हर गुरुवार की सुबह टीवी इंडस्ट्री के लिए बेहद अहम होती थी। इसी दिन आने वाली रेटिंग्स कई चैनलों की किस्मत तय करती थीं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
भारत में टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम पिछले कई वर्षों के सबसे बड़े बदलावों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर, मीडिया एजेंसीज और पॉलिसी मेकर्स सभी इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि आखिर आगे क्या होगा। लेकिन असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि रेटिंग्स कब वापस आएंगी। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय मीडिया इंडस्ट्री दर्शकों को मापने के बिल्कुल नए तरीके के लिए तैयार है?
हर गुरुवार की सुबह देशभर के टेलीविजन एग्जिक्यूटिव्स, मीडिया प्लानर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए एक खास दिन हुआ करता था। यह सिर्फ रेटिंग्स जारी होने का दिन नहीं होता था, बल्कि ऐसा दिन होता था जब कई चैनलों की किस्मत बनती और बिगड़ती थी। कोई शो अगर रैंकिंग में ऊपर पहुंच जाता तो वह ज्यादा विज्ञापन दरें वसूल सकता था, जबकि रैंकिंग में नीचे आने वाले शो के सामने स्पॉन्सरशिप, मार्केटिंग सपोर्ट या यहां तक कि अपने प्रसारण स्लॉट को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो जाती थी।
करीब दो दशकों तक ऑडियंस रेटिंग्स भारत के टेलीविजन कारोबार की साझा भाषा रही हैं। इन्हीं के आधार पर प्रोग्रामिंग से जुड़े फैसले लिए गए, हजारों करोड़ रुपये के विज्ञापन निवेश तय हुए और यह निर्धारित हुआ कि कौन-से चैनल मार्केट के लीडर बनेंगे। लेकिन आज यह पूरी भाषा बदल रही है।
टेलीविजन रेटिंग्स सिस्टम में हो रहे बदलावों और बदलती नियामकीय अपेक्षाओं के बीच इंडस्ट्री एक अहम मोड़ पर खड़ी है। लगभग सभी इस बात पर सहमत हैं कि ऑडियंस मीजरमेंट विश्वसनीय, पारदर्शी और प्रतिनिधिक होना चाहिए। लेकिन भविष्य का सिस्टम कैसा होगा और उसे तय करने का अधिकार किसके पास होगा, इस पर अभी भी स्पष्ट सहमति नहीं है। रेटिंग्स को लेकर बनी अनिश्चितता ने चर्चा को सिर्फ मीजरमेंट तक सीमित नहीं रखा है। इसने पूरी इंडस्ट्री को भरोसे, गवर्नेंस, तकनीक और तेजी से बदलती टीवी देखने की आदतों जैसे बड़े सवालों का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया है।
शायद पहली बार, जब से भारत में ऑडियंस मीजरमेंट को संस्थागत रूप मिला है, बहस सिर्फ रेटिंग्स तक सीमित नहीं रह गई है। अब चर्चा इस बात की है कि टेलीविजन इंडस्ट्री की सबसे कीमती करेंसी का भविष्य आखिर क्या होगा।
रेटिंग्स: टेलीविजन कारोबार की असली करेंसी
अखबारों की सर्कुलेशन या डिजिटल पेज व्यूज की तरह टेलीविजन दर्शकों की संख्या को रियल टाइम में सीधे नहीं गिना जा सकता। इसके लिए वैज्ञानिक सैंपलिंग का सहारा लिया जाता है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि कौन, क्या और कितना देख रहा है। यही अनुमान आगे चलकर वह करेंसी बन जाता है, जिसके आधार पर विज्ञापन कारोबार चलता है। इस करेंसी पर पूरी इंडस्ट्री निर्भर करती है।
ब्रॉडकास्टर्स रेटिंग्स के जरिए अपने कार्यक्रमों की सफलता का आकलन करते हैं और विज्ञापन दरें तय करते हैं। ऐडवर्टाइजर इन्हीं के आधार पर यह निर्णय लेते हैं कि अपना मार्केटिंग बजट कहां खर्च करना है। मीडिया एजेंसीज चैनलों की तुलना करती हैं, मीडिया प्लान तैयार करती हैं और अपने ग्राहकों को दी गई सलाह को सही ठहराती हैं। वहीं निवेशक और मार्केट एनालिस्ट भी रेटिंग्स को किसी नेटवर्क की प्रतिस्पर्धी ताकत का महत्वपूर्ण संकेत मानते हैं।
कई मायनों में रेटिंग्स टेलीविजन इंडस्ट्री के लिए वही महत्व रखती हैं, जो शेयर मार्केट में शेयरों की कीमत रखती है। इसलिए सिर्फ आंकड़े ही महत्वपूर्ण नहीं होते, बल्कि पूरे सिस्टम पर भरोसा होना उससे भी ज्यादा जरूरी होता है। जब भरोसा कमजोर पड़ता है तो हर तरह का व्यावसायिक लेनदेन अधिक जटिल हो जाता है।
मीजरमेंट से जवाबदेही तक
ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम कभी भी आलोचनाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं रहा। सैंपल किस तरह चुने जाते हैं, शहर और गांव के बीच संतुलन कितना है, अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कितना सही है और पैनल में हेरफेर की संभावना जैसे सवाल समय-समय पर उठते रहे हैं। कुछ वर्ष पहले सामने आए कथित टीआरपी हेरफेर विवाद ने इस मुद्दे को केवल इंडस्ट्री की बहस से निकालकर राष्ट्रीय स्तर की चर्चा बना दिया।
इसके बाद न्यूज रेटिंग्स को निलंबित किया गया और नियामकीय निगरानी भी काफी बढ़ गई। यही वह मोड़ था जिसने पूरे सिस्टम की दिशा बदल दी।
पॉलिसी मेकर्स के लिए यह सिर्फ ऑडियंस मीजरमेंट का मामला नहीं रह गया था। यह उस सिस्टम की विश्वसनीयता का सवाल बन गया था, जो विज्ञापनों पर खर्च होने वाले अरबों रुपये के फैसलों को प्रभावित करता है।
इसके बाद से इंडस्ट्री का ध्यान गवर्नेंस को मजबूत करने, मीजरमेंट की कार्यप्रणाली में सुधार लाने और पैनल का विस्तार करने पर केंद्रित रहा है। हालांकि सुधारों पर लगातार चर्चा हो रही है, लेकिन अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि नया ढांचा कब लागू होगा, उसका स्वरूप क्या होगा और क्या भविष्य का ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम मौजूदा व्यवस्था से पूरी तरह अलग होगा।
सरकार चाहती है विश्वसनीयता, इंडस्ट्री चाहती है निश्चितता
अगर ब्रॉडकास्टर्स यह जानना चाहते हैं कि स्थिर और भरोसेमंद रूप में रेटिंग्स कब वापस आएंगी, तो पॉलिसी मेकर्स एक अलग सवाल पूछते नजर आते हैं। उनका सवाल है कि ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम पर लोगों का भरोसा और मजबूत कैसे बनाया जाए?
इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों का मानना है कि सरकार का फोकस आगे भी पारदर्शिता, मजबूत गवर्नेंस व्यवस्था और बेहतर निगरानी तंत्र पर रहेगा। भविष्य में बड़े और ज्यादा प्रतिनिधिक सैंपल, मजबूत कार्यप्रणाली, बेहतर सुरक्षा उपाय और सुदृढ़ संस्थागत प्रक्रियाएं सुधारों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं। दूसरी ओर, ब्रॉडकास्टर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए एक और चिंता लगातार बढ़ती जा रही है- निश्चितता।
टेलीविजन विज्ञापन कारोबार तभी सबसे बेहतर तरीके से चलता है, जब पूरी इंडस्ट्री एक ही मीजरमेंट करेंसी पर भरोसा करती हो। 75 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के टीवी विज्ञापन मार्केट और करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये के कुल विज्ञापन मार्केट, जो आगे बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है, के लिए भारत को एक ऐसी बुनियादी, भरोसेमंद और सभी की ओर से स्वीकार की गई ऑडियंस मीजरमेंट करेंसी की जरूरत है, जो ब्रॉडकास्टर्स को स्पष्टता, ऐडवर्टाइजर्स को भरोसा, मीडिया एजेंसियों को स्थिरता और हर साल अरबों रुपये निवेश करने वाले ब्रैंड्स को विश्वसनीयता प्रदान करे। अगर मीजरमेंट सिस्टम कई हिस्सों में बंट जाता है या लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रहती है, तो इससे विज्ञापन दरों पर बातचीत मुश्किल हो सकती है, कैंपेन प्लानिंग में देरी हो सकती है और पूरे इकोसिस्टम का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
यही वजह है कि इंडस्ट्री के सामने एक नाजुक संतुलन बनाने की चुनौती है। सुधार जरूरी हैं, लेकिन वे विश्वसनीयता की कीमत पर नहीं होने चाहिए। वहीं दूसरी ओर, लंबे समय तक बनी रहने वाली अनिश्चितता की भी अपनी आर्थिक कीमत होती है।
BARC के सामने सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि भरोसा है
इस पूरी बहस के सबसे करीब अगर कोई संस्था है तो वह है BARC India. पिछले कुछ वर्षों में BARC ने ऑडियंस मीजरमेंट का दायरा बढ़ाया है, नई तकनीकों को अपनाया है और पैनल विस्तार पर भी निवेश किया है। लेकिन अगला दौर कितना सफल होगा, यह सिर्फ तकनीक तय नहीं करेगी। असल मुद्दा अब भरोसा बन चुका है।
क्या ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर और मीडिया एजेंसीज फिर से एक ही आंकड़ों को पूरी इंडस्ट्री की साझा करेंसी के रूप में स्वीकार करेंगी? क्या मीजरमेंट की कार्यप्रणाली इतनी तेजी से बदलेगी कि वह लोगों की बदलती टीवी देखने की आदतों को सही तरीके से दिखा सके? क्या गवर्नेंस में होने वाले सुधार सभी हितधारकों को यह भरोसा दिला पाएंगे कि यह सिस्टम किसी भी तरह के प्रभाव या दबाव से पूरी तरह सुरक्षित है?
संभव है कि आने वाले समय में ये सवाल किसी भी तकनीकी सुधार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हों।
ब्रॉडकास्टर्स अब अलग-अलग सवाल पूछ रहे हैं
रेटिंग्स को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि पूरी ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री एक जैसी सोच रखती है। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। अलग-अलग ब्रॉडकास्टर्स की प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं।
बड़े जनरल एंटरटेनमेंट नेटवर्क स्थिरता और अनुमानित सिस्टम चाहते हैं, क्योंकि उनका विज्ञापन कारोबार लगातार और भरोसेमंद मीजरमेंट पर निर्भर करता है। वहीं क्षेत्रीय चैनलों का कहना है कि अलग-अलग भाषाई मार्केट्स में दर्शकों की आदतों को ज्यादा बेहतर तरीके से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। न्यूज चैनल अब भी इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या पारंपरिक टेलीविजन मीजरमेंट आज के डिजिटल न्यूज इकोसिस्टम में उनके वास्तविक प्रभाव को सही तरीके से माप पाता है।
स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टर्स के सामने अलग तरह की चुनौती है। बड़े खेल आयोजनों के दौरान दर्शकों की संख्या अचानक बहुत तेजी से बढ़ती है, लेकिन यह बढ़ोतरी कुछ समय के लिए ही होती है। इसलिए ऐसे मीजरमेंट सिस्टम की जरूरत है, जो अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर दर्शकों के व्यवहार को सटीक तरीके से रिकॉर्ड कर सके। यानी ब्रॉडकास्टर्स की कोई एक जैसी राय नहीं है। कुछ चाहते हैं कि रेटिंग्स जल्द से जल्द वापस आ जाएं। जबकि कुछ का मानना है कि रेटिंग्स लौटने से पहले सिस्टम को पूरी तरह बेहतर बनाया जाना चाहिए।
ऐडवर्टाइजर्स को सिर्फ आंकड़े नहीं, जवाबदेही भी चाहिए
ऐडवर्टाइजर्स के लिए रेटिंग्स हमेशा से जवाबदेही का आधार रही हैं। हर मार्केटिंग बजट के सामने आखिरकार एक ही सवाल आता है- क्या निवेश सही दर्शकों तक पहुंचा या नहीं?
पारंपरिक रूप से टेलीविजन इस सवाल का जवाब ऑडियंस मीजरमेंट के जरिए देता रहा है। लेकिन अब दर्शक अपना समय ब्रॉडकास्ट टीवी, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, कनेक्टेड टीवी और मोबाइल स्क्रीन के बीच बांट रहे हैं। ऐसे में ऐडवर्टाइजर दर्शकों के व्यवहार की कहीं ज्यादा व्यापक तस्वीर देखना चाहते हैं।
आज कई मार्केटर्स किसी कैंपेन का मूल्यांकन सिर्फ टीवी रेटिंग्स के आधार पर नहीं करते। वे डिजिटल एनालिटिक्स, फर्स्ट-पार्टी कंज्यूमर डेटा, सोशल मीडिया एंगेजमेंट और बिक्री के आंकड़ों को भी साथ में देखते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि रेटिंग्स की अहमियत कम हो गई है। बल्कि उनकी भूमिका बदल रही है।
अब टेलीविजन रेटिंग्स सफलता का अकेला पैमाना नहीं रह गई हैं, बल्कि वे एक बड़े और व्यापक मीजरमेंट इकोसिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही हैं।
ऐडवर्टाइजर, मार्केटर्स, इंडियन सोसाइटी ऑफ एडवरटाइजर्स (ISA), नए ब्रैंड मालिक और ऐडवर्टाइजर्स के संगठन, जो मीडिया और ऑडियंस पर निवेश करते हैं, उन्हें मिलकर इस नई रेटिंग्स करेंसी की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। यह ऐसी करेंसी होनी चाहिए, जो अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म और फॉर्मेट पर होने वाली व्यूअरशिप और एंगेजमेंट दोनों को माप सके।
ब्रैंड्स और मार्केटर्स मिलकर हर साल लगभग 1.75 लाख करोड़ रुपये का विज्ञापन निवेश करते हैं। अगर वे सामूहिक रूप से इस राशि का लगभग 0.6 प्रतिशत यानी करीब 1,000 करोड़ रुपये ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम पर खर्च करें, तो इसका सबसे बड़ा लाभ उन्हें खुद मिलेगा और साथ ही पूरे मीडिया इकोसिस्टम को भी इसका फायदा होगा।
मीडिया एजेंसीज चुपचाप बदल रही हैं अपनी प्लानिंग का तरीका
अगर इस बदलाव के दौर में किसी ने सबसे तेजी से खुद को बदला है, तो वह मीडिया एजेंसीज हैं। मीडिया खपत के लगातार बिखरते स्वरूप को देखते हुए मीडिया प्लानर्स अब अपने ग्राहकों को सलाह देने के लिए कई तरह के डेटा का इस्तेमाल कर रहे हैं। ब्रॉडकास्ट टीवी कैंपेन की योजना बनाने में आज भी टेलीविजन रेटिंग्स की अहम भूमिका है, लेकिन अब उनके साथ डिजिटल व्यूअरशिप, कनेक्टेड टीवी की खपत, ऑनलाइन वीडियो के आंकड़े और एजेंसियों के अपने ऑडियंस टूल्स का भी विश्लेषण किया जा रहा है।
यह बदलाव पूरी इंडस्ट्री की एक बड़ी सच्चाई को दिखाता है। आज के दर्शक "टेलीविजन" और "वीडियो" के बीच कोई फर्क नहीं करते। वे सिर्फ वही कंटेंट देखते हैं, जो उन्हें जिस स्क्रीन पर सबसे सुविधाजनक लगता है। लेकिन मीजरमेंट सिस्टम अभी भी इस बदलाव की रफ्तार से काफी पीछे चल रहे हैं।
रेटिंग्स से कहीं ज्यादा तेजी से बदले हैं दर्शक
शायद सबसे बड़ा बदलाव रेटिंग्स इंडस्ट्री के भीतर नहीं, बल्कि भारतीय घरों के अंदर आया है। अब टेलीविजन ही एकमात्र ऐसी स्क्रीन नहीं रह गई है, जो लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती हो। एक ही परिवार का कोई सदस्य प्राइम टाइम का ड्रामा टीवी पर देख सकता है, दूसरा मोबाइल पर क्रिकेट मैच की हाइलाइट्स देख सकता है, तीसरा ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्म स्ट्रीम कर सकता है और उसी दिन कई बार शॉर्ट वीडियो भी देख सकता है।
पारंपरिक ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम उस दौर के लिए बनाया गया था, जब घरों में मनोरंजन का मुख्य माध्यम केवल टेलीविजन हुआ करता था। लेकिन आज दर्शकों की देखने की आदतें पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बिखरी हुई और विविध हो चुकी हैं। यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है।
क्या भारत आज भी सिर्फ टेलीविजन दर्शकों को माप रहा है, या अब उसे कुल वीडियो खपत को मापना शुरू कर देना चाहिए? इसी सवाल का जवाब आने वाले दशक में मीडिया प्लानिंग की दिशा तय कर सकता है।
क्या भारत को एक ही रेटिंग्स करेंसी चाहिए या कई?
ऑडियंस मीजरमेंट को लेकर एक और बहस तेजी से आगे बढ़ रही है। यह बहस इस बात को लेकर है कि भविष्य में मीजरमेंट सिस्टम का ढांचा कैसा होना चाहिए।
कई वर्षों से भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री इस सोच के साथ काम करती रही है कि एक ही मीजरमेंट करेंसी सबसे ज्यादा प्रभावी होती है। ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर और मीडिया एजेंसीज सभी एक ही डेटा सेट के आधार पर कारोबार करते हैं।
लेकिन तकनीक के विकास के साथ कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर एक से ज्यादा मीजरमेंट सिस्टम होंगे, तो इससे नई तकनीकों को बढ़ावा मिलेगा और इंडस्ट्री को ज्यादा गहरी और समृद्ध जानकारी मिल सकेगी।
वहीं दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग मीजरमेंट करेंसी से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे मीडिया खरीदने की प्रक्रिया पहले की तुलना में और ज्यादा जटिल हो जाएगी, खासकर भारत जैसे बड़े मार्केट में, जहां वर्षों से एक भरोसेमंद साझा करेंसी के आधार पर ब्रॉडकास्टर्स, मीडिया एजेंसियों और ब्रैंड्स के बीच कारोबार होता आया है।
दुनिया के कई देशों में इस समय अलग-अलग मॉडल पर प्रयोग किए जा रहे हैं। वहां पारंपरिक टेलीविजन पैनल के साथ रिटर्न-पाथ डेटा, कनेक्टेड टीवी एनालिटिक्स और डिजिटल मीजरमेंट को जोड़कर नए समाधान विकसित किए जा रहे हैं। संभव है कि आने वाले समय में भारत के सामने भी ऐसे ही विकल्प हों।
वह दर्शक जिसकी सबसे कम चर्चा होती है
दिलचस्प बात यह है कि रेटिंग्स को लेकर होने वाली बहस में जिस सबसे महत्वपूर्ण पक्ष की सबसे कम चर्चा होती है, वह है- दर्शक। हर ब्रॉडकास्टर दावा करता है कि वह अपने दर्शकों को समझता है। हर ऐडवर्टाइजर उन्हीं तक पहुंचना चाहता है। हर मीडिया एजेंसी उनका अध्ययन करती है। हर मीजरमेंट सिस्टम उन्हें सही तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। लेकिन यह चर्चा शायद ही कभी होती है कि खुद दर्शक चाहते क्या हैं और उन्हें किस तरह मापा जाना चाहिए।
असल में दर्शकों की प्राथमिकता सिर्फ अच्छी सामग्री, आसान पहुंच और ज्यादा विकल्प होती है। रेटिंग्स उनके लिए सीधे तौर पर महत्वपूर्ण नहीं होतीं।लेकिन यही रेटिंग्स तय करती हैं कि कौन-सा कार्यक्रम बनाया जाएगा, कौन-सा शो ऑन एयर बना रहेगा और किस तरह के कंटेंट में निवेश किया जाएगा।
इस तरह देखा जाए तो ऑडियंस मीजरमेंट सिर्फ कारोबारी फैसलों को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि उन करोड़ों भारतीयों तक पहुंचने वाले कंटेंट की दिशा भी तय करता है, जिसे वे हर दिन देखते हैं। यह बदलाव सिर्फ रेटिंग्स का नहीं, पूरे सिस्टम का है। अक्सर कहा जाता है कि टेलीविजन इंडस्ट्री बदलाव के दौर से गुजर रही है। लेकिन इस बार का बदलाव किसी अस्थायी रुकावट या केवल नियामकीय बदलाव से कहीं बड़ा है। यह उस पूरी सोच का पुनर्मूल्यांकन है कि ऐसे समय में दर्शकों को किस तरह मापा जाए, जब कंटेंट बिना किसी रुकावट के ब्रॉडकास्ट टीवी, कनेक्टेड टीवी, मोबाइल डिवाइस और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के बीच लगातार घूम रहा है।
आज पॉलिसी मेकर्स, ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर्स, मीडिया एजेंसियों और ऑडियंस मीजरमेंट कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ रेटिंग्स पर भरोसा बहाल करना नहीं है। बल्कि ऐसी मीजरमेंट व्यवस्था तैयार करना है, जो यह सही तरीके से दिखा सके कि भारत आज कंटेंट कैसे देखता है और आने वाले वर्षों में उसे किस तरह देखेगा। भविष्य में यह व्यवस्था एक मजबूत और अधिक सक्षम BARC के नेतृत्व में आगे बढ़ेगी, किसी अधिक तकनीक-आधारित ऑडियंस मीजरमेंट फ्रेमवर्क के जरिए विकसित होगी या फिर अलग-अलग प्लेटफॉर्म को जोड़ने वाली एक व्यापक और साझा मीजरमेंट करेंसी के रूप में सामने आएगी, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन एक बात अब बिल्कुल साफ है कि ऑडियंस मीजरमेंट के अगले दौर का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर नहीं होगा कि उसके आंकड़े कितने सटीक हैं, बल्कि इस बात पर भी होगा कि वह पूरी इंडस्ट्री में कितना भरोसा पैदा कर पाता है। कई वर्षों तक रेटिंग्स यह तय करती रही हैं कि इंडस्ट्री में कौन आगे है और कौन पीछे। लेकिन अब इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आने वाले समय में इस पूरे खेल के नियम कौन तय करेगा।
BARC को नए नेतृत्व, नई सोच और ज्यादा मानवीय, सक्रिय तथा विनम्र कार्यशैली की जरूरत है। लंबे समय से यह धारणा रही है कि BARC के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) इंडस्ट्री की चिंताओं और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (I&B Ministry) के उन निर्देशों के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा पाए, जो पूरे मीडिया उद्योग, ऐडवर्टाइजर्स और व्यापक इकोसिस्टम के हित में थे।
आगे बढ़ते हुए एक API आधारित मॉडल भी तैयार किया जा सकता है, जिसे अपेक्षाकृत कम निवेश में लागू करना संभव है। हालांकि, इसके लिए जरूरी होगा कि Meta, Facebook और अन्य बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इसमें शामिल हों, ताकि मार्केटर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए सभी माध्यमों को जोड़ने वाली एक साझा और एकीकृत मीजरमेंट करेंसी तैयार की जा सके। अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रह गया है कि रेटिंग्स कब वापस आएंगी। असल सवाल यह है कि रेटिंग्स सिस्टम में सुधार और बदलाव की अगुवाई कौन करेगा, उसके नए नियम कौन तय करेगा और यह प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होगी।
भारतीय मीडिया इंडस्ट्री को जितनी जल्दी हो सके एक भरोसेमंद, पारदर्शी और सभी की ओर से स्वीकार की गई साझा रेटिंग्स व्यवस्था की जरूरत है। क्योंकि इस तरह का लंबा खालीपन या अनिश्चितता पूरे मीडिया और विज्ञापन उद्योग के लिए किसी भी तरह से अच्छी नहीं मानी जा सकती।
प्रकाशन क्षेत्र की प्रमुख कंपनी हार्परकॉलीन्स पब्लिशर्स इंडिया ने अपनी एग्जिक्यूटिव पब्लिशर पौलोमी चटर्जी की जिम्मेदारियों का विस्तार किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रकाशन क्षेत्र की प्रमुख कंपनी हार्परकॉलीन्स पब्लिशर्स इंडिया ने अपनी वरिष्ठ अधिकारी पौलोमी चटर्जी की जिम्मेदारियों का विस्तार किया है। कंपनी की एग्जिक्यूटिव पब्लिशर के तौर पर काम कर रहीं पौलोमी अब कंपनी के सभी एडल्ट पब्लिशिंग इम्प्रिंट्स की देखरेख भी करेंगी।
नई जिम्मेदारी के तहत पौलोमी चटर्जी अब फोर्थ एस्टेट (Fourth Estate), पेरेनियल (Perennial), हार्परकॉलीन्स (HarperCollins), हार्पर बिजनेस (Harper Business), हार्पर फिक्शन (Harper Fiction), हार्पर नॉन-फिक्शन (Harper Non-Fiction), हार्पर फेथ (Harper Faith), हार्पर लर्निंग (Harper Learning) और हार्पर हिंदी (Harper Hindi) सहित कंपनी के प्रमुख प्रकाशन ब्रांड्स का नेतृत्व करेंगी।
कंपनी ने अपने बयान में कहा कि पौलोमी चटर्जी ने अब तक कंपनी के प्रकाशन कार्यक्रम को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने लेखकों और संपादकीय टीमों के साथ मिलकर ऐसी पुस्तकों की सूची तैयार की है, जो आज के दौर की विविधता, गुणवत्ता और नए विचारों को दर्शाती है।
हार्परकॉलीन्स इंडिया के मुताबिक, अपनी नई भूमिका में पौलोमी कंपनी के प्रकाशकों और संपादकों के साथ मिलकर संपादकीय दृष्टि को और मजबूत करेंगी। साथ ही, विभिन्न इम्प्रिंट्स की अलग पहचान को और बेहतर बनाने तथा कंपनी के ट्रेड पब्लिशिंग कारोबार को आगे बढ़ाने पर भी उनका विशेष फोकस रहेगा।
कंपनी का मानना है कि इस नई जिम्मेदारी के साथ पौलोमी चटर्जी का अनुभव और नेतृत्व हार्परकॉलीन्स इंडिया के प्रकाशन कार्यक्रम को नई दिशा देने और उसके विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
डी.बी. कॉर्प लिमिटेड को 2 जुलाई 2026 को प्रमोटर ग्रुप से जुड़ी दो कंपनियों की ओर से अपने दर्जे को 'प्रमोटर ग्रुप' से 'पब्लिक' श्रेणी में बदलने का अनुरोध मिला है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डी.बी. कॉर्प लिमिटेड को 2 जुलाई 2026 को प्रमोटर ग्रुप से जुड़ी दो कंपनियों की ओर से अपने दर्जे को 'प्रमोटर ग्रुप' से 'पब्लिक' श्रेणी में बदलने का अनुरोध मिला है।
कंपनी के मुताबिक, BEDR Realcon Private Limited और Diligent Pinkcity Center Private Limited ने यह अनुरोध SEBI (लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स) रेगुलेशंस, 2015 के नियम 31A के तहत किया है।
डी.बी. कॉर्प ने बताया कि इन दोनों कंपनियों के पास फिलहाल कंपनी का एक भी शेयर नहीं है। इसलिए दोनों ने अपने दर्जे को प्रमोटर ग्रुप से बदलकर पब्लिक कैटेगरी में शामिल करने की मांग की है।
कंपनी ने कहा कि इन अनुरोधों की जांच SEBI के लागू नियमों के अनुसार की जाएगी। इसके बाद इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के सामने रखा जाएगा।
यदि बोर्ड इस प्रस्ताव को मंजूरी देता है, तो डी.बी. कॉर्प आगे की आवश्यक प्रक्रिया पूरी करते हुए स्टॉक एक्सचेंज के पास री-क्लासिफिकेशन के लिए आवेदन करेगा।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने राधिका भिरानी को HT City का नया लाइफस्टाइल एडिटर नियुक्त किया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने राधिका भिरानी को HT City का नया लाइफस्टाइल एडिटर नियुक्त किया है। मीडिया और लाइफस्टाइल पत्रकारिता में लंबे अनुभव के साथ राधिका अब HT City की लाइफस्टाइल कंटेंट रणनीति और संपादकीय जिम्मेदारियां संभालेंगी।
राधिका भिरानी इससे पहले करीब पांच वर्षों तक Health Shots की संपादकीय टीम का नेतृत्व कर चुकी हैं। इसके बाद उन्होंने लगभग 1.2 वर्ष तक HT Shop Now (Lifestyle) का नेतृत्व किया, जहां उन्होंने लाइफस्टाइल से जुड़े कंटेंट और एडिटोरियल ऑपरेशंस की जिम्मेदारी संभाली।
यह हिन्दुस्तान टाइम्स के साथ उनका दूसरा कार्यकाल है। इससे पहले वह करीब एक वर्ष तक सीनियर स्पेशल कॉरेस्पॉन्डेंट के रूप में भी इस मीडिया समूह से जुड़ी रही थीं।
अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत में राधिका ने लगभग 12 वर्षों तक न्यूज एजेंसी IANS में काम किया। इस दौरान उन्होंने मनोरंजन, लाइफस्टाइल और फीचर पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापक अनुभव हासिल किया।
राधिका भिरानी की नियुक्ति को HT City के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। उनके अनुभव से लाइफस्टाइल कंटेंट को और मजबूत करने तथा पाठकों के लिए नई और उपयोगी सामग्री पेश करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
मध्य प्रदेश टुडे मीडिया लिमिटेड (Madhya Pradesh Today Media Limited) के खिलाफ REC Limited ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 की धारा 7 के तहत याचिका दायर की है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मध्य प्रदेश की प्रिंट मीडिया कंपनी 'मध्य प्रदेश टुडे मीडिया लिमिटेड' (Madhya Pradesh Today Media Limited) के खिलाफ REC Limited ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 की धारा 7 के तहत याचिका दायर की है। इसकी जानकारी कंपनी ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को दी है।
कंपनी ने SEBI (LODR) Regulations, 2015 के नियम 30 के तहत जारी सूचना में बताया कि उसे REC Limited की ओर से दायर याचिका प्राप्त हुई है। फिलहाल कंपनी इस याचिका की कानूनी समीक्षा कर रही है।
कंपनी ने यह भी कहा है कि मामले में आगे होने वाले किसी भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम की जानकारी नियामकीय नियमों के तहत समय-समय पर स्टॉक एक्सचेंज को दी जाएगी।
हालांकि, कंपनी ने यह नहीं बताया है कि याचिका किस बकाया राशि या किस वित्तीय विवाद से जुड़ी है। साथ ही, अभी केवल याचिका दायर की गई है। इस पर अंतिम फैसला संबंधित न्यायाधिकरण (NCLT) द्वारा लिया जाएगा।
'मध्य प्रदेश टुडे मीडिया लिमिटेड' मध्य प्रदेश की प्रिंट मीडिया कंपनी है, जिसकी स्थापना वर्ष 2010 में हुई थी। कंपनी भोपाल से संचालित होती है और 'प्रदेश टुडे' (Pradesh Today) नाम से हिंदी समाचार पत्र प्रकाशित करती है। कंपनी सुबह और शाम दोनों संस्करणों के साथ-साथ डिजिटल न्यूज़ पोर्टल भी संचालित करती है।
"Banking's Most Valuable Capital" शीर्षक वाली इस कवर स्टोरी का मुख्य संदेश है कि बैंकिंग क्षेत्र की सबसे बड़ी पूंजी पैसा नहीं, बल्कि भरोसा होता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
देश की प्रतिष्ठित मैगजीन BW बिजनेसवर्ल्ड ने अपना नया अंक जारी किया है, जिसमें HDFC बैंक में हाल के गवर्नेंस (कॉरपोरेट प्रशासन) से जुड़े घटनाक्रम और उनके भारत के बैंकिंग सेक्टर, संस्थागत भरोसे (Institutional Trust) और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर पड़ने वाले असर का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।
"Banking's Most Valuable Capital" शीर्षक वाली इस कवर स्टोरी का मुख्य संदेश है कि बैंकिंग क्षेत्र की सबसे बड़ी पूंजी पैसा नहीं, बल्कि भरोसा होता है। यह भरोसा वर्षों की बेहतर कार्यप्रणाली, मजबूत नेतृत्व, पारदर्शी गवर्नेंस और ग्राहकों, निवेशकों, नियामकों (Regulators) व बाजार के विश्वास से बनता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि HDFC बैंक लंबे समय से भारत के सबसे भरोसेमंद और प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थानों में गिना जाता रहा है। संचालन, अनुशासित कार्यशैली और संस्थागत विश्वसनीयता के मामले में बैंक को एक मानक माना जाता है। हालांकि, हाल के कुछ घटनाक्रमों ने बैंक के गवर्नेंस और हितधारकों के भरोसे को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।
रिपोर्ट में पूर्व चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती के इस्तीफे, Dubai/AT1 मामले, बोर्ड द्वारा कराई गई स्वतंत्र कानूनी जांच, नेतृत्व की निरंतरता (Leadership Continuity) से जुड़े सवालों और इन मुद्दों पर बैंक की सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।
दोनों पक्षों को दी गई जगह
BW Businessworld ने अपनी कवर स्टोरी में सभी पक्षों को शामिल करने की कोशिश की है।
रिपोर्ट के मुताबिक, HDFC बैंक का कहना है कि बोर्ड की ओर से कराई गई स्वतंत्र कानूनी समीक्षा में पूर्व चेयरमैन द्वारा उठाई गई चिंताओं की पुष्टि करने वाला कोई सबूत नहीं मिला।
वहीं, अतनु चक्रवर्ती ने अपने सार्वजनिक बयान में कहा कि उनका इस्तीफा किसी कानूनी आरोप के कारण नहीं, बल्कि "अंतरात्मा की आवाज" (Call of Conscience) पर लिया गया फैसला था।
पत्रिका का कहना है कि इन दोनों पक्षों को सामने रखते हुए रिपोर्ट ने पूरे मामले को कॉरपोरेट गवर्नेंस, जवाबदेही (Accountability) और संस्थागत जिम्मेदारी (Institutional Stewardship) के व्यापक संदर्भ में समझाने का प्रयास किया है।
सिर्फ नियमों का पालन नहीं, पारदर्शिता भी जरूरी
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि HDFC बैंक आज भी वित्तीय रूप से मजबूत है, बाजार में उसकी अग्रणी स्थिति बनी हुई है और भारतीय बैंकिंग प्रणाली में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
हालांकि, आज के समय में किसी संस्थान की गवर्नेंस का मूल्यांकन सिर्फ नियामकीय नियमों के पालन से नहीं किया जाता। अब पारदर्शिता, समय पर जानकारी साझा करना, बोर्ड की निगरानी और हितधारकों के साथ प्रभावी संवाद भी उतने ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
कॉरपोरेट इंडिया के लिए भी सीख
BW Businessworld का कहना है कि यह चर्चा केवल HDFC बैंक तक सीमित नहीं है। भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक स्तर पर कंपनियों की बढ़ती मौजूदगी के बीच कॉरपोरेट गवर्नेंस का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, अब कंपनियों के लिए प्रभावी बोर्ड, स्पष्ट उत्तराधिकार योजना (Succession Planning), मजबूत डिस्क्लोजर सिस्टम और नेतृत्व की जवाबदेही जैसे मुद्दे लंबे समय तक संस्थागत भरोसा बनाए रखने के लिए बेहद अहम हो गए हैं।
पत्रिका का मानना है कि बैंकिंग की पूरी व्यवस्था भरोसे पर आधारित होती है। किसी वित्तीय संस्थान की असली ताकत सिर्फ उसकी बैलेंस शीट में नहीं, बल्कि उस भरोसे में होती है जो वह अपने ग्राहकों, निवेशकों और अन्य हितधारकों के बीच कायम करता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जब किसी संस्थान पर सवाल उठते हैं, तब पारदर्शिता, जवाबदेही और मजबूत गवर्नेंस के जरिए ही वह अपने प्रति लोगों का विश्वास और मजबूत कर सकता है।
विशेषज्ञों की राय और विस्तृत विश्लेषण
BW Businessworld के इस विशेष अंक में विस्तृत रिपोर्टिंग, गहन विश्लेषण और विशेषज्ञों की राय के जरिए भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के सबसे चर्चित गवर्नेंस मुद्दों में से एक पर व्यापक चर्चा की गई है। साथ ही यह भी बताया गया है कि तेजी से बदलते और अधिक पारदर्शी कारोबारी माहौल में कॉरपोरेट इंडिया किस तरह अपने संस्थागत भरोसे को मजबूत बनाए रख सकता है।
यह नया अंक प्रिंट और डिजिटल, दोनों प्रारूपों में उपलब्ध है।
BW Businessworld के बारे में
BW Businessworld पिछले 45 वर्षों से भारत का प्रमुख बिजनेस मीडिया ब्रांड है। यह 23 विशेष बिजनेस समुदायों (Niche Business Communities) और 10 मैगजीन के नेटवर्क के साथ काम करता है। इसके अलावा यह देश और विदेश में कई कॉन्फ्रेंस और बिजनेस फोरम आयोजित करता है, जहां इंडस्ट्री के लीडर्स को एक-दूसरे के साथ विचार साझा करने और सहयोग बढ़ाने का अवसर मिलता है। प्रिंट संस्करण के साथ-साथ BW Businessworld अपने सभी कंटेंट को डिजिटल, वीडियो स्टोरी और ई-मैगजीन के रूप में भी उपलब्ध कराता है।
देश के न्यूज पब्लिशर्स ने प्रिंट विज्ञापन दरें बढ़ाने की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि न्यूजप्रिंट, ईंधन, परिवहन व अन्य खर्चें बढ़ रहे हैं, पर विज्ञापन दरें अब भी उसी अनुपात में नहीं बढ़ीं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।
भारत के न्यूज पब्लिशर्स (समाचार पत्र प्रकाशक) ने प्रिंट विज्ञापनों की दरों में बढ़ोतरी की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि न्यूजप्रिंट, ईंधन, परिवहन और अन्य परिचालन खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन विज्ञापन दरों में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई है। ऐसे में प्रिंट मीडिया का आर्थिक मॉडल लगातार दबाव में आ गया है और विश्वसनीय पत्रकारिता को बनाए रखना पहले से अधिक मुश्किल होता जा रहा है।
यह मांग ऐसे समय में सामने आई है जब लगभग सभी इंडस्ट्री बढ़ती लागत का असर अपने ग्राहकों तक पहुंचा चुके हैं। कई कंपनियों ने या तो अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाई हैं या फिर पैकेट का आकार छोटा कर दिया है। पब्लिशर्स का कहना है कि जब दूसरे इंडस्ट्री अपनी लागत की भरपाई कर सकते हैं, तो प्रिंट मीडिया को भी विज्ञापन दरों में संशोधन का अधिकार मिलना चाहिए।
टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की कंपनी बेनेट, कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (BCCL) के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO), बोर्ड सदस्य और ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशंस (ABC) के वाइस चेयरमैन मोहित जैन ने कहा कि प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री इस समय गंभीर महंगाई के दबाव से गुजर रहा है।
उन्होंने बताया कि रुपये के कमजोर होने, न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों और ईंधन महंगा होने से अखबार प्रकाशित करने की लागत में काफी बढ़ोतरी हुई है। वहीं डेयरी, FMCG और ऑटोमोबाइल समेत कई इंडस्ट्री पहले ही बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल चुके हैं।
मोहित जैन ने कहा कि न्यूज पब्लिशर्स पर भी वही लागत का दबाव है, इसलिए विज्ञापन दरों में जल्द संशोधन जरूरी है। उनके मुताबिक, न्यूजप्रिंट और वितरण लागत को देखते हुए प्रिंट विज्ञापन दरों में 15 से 20 फीसदी तक बढ़ोतरी की जरूरत है। उनका कहना है कि विश्वसनीय समाचारों का महत्व आज भी पहले जैसा ही है, लेकिन उन्हें तैयार करने और पाठकों तक पहुंचाने की लागत काफी बढ़ चुकी है।
इसी तरह मातृभूमि के प्रबंध निदेशक, इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (INS) के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद एम. वी. श्रेयम्स कुमार ने भी विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी की मांग का समर्थन किया।
उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत और विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव के कारण प्रिंट मीडिया की आर्थिक स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।
श्रेयम्स कुमार ने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर विज्ञापन दरें इन वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं बढ़ेंगी तो पब्लिशर अपनी लागत की भरपाई कैसे करेंगे? उन्होंने बताया कि वे काफी समय से बड़े विज्ञापनदाताओं से दरों में संशोधन की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें केवल आश्वासन ही मिला है और कोई ठोस फैसला नहीं हुआ।
उन्होंने कहा कि कंपनियां महंगाई का असर अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाकर ग्राहकों तक पहुंचा चुकी हैं। ऐसे में न्यूज पब्लिशर्सों को भी विश्वसनीय पत्रकारिता की बढ़ती लागत निकालने के लिए पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने प्रिंट विज्ञापन दरों में कम से कम 25 फीसदी बढ़ोतरी की मांग की।
पब्लिशर्स का कहना है कि उनकी मांग पर अब तक विज्ञापनदाताओं ने कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया है। मोहित जैन और श्रेयम्स कुमार दोनों का कहना है कि वे लंबे समय से विज्ञापन दरों में संशोधन की मांग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है।
इसके बावजूद प्रिंट मीडिया आज भी देश के बड़े विज्ञापनदाताओं के लिए एक अहम माध्यम बना हुआ है। FMCG, ऑटोमोबाइल, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, रिटेल, रियल एस्टेट, शिक्षा और वित्तीय सेवाओं जैसे कई बड़े सेक्टर अब भी अखबारों में बड़े पैमाने पर विज्ञापन देते हैं।
डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की सचिव सुजाता गुप्ता ने कहा कि विश्वसनीय पत्रकारिता तैयार करने की लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि पब्लिशर समय-समय पर अपनी व्यावसायिक कीमतों की समीक्षा करें। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विज्ञापन दरों को लेकर अंतिम फैसला हर पब्लिशर अपने बाजार और कारोबारी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र रूप से करता है।
इस मुद्दे पर e4m ने इंडियन सोसाइटी ऑफ एडवरटाइजर्स (ISA) और FMCG व ऑटोमोबाइल क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियों से प्रतिक्रिया मांगी। खबर लिखे जाने तक उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला था। वहीं मारुति सुजुकी ने कहा कि कंपनी फिलहाल मेंटेनेंस शटडाउन पर है और अगले सप्ताह इस विषय पर प्रतिक्रिया देगी।
बढ़ती लागत और विज्ञापन दरों के बीच बढ़ती खाई
भारत का प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री आज भी सालाना 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का विज्ञापन कारोबार करता है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र की वृद्धि काफी धीमी रही है।
प्रिंट मीडिया में न्यूजरूम चलाने, प्रिंटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए रखने, कागज खरीदने और अखबारों को देशभर में वितरित करने जैसी कई स्थायी लागतें होती हैं। मौजूदा महंगाई के दौर में इन सभी खर्चों में लगातार बढ़ोतरी हुई है।
पब्लिशर्स का कहना है कि न्यूजप्रिंट उनकी सबसे बड़ी लागतों में से एक है। इसकी कीमत वैश्विक कागज आपूर्ति, शिपिंग खर्च और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति पर निर्भर करती है। रुपये के कमजोर होने से आयातित न्यूजप्रिंट और महंगा हो जाता है। इसके अलावा ईंधन महंगा होने से देशभर में अखबार पहुंचाने का खर्च भी काफी बढ़ गया है।
पब्लिशर्स का तर्क है कि जब किसी इंडस्ट्री की उत्पादन लागत बढ़ती है तो कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ा देती हैं। उसी तरह मीडिया इंडस्ट्री को भी अखबार तैयार करने की बढ़ती लागत के अनुरूप विज्ञापन दरों में बदलाव करने का अधिकार मिलना चाहिए।
विज्ञापनदाताओं की भी अपनी मजबूरियां
हालांकि विज्ञापन क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ इस मुद्दे को केवल लागत के नजरिए से नहीं देखते।
एक मार्केटिंग विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि विज्ञापन दरों में किसी भी बढ़ोतरी का फैसला केवल रेट कार्ड बदलने भर का मामला नहीं होता। विज्ञापनदाता किसी भी माध्यम की पहुंच, पाठकों की संख्या, प्रभाव, संबंधित इंडस्ट्री की मांग और डिजिटल, टेलीविजन, आउटडोर व रिटेल मीडिया जैसे अन्य विकल्पों की भी तुलना करते हैं। इसलिए यह फैसला काफी जटिल होता है।
उन्होंने यह भी कहा कि इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) वर्ष 2019 के बाद से नहीं हुआ है। ऐसे में प्रिंट मीडिया की मौजूदा पहुंच और पाठकों के आंकड़ों का अभाव भी इस चर्चा को और कठिन बना देता है।
एक अन्य मार्केटिंग विशेषज्ञ ने कहा कि प्रिंट मीडिया आज भी भरोसेमंद, क्षेत्रीय पहुंच वाला और प्रीमियम समाचार वातावरण उपलब्ध कराता है। लेकिन दूसरी तरफ विज्ञापनदाता भी अपने मार्केटिंग बजट पर पहले से ज्यादा सख्ती से नजर रख रहे हैं। अब वे ऐसे प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता दे रहे हैं जहां निवेश के परिणामों को आसानी से मापा जा सके और जरूरत के हिसाब से विज्ञापन रणनीति बदली जा सके।
डिजिटल में भी बढ़ रही हैं चुनौतियां
भारतीय समाचार पब्लिशर्स के सामने केवल प्रिंट मीडिया की लागत ही चुनौती नहीं है। डिजिटल समाचार कारोबार भी तेजी से बदल रहा है।
वेबसाइट ट्रैफिक में उतार-चढ़ाव, सोशल मीडिया और सर्च प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म में बदलाव, खबरें पढ़ने की बदलती आदतें और AI प्लेटफॉर्म से उचित भुगतान को लेकर जारी बहस ने डिजिटल मीडिया की कमाई पर भी असर डाला है।
इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए कई मीडिया संस्थान वीडियो कंटेंट, इवेंट्स, डिजिटल सब्सक्रिप्शन, B2B सेवाएं, न्यूजलेटर, पेवॉल और बॉट-ब्लॉकिंग जैसी नई रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। हालांकि इन मॉडलों को बड़े स्तर पर सफल होने में अभी समय लगेगा। फिलहाल अधिकांश पारंपरिक मीडिया संस्थानों के लिए प्रिंट विज्ञापन ही आय का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है।
यही वजह है कि विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी की मौजूदा मांग केवल कीमत बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह इस बड़े सवाल से जुड़ी है कि जब विश्वसनीय पत्रकारिता तैयार करने और उसे पाठकों तक पहुंचाने की लागत लगातार बढ़ रही है, तब विज्ञापनदाता समाचार माध्यमों का मूल्यांकन किस तरह करें।
डिजिटल पब्लिशर्स को भी झटका
प्रिंट मीडिया के साथ-साथ डिजिटल समाचार पब्लिशर भी विज्ञापन दरों को लेकर दबाव महसूस कर रहे हैं।
केंद्र सरकार ने पिछले आठ वर्षों में लोकप्रिय डिजिटल विज्ञापन फॉर्मेट की सरकारी दरों में लगभग 50 फीसदी तक कटौती की है। दिसंबर 2024 में जारी संशोधित दरों के अनुसार, 50 लाख से अधिक मासिक यूनिक यूजर्स वाले ग्रुप-ए पब्लिशर्स के लिए सबसे लोकप्रिय 320×250 पिक्सल बैनर का कॉस्ट पर थाउजेंड इम्प्रेशन (CPTI) वर्ष 2016 और 2020 में 45 रुपये था, जिसे घटाकर 2024 में 25 रुपये कर दिया गया।
एक पब्लिशर ने कहा कि डिजिटल विज्ञापन बाजार तेजी से बदल चुका है, लेकिन इसके बावजूद सरकार की आधिकारिक विज्ञापन दरों में वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप संशोधन नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि पब्लिशर्स ने कई बार सरकार से इन दरों की समीक्षा करने का आग्रह किया, लेकिन उनकी मांग पर अब तक कोई फैसला नहीं लिया गया।
इस तरह प्रिंट और डिजिटल, दोनों ही क्षेत्रों में बढ़ती लागत और अपेक्षाकृत कम विज्ञापन आय भारतीय समाचार पब्लिशर्स के सामने बड़ी आर्थिक चुनौती बनती जा रही है।
TNPL के शेयरधारकों ने थिरु कुमार जयंत को नया चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर और डॉ. एस. विजयकुमार को डायरेक्टर नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
तमिलनाडु न्यूजप्रिंट एंड पेपर्स लिमिटेड (TNPL) में बड़े स्तर पर बदलाव देखने को मिला है। कंपनी के शेयरधारकों ने थिरु कुमार जयंत को नया चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर (CMD) और डॉ. एस. विजयकुमार को डायरेक्टर नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। वहीं, कंपनी के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर (ऑपरेशंस) और चीफ रिस्क ऑफिसर (CRO) योगेंद्र कुमार वार्ष्णेय ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
कंपनी ने 29 जून 2026 को बताया कि दोनों नई नियुक्तियों को पोस्टल बैलेट (रिमोट ई-वोटिंग) के जरिए मंजूरी मिली। ई-वोटिंग 27 मई से 25 जून 2026 तक चली और शेयरधारकों ने भारी बहुमत से इन प्रस्तावों का समर्थन किया।
कंपनी के रिकॉर्ड के अनुसार, कुल 50,968 शेयरधारकों में से 240 शेयरधारकों ने ई-वोटिंग में हिस्सा लिया। थिरु कुमार जयंत और डॉ. एस. विजयकुमार की नियुक्ति के पक्ष में करीब 99.97% वोट पड़े, जिसके बाद दोनों की नियुक्ति को औपचारिक मंजूरी मिल गई।
TNPL ने बताया कि यह नियुक्तियां कंपनी की नेतृत्व टीम को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से की गई हैं। इन प्रस्तावों की जानकारी कंपनी ने इससे पहले 26 और 27 मई 2026 को शेयर बाजारों को भी दी थी। कंपनी ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया SEBI (LODR) नियम, 2015 के तहत पूरी की गई है।
इसी बीच, कंपनी ने यह भी जानकारी दी कि योगेंद्र कुमार वार्ष्णेय ने एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर (ऑपरेशंस) और चीफ रिस्क ऑफिसर (CRO) के पद से व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया है। उनका इस्तीफा 27 जून 2026 को कार्य दिवस समाप्त होने के साथ प्रभावी हो गया।
TNPL ने स्पष्ट किया कि योगेंद्र कुमार के इस्तीफे के पीछे व्यक्तिगत कारणों के अलावा कोई अन्य महत्वपूर्ण वजह नहीं है। कंपनी में उन्होंने करीब 13 महीने तक अपनी सेवाएं दीं। योगेंद्र कुमार ने अपने नोटिस पीरियड के दौरान जिम्मेदारियों का सुचारु हस्तांतरण सुनिश्चित करने की भी बात कही है।
आज की युवा पीढ़ी के लिए खबरों का सबसे बड़ा माध्यम अब अखबार नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन बन गई है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आज की युवा पीढ़ी के लिए खबरों का सबसे बड़ा माध्यम अब अखबार नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन बन गई है। Instagram Reels पर कुछ ही सेकंड में न्यूज अपडेट मिल जाती है, WhatsApp पर खबरों के लिंक और फॉरवर्ड लगातार आते रहते हैं, जबकि YouTube पर पॉडकास्ट और एक्सप्लेनर वीडियो आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे में घर के दरवाजे पर आने वाला अखबार पहले जैसी अहमियत नहीं रखता।
यह बदलाव सिर्फ खबरें पढ़ने के तरीके का नहीं, बल्कि पूरी मीडिया खपत में आए बड़े बदलाव का संकेत है। BCG-Snapchat Report 2024 के मुताबिक, भारत की 37.7 करोड़ Gen Z आबादी का बड़ा हिस्सा अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए खबरें देख और समझ रहा है। यही वजह है कि प्रिंट मीडिया के सामने आज युवा पाठकों को अपने साथ जोड़कर रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
सुबह की आदत बदल चुकी है
Reuters Institute for the Study of Journalism की Digital News Report 2025 (जो करीब एक लाख लोगों पर 48 देशों में किए गए सर्वे पर आधारित है) में यह बात साफ सामने आई है। वैश्विक स्तर पर 18-24 आयु वर्ग के 44% युवा सोशल मीडिया और वीडियो नेटवर्क को अपना मुख्य न्यूज सोर्स मानते हैं। 25-34 आयु वर्ग में यह आंकड़ा 38% है।
भारत के लिए यह तस्वीर और भी साफ है। उसी रिपोर्ट के भारत-केंद्रित विश्लेषण के अनुसार, 18-34 आयु वर्ग के 41% भारतीय सोशल मीडिया और YouTube को अपना मुख्य न्यूज सोर्स बताते हैं, जबकि इसी उम्र के केवल 24% लोग पब्लिशर्स वेबसाइट पर जाते हैं। मतलब साफ है- खबर मिल रही है, लेकिन अखबार के जरिए नहीं और यह बदलाव सिर्फ "पढ़ने बनाम स्क्रॉल करने" तक सीमित नहीं है। Reuters की रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत उन देशों में शामिल है जहां लोग खबर पढ़ने की बजाय देखना ज्यादा पसंद करते हैं। सोशल वीडियो न्यूज की वैश्विक खपत 2020 में 52% थी, जो 2025 में 65% पर पहुंच चुकी है।
Gen Z न्यूज ले कहां से रही है?
DataReportal India 2025 के अनुसार, जनवरी 2025 तक भारत में 49.1 करोड़ सोशल मीडिया यूजर आइडेंटिटी हैं, जो कुल आबादी का 33.7% है। Gen Z (13-24 वर्ष) इस तबके में करीब 40% की हिस्सेदारी रखती है और रोजाना 3 घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर बिताती है।
इनकी पसंदीदा प्लेटफॉर्म्स हैं:
यहां एक बड़ा सवाब उठता है: क्या ये प्लेटफॉर्म अब पब्लिशर बन चुके हैं? जवाब है- काफी हद तक, हां। Reuters की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 50% से ज्यादा अंग्रेजी भाषी इंटरनेट यूजर कभी-कभी खबरों से बचते हैं (news avoidance), और इसकी बड़ी वजह डिजिटल मीडिया का overwhelming volume है।
"हेडलाइंस" का दौर, "डीप रीडिंग" खत्म?
जब खबरें 15-30 सेकंड की Reels और Shorts में सिमटने लगें, तो गहराई से पढ़ने और समझने की आदत अपने आप कम होने लगती है। यही बड़ा बदलाव आज प्रिंट मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
Reuters Institute की मार्च 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट ‘Understanding Young News Audiences’ के मुताबिक, दुनिया भर में 18-24 साल के करीब 73% युवा हर हफ्ते कम से कम एक शॉर्ट वीडियो के जरिए न्यूज देखते हैं। भारत में TikTok भले ही बंद हो, लेकिन Instagram Reels और YouTube Shorts ने उसकी जगह काफी हद तक ले ली है।
इसका असर साफ दिख रहा है। युवा अब खबरों को पढ़ने से ज्यादा “स्क्रॉल” कर रहे हैं। कौन-सी खबर लोगों तक पहुंचेगी, यह अब एडिटोरियल टीम से ज्यादा सोशल मीडिया एल्गोरिदम और व्यूज-लाइक्स तय कर रहे हैं।
प्रिंट के आंकड़े क्या कहते हैं?
FICCI-EY Media & Entertainment Report 2026 के मुताबिक, भारत का प्रिंट मीडिया सेक्टर 2025 में करीब ₹25,900 करोड़ पर लगभग स्थिर रहा। विज्ञापनों से होने वाली कमाई में सिर्फ 2% की मामूली बढ़त दर्ज की गई, जिसकी बड़ी वजह luxury products, real estate और सरकारी विज्ञापन रहे। वहीं अखबारों की बिक्री यानी circulation revenue में 1% की गिरावट आई। लगातार दूसरे साल ऐसा हुआ जब प्रिंट सर्कुलेशन से होने वाली कमाई घटी।
दूसरी तरफ डिजिटल मीडिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में डिजिटल विज्ञापन बाजार 26% बढ़कर ₹94,700 करोड़ तक पहुंच गया। कुल विज्ञापन खर्च में इसकी हिस्सेदारी 63% रही।
प्रिंट मीडिया की घटती हिस्सेदारी dentsu-e4m Digital Advertising Report के आंकड़ों में भी साफ दिखती है। 2024 में कुल विज्ञापन बाजार में प्रिंट की हिस्सेदारी 17% थी, जो 2025 में घटकर 15% रह गई। 2026 में इसके 13% तक आने का अनुमान है। dentsu-e4m Report 2026 के मुताबिक, 2025 में प्रिंट विज्ञापन बाजार ₹16,594 करोड़ का रहा, जो कुल विज्ञापन बाजार का करीब 14% है।
हालांकि सर्कुलेशन के आंकड़े एक मिली-जुली तस्वीर दिखाते हैं। Audit Bureau of Circulations (ABC) के जनवरी-जून 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में अखबारों की कुल दैनिक सर्कुलेशन करीब 2 करोड़ 97 लाख प्रतियां रही, जो पिछले छह महीनों की तुलना में 2.77% ज्यादा थी। इसमें Dainik Bhaskar सबसे आगे रहा, जिसके बाद Dainik Jagran और Amar Ujala का स्थान रहा। यह बढ़त मुख्य रूप से छोटे शहरों और Tier-2/Tier-3 बाजारों से आई।
लेकिन ABC के जुलाई-दिसंबर 2025 के नए आंकड़े बताते हैं कि Dainik Jagran, Amar Ujala और Rajasthan Patrika जैसे बड़े अखबारों की सर्कुलेशन में गिरावट देखने को मिली। वहीं Dainik Bhaskar और Hindustan को मामूली बढ़त मिली।
युवा अखबार से क्यों दूर हो रहे हैं?
इसके पीछे सिर्फ मोबाइल नहीं है- कंटेंट मिसमैच भी एक बड़ी वजह है।
पहली बात, अखबारों की भाषा और लेआउट पुरानी पीढ़ी के लिए डिजाइन है। Gen Z को क्रिएटर इकनॉमी, पॉप कल्चर, मेंटल हेल्थ, क्लाइमेट और गेमिंग जैसे विषयों में ज्यादा रुचि है- अखबार इन्हें गहराई से कवर नहीं करते।
दूसरी बात, मॉर्निंग हैबिट का टूटना। जिस पीढ़ी ने घर में अखबार देखते हुए बड़े होने का अनुभव नहीं किया, वह इस आदत को खुद क्यों शुरू करेगी?
तीसरी बात, तीसरी बड़ी वजह है पर्सनलॉइजेशन। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम हर यूजर को उसकी पसंद और रुचि के हिसाब से खबरें दिखाते हैं। किसी को स्पोर्ट्स ज्यादा दिखता है, किसी को एंटरटेनमेंट, तो किसी को बिजनेस या पॉलिटिक्स। वहीं अखबार हर पाठक को लगभग एक जैसा कंटेंट देता है। Gen Z की बड़ी आबादी को यही बात अब कम जुड़ाव वाली और कई बार “इर्रेलिवेंट” लगने लगी है।
चौथी बात, AI की बढ़ती भूमिका। Reuters Institute Digital News Report 2025 के अनुसार भारत में 44% लोग AI से पर्सनलाइज्ड न्यूज पाने में सहज हैं- यह वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है (तुलना के लिए ब्रिटेन में सिर्फ 11%)। साथ ही, 18% भारतीय हर हफ्ते AI चैटबॉट्स के जरिए खबर पढ़ते हैं- वैश्विक स्तर पर यह औसत महज 7% है।
क्या खुद अखबार भी जिम्मेदार हैं?
एक हद तक हां। भारत के अधिकांश बड़े अखबार समूहों ने डिजिटल-फर्स्ट थिंकिंग को देर से अपनाया। जब तक वे Instagram Reels, podcasts और WhatsApp न्यूजलेटर्स पर सक्रिय हुए, तब तक क्रिएटर इकनॉमी के नए चेहरे लाखों सब्सक्राइबर्स बना चुके थे।
Reuters Institute की अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट 'मैपिंग न्यूज क्रिएटर्स व इन्फ्लुएंसर्स' (24 देशों पर आधारित) यह बताती है कि न्यूज क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स अब कई ट्रेडिशनल न्यूज ब्रैंड्स से ज्यादा ध्यान खींच रहे हैं, खासकर सोशल और वीडियो नेटवर्क्स पर। इसी रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में 21% वयस्क और 30 साल से कम उम्र के 37% युवा अब रेगुलेट्री क्रिएटर्स या इन्फ्लुएंसर्स से खबर लेते हैं।
भारत में भी तस्वीर कुछ ऐसी ही है। YouTube पर ध्रुव राठी जैसे क्रिएटर्स के करोड़ों सब्सक्राइबर्स हैं। वहीं Instagram पर न्यूज एक्सप्लेनर और शॉर्ट न्यूज कंटेंट बनाने वाले कई अकाउंट्स की पहुंच अब कई रीजनल अखबारों के बराबर या उससे भी ज्यादा हो चुकी है। आसान भाषा, तेज फॉर्मेट और मोबाइल-फ्रेंडली कंटेंट की वजह से युवा तेजी से इन प्लेटफॉर्म्स की तरफ बढ़ रहे हैं। एक तरह से क्रिएटर इकनॉमी ने युवाओं के बीच वह जगह भर दी है, जहां प्रिंट मीडिया खुद को समय के साथ उतनी तेजी से नहीं बदल पाया।
लेकिन क्या सच में अखबार खत्म हो रहे हैं?
हालांकि कहानी का दूसरा पहलू भी है। Urban Gen Z यानी बड़े शहरों के युवा पूरे भारत की तस्वीर नहीं हैं।
TAM AdEx, RCS India और Excellent Publicity के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की पहली छमाही में प्रिंट विज्ञापनों में 26% की अच्छी बढ़त दर्ज की गई। इसमें छोटे शहरों और नॉन-मेट्रो मार्केट्स का बड़ा योगदान रहा। यानी देश के कई हिस्सों में अखबार अब भी मजबूत माध्यम बने हुए हैं।
वहीं WARC के आंकड़े बताते हैं कि 72% भारतीय उपभोक्ता डिजिटल विज्ञापनों की ज्यादा संख्या से परेशान महसूस करते हैं। इतना ही नहीं, 60% से ज्यादा लोग आज भी डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म्स के मुकाबले प्रिंट और टीवी खबरों पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
यही भरोसा प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि प्रिंट मीडिया समय के साथ खुद को बदले और नए दौर के पाठकों की जरूरतों के हिसाब से खुद को फिर से तैयार करे।
Trust की लड़ाई: सोशल मीडिया बनाम अखबार
AI और एल्गोरिदम से चलने वाली न्यूज की दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती यह बनती जा रही है कि सही और गलत खबर में फर्क करना मुश्किल होता जा रहा है। Reuters की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में 58% लोग ऑनलाइन गलत जानकारी और फेक न्यूज को लेकर चिंतित हैं। भारत में यह चिंता और ज्यादा गंभीर है। करीब 11% भारतीय यूजर्स मानते हैं कि कई बार दोस्त और परिवार के लोग भी अनजाने में गलत जानकारी आगे बढ़ा देते हैं।
WhatsApp ग्रुप्स के जरिए फैली अफवाहों को लेकर पहले भी कई गंभीर घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें हिंसा तक देखने को मिली। ऐसे माहौल में प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी एडिटोरियल अकाउंटबिलिटी, फैक्ट-चेकिंग और बाइलाइन जर्नलिज्म है, जहां खबरों की जिम्मेदारी तय होती है और जानकारी जांच-परख के बाद प्रकाशित की जाती है।
चुनौती बस इतनी है कि प्रिंट मीडिया इस भरोसे और विश्वसनीयता को नई पीढ़ी तक किस तरह पहुंचाता है।
प्रिंट मीडिया की नई रणनीति
अब न्यूजपेपर और मीडिया कंपनियां भी यह समझ चुकी हैं कि सिर्फ छपे हुए अखबार के जरिए Gen Z तक पहुंचना आसान नहीं है। यही वजह है कि अब कई न्यूजपेपर ब्रैंड्स शॉर्ट्स वीडियोज बना रहे हैं, AI आधारित वॉयस बुलेटिन शुरू कर रहे हैं, WhatsApp Channels पर सब्सक्राइबर्ट बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं और पॉडकास्ट स्टूडियो भी तैयार कर रहे हैं। इसके अलावा इवेंट्स और ब्रैंडेट कंटेंट भी कमाई का नया जरिया बनते जा रहे हैं।
FICCI-EY 2026 की रिपोर्ट भी बताती है कि प्रिंट पब्लिशर्स अब सिर्फ अखबारों पर निर्भर नहीं रहना चाहते। वे इवेंट्स, ब्रैंडेट कंटेंट और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए अपनी कमाई के नए रास्ते बना रहे हैं।
भविष्य क्या है?
आने वाले समय में भारत का प्रिंट मीडिया तीन रास्तों में से किसी एक दिशा में जाता दिख सकता है।
पहला रास्ता यह है कि प्रिंट धीरे-धीरे एक niche product बन जाए, यानी ऐसा माध्यम जो सिर्फ खास वर्ग के पाठकों तक सीमित रह जाए। इसमें premium readers, high-income वर्ग या UPSC और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले पाठक प्रमुख हो सकते हैं।
दूसरा रास्ता हाइब्रिड मॉडल का है, जहां अखबार सिर्फ प्रिंट तक सीमित न रहे, बल्कि वीडियो, ऑडियो, पॉडकास्ट्स, इवेंट्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के साथ मिलकर एक नया मीडिया इकोसिस्टम तैयार करे।
तीसरा और सबसे मजबूत रास्ता हाइपर लोकल जर्नलिज्म का माना जा रहा है। यानी जिला, शहर और तहसील स्तर की खबरों पर फोकस करने वाले रीजनल अखबार अपनी अहमियत बनाए रख सकते हैं। वजह साफ है- नेशनल न्यूज अब लोगों को मोबाइल पर मुफ्त में मिल जाती है, लेकिन स्थानीय खबरों के लिए आज भी बड़ी संख्या में लोग अखबारों पर भरोसा करते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि Gen Z ने खबर पढ़ना नहीं छोड़ा — बस फॉर्मेट बदल दिया है। Reuters Digital News Report 2025 के मुताबिक वैश्विक स्तर पर 18-24 आयु वर्ग के 44% और भारत में 18-34 आयु वर्ग के 41% युवा सोशल मीडिया को मुख्य न्यूज सोर्स मानते हैं। FICCI-EY 2026 बताती है कि प्रिंट का सर्कुलेशन रेवेन्यू लगातार दूसरे साल घटा है। dentsu-e4m के अनुसार 2025 में प्रिंट की कुल विज्ञापन हिस्सेदारी सिमटकर 14% पर आ गई।
लेकिन इस सबके बीच एक उम्मीद की किरण भी है- WARC के अनुसार 60% से ज्यादा भारतीय उपभोक्ता अभी भी प्रिंट को डिजिटल से ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। जिस दिन प्रिंट मीडिया इस ट्रस्ट को Gen Z की भाषा में ट्रांसलेट कर पाएगा- चाहे वो Reels हो, Podcast हो या WhatsApp न्यूजलेटर, उस दिन शायद अखबार फिर से दरवाजे से उठाया जाएगा।
फिलहाल तो यह कहना गलत नहीं होगा कि युवा पीढ़ी अखबार छोड़ रही है, लेकिन खबरों की भूख खत्म नहीं हुई, बस उसका फॉर्मेट बदल गया है।
गुजरात के सबसे बड़ा और प्रभावशाली मीडिया हाउस 'संदेश लिमिटेड' (The Sandesh Limited) के सीनियर मैनेजमेंट में बदलाव हुआ है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
गुजरात के सबसे बड़ा और प्रभावशाली मीडिया हाउस 'संदेश लिमिटेड' (The Sandesh Limited) के सीनियर मैनेजमेंट में बदलाव हुआ है। कंपनी ने दी जानकारी में बताया कि एचआर विभाग की सीनियर मैनेजर और सीनियर मैनेजमेंट पर्सनल (SMP) के तौर पर कार्यरत श्रीप्रधा मोरे ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
कंपनी के अनुसार, श्रीप्रधा मोरे ने 4 मई 2026 को अपना इस्तीफा सौंपा था। उनका इस्तीफा 20 जून 2026 से प्रभावी हो गया है और इसी तारीख से उन्हें कंपनी की सेवाओं से मुक्त कर दिया गया है। इसके साथ ही 20 जून 2026 को कारोबारी समय समाप्त होने के बाद से वह कंपनी के सीनियर मैनेजमेंट पर्सनल की श्रेणी से भी बाहर हो गई हैं।
इससे पहले खबर आयी थी, श्रीप्रधा मोरे तीन महीने के नोटिस पीरियड पर रहेंगी, जिसके तहत वह 3 अगस्त 2026 तक अपनी जिम्मेदारियां निभाती रहेंगी और उसी दिन उनका आखिरी वर्किंग डे होगा, लेकिन मैनेजमेंट ने इसमें बदलाव करते हुए उनका इस्तीफा मंजूर कर लिया और नोटिस पीरियड समाप्त होने से पहले ही उन्हें कार्यमुक्त कर दिया।
हालांकि अपने इस्तीफे में श्रीप्रधा मोरे ने कहा था कि वह नए प्रोफेशनल मौके तलाशने के लिए यह फैसला ले रही हैं।
'संदेश लिमिटेड' गुजरात की एक बड़ी और पुरानी मीडिया कंपनी है, जो खासतौर पर रीजनल मीडिया में मजबूत पकड़ रखती है। यह कंपनी अखबार, टीवी न्यूज और डिजिटल मीडिया का काम करती है। इसका सबसे बड़ा प्रोडक्ट गुजराती अखबार ‘संदेश’ है, जो राज्य के प्रमुख अखबारों में गिना जाता है। कंपनी की शुरुआत 1923 में हुई थी, जबकि इसे पब्लिक लिमिटेड कंपनी के रूप में 1943 में स्थापित किया गया।
टाइम्स समूह के अनुसार, पुणे टाइम्स मिरर, ई समय और नवगुजरात समय का विनिवेश किया जा चुका है, जबकि अहमदाबाद मिरर को लाइसेंस के आधार पर संचालित किया जा रहा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
कंचन श्रीवास्तव, एक्सचेंज4मीडिया।।
बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (BCCL) ने एक सार्वजनिक नोटिस जारी कर स्पष्ट किया है कि पुणे टाइम्स मिरर, ई समय, नवगुजरात समय और अहमदाबाद मिरर अब BCCL, मेट्रोपॉलिटन मीडिया कंपनी लिमिटेड (MMCL) या उनके किसी भी संबद्ध समूह के नियंत्रण, प्रकाशन या संचालन में नहीं हैं।
पाठकों, विज्ञापनदाताओं, कॉरपोरेट संस्थाओं, एजेंसियों और अन्य स्टेकहोल्डर्स को संबोधित नोटिस में BCCL ने कहा कि पुणे टाइम्स मिरर, ई समय और नवगुजरात समय का विनिवेश (Divestment) किया जा चुका है, जबकि अहमदाबाद मिरर को लाइसेंस के आधार पर संचालित किया जा रहा है। कंपनी के अनुसार ये सभी प्रकाशन अब स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं और BCCL या टाइम्स ऑफ इंडिया समूह का इनके संपादकीय, प्रबंधकीय या परिचालन निर्णयों पर कोई नियंत्रण नहीं है।
नोटिस में यह भी कहा गया है कि इन पब्लिकेशंस के एडिटोरियल कंटेंट, कारोबारी गतिविधियों, दावों, आग्रहों या इनके प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले किसी व्यक्ति के आचरण के लिए BCCL और उसके समूह की कोई जिम्मेदारी या जवाबदेही नहीं होगी। कंपनी ने स्पष्ट किया कि इन पब्लिकेशंस के साथ किसी भी प्रकार का व्यावसायिक या अन्य संबंध संबंधित पक्षों के अपने विवेक और जोखिम पर होगा।
इंडस्ट्री जगत में इस नोटिस का समय भी चर्चा का विषय बना है, क्योंकि इनमें से कुछ पब्लिकेशंस का विनिवेश या लाइसेंसिंग पहले ही हो चुकी थी। हालांकि BCCL के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस कदम का उद्देश्य ब्रैंड आइडेंटिटी और संपादकीय संबद्धता को लेकर बनी भ्रम की स्थिति को समाप्त करना है।
अधिकारी के अनुसार, इन पब्लिकेशंस के विनिवेश और लाइसेंसिंग के बाद उनकी संपादकीय नीतियां अलग हो गई हैं, लेकिन कई लोग अब भी उन्हें टाइम्स समूह का हिस्सा मानते थे। इसी भ्रम को दूर करने के लिए यह सार्वजनिक घोषणा जारी की गई है।
विज्ञापनदाताओं के लिए क्यों अहम है यह कदम
मीडिया इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि यह स्पष्टीकरण विज्ञापन बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण है। प्रिंट मीडिया की वृद्धि भले ही डिजिटल के मुकाबले धीमी हो, लेकिन शहर-आधारित और क्षेत्रीय भाषा के पब्लिकेशंस अब भी स्थानीय विज्ञापनदाताओं, रियल एस्टेट कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों, रिटेल चेन, राजनीतिक अभियानों, सार्वजनिक सूचनाओं और सरकारी संचार के लिए प्रभावी माध्यम बने हुए हैं।
पुणे टाइम्स मिरर, अहमदाबाद मिरर, ई समय और नवगुजरात समय जैसे पब्लिकेशंस ऐसे बाजारों में सक्रिय हैं, जहां स्थानीय भरोसा, क्षेत्रीय प्रभाव और भाषा आधारित पहुंच महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में कई विज्ञापनदाता ऐतिहासिक रूप से टाइम्स समूह से जुड़े रहे इन प्रकाशनों को उसी समूह का हिस्सा मान सकते हैं। BCCL के नोटिस को इसी धारणा को स्पष्ट रूप से समाप्त करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
मीडिया और विज्ञापन क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रांड की प्रतिष्ठा, संपादकीय विश्वसनीयता और प्रकाशक की साख अब भी मीडिया प्लानिंग के महत्वपूर्ण आधार हैं। ऐसे में BCCL ने स्पष्ट कर दिया है कि इन प्रकाशनों के साथ होने वाले किसी भी व्यावसायिक या संपादकीय संबंध को टाइम्स समूह का समर्थन या जिम्मेदारी नहीं माना जाना चाहिए।
इन पब्लिकेशंस का टाइम्स समूह से रहा है पुराना संबंध
ई समय को BCCL ने वर्ष 2012 में कोलकाता से लॉन्च किया था। वर्ष 2024 में टाइम्स समूह ने इस बंगाली दैनिक को अधिवक्ता संजय बसु और अनुराग चौधरी से जुड़े एक समूह को बेच दिया था। हालांकि सौदे की वित्तीय शर्तें सार्वजनिक नहीं की गई थीं।
नवगुजरात समय की शुरुआत जनवरी 2014 में अहमदाबाद से की गई थी। बाद में सार्वजनिक रिकॉर्ड और रिपोर्टों में इसका संबंध शयोना टाइम्स प्राइवेट लिमिटेड से जोड़ा गया। BCCL ने अपने ताजा नोटिस में इसे विनिवेशित प्रकाशन बताया है।
वहीं मिरर ब्रैंड के तहत, मेट्रोपॉलिटन मीडिया कंपनी लिमिटेड (MMCL) ने 31 मार्च 2020 को BCCL से पुणे मिरर, अहमदाबाद मिरर और मुंबई मिरर का अधिग्रहण किया था। इसके बाद कोविड काल के दौरान पुणे मिरर का प्रिंट संस्करण बंद कर दिया गया और फरवरी 2021 में इसे द लेक्सिकॉन ग्रुप के अध्यक्ष पंकज शर्मा ने अधिग्रहीत कर लिया। अहमदाबाद मिरर की वेबसाइट वर्तमान में इसे शयोना टाइम्स प्राइवेट लिमिटेड का शहर-केंद्रित समाचार पत्र बताती है। BCCL ने अपने नोटिस में अहमदाबाद मिरर को लाइसेंस प्राप्त प्रकाशन की श्रेणी में रखा है।
BCCL की यह घोषणा भारतीय मीडिया इंडस्ट्री के उस व्यापक पहलू को भी रेखांकित करती है, जिसमें किसी पब्लिकेशन की पुरानी ब्रैंड आइडेंटिटी उसके स्वामित्व, लाइसेंसिंग या संचालन में बदलाव के बाद भी लंबे समय तक बनी रहती है। कंपनी ने अब स्पष्ट कर दिया है कि इन प्रकाशनों का टाइम्स समूह से ऐतिहासिक संबंध भले रहा हो, लेकिन उनकी वर्तमान संपादकीय दिशा, संचालन और कारोबारी गतिविधियां BCCL के नियंत्रण से बाहर हैं।