इस मामले में SEBI के Listing Obligations and Disclosure Requirements Regulations, 2015 के Regulation 30 के तहत स्टॉक एक्सचेंजों को जानकारी दी है।
देश के बड़े अखबार समूह अब प्रिंट से आगे बढ़कर डिजिटल, OOH विज्ञापन और इवेंट्स जैसे कारोबारों पर फोकस कर रहे हैं, जिसका असर उनकी कमाई में भी दिख रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
देश के बड़े अखबार समूह अब सिर्फ अखबार बेचने और प्रिंट विज्ञापन पर निर्भर नहीं रहना चाहते। डिजिटल, आउटडोर विज्ञापन (OOH), इवेंट्स और दूसरे कारोबारों की ओर बढ़ते कदमों का असर अब उनकी कमाई में भी साफ दिखाई दे रहा है।
Crisil Ratings की एक स्टडी के मुताबिक, देश के बड़े अखबार समूहों की कुल कमाई में नॉन-प्रिंट कारोबार की हिस्सेदारी इस वित्त वर्ष करीब 25% तक पहुंचने की उम्मीद है, जो वित्त वर्ष 2019 में करीब 13% थी। यानी पिछले कुछ वर्षों में अखबार कंपनियों ने अपनी कमाई के स्रोतों में बड़ा बदलाव किया है।
प्रिंट से आगे बढ़ रहे हैं अखबार समूह
Crisil Ratings ने देश के पांच सबसे ज्यादा प्रसारित अखबारों को संचालित करने वाले बड़े अखबार समूहों का अध्ययन किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले सात वित्त वर्षों में इन कंपनियों के नॉन-प्रिंट कारोबार की हिस्सेदारी 11-13 प्रतिशत अंक बढ़ी है। इसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म, आउटडोर विज्ञापन, इवेंट मैनेजमेंट और दूसरे संबंधित कारोबार शामिल हैं।
इस बदलाव से साफ है कि अखबार कंपनियां अब केवल सर्कुलेशन बढ़ाने वाले पुराने मॉडल पर निर्भर रहने के बजाय अपने ब्रांड और बड़ी ऑडियंस का इस्तेमाल अलग-अलग तरह की कमाई के लिए कर रही हैं।
अखबारों की सर्कुलेशन में आई गिरावट
अखबार कंपनियों के लिए कारोबार में बदलाव की सबसे बड़ी वजह प्रिंट सर्कुलेशन में लगातार आ रही गिरावट है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी अखबार कंपनियों का कुल सर्कुलेशन 2019 में करीब 1.5 करोड़ से घटकर 2025 में लगभग 1 करोड़ रह गया है। आने वाले समय में इसमें और गिरावट की आशंका है, क्योंकि युवा पाठक तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर जा रहे हैं।
इसका सीधा असर प्रिंट से होने वाली कमाई पर पड़ा है। पिछले सात वर्षों में प्रिंट से जुड़ी कमाई, जिसमें प्रिंट विज्ञापन भी शामिल है, में 1-2% की सालाना चक्रवृद्धि दर से गिरावट आई है।
नॉन-प्रिंट कारोबार तेजी से बढ़ेगा
Crisil Ratings के Senior Director और Deputy Chief Rating Officer Manish Gupta के मुताबिक, बड़े अखबार समूहों के लिए कारोबार में विविधता लाना अब विकल्प नहीं बल्कि जरूरत बन गया है।
उनके मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 से 2027 के बीच नॉन-प्रिंट कारोबार से होने वाली कमाई में 10-12% सालाना वृद्धि होने की उम्मीद है। इसके मुकाबले पारंपरिक प्रिंट कारोबार की वृद्धि सिर्फ 2-3% रहने का अनुमान है।
Gupta ने कहा कि बड़े मीडिया समूहों की मजबूत ब्रांड पहचान, देश के अलग-अलग क्षेत्रों में मजबूत पहुंच और प्रिंट, डिजिटल, रेडियो, इवेंट्स और आउटडोर मीडिया को एक साथ जोड़कर विज्ञापन समाधान देने की क्षमता नॉन-प्रिंट कारोबार को आगे बढ़ाने में मदद कर रही है।
डिजिटल कारोबार से बढ़ रही उम्मीद
नॉन-प्रिंट कारोबार बढ़ने से अखबार कंपनियों की कमाई के साथ-साथ मुनाफे पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक नॉन-प्रिंट कारोबार अभी भी पारंपरिक प्रिंट बिजनेस के मुकाबले कम मुनाफे वाला है।
इस वित्त वर्ष कंपनियों का मार्जिन करीब 12-13% पर स्थिर रहने की उम्मीद है। डिजिटल और उससे जुड़े कारोबार में बढ़ते पैमाने का फायदा कंपनियों को मिल रहा है।
आउटडोर विज्ञापन और इवेंट मैनेजमेंट में लागत ज्यादा होने और प्रतिस्पर्धा कड़ी होने के कारण मार्जिन पर दबाव रहता है। वहीं, डिजिटल कारोबार में शुरुआती निवेश का दौर धीरे-धीरे कम हो रहा है और कारोबार का पैमाना बढ़ने से EBITDA घाटे में सुधार देखने को मिल रहा है।
मजबूत बैलेंस शीट से मिल रहा सहारा
प्रिंट कारोबार में दबाव के बावजूद बड़े अखबार समूहों की वित्तीय स्थिति फिलहाल मजबूत बनी हुई है। इसकी वजह उनकी अपेक्षाकृत कम कर्ज वाली बैलेंस शीट, नेट कैश पोजिशन और बड़े लिक्विड निवेश हैं।
Crisil Ratings के Director Ankit Hakhu के मुताबिक, इन कंपनियों की क्रेडिट मजबूती अब सिर्फ प्रिंट कारोबार के प्रदर्शन पर निर्भर नहीं है, बल्कि उनकी मजबूत बैलेंस शीट भी अहम भूमिका निभा रही है।
उन्होंने बताया कि इन कंपनियों की नेटवर्थ का करीब 90% हिस्सा लिक्विड और निवेश वाली परिसंपत्तियों, जैसे वित्तीय संपत्तियों और कैश इक्विवेलेंट्स में है।
इन निवेशों से होने वाली आय और कम कर्ज का स्तर कंपनियों को नए कारोबारों में निवेश करने और उन्हें बड़ा करने के दौरान पुराने प्रिंट कारोबार से मिलने वाली कमाई में कमी की भरपाई करने में मदद कर सकता है।
डिजिटल से कमाई बढ़ाना अब बड़ी चुनौती
हालांकि, सेक्टर के सामने कुछ जोखिम भी बने हुए हैं। इनमें उम्मीद से ज्यादा तेजी से अखबारों के सर्कुलेशन में गिरावट, डिजिटल प्लेटफॉर्म से कमाई बढ़ाने में देरी और नॉन-प्रिंट कारोबार को तेजी से बड़े पैमाने पर पहुंचाने में आने वाली दिक्कतें शामिल हैं।
फिलहाल, डिजिटल, आउटडोर विज्ञापन और इवेंट जैसे कारोबारों से बढ़ती कमाई और मजबूत बैलेंस शीट देश के बड़े अखबार समूहों को प्रिंट बिजनेस पर लंबे समय से बने दबाव से निपटने में मदद कर रही है।
कुल मिलाकर, भारतीय अखबार उद्योग का कारोबार अब सिर्फ प्रिंट तक सीमित नहीं रह गया है। डिजिटल और दूसरे नॉन-प्रिंट कारोबार आने वाले वर्षों में मीडिया कंपनियों की कमाई और ग्रोथ की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों के बीच देश के प्रमुख घरेलू निर्माताओं में से एक ने कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर उठ रहे सवालों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों को लेकर चल रही बहस में अब एक और पहलू जुड़ गया है। इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) ने घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के साथ-साथ आयातित न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत को लेकर चिंता जताई थी। इसके कुछ दिनों बाद भारत के प्रमुख घरेलू न्यूजप्रिंट निर्माताओं में से एक ने कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर उठ रहे सवालों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। कंपनी का कहना है कि घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में बदलाव लागत बढ़ने की वजह से हुआ है और यह पूरे इंडस्ट्री में देखने को मिल रही है।
इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी के मुताबिक, भारतीय अखबार इंडस्ट्री हर साल करीब 13 लाख टन न्यूजप्रिंट इस्तेमाल करती है, जबकि देश में घरेलू उत्पादन करीब 5 लाख टन है। देश के प्रमुख घरेलू न्यूजप्रिंट उत्पादकों में ओडिशा की Emami Paper Mills, पंजाब की Khanna Paper Mills और सरकार के स्वामित्व वाली केरल की Hindustan Newsprint तथा मध्य प्रदेश की NEPA शामिल हैं।
एक्सचेंज4मीडिया ने सभी प्रमुख खिलाड़ियों और Indian Newsprint Manufacturers Association (INMA) से यह समझने के लिए संपर्क किया कि महंगाई का उन पर किस तरह असर पड़ रहा है। INMA के महासचिव विजय कुमार ने कहा, “एसोसिएशन बाजार की कीमतों पर नजर नहीं रखता है, इसलिए हम इस पर टिप्पणी नहीं कर पाएंगे।”
जहां दूसरे निर्माताओं ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, वहीं हर साल करीब 75,000 मीट्रिक टन (MT) न्यूजप्रिंट बनाने वाली Emami Paper Mills का कहना है कि कई तरह की कच्चे माल से जुड़ी और वित्तीय लागतें निर्माताओं पर दबाव डाल रही हैं।
Emami Paper Mills Ltd के होल टाइम डायरेक्टर व सीईओ एस. के. खेतान ने एक्सचेंज4मीडिया को बताया कि घरेलू न्यूजप्रिंट की मौजूदा कीमत करीब 58 से 62 रुपये प्रति किलो एक्स-मिल है। कीमत GSM, गुणवत्ता और स्थान के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। खेतान के मुताबिक, “घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतें अभी भी वित्त वर्ष 2022-23 में देखे गए स्तर से नीचे हैं, जबकि निर्माताओं को लागत से जुड़े कई तरह के दबावों का सामना करना पड़ रहा है।”
खेतान ने कहा, “कीमतों में यह बदलाव मुख्य रूप से लागत बढ़ने की वजह से है और पूरे इंडस्ट्री में देखने को मिल रहा है।”
उन्होंने चार प्रमुख दबावों की ओर इशारा किया। इनमें रुपये की कीमत में गिरावट, आयातित फाइबर और केमिकल की बढ़ती लागत, पूंजी की ऊंची लागत और खाड़ी क्षेत्र की स्थिति के कारण शिपिंग तथा लॉजिस्टिक्स खर्च में बढ़ोतरी शामिल है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पब्लिशर्स पहले से ही आयातित न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों, कमजोर रुपये और बढ़ी हुई माल ढुलाई लागत से परेशान हैं। दूसरी ओर, प्रतिस्पर्धी विज्ञापन बाजार के कारण पब्लिशर्स के लिए बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ पाठकों या बाजार पर डालना भी आसान नहीं है।
इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) के प्रमुख विवेक गुप्ता ने इससे पहले e4m को बताया था कि मार्च से घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में 30-40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और इसके लिए “कोई वजह नहीं” बताई गई है। उन्होंने यह भी कहा था कि आयातित और घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतें लगातार एक-दूसरे के करीब आ रही हैं।
हालांकि, Emami ने इस व्यापक धारणा से असहमति जताई है कि घरेलू निर्माताओं ने वैश्विक बाजार में आई परेशानी का फायदा उठाकर केवल अपनी कीमतें बढ़ाई हैं।
पब्लिशर्स के लिए अलग-अलग लागत दबावों के बीच यह अंतर तत्काल असर को ज्यादा नहीं बदलता। न्यूजप्रिंट उनके सबसे बड़े ऑपरेशनल खर्चों में से एक है और इसकी खरीद लागत बढ़ने से कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ता है।
INS की ओर से किए गए प्रमुख दावों में से एक यह भी था कि घरेलू न्यूजप्रिंट को पहले जो कीमत का फायदा मिलता था, वह अब काफी कम हो गया है। INS के मुताबिक, घरेलू और आयातित न्यूजप्रिंट की कीमत करीब 65 से 68 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।
Emami की राय इससे अलग है। खेतान ने कहा कि घरेलू न्यूजप्रिंट अभी भी प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध है और यह हमेशा आयातित न्यूजप्रिंट से सस्ता रहता है। हालांकि, दोनों के बीच कीमत का अंतर वैश्विक न्यूजप्रिंट की कीमतों और मुद्रा में होने वाले बदलाव के आधार पर बदलता रहता है।
भारत में पर्याप्त उत्पादन क्षमता है: INMA
INMA के महासचिव कुमार का कहना है, “हमारे पास पूरी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त क्षमता है। चूंकि न्यूजप्रिंट का इस्तेमाल एक खास उद्देश्य के लिए होता है और इसे केवल वास्तविक उपयोगकर्ताओं को ही बेचा जाना है, इसलिए उत्पादन पूरी तरह उपभोक्ताओं से मिले वास्तविक और पक्के ऑर्डर के आधार पर किया जाता है।”
हालांकि, पब्लिशर्स का कहना है कि कीमतों की तुलना सिर्फ लागत के आधार पर नहीं की जा सकती। उनका कहना है कि देश में तैयार होने वाला न्यूजप्रिंट हर बार आयातित न्यूजप्रिंट की गुणवत्ता के बराबर नहीं होता, खासकर हाई-स्पीड अखबार प्रिंटिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले पेपर में।
इसी वजह से कई पब्लिकेशन प्रीमियम जरूरतों के लिए आयातित पेपर का इस्तेमाल करते हैं, जबकि घरेलू न्यूजप्रिंट का इस्तेमाल मुख्य रूप से अंदर के पन्नों के लिए किया जाता है। किसी पब्लिकेशन और उसकी पेपर जरूरतों के आधार पर घरेलू न्यूजप्रिंट किसी अखबार के कुल संस्करण में 30-40 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सा रख सकता है।
विवेक गुप्ता ने घरेलू बाजार में गुणवत्ता के मानकों को लेकर भी चिंता जताई है। उनका आरोप है कि कुछ घरेलू निर्माता कम गुणवत्ता वाले न्यूजप्रिंट को Grade 1 के रूप में बेचते हैं। इससे पब्लिशर्स के लिए वास्तविक कीमत और गुणवत्ता के अंतर को समझना मुश्किल हो जाता है।
हालांकि, e4m इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका है। घरेलू निर्माताओं ने भी इस व्यापक धारणा पर आपत्ति जताई है कि स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाला न्यूजप्रिंट स्वाभाविक रूप से घटिया गुणवत्ता का होता है।
गुणवत्ता को लेकर यह बहस नई नहीं है। INS पहले भी घरेलू और आयातित न्यूजप्रिंट के बीच अंतर की ओर इशारा कर चुका है। इसमें अलग-अलग ग्रेड और गुणवत्ता के अंतर की बात कही गई है। INS की हालिया वार्षिक रिपोर्ट में भी “गुणवत्ता से जुड़ी समस्याओं” और घरेलू बाजार में कुछ कम-GSM वाले उत्पादों की सीमित उपलब्धता का जिक्र किया गया है।
इसका नतीजा यह है कि बाजार में पब्लिशर्स और निर्माता एक ही कीमत में हुए बदलाव को अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। पब्लिशर्स के लिए घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में बढ़ोतरी ऐसे समय में एक अतिरिक्त बोझ है, जब आयातित न्यूजप्रिंट पहले से ही महंगा हो रहा है।
वहीं, घरेलू निर्माताओं का कहना है कि वे भी उसी महंगाई और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच काम कर रहे हैं और बढ़ती कच्चे माल तथा वित्तीय लागतों को हमेशा अपने ऊपर नहीं ले सकते।
क्या कीमतों में कमी आ सकती है?
जो पब्लिशर्स वैश्विक न्यूजप्रिंट संकट से कुछ राहत के लिए घरेलू बाजार की ओर देख रहे हैं, उनके लिए Emami की ओर से फिलहाल कोई स्पष्ट राहत नहीं मिली है।
जब खेतान से पूछा गया कि आने वाले महीनों में घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में कमी आ सकती है या नहीं, तो उन्होंने कहा कि इस समय भविष्य का अनुमान लगाना मुश्किल है।
उन्होंने कहा, “मौजूदा भू-राजनीतिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय बाजार की अनिश्चित परिस्थितियों को देखते हुए इस समय भविष्य में कीमतों में होने वाले बदलाव का अनुमान लगाना मुश्किल होगा।”
इस अनिश्चितता के कारण पब्लिशर्स के सामने एक मुश्किल स्थिति बनी हुई है। आयातित न्यूजप्रिंट की कीमतें मुद्रा, माल ढुलाई और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों से प्रभावित होती रहेंगी। घरेलू न्यूजप्रिंट कम लागत वाला विकल्प हो सकता है, लेकिन निर्माताओं का कहना है कि उन्हें भी कच्चे माल और वित्तीय लागत में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ रहा है।
ऐसे इंडस्ट्री के लिए, जो पहले से ही प्रतिस्पर्धी विज्ञापन बाजार में काम कर रहा है, अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया है कि घरेलू या आयातित न्यूजप्रिंट में से कौन सस्ता है। सवाल यह भी है कि कीमत और गुणवत्ता के बीच संतुलन क्या होगा और न्यूज पब्लिशर्स बढ़ी हुई लागत का कितना हिस्सा खुद वहन कर पाएंगे।
सम्भाव मीडिया (Sambhaav Media Limited) की 36वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) में कंपनी के शेयरधारकों ने रखे गए दोनों प्रस्तावों को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
सम्भाव मीडिया की AGM में दोनों प्रस्तावों को शेयरधारकों की मंजूरी, 99.99% वोट पड़े पक्ष में
सम्भाव मीडिया (Sambhaav Media Limited) की 36वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) में कंपनी के शेयरधारकों ने रखे गए दोनों प्रस्तावों को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। AGM का आयोजन 13 अगस्त 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यमों के जरिए किया गया था।
कंपनी के मुताबिक, 6 अगस्त 2026 की कट-ऑफ डेट के आधार पर कुल 27,016 शेयरधारक वोटिंग के लिए पात्र थे। बैठक में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप के 7 और पब्लिक कैटेगरी के 30 शेयरधारकों ने हिस्सा लिया।
इन दोनों प्रस्तावों को मिली मंजूरी
पहला प्रस्ताव-
AGM में पहला प्रस्ताव कंपनी के 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के ऑडिटेड स्टैंडअलोन और कंसोलिडेटेड वित्तीय परिणामों को स्वीकार करने और मंजूर करने से जुड़ा था। इसमें बैलेंस शीट, प्रॉफिट एंड लॉस अकाउंट, कैश फ्लो स्टेटमेंट के साथ ऑडिटर्स और डायरेक्टर्स की रिपोर्ट को अपनाना शामिल था।
इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 11,92,59,567 वोट पड़े, जबकि विरोध में सिर्फ 17,072 वोट आए। इस तरह कुल वैध वोटों में करीब 99.99% वोट प्रस्ताव के पक्ष में रहे। प्रस्ताव को जरूरी बहुमत के साथ मंजूरी मिल गई।
दूसरा प्रस्ताव-
दूसरा प्रस्ताव जगदीश पावरा (DIN: 02203198) को डायरेक्टर के तौर पर दोबारा नियुक्त करने से संबंधित था। जगदीश पावरा कंपनी के उन डायरेक्टर्स में शामिल हैं, जो रोटेशन के आधार पर रिटायर हो रहे थे और दोबारा नियुक्ति के लिए पात्र थे।
इस प्रस्ताव को भी शेयरधारकों का जबरदस्त समर्थन मिला। इसके पक्ष में 11,92,59,567 वोट पड़े, जबकि 17,072 वोट इसके खिलाफ रहे। यानी करीब 99.99% वैध वोट प्रस्ताव के पक्ष में पड़े।
जगदीश पावरा गुजरात यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रॉनिक्स में डिप्लोमा इंजीनियर हैं। उन्हें कॉरपोरेट और टेक्निकल क्षेत्र में लंबे समय से काम करने का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत टेक्निकल फील्ड से की थी।
शुरुआत में उन्होंने इंस्टॉलेशन ऑफिसर के तौर पर काम किया, जहां वह टीवी ट्रांसमीटर, रेडियो एफएम ट्रांसमीटर, रेडियो स्टूडियो और टीवी स्टूडियो की स्थापना से जुड़े प्रोजेक्ट्स को संभालते थे। इसके अलावा उन्हें मीडिया से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए सरकारी विभागों से जरूरी मंजूरियां लेने, सोर्सिंग और लायजनिंग का भी अच्छा अनुभव है।
मीडिया इंडस्ट्री में उनकी अच्छी पकड़ है और उन्होंने अलग-अलग तरह की व्यावसायिक गतिविधियों में भी काम किया है। उन्हें भारत में टीवी चैनल और एफएम रेडियो चैनल स्थापित करने और ब्रॉडकास्टिंग मीडिया से जुड़े प्रोजेक्ट्स की अच्छी समझ है।
जगदीश पावरा कई कंपनियों के साथ निदेशक के तौर पर भी जुड़े हुए हैं। इनमें Ved Technoserve India Private Limited में Whole-Time Director, Ahmedabad Radio and Mast Services Private Limited और Neri Hydro Projects Private Limited शामिल हैं।
कुल 11.92 करोड़ से ज्यादा वोट पड़े
कंपनी की ओर से जारी वोटिंग डिटेल के मुताबिक, AGM में कुल 11,92,76,639 वोट पड़े। इनमें से 11,92,59,567 वोट पक्ष में और 17,072 वोट विरोध में थे। कुल वोटिंग प्रतिशत कंपनी के बकाया शेयरों के मुकाबले 62.41% रहा।
प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप के पास कुल 12,02,73,982 शेयर थे, जिनमें से 11,33,75,982 शेयरों के लिए वोटिंग हुई। प्रमोटर ग्रुप के सभी वोट प्रस्तावों के पक्ष में रहे।
पब्लिक नॉन-इंस्टीट्यूशनल शेयरधारकों की ओर से 59,00,657 वोट पड़े। इनमें 58,83,585 वोट प्रस्तावों के पक्ष में, जबकि 17,072 वोट विरोध में रहे। पब्लिक इंस्टीट्यूशनल शेयरधारकों की ओर से वोटिंग नहीं हुई।
स्क्रूटिनाइजर रिपोर्ट में भी प्रस्ताव पास
कंपनी के लिए स्क्रूटिनाइजर की भूमिका निभाने वाली Umesh Ved & Associates, Company Secretaries ने अपनी रिपोर्ट में भी दोनों प्रस्तावों को जरूरी बहुमत से पास घोषित किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, रिमोट ई-वोटिंग और AGM के दौरान की गई ई-वोटिंग के नतीजों को कंपनी के रिकॉर्ड और रजिस्ट्रार एवं ट्रांसफर एजेंट के रिकॉर्ड से मिलाकर देखा गया। वोटों को AGM खत्म होने के बाद अनब्लॉक किया गया।
स्क्रूटिनाइजर रिपोर्ट में कहा गया कि AGM के नोटिस में शामिल दोनों प्रस्ताव आवश्यक बहुमत के साथ पास हो गए हैं।
AGM में ऑनलाइन हुई वोटिंग
सम्भाव मीडिया की 36वीं AGM 13 अगस्त 2026 को सुबह 11:30 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग/अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यमों से आयोजित हुई। शेयरधारकों के लिए रिमोट ई-वोटिंग की सुविधा 10 अगस्त 2026 सुबह 9 बजे से 12 अगस्त 2026 शाम 5 बजे तक उपलब्ध थी।
AGM के दौरान उन शेयरधारकों को भी ई-वोटिंग की सुविधा दी गई, जिन्होंने पहले रिमोट ई-वोटिंग के जरिए अपना वोट नहीं डाला था।
कुल मिलाकर, सम्भाव मीडिया के शेयरधारकों ने कंपनी के वित्तीय खातों को मंजूरी देने और जगदीश पावरा की डायरेक्टर के तौर पर दोबारा नियुक्ति, दोनों प्रस्तावों पर लगभग सर्वसम्मति से मुहर लगा दी।
हिंदुस्तान टाइम्स के एडिटर-इन-चीफ रहे सुकुमार रंगनाथन का नेतृत्व सिर्फ संपादकीय फैसलों तक सीमित नहीं रहा। उनकी सादगी, निष्पक्षता और उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता ने अलग पहचान बनाई।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
हिंदुस्तान टाइम्स (Hindustan Times) के एडिटर-इन-चीफ पद से सुकुमार रंगनाथन (Sukumar Ranganathan) के हटने की खबर ने मीडिया जगत में कई लोगों को चौंकाया है। हालांकि, उनके जाने का यह दौर उनके करीब से काम करने वाले लोगों के लिए उनके नेतृत्व, सोच और पत्रकारिता के मूल्यों को याद करने का अवसर भी है।
पिछले चार वर्षों से सुकुमार रंगनाथन ई4एम इंग्लिश जर्नलिज्म 40 अंडर 40 अवॉर्ड्स (e4m English Journalism 40 Under 40 Awards) की जूरी के अध्यक्ष रहे हैं। इस दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि यह सम्मान केवल हर साल 40 नाम पूरे करने की औपचारिक प्रक्रिया बनकर न रह जाए।
उनके नेतृत्व में जूरी ने हमेशा काम की गुणवत्ता को संख्या से ऊपर रखा। हर साल 40 पत्रकारों को सम्मान देने की परंपरा के बावजूद उन्हीं उम्मीदवारों का चयन किया गया, जिनका काम तय मानकों पर खरा उतरा। अब तक सबसे ज्यादा 26 पत्रकार चुने गए, जबकि इस साल यह संख्या सिर्फ 17 रही। यह अंतर अपने आप में बताता है कि सुकुमार के लिए सम्मान की विश्वसनीयता कितनी महत्वपूर्ण थी।
जूरी की जिम्मेदारी को वह बेहद गंभीरता से लेते थे। हर उम्मीदवार की प्रोफाइल और उसके काम को ध्यान से पढ़ना, जरूरी बातें नोट करना और बैठकों में उनसे जुड़े छोटे-छोटे पहलुओं को याद रखना उनकी कार्यशैली का हिस्सा था। कई बार चयन प्रक्रिया महीनों तक चलती थी, लेकिन अगली बैठक में भी उन्हें पिछली चर्चाओं, सवालों और तर्कों की पूरी जानकारी रहती थी।
उनकी खासियत सिर्फ पेशेवर गंभीरता तक सीमित नहीं थी। इतने बड़े पद पर रहने के बावजूद उनकी सादगी और विनम्रता हमेशा लोगों के बीच चर्चा का विषय रही। व्यस्त कार्यक्रम हो या किसी आयोजन में देरी, उन्होंने कभी अपने पद या कद को सामने नहीं रखा। वह सहजता और धैर्य के साथ लोगों से मिलते और बातचीत करते रहे।
हिंदुस्तान टाइम्स में उनका कार्यकाल संपादकीय दृष्टि, संस्थान निर्माण और पत्रकारिता में बौद्धिक कठोरता के लिए याद किया जाएगा। उनका प्रभाव केवल उन खबरों और संपादकीय फैसलों तक सीमित नहीं रहेगा, जिनका उन्होंने नेतृत्व किया, बल्कि उस कार्यसंस्कृति में भी दिखाई देगा, जिसे उन्होंने अपने आसपास विकसित किया।
सुकुमार रंगनाथन की पत्रकारिता की सबसे बड़ी पहचान शायद यही रही कि उन्होंने उत्कृष्टता को केवल एक शब्द नहीं माना। उन्होंने अपने काम और फैसलों के जरिए यह दिखाया कि पत्रकारिता में विश्वसनीयता, ईमानदारी, विनम्रता और गुणवत्ता से समझौता किए बिना भी नेतृत्व किया जा सकता है।
न्यूजपेपर इंडस्ट्री ने भले ही विज्ञापन दरें बढ़ाने की जरूरत पर एकजुट होकर अपनी बात रखी हो, लेकिन जब वास्तव में विज्ञापनदाताओं से ज्यादा पैसा लेने की बात आई है, तो पब्लिशर्स काफी सावधानी बरत रहे हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारत की न्यूजपेपर इंडस्ट्री ने भले ही विज्ञापन दरें बढ़ाने की जरूरत पर एकजुट होकर अपनी बात रखी हो, लेकिन जब वास्तव में विज्ञापनदाताओं से ज्यादा पैसा लेने की बात आई है, तो पब्लिशर्स काफी सावधानी बरत रहे हैं।
इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) ने 22 जुलाई को अपने सदस्यों को 1 अगस्त से विज्ञापनों पर 15% सरचार्ज लगाने की सलाह दी थी। इसके 12 दिन से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी ज्यादातर बड़े अंग्रेजी, हिंदी और रीजनल पब्लिशर्स ने इसे लागू नहीं किया है। यह हिचकिचाहट प्रिंट मीडिया के सामने मौजूद एक पुराने संकट को दिखाती है। बढ़ती लागत से मुनाफे पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन प्रतिस्पर्धी विज्ञापन मार्केट में दरें बढ़ाने से पब्लिशर्स को वही कारोबार खोने का डर है, जिसे वे बचाना चाहते हैं।
INS ने यह सलाह 22 जुलाई को जारी की थी। इससे पहले 17 जुलाई को हुई उसकी एग्जिक्यूटिव कमेटी की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी। INS ने घरेलू और आयातित न्यूजप्रिंट की कीमतों में तेज बढ़ोतरी और लगातार बढ़ते ऑपरेशनल खर्च का हवाला दिया था। इस सिफारिश का मकसद पब्लिशर्स को मिलकर अपनी बढ़ी हुई लागत का कम से कम कुछ हिस्सा विज्ञापनदाताओं तक पहुंचाने का एक तरीका देना था।
लेकिन मार्केट में इसका असर सीमित ही दिखाई दिया है। एक वरिष्ठ पब्लिशिंग एग्जिक्यूटिव ने कहा, “मार्केट की स्थिति मुश्किल है, प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा है और विज्ञापनदाताओं की ओर से दबाव भी है। इसलिए हमने कुछ और समय तक इसे लागू नहीं करने का फैसला किया है।” यह बयान बताता है कि पब्लिशर्स ऐसे समय में दरें बढ़ाने से क्यों बच रहे हैं, जब विज्ञापन से मिलने वाले हर अतिरिक्त रुपये के लिए भी कड़ी प्रतिस्पर्धा है।
'एक्सचेंज4मीडिया' ने सभी प्रमुख अंग्रेजी और हिंदी प्रकाशनों से संपर्क किया। ऑफ द रिकॉर्ड उन्होंने माना कि उन्होंने अभी तक इसे लागू नहीं किया है।
'द हिंदू' ने भी अभी तक सरचार्ज लागू नहीं किया है। चेन्नई स्थित इस ग्रुप के चीफ रेवेन्यू ऑफिसर सुंदर कोंडूर ने इसकी पुष्टि की।
'मातृभूमि' के मैनेजिंग डायरेक्टर एमवी श्रेयम्स कुमार ने कहा कि ग्रुप ने अब तक सरचार्ज लागू नहीं किया है। उन्होंने बताया कि केरल में भी अखबारों ने बड़े पैमाने पर इसे लागू करने से फिलहाल दूरी बनाए रखी है।
एक प्रमुख मैगजीन पब्लिकेशन के एमडी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यह सरचार्ज मैगजीन के मुकाबले अखबारों के लिए ज्यादा प्रासंगिक है, क्योंकि दोनों के लागत ढांचे और मार्केट की स्थिति अलग-अलग है।
INS के प्रेजिडेंट विवेक गुप्ता ने बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद कोई जवाब नहीं दिया।
त्योहारी सीजन ने बढ़ाई मुश्किल
रीजनल पब्लिशर्स के लिए इस समय को लेकर एक और चुनौती सामने आई है। पब्लिशर्स का कहना है कि ओणम (16-26 अगस्त), जो केरल के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है, ने इस समय को और संवेदनशील बना दिया है।
ओणम भारत में त्योहारी सीजन की शुरुआत का संकेत माना जाता है। इसके बाद रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, नवरात्र और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आते हैं। यह समय रीजनल मीडिया के लिए विज्ञापन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान रिटेल, ऑटो, ज्वेलरी, FMCG, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और स्थानीय कारोबारों से जुड़े विज्ञापनदाता अपनी मौजूदगी बढ़ाते हैं।
एक प्रमुख पब्लिशर ने कहा, “ज्यादातर विज्ञापनदाता त्योहारी सीजन के दौरान भारी डिस्काउंट चाहते हैं। यह लंबे समय से चली आ रही परंपरा है। ऐसे समय में हम रेट बढ़ाने की मांग करने की स्थिति में नहीं हैं, भले ही मौजूदा हालात इसकी जरूरत बता रहे हों।”
पब्लिशर्स के सामने जोखिम साफ है। 15% की बढ़ोतरी से हर विज्ञापन से होने वाली कमाई बढ़ सकती है, लेकिन इससे बातचीत, ज्यादा डिस्काउंट की मांग या विज्ञापन बजट को दूसरी जगह ले जाने की स्थिति भी बन सकती है। और यह ठीक उसी समय हो सकता है जब पब्लिशर्स विज्ञापन की मात्रा बढ़ाना चाहते हैं।
INS की सिफारिश पर अलग-अलग पब्लिशर्स का अलग-अलग रुख एक बड़ी समस्या को सामने लाता है। लागत का दबाव सभी पर समान है, लेकिन सभी पब्लिशर्स के पास विज्ञापन दरें बढ़ाने की एक जैसी क्षमता नहीं है।
मार्केट कुछ और संकेत दे रहा है
पब्लिशर्स की हिचकिचाहट यह भी दिखाती है कि ज्यादा कमाई की उनकी जरूरत और मार्केट की ज्यादा कीमत चुकाने की इच्छा के बीच कितना बड़ा अंतर है।
पब्लिशर्स कई सालों से यह कहते रहे हैं कि विज्ञापन दरें न्यूजप्रिंट, प्रिंटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन की बढ़ती लागत के हिसाब से नहीं बढ़ी हैं। लेकिन जब भी किसी पब्लिशर ने अकेले विज्ञापन दरें बढ़ाने की कोशिश की है, उसे अक्सर विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों के विरोध का सामना करना पड़ा है। INS की सलाह इसी लंबे समय से चली आ रही समस्या के लिए पब्लिशर्स को एक साथ लाने की कोशिश थी।
लेकिन एक साथ इरादा जाहिर करने का मतलब यह नहीं है कि सभी के पास कीमत बढ़ाने की ताकत भी एक जैसी हो। एक प्रमुख FMCG कंपनी के CMO ने कहा, “अखबार और टीवी मीडिया स्पेस की खरीद-बिक्री डिमांड और सप्लाई के आधार पर होती है। यहां दरें मार्केट तय करता है, पब्लिशर्स की संस्था नहीं।”
मार्केटर्स का कहना है कि विज्ञापन की दरें पाठकों की संख्या, सर्कुलेशन, मार्केट में स्थिति, उपलब्ध इन्वेंट्री, किसी कैटेगरी की मांग और विज्ञापनदाता के साथ रिश्ते जैसे कई फैक्टर के आधार पर तय होती हैं। किसी राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक, बड़े हिंदी अखबार और किसी रीजनल प्रकाशन के पास 15% की बढ़ोतरी को विज्ञापनदाताओं पर डालने की समान क्षमता जरूरी नहीं है। INS की सलाह सामने आने के बाद विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों की ओर से यह एक प्रमुख चिंता थी।
एक विज्ञापन एग्जिक्यूटिव ने कहा, “अगर कोई पब्लिकेशन अपनी ऑडियंस की क्वालिटी, रीडरशिप, कंटेंट और असर के आधार पर ज्यादा कीमत को सही साबित कर सकता है, तो मीडिया बायर्स उसके लिए भुगतान करेंगे। लेकिन कीमत तय करना आदर्श रूप से खरीदार और विक्रेता के बीच का फैसला होना चाहिए, न कि किसी तीसरे पक्ष की ओर से तय किया जाना चाहिए।”
इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) की गैरमौजूदगी ने इस पूरी बातचीत को और मुश्किल बना दिया है। पिछले IRS को करीब सात साल हो चुके हैं। इसके बावजूद विज्ञापनदाताओं के पास ऐसा कोई सर्वमान्य रीडरशिप करेंसी नहीं है, जिसके आधार पर अलग-अलग प्रकाशनों की ऑडियंस के आकार, क्वालिटी और अतिरिक्त पहुंच की तुलना की जा सके। डाबर इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट, हेड ऑफ मीडिया और हेड ऑफ ब्रांड एक्टिवेशंस राजीव दुबे ने भी कहा है कि इससे प्रिंट मीडिया के लिए ज्यादा दरों को सही ठहराना मुश्किल होता है।
हालांकि पब्लिशर्स का इसके उलट तर्क है कि उनकी कारोबारी वैल्यू को सिर्फ एक रीडरशिप नंबर से नहीं आंका जा सकता। पाठकों का भरोसा, एडिटोरियल प्रभाव, प्रीमियम माहौल और बड़े आयोजनों या महत्वपूर्ण घटनाओं के आसपास प्रभाव पैदा करने की क्षमता भी उनकी वैल्यू का हिस्सा है।
INS के प्रेजिडेंट विवेक गुप्ता ने भी इन्हीं आधारों पर सरचार्ज का बचाव किया है। इससे पहले एक्सचेंज4मीडिया के साथ बातचीत में उन्होंने 15% सरचार्ज को स्थायी बढ़ोतरी के बजाय एक अस्थायी उपाय बताया था। उनका तर्क था कि जब अलग-अलग सेक्टर की कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल रही हैं, तो अखबारों से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वे महंगाई से बढ़ी लागत को खुद ही वहन करते रहें।
विवेक गुप्ता ने कहा था, “अगर युद्ध और दूसरी ऐसी परिस्थितियां, जिन्होंने हमें इस स्थिति में पहुंचाया है, सामान्य हो जाती हैं और कीमतें नीचे आती हैं, तो हम सरचार्ज को हटा सकते हैं। यह स्थायी सरचार्ज नहीं है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि INS पब्लिशर्स के लिए एक फैसिलिटेटर और गाइड के रूप में काम कर रही है, न कि उनकी कीमतें तय कर रही है।
जागरण प्रकाशन लिमिटेड के बोर्ड ने कंपनी के चार पूर्णकालिक निदेशकों को एक बार फिर पांच साल के लिए नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जागरण प्रकाशन लिमिटेड के बोर्ड ने कंपनी के चार पूर्णकालिक निदेशकों को एक बार फिर पांच साल के लिए नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है। बोर्ड की 12 अगस्त 2026 को हुई बैठक में धीरेंद्र मोहन गुप्ता, सुनील गुप्ता, संजय गुप्ता और शैलेश गुप्ता की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। हालांकि, इन नियुक्तियों के लिए अब शेयरहोल्डर्स की मंजूरी जरूरी होगी।
इन चारों की मौजूदा अवधि 30 सितंबर 2026 को खत्म हो रही है। प्रस्तावित पुनर्नियुक्ति 1 अक्टूबर 2026 से अगले पांच साल के लिए होगी।
धीरेंद्र मोहन गुप्ता को 60 साल से ज्यादा का प्रिंट मीडिया अनुभव
धीरेंद्र मोहन गुप्ता की उम्र 82 साल है और उनके पास प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में 60 साल से ज्यादा का अनुभव है। उन्होंने बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की है। वह महेंद्र मोहन गुप्ता, देवेंद्र मोहन गुप्ता और शैलेंद्र मोहन गुप्ता के भाई हैं।
सुनील गुप्ता 64 साल के हैं। उन्होंने कॉमर्स में बैचलर और मास्टर डिग्री हासिल की है। उनके पास प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में 45 साल से ज्यादा का अनुभव है।
संजय गुप्ता और शैलेश गुप्ता की भी होगी पुनर्नियुक्ति
संजय गुप्ता की उम्र 63 साल है और उन्होंने साइंस में बैचलर डिग्री हासिल की है। उनके पास प्रिंट मीडिया क्षेत्र में 45 साल से ज्यादा का अनुभव है। वह संदीप गुप्ता के भाई हैं।
वहीं, शैलेश गुप्ता 57 साल के हैं और उनके पास कॉमर्स में बैचलर की डिग्री है। उन्हें प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में 35 साल से ज्यादा का अनुभव है। वह महेंद्र मोहन गुप्ता के बेटे हैं।
1 अक्टूबर से शुरू होगा नया कार्यकाल
कंपनी के मुताबिक, चारों पूर्णकालिक निदेशकों की नई पांच साल की अवधि 1 अक्टूबर 2026 से शुरू होगी। यह फैसला कंपनी की नामांकन और पारिश्रमिक समिति व ऑडिट समिति की सिफारिश के आधार पर लिया गया है।
हालांकि, अंतिम नियुक्ति के लिए कंपनी के शेयरहोल्डर्स की मंजूरी लेना जरूरी होगा।
करीब 2 घंटे में खत्म हुई बोर्ड मीटिंग
जागरण प्रकाशन के बोर्ड की बैठक 12 अगस्त को दोपहर 2:30 बजे शुरू हुई और 3:35 बजे खत्म हुई। बैठक में चारों पूर्णकालिक निदेशकों की पुनर्नियुक्ति के अलावा कंपनी से जुड़े अन्य मामलों पर भी विचार किया गया।
इस फैसले से कंपनी के शीर्ष प्रबंधन में मौजूदा नेतृत्व की निरंतरता बनी रहने की उम्मीद है, खासकर ऐसे समय में जब प्रिंट मीडिया कंपनियां डिजिटल विस्तार और बदलते मीडिया कारोबार के बीच अपनी रणनीति को लगातार मजबूत कर रही हैं।
जागरण प्रकाशन लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून 2026 के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जागरण प्रकाशन लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून 2026 के वित्तीय नतीजे जारी कर दिए हैं। कंपनी के स्टैंडअलोन कारोबार में रेवेन्यू और विज्ञापन से होने वाली कमाई में अच्छी बढ़त देखने को मिली है, लेकिन दूसरी आय में बड़ी कमी के चलते मुनाफे पर दबाव रहा। वहीं, कंसोलिडेटेड आधार पर कंपनी का ऑपरेटिंग प्रॉफिट करीब 10 फीसदी बढ़ा है।
स्टैंडअलोन रेवेन्यू 11 फीसदी बढ़ा
कंपनी का स्टैंडअलोन ऑपरेटिंग रेवेन्यू वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 442.27 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की समान तिमाही के 398.13 करोड़ रुपये से 11.1 फीसदी ज्यादा है।
विज्ञापन से होने वाली कमाई में और तेज बढ़ोतरी हुई। कंपनी का एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू 14.5 फीसदी बढ़कर 289.23 करोड़ रुपये पहुंच गया। पिछले साल की पहली तिमाही में यह 252.64 करोड़ रुपये था।
सर्कुलेशन रेवेन्यू लगभग स्थिर रहा और 82.42 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल यह 82.30 करोड़ रुपये था। दूसरी ओर, अन्य ऑपरेटिंग रेवेन्यू 11.8 फीसदी बढ़कर 70.62 करोड़ रुपये हो गया।
डिजिटल रेवेन्यू में 32.6 फीसदी की बढ़ोतरी
जागरण प्रकाशन के डिजिटल कारोबार ने इस तिमाही में मजबूत ग्रोथ दर्ज की। डिजिटल रेवेन्यू 32.6 फीसदी बढ़कर 23.38 करोड़ रुपये हो गया। Q1FY26 में यह 17.64 करोड़ रुपये था।
यानी कंपनी के लिए डिजिटल कारोबार लगातार एक महत्वपूर्ण ग्रोथ एरिया बन रहा है।
स्टैंडअलोन मुनाफे में गिरावट
रेवेन्यू बढ़ने के बावजूद स्टैंडअलोन ऑपरेटिंग प्रॉफिट 61.52 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 64.70 करोड़ रुपये था।
कंपनी की दूसरी आय में भी बड़ी गिरावट आई। वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में यह 23.60 करोड़ रुपये रही, जबकि पिछले साल 44.53 करोड़ रुपये थी। कंपनी ने बताया कि पिछले साल की दूसरी आय में 23.85 करोड़ रुपये की Keyman Insurance Policy की maturity proceeds शामिल थी।
इस वजह से स्टैंडअलोन प्रॉफिट बिफोर टैक्स (PBT) 94.73 करोड़ रुपये से घटकर 70.16 करोड़ रुपये और टैक्स के बाद मुनाफा (PAT) 71.35 करोड़ रुपये से घटकर 53.50 करोड़ रुपये रह गया।
कंसोलिडेटेड रेवेन्यू 8.5 फीसदी बढ़ा
पूरे ग्रुप के कंसोलिडेटेड नतीजों की बात करें तो ऑपरेटिंग रेवेन्यू 8.5 फीसदी बढ़कर 499.35 करोड़ रुपये हो गया। Q1FY26 में यह 460.05 करोड़ रुपये था।
कंसोलिडेटेड विज्ञापन रेवेन्यू भी 14 फीसदी बढ़कर 299.25 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल यह 262.52 करोड़ रुपये था।
कंसोलिडेटेड डिजिटल रेवेन्यू 30.8 फीसदी बढ़कर 24.58 करोड़ रुपये पहुंच गया। वहीं, सर्कुलेशन रेवेन्यू लगभग स्थिर रहा और 84.78 करोड़ रुपये रहा।
ऑपरेटिंग प्रॉफिट 9.8 फीसदी बढ़ा
कंपनी के कंसोलिडेटेड ऑपरेटिंग प्रॉफिट में अच्छी बढ़त रही। यह 9.8 फीसदी बढ़कर 70.03 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले साल की समान तिमाही में 63.79 करोड़ रुपये था।
हालांकि, दूसरी आय घटने के कारण कंसोलिडेटेड PBT 90.37 करोड़ रुपये से घटकर 81.02 करोड़ रुपये और PAT 66.76 करोड़ रुपये से घटकर 61.23 करोड़ रुपये रह गया।
Dainik Jagran की कमाई बढ़ी, लेकिन ऑपरेटिंग प्रॉफिट घटा
कंपनी के प्रमुख अखबार Dainik Jagran का वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में ऑपरेटिंग रेवेन्यू 314.15 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल इसी अवधि में यह 286.35 करोड़ रुपये था।
हालांकि, इसका ऑपरेटिंग प्रॉफिट 63.14 करोड़ रुपये से घटकर 59.84 करोड़ रुपये रह गया। ऑपरेटिंग मार्जिन भी 22.05 फीसदी से घटकर 19.05 फीसदी रहा।
अन्य पब्लिकेशंस का ऑपरेटिंग रेवेन्यू 54.45 करोड़ रुपये रहा, लेकिन इस कारोबार में 2.04 करोड़ रुपये का ऑपरेटिंग घाटा हुआ।
Radio City के कारोबार में सुधार
जागरण प्रकाशन के रेडियो कारोबार Music Broadcast Limited, जो Radio City चलाती है, ने इस तिमाही में अच्छा सुधार दिखाया।
रेडियो का ऑपरेटिंग रेवेन्यू 44.54 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल यह 49.32 करोड़ रुपये था। हालांकि, ऑपरेटिंग प्रॉफिट 0.94 करोड़ रुपये से बढ़कर 8.92 करोड़ रुपये हो गया।
इसका ऑपरेटिंग मार्जिन भी 1.90 फीसदी से बढ़कर 20.03 फीसदी हो गया।
डिजिटल कारोबार अभी भी घाटे में
डिजिटल प्रिंट कारोबार का ऑपरेटिंग रेवेन्यू 18.80 करोड़ रुपये से बढ़कर 24.58 करोड़ रुपये हो गया। हालांकि, कारोबार अभी भी घाटे में है।
वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में डिजिटल कारोबार को 3.07 करोड़ रुपये का ऑपरेटिंग घाटा हुआ। पिछले साल इसी तिमाही में यह घाटा 4.69 करोड़ रुपये था। यानी घाटा कम हुआ है।
डिजिटल पहुंच भी मजबूत
कंपनी के मुताबिक, जागरण न्यू मीडिया की न्यूज और इंफॉर्मेशन कैटेगरी में करीब 4.8 करोड़ यूनिक विजिटर्स रहे। वहीं, Hindi News and Information Category में Jagran.com के करीब 3.6 करोड़ कुल यूनीक विजटर्स और एजुकेशन कैटेगरी में JagranJosh.com के करीब 70 लाख कुल यूनीक विजटर्स रहे।
ये आंकड़े जून 2026 के Comscore MMX Multi-Platform डेटा पर आधारित हैं।
जागरण प्रकाशन के पास प्रिंट, रेडियो, डिजिटल, आउटडोर विज्ञापन, प्रमोशनल मार्केटिंग और इवेंट मैनेजमेंट समेत मीडिया कारोबार की कई श्रेणियां हैं। कंपनी के मुताबिक, उसका ग्रुप 13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 5 भाषाओं में 8 पब्लिकेशन प्रकाशित करता है और रेडियो कारोबार के तहत 39 FM स्टेशन संचालित करता है।
कंपनी की क्रेडिट रेटिंग की बात करें तो CRISIL ने जागरण प्रकाशन की लॉन्ग और मीडियम टर्म रेटिंग AA+ Stable और शॉर्ट टर्म रेटिंग A1+ पर बरकरार रखी है।