हर गुरुवार की सुबह टीवी इंडस्ट्री के लिए बेहद अहम होती थी। इसी दिन आने वाली रेटिंग्स कई चैनलों की किस्मत तय करती थीं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
भारत में टेलीविजन ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम पिछले कई वर्षों के सबसे बड़े बदलावों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर, मीडिया एजेंसीज और पॉलिसी मेकर्स सभी इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि आखिर आगे क्या होगा। लेकिन असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि रेटिंग्स कब वापस आएंगी। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय मीडिया इंडस्ट्री दर्शकों को मापने के बिल्कुल नए तरीके के लिए तैयार है?
हर गुरुवार की सुबह देशभर के टेलीविजन एग्जिक्यूटिव्स, मीडिया प्लानर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए एक खास दिन हुआ करता था। यह सिर्फ रेटिंग्स जारी होने का दिन नहीं होता था, बल्कि ऐसा दिन होता था जब कई चैनलों की किस्मत बनती और बिगड़ती थी। कोई शो अगर रैंकिंग में ऊपर पहुंच जाता तो वह ज्यादा विज्ञापन दरें वसूल सकता था, जबकि रैंकिंग में नीचे आने वाले शो के सामने स्पॉन्सरशिप, मार्केटिंग सपोर्ट या यहां तक कि अपने प्रसारण स्लॉट को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो जाती थी।
करीब दो दशकों तक ऑडियंस रेटिंग्स भारत के टेलीविजन कारोबार की साझा भाषा रही हैं। इन्हीं के आधार पर प्रोग्रामिंग से जुड़े फैसले लिए गए, हजारों करोड़ रुपये के विज्ञापन निवेश तय हुए और यह निर्धारित हुआ कि कौन-से चैनल मार्केट के लीडर बनेंगे। लेकिन आज यह पूरी भाषा बदल रही है।
टेलीविजन रेटिंग्स सिस्टम में हो रहे बदलावों और बदलती नियामकीय अपेक्षाओं के बीच इंडस्ट्री एक अहम मोड़ पर खड़ी है। लगभग सभी इस बात पर सहमत हैं कि ऑडियंस मीजरमेंट विश्वसनीय, पारदर्शी और प्रतिनिधिक होना चाहिए। लेकिन भविष्य का सिस्टम कैसा होगा और उसे तय करने का अधिकार किसके पास होगा, इस पर अभी भी स्पष्ट सहमति नहीं है। रेटिंग्स को लेकर बनी अनिश्चितता ने चर्चा को सिर्फ मीजरमेंट तक सीमित नहीं रखा है। इसने पूरी इंडस्ट्री को भरोसे, गवर्नेंस, तकनीक और तेजी से बदलती टीवी देखने की आदतों जैसे बड़े सवालों का सामना करने के लिए मजबूर कर दिया है।
शायद पहली बार, जब से भारत में ऑडियंस मीजरमेंट को संस्थागत रूप मिला है, बहस सिर्फ रेटिंग्स तक सीमित नहीं रह गई है। अब चर्चा इस बात की है कि टेलीविजन इंडस्ट्री की सबसे कीमती करेंसी का भविष्य आखिर क्या होगा।
रेटिंग्स: टेलीविजन कारोबार की असली करेंसी
अखबारों की सर्कुलेशन या डिजिटल पेज व्यूज की तरह टेलीविजन दर्शकों की संख्या को रियल टाइम में सीधे नहीं गिना जा सकता। इसके लिए वैज्ञानिक सैंपलिंग का सहारा लिया जाता है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि कौन, क्या और कितना देख रहा है। यही अनुमान आगे चलकर वह करेंसी बन जाता है, जिसके आधार पर विज्ञापन कारोबार चलता है। इस करेंसी पर पूरी इंडस्ट्री निर्भर करती है।
ब्रॉडकास्टर्स रेटिंग्स के जरिए अपने कार्यक्रमों की सफलता का आकलन करते हैं और विज्ञापन दरें तय करते हैं। ऐडवर्टाइजर इन्हीं के आधार पर यह निर्णय लेते हैं कि अपना मार्केटिंग बजट कहां खर्च करना है। मीडिया एजेंसीज चैनलों की तुलना करती हैं, मीडिया प्लान तैयार करती हैं और अपने ग्राहकों को दी गई सलाह को सही ठहराती हैं। वहीं निवेशक और मार्केट एनालिस्ट भी रेटिंग्स को किसी नेटवर्क की प्रतिस्पर्धी ताकत का महत्वपूर्ण संकेत मानते हैं।
कई मायनों में रेटिंग्स टेलीविजन इंडस्ट्री के लिए वही महत्व रखती हैं, जो शेयर मार्केट में शेयरों की कीमत रखती है। इसलिए सिर्फ आंकड़े ही महत्वपूर्ण नहीं होते, बल्कि पूरे सिस्टम पर भरोसा होना उससे भी ज्यादा जरूरी होता है। जब भरोसा कमजोर पड़ता है तो हर तरह का व्यावसायिक लेनदेन अधिक जटिल हो जाता है।
मीजरमेंट से जवाबदेही तक
ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम कभी भी आलोचनाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं रहा। सैंपल किस तरह चुने जाते हैं, शहर और गांव के बीच संतुलन कितना है, अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कितना सही है और पैनल में हेरफेर की संभावना जैसे सवाल समय-समय पर उठते रहे हैं। कुछ वर्ष पहले सामने आए कथित टीआरपी हेरफेर विवाद ने इस मुद्दे को केवल इंडस्ट्री की बहस से निकालकर राष्ट्रीय स्तर की चर्चा बना दिया।
इसके बाद न्यूज रेटिंग्स को निलंबित किया गया और नियामकीय निगरानी भी काफी बढ़ गई। यही वह मोड़ था जिसने पूरे सिस्टम की दिशा बदल दी।
पॉलिसी मेकर्स के लिए यह सिर्फ ऑडियंस मीजरमेंट का मामला नहीं रह गया था। यह उस सिस्टम की विश्वसनीयता का सवाल बन गया था, जो विज्ञापनों पर खर्च होने वाले अरबों रुपये के फैसलों को प्रभावित करता है।
इसके बाद से इंडस्ट्री का ध्यान गवर्नेंस को मजबूत करने, मीजरमेंट की कार्यप्रणाली में सुधार लाने और पैनल का विस्तार करने पर केंद्रित रहा है। हालांकि सुधारों पर लगातार चर्चा हो रही है, लेकिन अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि नया ढांचा कब लागू होगा, उसका स्वरूप क्या होगा और क्या भविष्य का ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम मौजूदा व्यवस्था से पूरी तरह अलग होगा।
सरकार चाहती है विश्वसनीयता, इंडस्ट्री चाहती है निश्चितता
अगर ब्रॉडकास्टर्स यह जानना चाहते हैं कि स्थिर और भरोसेमंद रूप में रेटिंग्स कब वापस आएंगी, तो पॉलिसी मेकर्स एक अलग सवाल पूछते नजर आते हैं। उनका सवाल है कि ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम पर लोगों का भरोसा और मजबूत कैसे बनाया जाए?
इंडस्ट्री से जुड़े जानकारों का मानना है कि सरकार का फोकस आगे भी पारदर्शिता, मजबूत गवर्नेंस व्यवस्था और बेहतर निगरानी तंत्र पर रहेगा। भविष्य में बड़े और ज्यादा प्रतिनिधिक सैंपल, मजबूत कार्यप्रणाली, बेहतर सुरक्षा उपाय और सुदृढ़ संस्थागत प्रक्रियाएं सुधारों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं। दूसरी ओर, ब्रॉडकास्टर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए एक और चिंता लगातार बढ़ती जा रही है- निश्चितता।
टेलीविजन विज्ञापन कारोबार तभी सबसे बेहतर तरीके से चलता है, जब पूरी इंडस्ट्री एक ही मीजरमेंट करेंसी पर भरोसा करती हो। 75 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के टीवी विज्ञापन मार्केट और करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये के कुल विज्ञापन मार्केट, जो आगे बढ़कर 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है, के लिए भारत को एक ऐसी बुनियादी, भरोसेमंद और सभी की ओर से स्वीकार की गई ऑडियंस मीजरमेंट करेंसी की जरूरत है, जो ब्रॉडकास्टर्स को स्पष्टता, ऐडवर्टाइजर्स को भरोसा, मीडिया एजेंसियों को स्थिरता और हर साल अरबों रुपये निवेश करने वाले ब्रैंड्स को विश्वसनीयता प्रदान करे। अगर मीजरमेंट सिस्टम कई हिस्सों में बंट जाता है या लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रहती है, तो इससे विज्ञापन दरों पर बातचीत मुश्किल हो सकती है, कैंपेन प्लानिंग में देरी हो सकती है और पूरे इकोसिस्टम का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
यही वजह है कि इंडस्ट्री के सामने एक नाजुक संतुलन बनाने की चुनौती है। सुधार जरूरी हैं, लेकिन वे विश्वसनीयता की कीमत पर नहीं होने चाहिए। वहीं दूसरी ओर, लंबे समय तक बनी रहने वाली अनिश्चितता की भी अपनी आर्थिक कीमत होती है।
BARC के सामने सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि भरोसा है
इस पूरी बहस के सबसे करीब अगर कोई संस्था है तो वह है BARC India. पिछले कुछ वर्षों में BARC ने ऑडियंस मीजरमेंट का दायरा बढ़ाया है, नई तकनीकों को अपनाया है और पैनल विस्तार पर भी निवेश किया है। लेकिन अगला दौर कितना सफल होगा, यह सिर्फ तकनीक तय नहीं करेगी। असल मुद्दा अब भरोसा बन चुका है।
क्या ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर और मीडिया एजेंसीज फिर से एक ही आंकड़ों को पूरी इंडस्ट्री की साझा करेंसी के रूप में स्वीकार करेंगी? क्या मीजरमेंट की कार्यप्रणाली इतनी तेजी से बदलेगी कि वह लोगों की बदलती टीवी देखने की आदतों को सही तरीके से दिखा सके? क्या गवर्नेंस में होने वाले सुधार सभी हितधारकों को यह भरोसा दिला पाएंगे कि यह सिस्टम किसी भी तरह के प्रभाव या दबाव से पूरी तरह सुरक्षित है?
संभव है कि आने वाले समय में ये सवाल किसी भी तकनीकी सुधार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हों।
ब्रॉडकास्टर्स अब अलग-अलग सवाल पूछ रहे हैं
रेटिंग्स को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि पूरी ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री एक जैसी सोच रखती है। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। अलग-अलग ब्रॉडकास्टर्स की प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं।
बड़े जनरल एंटरटेनमेंट नेटवर्क स्थिरता और अनुमानित सिस्टम चाहते हैं, क्योंकि उनका विज्ञापन कारोबार लगातार और भरोसेमंद मीजरमेंट पर निर्भर करता है। वहीं क्षेत्रीय चैनलों का कहना है कि अलग-अलग भाषाई मार्केट्स में दर्शकों की आदतों को ज्यादा बेहतर तरीके से प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। न्यूज चैनल अब भी इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या पारंपरिक टेलीविजन मीजरमेंट आज के डिजिटल न्यूज इकोसिस्टम में उनके वास्तविक प्रभाव को सही तरीके से माप पाता है।
स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टर्स के सामने अलग तरह की चुनौती है। बड़े खेल आयोजनों के दौरान दर्शकों की संख्या अचानक बहुत तेजी से बढ़ती है, लेकिन यह बढ़ोतरी कुछ समय के लिए ही होती है। इसलिए ऐसे मीजरमेंट सिस्टम की जरूरत है, जो अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर दर्शकों के व्यवहार को सटीक तरीके से रिकॉर्ड कर सके। यानी ब्रॉडकास्टर्स की कोई एक जैसी राय नहीं है। कुछ चाहते हैं कि रेटिंग्स जल्द से जल्द वापस आ जाएं। जबकि कुछ का मानना है कि रेटिंग्स लौटने से पहले सिस्टम को पूरी तरह बेहतर बनाया जाना चाहिए।
ऐडवर्टाइजर्स को सिर्फ आंकड़े नहीं, जवाबदेही भी चाहिए
ऐडवर्टाइजर्स के लिए रेटिंग्स हमेशा से जवाबदेही का आधार रही हैं। हर मार्केटिंग बजट के सामने आखिरकार एक ही सवाल आता है- क्या निवेश सही दर्शकों तक पहुंचा या नहीं?
पारंपरिक रूप से टेलीविजन इस सवाल का जवाब ऑडियंस मीजरमेंट के जरिए देता रहा है। लेकिन अब दर्शक अपना समय ब्रॉडकास्ट टीवी, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, कनेक्टेड टीवी और मोबाइल स्क्रीन के बीच बांट रहे हैं। ऐसे में ऐडवर्टाइजर दर्शकों के व्यवहार की कहीं ज्यादा व्यापक तस्वीर देखना चाहते हैं।
आज कई मार्केटर्स किसी कैंपेन का मूल्यांकन सिर्फ टीवी रेटिंग्स के आधार पर नहीं करते। वे डिजिटल एनालिटिक्स, फर्स्ट-पार्टी कंज्यूमर डेटा, सोशल मीडिया एंगेजमेंट और बिक्री के आंकड़ों को भी साथ में देखते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि रेटिंग्स की अहमियत कम हो गई है। बल्कि उनकी भूमिका बदल रही है।
अब टेलीविजन रेटिंग्स सफलता का अकेला पैमाना नहीं रह गई हैं, बल्कि वे एक बड़े और व्यापक मीजरमेंट इकोसिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही हैं।
ऐडवर्टाइजर, मार्केटर्स, इंडियन सोसाइटी ऑफ एडवरटाइजर्स (ISA), नए ब्रैंड मालिक और ऐडवर्टाइजर्स के संगठन, जो मीडिया और ऑडियंस पर निवेश करते हैं, उन्हें मिलकर इस नई रेटिंग्स करेंसी की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। यह ऐसी करेंसी होनी चाहिए, जो अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म और फॉर्मेट पर होने वाली व्यूअरशिप और एंगेजमेंट दोनों को माप सके।
ब्रैंड्स और मार्केटर्स मिलकर हर साल लगभग 1.75 लाख करोड़ रुपये का विज्ञापन निवेश करते हैं। अगर वे सामूहिक रूप से इस राशि का लगभग 0.6 प्रतिशत यानी करीब 1,000 करोड़ रुपये ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम पर खर्च करें, तो इसका सबसे बड़ा लाभ उन्हें खुद मिलेगा और साथ ही पूरे मीडिया इकोसिस्टम को भी इसका फायदा होगा।
मीडिया एजेंसीज चुपचाप बदल रही हैं अपनी प्लानिंग का तरीका
अगर इस बदलाव के दौर में किसी ने सबसे तेजी से खुद को बदला है, तो वह मीडिया एजेंसीज हैं। मीडिया खपत के लगातार बिखरते स्वरूप को देखते हुए मीडिया प्लानर्स अब अपने ग्राहकों को सलाह देने के लिए कई तरह के डेटा का इस्तेमाल कर रहे हैं। ब्रॉडकास्ट टीवी कैंपेन की योजना बनाने में आज भी टेलीविजन रेटिंग्स की अहम भूमिका है, लेकिन अब उनके साथ डिजिटल व्यूअरशिप, कनेक्टेड टीवी की खपत, ऑनलाइन वीडियो के आंकड़े और एजेंसियों के अपने ऑडियंस टूल्स का भी विश्लेषण किया जा रहा है।
यह बदलाव पूरी इंडस्ट्री की एक बड़ी सच्चाई को दिखाता है। आज के दर्शक "टेलीविजन" और "वीडियो" के बीच कोई फर्क नहीं करते। वे सिर्फ वही कंटेंट देखते हैं, जो उन्हें जिस स्क्रीन पर सबसे सुविधाजनक लगता है। लेकिन मीजरमेंट सिस्टम अभी भी इस बदलाव की रफ्तार से काफी पीछे चल रहे हैं।
रेटिंग्स से कहीं ज्यादा तेजी से बदले हैं दर्शक
शायद सबसे बड़ा बदलाव रेटिंग्स इंडस्ट्री के भीतर नहीं, बल्कि भारतीय घरों के अंदर आया है। अब टेलीविजन ही एकमात्र ऐसी स्क्रीन नहीं रह गई है, जो लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती हो। एक ही परिवार का कोई सदस्य प्राइम टाइम का ड्रामा टीवी पर देख सकता है, दूसरा मोबाइल पर क्रिकेट मैच की हाइलाइट्स देख सकता है, तीसरा ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्म स्ट्रीम कर सकता है और उसी दिन कई बार शॉर्ट वीडियो भी देख सकता है।
पारंपरिक ऑडियंस मीजरमेंट सिस्टम उस दौर के लिए बनाया गया था, जब घरों में मनोरंजन का मुख्य माध्यम केवल टेलीविजन हुआ करता था। लेकिन आज दर्शकों की देखने की आदतें पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बिखरी हुई और विविध हो चुकी हैं। यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है।
क्या भारत आज भी सिर्फ टेलीविजन दर्शकों को माप रहा है, या अब उसे कुल वीडियो खपत को मापना शुरू कर देना चाहिए? इसी सवाल का जवाब आने वाले दशक में मीडिया प्लानिंग की दिशा तय कर सकता है।
क्या भारत को एक ही रेटिंग्स करेंसी चाहिए या कई?
ऑडियंस मीजरमेंट को लेकर एक और बहस तेजी से आगे बढ़ रही है। यह बहस इस बात को लेकर है कि भविष्य में मीजरमेंट सिस्टम का ढांचा कैसा होना चाहिए।
कई वर्षों से भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री इस सोच के साथ काम करती रही है कि एक ही मीजरमेंट करेंसी सबसे ज्यादा प्रभावी होती है। ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर और मीडिया एजेंसीज सभी एक ही डेटा सेट के आधार पर कारोबार करते हैं।
लेकिन तकनीक के विकास के साथ कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर एक से ज्यादा मीजरमेंट सिस्टम होंगे, तो इससे नई तकनीकों को बढ़ावा मिलेगा और इंडस्ट्री को ज्यादा गहरी और समृद्ध जानकारी मिल सकेगी।
वहीं दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग मीजरमेंट करेंसी से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे मीडिया खरीदने की प्रक्रिया पहले की तुलना में और ज्यादा जटिल हो जाएगी, खासकर भारत जैसे बड़े मार्केट में, जहां वर्षों से एक भरोसेमंद साझा करेंसी के आधार पर ब्रॉडकास्टर्स, मीडिया एजेंसियों और ब्रैंड्स के बीच कारोबार होता आया है।
दुनिया के कई देशों में इस समय अलग-अलग मॉडल पर प्रयोग किए जा रहे हैं। वहां पारंपरिक टेलीविजन पैनल के साथ रिटर्न-पाथ डेटा, कनेक्टेड टीवी एनालिटिक्स और डिजिटल मीजरमेंट को जोड़कर नए समाधान विकसित किए जा रहे हैं। संभव है कि आने वाले समय में भारत के सामने भी ऐसे ही विकल्प हों।
वह दर्शक जिसकी सबसे कम चर्चा होती है
दिलचस्प बात यह है कि रेटिंग्स को लेकर होने वाली बहस में जिस सबसे महत्वपूर्ण पक्ष की सबसे कम चर्चा होती है, वह है- दर्शक। हर ब्रॉडकास्टर दावा करता है कि वह अपने दर्शकों को समझता है। हर ऐडवर्टाइजर उन्हीं तक पहुंचना चाहता है। हर मीडिया एजेंसी उनका अध्ययन करती है। हर मीजरमेंट सिस्टम उन्हें सही तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश करता है। लेकिन यह चर्चा शायद ही कभी होती है कि खुद दर्शक चाहते क्या हैं और उन्हें किस तरह मापा जाना चाहिए।
असल में दर्शकों की प्राथमिकता सिर्फ अच्छी सामग्री, आसान पहुंच और ज्यादा विकल्प होती है। रेटिंग्स उनके लिए सीधे तौर पर महत्वपूर्ण नहीं होतीं।लेकिन यही रेटिंग्स तय करती हैं कि कौन-सा कार्यक्रम बनाया जाएगा, कौन-सा शो ऑन एयर बना रहेगा और किस तरह के कंटेंट में निवेश किया जाएगा।
इस तरह देखा जाए तो ऑडियंस मीजरमेंट सिर्फ कारोबारी फैसलों को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि उन करोड़ों भारतीयों तक पहुंचने वाले कंटेंट की दिशा भी तय करता है, जिसे वे हर दिन देखते हैं। यह बदलाव सिर्फ रेटिंग्स का नहीं, पूरे सिस्टम का है। अक्सर कहा जाता है कि टेलीविजन इंडस्ट्री बदलाव के दौर से गुजर रही है। लेकिन इस बार का बदलाव किसी अस्थायी रुकावट या केवल नियामकीय बदलाव से कहीं बड़ा है। यह उस पूरी सोच का पुनर्मूल्यांकन है कि ऐसे समय में दर्शकों को किस तरह मापा जाए, जब कंटेंट बिना किसी रुकावट के ब्रॉडकास्ट टीवी, कनेक्टेड टीवी, मोबाइल डिवाइस और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के बीच लगातार घूम रहा है।
आज पॉलिसी मेकर्स, ब्रॉडकास्टर्स, ऐडवर्टाइजर्स, मीडिया एजेंसियों और ऑडियंस मीजरमेंट कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ रेटिंग्स पर भरोसा बहाल करना नहीं है। बल्कि ऐसी मीजरमेंट व्यवस्था तैयार करना है, जो यह सही तरीके से दिखा सके कि भारत आज कंटेंट कैसे देखता है और आने वाले वर्षों में उसे किस तरह देखेगा। भविष्य में यह व्यवस्था एक मजबूत और अधिक सक्षम BARC के नेतृत्व में आगे बढ़ेगी, किसी अधिक तकनीक-आधारित ऑडियंस मीजरमेंट फ्रेमवर्क के जरिए विकसित होगी या फिर अलग-अलग प्लेटफॉर्म को जोड़ने वाली एक व्यापक और साझा मीजरमेंट करेंसी के रूप में सामने आएगी, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन एक बात अब बिल्कुल साफ है कि ऑडियंस मीजरमेंट के अगले दौर का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर नहीं होगा कि उसके आंकड़े कितने सटीक हैं, बल्कि इस बात पर भी होगा कि वह पूरी इंडस्ट्री में कितना भरोसा पैदा कर पाता है। कई वर्षों तक रेटिंग्स यह तय करती रही हैं कि इंडस्ट्री में कौन आगे है और कौन पीछे। लेकिन अब इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आने वाले समय में इस पूरे खेल के नियम कौन तय करेगा।
BARC को नए नेतृत्व, नई सोच और ज्यादा मानवीय, सक्रिय तथा विनम्र कार्यशैली की जरूरत है। लंबे समय से यह धारणा रही है कि BARC के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) इंडस्ट्री की चिंताओं और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (I&B Ministry) के उन निर्देशों के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा पाए, जो पूरे मीडिया उद्योग, ऐडवर्टाइजर्स और व्यापक इकोसिस्टम के हित में थे।
आगे बढ़ते हुए एक API आधारित मॉडल भी तैयार किया जा सकता है, जिसे अपेक्षाकृत कम निवेश में लागू करना संभव है। हालांकि, इसके लिए जरूरी होगा कि Meta, Facebook और अन्य बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इसमें शामिल हों, ताकि मार्केटर्स और ऐडवर्टाइजर्स के लिए सभी माध्यमों को जोड़ने वाली एक साझा और एकीकृत मीजरमेंट करेंसी तैयार की जा सके। अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रह गया है कि रेटिंग्स कब वापस आएंगी। असल सवाल यह है कि रेटिंग्स सिस्टम में सुधार और बदलाव की अगुवाई कौन करेगा, उसके नए नियम कौन तय करेगा और यह प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होगी।
भारतीय मीडिया इंडस्ट्री को जितनी जल्दी हो सके एक भरोसेमंद, पारदर्शी और सभी की ओर से स्वीकार की गई साझा रेटिंग्स व्यवस्था की जरूरत है। क्योंकि इस तरह का लंबा खालीपन या अनिश्चितता पूरे मीडिया और विज्ञापन उद्योग के लिए किसी भी तरह से अच्छी नहीं मानी जा सकती।
डी.बी. कॉर्प ने वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में 614 करोड़ रुपये का समेकित राजस्व दर्ज किया। विज्ञापन आय और मुनाफे में सालाना आधार पर गिरावट दर्ज हुई है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
दैनिक भास्कर (Dainik Bhaskar), दिव्य भास्कर (Divya Bhaskar) और दिव्य मराठी (Divya Marathi) का प्रकाशन करने वाली डी.बी. कॉर्प (D.B. Corp) ने वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में 614 करोड़ रुपये का समेकित राजस्व दर्ज किया है। पिछले साल की समान तिमाही में यह 635 करोड़ रुपये था।
कंपनी की विज्ञापन आय 411 करोड़ रुपये रही, जो एक साल पहले 439 करोड़ रुपये थी। सर्कुलेशन आय भी 121 करोड़ रुपये से घटकर 116 करोड़ रुपये रह गई। इस दौरान कंपनी का शुद्ध मुनाफा 93 करोड़ रुपये से घटकर 69 करोड़ रुपये रहा, जबकि एबिट्डा (EBITDA) 158 करोड़ रुपये से घटकर 124 करोड़ रुपये हो गया।
कंपनी ने बताया कि विज्ञापन आय और एबिट्डा में सालाना आधार पर आई गिरावट मुख्य रूप से नवरात्रि के त्योहार की तारीखों में बदलाव के कारण रही। पिछले साल नवरात्रि दूसरी तिमाही में था, जबकि इस साल यह तीसरी तिमाही में है। कंपनी के मुताबिक, इस प्रभाव को हटाकर समान आधार पर विज्ञापन आय और एबिट्डा में एकल अंक की सकारात्मक वृद्धि दर्ज हुई।
वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में डी.बी. कॉर्प का समेकित राजस्व 1,222 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,246 करोड़ रुपये हो गया। इस दौरान विज्ञापन आय 832 करोड़ रुपये से बढ़कर 843 करोड़ रुपये रही। सर्कुलेशन आय 241 करोड़ रुपये के मुकाबले 236 करोड़ रुपये रही, जबकि शुद्ध मुनाफा 174 करोड़ रुपये से घटकर 169 करोड़ रुपये रहा।
कंपनी ने तिमाही के दौरान न्यूजप्रिंट की लागत में भी 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की। इसके पीछे मुख्य वजह भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं को बताया गया है। बढ़ी हुई लागत के असर को नियंत्रित करने के लिए कंपनी लागत अनुकूलन, परिचालन दक्षता और इन्वेंटरी प्रबंधन पर लगातार ध्यान दे रही है।
डी.बी. कॉर्प लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर सुधीर अग्रवाल (Sudhir Agarwal) ने कहा कि कुछ हिस्सों में सामान्य से कम मानसून के बावजूद कंपनी की मजबूत बाजार मौजूदगी, पाठकों के साथ संबंध और विज्ञदाताओं के साथ साझेदारी ने प्रदर्शन को मजबूती दी। उन्होंने कहा कि आने वाली तिमाहियों में त्योहारी सीजन से विज्ञापन गतिविधियों और उपभोक्ता खर्च को समर्थन मिलने की उम्मीद है।
भारत में अखबार का कारोबार दो रफ्तारों पर चल रहा है। बड़े क्षेत्रीय समूहों ने अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में विज्ञापन राजस्व में दोहरे अंकों की बढ़त दर्ज की।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारत में अखबार का कारोबार दो रफ्तारों पर चल रहा है। बड़े क्षेत्रीय समूहों ने अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में विज्ञापन राजस्व में दोहरे अंकों की बढ़त दर्ज की। दैनिक भास्कर के विज्ञापन राजस्व में 10% और दैनिक जागरण में 13% बढ़त रही। दूसरी तरफ सरकारी विज्ञापन, महंगे न्यूज़प्रिंट और डिजिटल मंचों का दबाव उन अखबारों पर ज्यादा है जिनके पास बड़ा ब्रैंड और अतिरिक्त आय के स्रोत नहीं हैं। सितंबर 2026 में सार्वजनिक हुई इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) की वार्षिक रिपोर्ट इस दबाव की तस्वीर देती है।
बाजार की तस्वीर: विज्ञापन का बड़ा बाजार, छोटा प्रिंट का हिस्सा
डेंट्सू की डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग रिपोर्ट 2026 के अनुसार 2025 में भारत का कुल विज्ञापन खर्च ₹1,21,339 करोड़ रहा। इसमें डिजिटल ₹71,621 करोड़ (59%) और प्रिंट ₹16,594 करोड़ (14%) था। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2027 तक प्रिंट की हिस्सेदारी 10% रह जाएगी।
पिच-मैडिसन रिपोर्ट (PMAR) 2026 की परिभाषा अलग है। उसके अनुसार 2025 में प्रिंट का विज्ञापन खर्च ₹20,866 करोड़ था और मात्रा 336 मिलियन कॉलम सेंटीमीटर रही। राजस्व को सहारा प्रीमियम जगहों से मिला, जैसे फ्रंट पेज और जैकेट। 2026 के लिए रिपोर्ट का अनुमान ₹21,388 करोड़ है। इसके मुताबिक प्रिंट अब "व्यापक पहुंच" से ज्यादा "विश्वसनीयता और चुनिंदा बाजारों में असर" का माध्यम बन रहा है।
FICCI-EY की 2026 रिपोर्ट में 2025 में प्रिंट इंडस्ट्री ₹25,900 करोड़ की थी। इसमें विज्ञापन ₹17,930 करोड़ और सर्कुलेशन राजस्व ₹8,010 करोड़ रहा। प्रिंट कंपनियों के राजस्व में डिजिटल का औसत हिस्सा करीब 6% है। रिपोर्ट आगे प्रिंट विज्ञापन में सालाना करीब 2% की मामूली बढ़त का अनुमान देती है।
भाषाई अखबार: INS रिपोर्ट के आंकड़े
INS की 87वीं वार्षिक रिपोर्ट (2025-26) के अनुसार 2025 में उसके सदस्य प्रकाशनों का कुल विज्ञापन कारोबार ₹14,773.74 करोड़ रहा। इसमें मान्यता प्राप्त एजेंसियों से ₹8,178.15 करोड़ आया:
बाकी कारोबार का ब्योरा:
वैसे बता दें कि रिपोर्ट इन सीधे विज्ञापनों में स्थानीय विज्ञापनदाताओं का अलग ब्योरा नहीं देती। यह भी ध्यान रहे कि 2025 के आंकड़े 526 सदस्य प्रकाशनों ने दिए। यह पूरे बाजार का हूबहू पैमाना नहीं है।
बड़े समूह: 2026-27 की पहली तिमाही बनाम 2025-26
ये बड़ी सूचीबद्ध कंपनियां हैं। इनके नतीजे जिला-स्तरीय अखबारों की हालत का पैमाना नहीं हैं।
स्थानीय बजट और डिजिटल प्रतिस्पर्धा
छोटे कारोबारियों का पैसा तेजी से डिजिटल की तरफ जा रहा है। PMAR के अनुसार 2025 में MSME का डिजिटल विज्ञापन खर्च ₹35,814 करोड़ रहा, और 2026 में इसके ₹42,976 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। उसी रिपोर्ट में पूरे प्रिंट इंडस्ट्री का 2025 का विज्ञापन खर्च ₹20,866 करोड़ था। यानी MSME का डिजिटल खर्च अकेले पूरे प्रिंट बाजार से बड़ा है।
INS ने डिजिटल विज्ञापन में बिग टेक की प्रभुत्वशाली स्थिति को लेकर प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) में शिकायत की है। आयोग ने प्रथम दृष्टया इसे जांच योग्य माना है, नतीजा बाकी है। प्रिंट की प्रभावशीलता पर INS के साल भर के अभियान के पहले क्रिएटिव 1 जुलाई 2026 को सदस्यों को भेजे गए।
सरकारी विज्ञापन: दर बढ़ी, बजट नहीं
केंद्र सरकार ने नवंबर 2025 में प्रिंट विज्ञापन दरें 26% बढ़ाईं। एक लाख प्रसार वाले दैनिक के लिए श्वेत-श्याम विज्ञापन की दर ₹47.40 से ₹59.68 प्रति वर्ग सेमी हो गई। INS का कहना है कि प्रिंट को मिलने वाला कुल सरकारी विज्ञापन बजट उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। रिपोर्ट यह नहीं बताती कि दर बढ़ने से विज्ञापनों की संख्या घटी या नहीं।
INS सदस्यों को 2025 में मिला सरकारी-संबंधित कारोबार:
राज्य सरकारों से मिलने वाला कारोबार केंद्र से कई गुना है, इसलिए राज्य स्तर पर विज्ञापन नीति क्षेत्रीय अखबारों के लिए निर्णायक है। छोटे और क्षेत्रीय प्रकाशनों की सरकारी विज्ञापन पर निर्भरता ज्यादा बताई जाती है।
प्रिंट लागत: न्यूज़प्रिंट की मार
INS ने आयातित न्यूज़प्रिंट पर 5% सीमा शुल्क हटाने की मांग फिर दोहराई है। रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया के तनाव से कीमतों और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। INS के निवर्तमान अध्यक्ष विवेक गुप्ता के मुताबिक घरेलू उत्पादन इंडस्ट्री की जरूरत का लगभग आधा ही पूरा करता है। रिपोर्ट गुणवत्ता की समस्याओं और मिलों के पैकेजिंग-ग्रेड कागज की ओर जाने का भी जिक्र करती है। INS ने फरवरी-मार्च 2026 में घरेलू आपूर्ति की कमी पर बयान भी जारी किए थे।
असर कंपनियों के नतीजों में दिखता है। डीबी कॉर्प ने लागत नियंत्रण से मार्जिन बढ़ाया, जबकि जागरण का मार्जिन घटा।
छोटे शहरों में पहुंच
INS के निवर्तमान अध्यक्ष गुप्ता ने कहा कि हॉकरों की उपलब्धता "गंभीर चिंता" बनती जा रही है। यह वितरण की आखिरी कड़ी है, जिस पर कस्बों और गांवों तक अखबार पहुंचना निर्भर है।
ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (ABC) के जुलाई-दिसंबर 2025 के आंकड़ों में हिंदी पट्टी का रुझान मिला-जुला रहा। दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान के प्रसार में मामूली बढ़त हुई, जबकि दैनिक जागरण, अमर उजाला और राजस्थान पत्रिका में गिरावट आई। EY की रिपोर्ट के अनुसार अखबारों के पाठक 35 वर्ष से ऊपर की ओर झुक रहे हैं और युवा पाठक डिजिटल पर जा रहे हैं।
आगे की राह (विश्लेषण)
कुल मिलाकर प्रिंट खत्म नहीं हो रहा, पर उसका आर्थिक आधार बदल रहा है। बड़े ब्रैंड वाले समूह आगे हैं, जबकि सरकारी विज्ञापन और स्थानीय बजट पर निर्भर अखबार ज्यादा जोखिम में हैं।
इस पहल के जरिए प्रिंट मैगजीन को ऑन-डिमांड खरीदारी की व्यवस्था से जोड़ा गया है, जिसमें पाठकों की सुविधा को डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी का अहम हिस्सा बनाया गया है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
लिविंग मीडिया इंडिया लिमिटेड (Living Media India Limited) को अपनी पहल ‘मैगजीन इन मिनट्स’ (Magazine in Minutes) के लिए WAN-IFRA प्रिंट एंड सस्टेनेबिलिटी अवॉर्ड्स 2026 में सप्लाई चेन इनोवेटर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। यह पहल डिजिटल माध्यम से मैगजीन तलाशने और ऑर्डर करने की सुविधा को प्रिंट मैगजीन की तेज डिलीवरी से जोड़ती है।
यह अवॉर्ड नीदरलैंड्स के रॉटरडैम में आयोजित वर्ल्ड प्रिंटर्स समिट और डिस्ट्रीप्रेस कांग्रेस के दौरान प्रदान किया गया। इस कार्यक्रम में दुनियाभर से प्रिंट और डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर के 300 से अधिक प्रोफेशनल्स शामिल हुए। कंपनी की ओर से सीईओ एवं पब्लिशर मनोज शर्मा और सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन के असिस्टेंट वाइस प्रेजिडेंट (सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन) दीपक भट्ट ने यह अवॉर्ड प्राप्त किया।
ब्लिंकिट के साथ साझेदारी से मिली रफ्तार: कोविड-19 महामारी के बाद पाठकों के बदलते व्यवहार को देखते हुए इस पहल की शुरुआत की गई। इसका उद्देश्य मैगजीन की दुकानों पर घटती ग्राहकों की आवाजाही और न्यूजस्टैंड पर कम होती बिक्री की चुनौती से निपटना था। इसके लिए प्रिंट मैगजीन को क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से उपलब्ध कराने का मॉडल अपनाया गया।
लिविंग मीडिया ने ब्लिंकिट के साथ साझेदारी कर लोगों को डिजिटल माध्यम से मैगजीन देखने और ऑर्डर करने की सुविधा दी। कंपनी के मुताबिक, इस व्यवस्था के तहत मैगजीन की डिलीवरी कुछ मामलों में महज 10 से 12 मिनट में हो जाती है। क्विक कॉमर्स के जरिए यह मॉडल अब भारत के 100 से अधिक शहरों तक पहुंच चुका है, जहां डिलीवरी में आमतौर पर 10 से 15 मिनट लगते हैं।
कंपनी ने अवॉर्ड के लिए दिए गए अपने आवेदन में बताया कि इस माध्यम की हिस्सेदारी उसके कुल मासिक सर्कुलेशन में 10% से अधिक हो गई है। इस चैनल के जरिए ग्राहकों की ओर से दोबारा खरीदारी भी हो रही है और नए ग्राहक भी जुड़ रहे हैं।
डिस्ट्रीब्यूशन प्रक्रिया में किए गए बदलाव: इस मॉडल का विस्तार करने के लिए कंपनी को अपने इन्वेंट्री और वितरण से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव करने पड़े। हर मैगजीन अंक की बिक्री के लिए सीमित समय होता है, जबकि क्विक कॉमर्स के तहत ऑर्डर पूरा करने के लिए स्थानीय डार्क स्टोर्स में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध होना जरूरी है।
अपने साझेदारों की टेक्नोलॉजी, इन्वेंट्री प्लानिंग और ऑपरेशंस टीमों के साथ काम करते हुए लिविंग मीडिया ने मैगजीन के नए अंक जारी करने, स्टॉक की दोबारा आपूर्ति, उपलब्धता और मांग का अनुमान लगाने की प्रक्रियाओं को नए सिरे से तैयार किया। कंपनी ने स्टॉक के आवंटन के लिए ऊपर से नीचे तक अपनाई जाने वाली व्यवस्था की जगह क्षेत्रवार मांग के अनुमान पर भी जोर दिया, ताकि अलग-अलग इलाकों में ग्राहकों की खरीदारी के रुझान के अनुसार स्टॉक उपलब्ध कराया जा सके।
इस बारे में लिविंग मीडिया के सीईओ एवं पब्लिशर मनोज शर्मा ने कहा कि यह अवॉर्ड मैगजीन डिस्ट्रीब्यूशन के पारंपरिक तरीकों को चुनौती देने के लिए कंपनी की टीमों की सोच और दृढ़ संकल्प को मान्यता देता है। उन्होंने कहा, ‘हमारा मानना था कि प्रिंट का भविष्य केवल कंटेंट की गुणवत्ता पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि पाठक उस तक कितनी आसानी और तेजी से पहुंच सकते हैं।’ शर्मा ने कहा कि इस पहल की अहमियत केवल डिलीवरी की रफ्तार तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, असली उपलब्धि मैगजीन के लिए उपभोक्ताओं की एक नई यात्रा तैयार करना है, जिसमें डिजिटल माध्यम से मैगजीन की खोज करने से लेकर उसकी तत्काल फिजिकल डिलीवरी तक की प्रक्रिया शामिल है।
युवा पाठकों तक पहुंचने पर जोर: कंपनी इस मॉडल को युवा पाठकों तक पहुंचने, प्रीमियम और विशिष्ट श्रेणियों की मैगजीन पेश करने और उपभोक्ताओं से मिलने वाले राजस्व के आधार पर नए प्रोडक्ट विकसित करने के अवसर के रूप में देख रही है।
लिविंग मीडिया के मुताबिक, पारंपरिक न्यूजस्टैंड अब भी उसके वितरण नेटवर्क का हिस्सा बने रहेंगे। हालांकि, भविष्य में कारोबार की वृद्धि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि पाठकों तक उन प्लेटफॉर्म के जरिए कैसे पहुंचा जाए, जिनका वे पहले से इस्तेमाल करते हैं। इस पहल के जरिए प्रिंट मैगजीन को ऑन-डिमांड खरीदारी की व्यवस्था से जोड़ा गया है, जिसमें पाठकों की सुविधा को डिस्ट्रीब्यूशन स्ट्रैटेजी का अहम हिस्सा बनाया गया है।
दैनिक भास्कर अखबार समूह की कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड (D.B. Corp Limited) 16 अक्टूबर, 2026 को निवेशकों और विश्लेषकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल करेगी।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
दैनिक भास्कर अखबार समूह की कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड (D.B. Corp Limited) 16 अक्टूबर, 2026 को निवेशकों और विश्लेषकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल करेगी। यह कॉल शाम 4:30 बजे (भारतीय समयानुसार) शुरू होगी। इसमें कंपनी 30 सितंबर, 2026 को समाप्त दूसरी तिमाही और वित्त वर्ष की पहली छमाही के वित्तीय प्रदर्शन पर चर्चा करेगी।
कंपनी ने 9 अक्टूबर, 2026 को बीएसई (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को दी गई सूचना में यह जानकारी दी। यह सूचना भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के लिस्टिंग से जुड़े नियमों, 2015 के नियम 30 के तहत दी गई है।
15 अक्टूबर को घोषित होंगे वित्तीय नतीजे
कंपनी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही और 30 सितंबर, 2026 को समाप्त छमाही के वित्तीय नतीजे 15 अक्टूबर, 2026 को घोषित किए जाने हैं। इसके अगले दिन यानी 16 अक्टूबर को कॉन्फ्रेंस कॉल के जरिए कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन पर चर्चा होगी।
इस कॉल में कंपनी के प्रबंधन की ओर से डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर पवन अग्रवाल, डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल, मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) ललित जैन, फाइनेंस एंड अकाउंट्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट मुश्ताक अली और निवेशक संबंध विभाग के प्रमुख प्रसून पांडे शामिल होंगे।
पहले प्रबंधन की बात, फिर सवाल-जवाब
कॉन्फ्रेंस कॉल की शुरुआत कंपनी के प्रबंधन की ओर से संक्षिप्त शुरुआती संबोधन से होगी। इसके बाद निवेशकों और विश्लेषकों के लिए सवाल-जवाब का सत्र खोला जाएगा, जिसमें वे कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन से जुड़े सवाल पूछ सकेंगे।
डीबी कॉर्प लिमिटेड भारत की प्रमुख प्रिंट मीडिया कंपनियों में से एक है। कंपनी के मुताबिक, इसके अखबार समूह में पांच अखबार शामिल हैं। इनमें हिंदी का दैनिक भास्कर, गुजराती के दिव्य भास्कर और सौराष्ट्र समाचार, मराठी का दिव्य मराठी और डीबी स्टार शामिल हैं।
कंपनी के अनुसार, दैनिक भास्कर के 43 संस्करण, दिव्य भास्कर के 8 संस्करण और दिव्य मराठी के 6 संस्करण हैं। इसके अलावा, तीन भाषाओं- हिंदी, गुजराती और मराठी, में 210 उप-संस्करणों के जरिए इसकी मौजूदगी देश के 12 राज्यों में है।
कंपनी के अनुसार, इसके प्रमुख अखबारों की कुल पाठक संख्या 6.67 करोड़ है। समूह की मौजूदगी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड में है।
अखबारों के अलावा, कंपनी रेडियो कारोबार में भी सक्रिय है। इसका रेडियो ब्रांड ‘94.3 माय एफएम’ (94.3 MY FM) सात राज्यों के 39 शहरों में मौजूद है। कंपनी का डिजिटल कारोबार भी बढ़ रहा है, जिसके तहत चार डिजिटल पोर्टल और चार मोबाइल ऐप हैं, जिन्हें लोग डाउनलोड करके इस्तेमाल करते हैं।
कंपनी ने दी भविष्य के अनुमानों पर चेतावनी
डीबी कॉर्प ने यह भी कहा है कि कॉन्फ्रेंस कॉल के दौरान कंपनी के भविष्य के प्रदर्शन को लेकर कुछ अनुमान या बयान दिए जा सकते हैं। ऐसे अनुमान नियामकीय बदलावों, स्थानीय राजनीतिक या आर्थिक घटनाक्रम, तकनीकी जोखिमों और अन्य कारणों से प्रभावित हो सकते हैं। इन वजहों से कंपनी के वास्तविक नतीजे बताए गए अनुमानों से काफी अलग हो सकते हैं।
कंपनी ने स्पष्ट किया है कि ऐसे बयानों के आधार पर की गई किसी कार्रवाई के लिए वह जिम्मेदार नहीं होगी। साथ ही, बाद में होने वाली घटनाओं या परिस्थितियों के आधार पर इन अनुमानों को सार्वजनिक रूप से अपडेट करने की जिम्मेदारी भी कंपनी ने नहीं ली है।
यह सूचना कंपनी के कंपनी सचिव और अनुपालन अधिकारी ओम प्रकाश पांडे की ओर से जारी की गई है।
निष्ठा बधानी को राजस्थान पत्रिका में वाइस प्रेसिडेंट-नेशनल अकाउंट्स नियुक्त किया गया है। इससे पहले वह जियोस्टार में एसोसिएट डायरेक्टर थीं और टेलीविजन व प्रिंट मीडिया में 16 साल का अनुभव रखती हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
निष्ठा बधानी (Nishtha Badhani) को राजस्थान पत्रिका (Rajasthan Patrika) में वाइस प्रेसिडेंट-नेशनल अकाउंट्स (Vice President-National Accounts) नियुक्त किया गया है। उन्होंने लिंक्डइन (LinkedIn) पर एक पोस्ट के जरिए अपनी नई जिम्मेदारी की जानकारी साझा की।
अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा कि उन्हें यह साझा करते हुए खुशी हो रही है कि उन्होंने राजस्थान पत्रिका प्राइवेट लिमिटेड (Rajasthan Patrika Pvt. Ltd.) में वाइस प्रेसिडेंट के तौर पर नई जिम्मेदारी संभाली है।
इससे पहले निष्ठा बधानी करीब दो साल तक जियोस्टार (JioStar) के साथ एसोसिएट डायरेक्टर (Associate Director) के पद पर काम कर रही थीं।
निष्ठा बधानी को स्ट्रैटेजिक और रिजल्ट-ओरिएंटेड मीडिया सेल्स लीडर (Strategic and Result-Oriented Media Sales Leader) के तौर पर जाना जाता है। उन्हें टेलीविजन और प्रिंट मीडिया (Television and Print Media) में 16 वर्षों का अनुभव है। अपने करियर में उन्होंने रेवेन्यू ग्रोथ (Revenue Growth) और रणनीति आधारित समाधानों के जरिए लंबे समय तक क्लाइंट रिलेशनशिप (Client Relationships) विकसित करने पर काम किया है।
इससे पहले वह डिज्नी स्टार (Disney Star), नेटवर्क18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड (Network18 Media & Investments Limited) और डीबी कॉर्प लिमिटेड (DB Corp Ltd.) समेत कई प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं।
मिली ऐश्वर्या ने पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया में 18 साल पूरे किए हैं। उन्होंने 2008 में शुरुआत की थी और अब एडल्ट पब्लिशिंग ग्रुप के साथ 13 इम्प्रिंट्स की जिम्मेदारी संभालती हैं।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया (Penguin Random House India) की पब्लिशर और ग्रुप सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (Publisher and Group Senior Vice President) मिली ऐश्वर्या (Milee Ashwarya) ने कंपनी के साथ 18 साल पूरे कर लिए हैं। उन्होंने सितंबर 2008 में पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के साथ पब्लिशर, एबरी पब्लिशिंग और विंटेज पब्लिशिंग (Publisher, Ebury Publishing and Vintage Publishing) के तौर पर करियर शुरू किया था। इस भूमिका में उन्होंने 14 साल से ज्यादा समय बिताया।
जनवरी 2023 में उन्हें सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और पब्लिशर, एडल्ट पब्लिशिंग ग्रुप (Senior Vice President and Publisher, Adult Publishing Group) की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद जनवरी 2026 में उन्हें पब्लिशर और ग्रुप सीनियर वाइस प्रेसिडेंट के पद पर प्रमोट किया गया।
18 साल पूरे होने के मौके पर लिंक्डइन (LinkedIn) पर साझा की गई पोस्ट में मिली ऐश्वर्या ने अपने सफर को याद किया। उन्होंने कहा कि इस दौरान उन्होंने पब्लिशिंग लैंडस्केप (Publishing Landscape) में बदलाव देखे, इंडस्ट्री की चुनौतियों का सामना किया, नए लेखकों के साथ काम किया और भारतीय पाठकों के लिए कई इम्प्रिंट्स लॉन्च किए।
उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसे पब्लिशिंग प्रोग्राम (Publishing Programme) को तैयार करने पर खास गर्व है, जो भारत की भाषाई, सांस्कृतिक और बौद्धिक विविधता को दर्शाता है और पाठकों तक नई आवाजों और विचारों को पहुंचाता है।
फिलहाल मिली ऐश्वर्या पेंगुइन इंडिया के एडल्ट पब्लिशिंग ग्रुप का नेतृत्व कर रही हैं। वह एलन लेन (Allen Lane), हैमिश हैमिल्टन (Hamish Hamilton), विंटेज (Vintage), वाइकिंग (Viking), पेंगुइन क्लासिक्स (Penguin Classics) और पेंगुइन बिजनेस (Penguin Business) समेत 13 इम्प्रिंट्स की जिम्मेदारी संभालती हैं।
तमिलनाडु न्यूजप्रिंट एंड पेपर्स लिमिटेड (TNPL) की 46वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) 24 सितंबर 2026 को हुई।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
तमिलनाडु न्यूजप्रिंट एंड पेपर्स लिमिटेड (TNPL) की 46वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) 24 सितंबर 2026 को हुई। बैठक में शेयरधारकों ने 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के लिए कंपनी के ऑडिट किए गए वित्तीय नतीजों को मंजूरी दे दी।
बैठक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई। इसका आयोजन कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के सर्कुलर के तहत किया गया। बैठक की अध्यक्षता कंपनी के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर कुमार जयंत ने की।
AGM में डिविडेंड घोषित करने, रोटेशन के आधार पर रिटायर हो रहे एक डायरेक्टर की दोबारा नियुक्ति और वैधानिक ऑडिटर के पारिश्रमिक तय करने समेत कुल पांच साधारण प्रस्ताव रखे गए। सभी प्रस्ताव जरूरी बहुमत से पास हो गए।
वोटिंग के नतीजे जारी
कंपनी ने SEBI के लिस्टिंग नियमों के रेगुलेशन 44(3) के तहत कंसोलिडेटेड वोटिंग रिजल्ट भी जारी किया है। 17 सितंबर 2026 की कट-ऑफ डेट तक कंपनी के कुल 51,591 शेयरधारक रिकॉर्ड पर थे।
शेयरधारकों ने 21 सितंबर से 23 सितंबर 2026 तक रिमोट ई-वोटिंग के जरिए और AGM के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग के जरिए मतदान किया।
वित्तीय स्टेटमेंट को मंजूरी देने वाले प्रस्ताव के पक्ष में 99.98% वोट पड़े, जबकि डिविडेंड घोषित करने के प्रस्ताव को 99.99% वोट मिले। वहीं, डॉ. एस. विजयकुमार, आईएएस की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव के पक्ष में 99.97% वोट पड़े।

ऑडिट में क्या कहा गया?
कंपनी के वैधानिक ऑडिटर एम/एस ए. जॉन मॉरिस एंड कंपनी ने वित्तीय स्टेटमेंट पर बिना किसी प्रतिकूल टिप्पणी के ऑडिट राय दी। हालांकि, उन्होंने कंपनी के अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर Oracle E-Business Suite (EBS) में ऑडिट ट्रेल से जुड़ी एक बात बताई।
ऑडिटर्स के मुताबिक, EBS में एप्लिकेशन लेवल पर ऑडिट ट्रेल मौजूद है, लेकिन डेटाबेस लेवल पर सीधे किए जाने वाले डेटा बदलावों को रिकॉर्ड करने के लिए ऑडिट ट्रेल चालू नहीं है। ऑडिटर्स ने यह भी स्पष्ट किया कि यूजर्स के पास बैकएंड से एंट्री को बदलने या एडिट करने की सुविधा नहीं है।
इसके अलावा, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने ‘NIL’ रिपोर्ट दी, यानी खातों को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गई। कंपनी के सेक्रेटेरियल ऑडिटर्स एम/एस श्रीधरन एंड श्रीधरन एसोसिएट्स ने भी अपनी रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में बताई गई योग्यताओं को बोर्ड की रिपोर्ट में संबोधित किया गया है।
AGM में कौन-कौन रहे मौजूद?
बैठक में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर कुमार जयंत, एन. वेंकटेश, आर. कन्नन और कई स्वतंत्र डायरेक्टर शामिल रहे। इनमें डॉ. एन. सुंदरदेवन, टी.एम.टी. एम. सत्यवती, मैथ्यू थॉमस और श्रीगणेश पद्मनाभन शामिल थे।
डॉ. एस. विजयकुमार पहले से तय व्यस्तताओं के कारण बैठक में मौजूद नहीं थे। उन्हें दोबारा डायरेक्टर नियुक्त करने का प्रस्ताव AGM में मंजूर किया गया। AGM दोपहर 1:45 बजे समाप्त हुई। इस दौरान शेयरधारकों ने कंपनी के कामकाज और बाजार की स्थिति से जुड़े सवाल भी पूछे।
हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड की 16वीं (पोस्ट-आईपीओ) सालाना आम बैठक (एजीएम) 24 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित की गई।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड की 16वीं (पोस्ट-आईपीओ) सालाना आम बैठक (एजीएम) 24 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित की गई। कंपनी ने बैठक में रखे गए दोनों प्रस्तावों को जरूरी बहुमत के साथ मंजूरी मिलने की जानकारी दी है।
कंपनी के मुताबिक, एजीएम सुबह 11 बजे शुरू हुई। शेयरधारकों को बैठक से पहले रिमोट ई-वोटिंग और एजीएम के दौरान ई-वोटिंग के जरिए वोट करने की सुविधा दी गई थी।
बैठक में पहला प्रस्ताव वित्त वर्ष 2025-26 के लिए कंपनी के ऑडिट किए गए स्टैंडअलोन और कंसोलिडेटेड वित्तीय विवरणों को मंजूर करने से जुड़ा था। इसमें बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और ऑडिटर्स की रिपोर्ट भी शामिल थी। इस प्रस्ताव को 99.9935 फीसदी वोट के साथ मंजूरी मिली।
दूसरा प्रस्ताव प्रियव्रत भारती को रोटेशन के आधार पर रिटायर होने के बाद फिर से डायरेक्टर नियुक्त करने से जुड़ा था। वे दोबारा नियुक्ति के लिए पात्र थे और उन्होंने इसके लिए अपनी पेशकश की थी। इस प्रस्ताव को 99.9934 फीसदी वोट के साथ मंजूरी मिली।
कंपनी के 17 सितंबर 2026 के कट-ऑफ डेट तक कुल 15,769 शेयरधारक थे। एजीएम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप से 1 और पब्लिक कैटेगरी से 49 शेयरधारकों ने हिस्सा लिया।
कंपनी ने बताया कि दोनों प्रस्ताव जरूरी बहुमत के साथ पास हो गए हैं। वोटिंग के नतीजे और स्क्रूटिनाइजर की रिपोर्ट कंपनी की वेबसाइट और नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) की ई-वोटिंग वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाएगी।
डी.बी. कॉर्प को NSE और BSE से दो प्रमोटर ग्रुप कंपनियों को ‘पब्लिक’ कैटेगरी में लाने के लिए नो-ऑब्जेक्शन लेटर मिला है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डी.बी. कॉर्प लिमिटेड ने बताया है कि उसे नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) से अपने दो प्रमोटर ग्रुप से जुड़ी कंपनियों को ‘प्रमोटर ग्रुप’ कैटेगरी से ‘पब्लिक’ कैटेगरी में लाने के लिए नो-ऑब्जेक्शन लेटर मिल गया है।
कंपनी ने 23 सितंबर 2026 को शेयर बाजारों को दी जानकारी में बताया कि उसे BEDR Realcon Private Limited और Diligent Pinkcity Center Private Limited के पुनर्वर्गीकरण (Reclassification) के लिए दोनों एक्सचेंजों से नो-ऑब्जेक्शन लेटर मिला है। यह प्रक्रिया सेबी के लिस्टिंग नियमों के रेगुलेशन 31A के तहत की जा रही है।
NSE ने अपने पत्र में कहा है कि कंपनी की ओर से 22 जुलाई 2026 को दिए गए आवेदन के आधार पर दोनों प्रमोटर ग्रुप कंपनियों के पुनर्वर्गीकरण के आवेदन पर नो-ऑब्जेक्शन दिया गया है।
BSE ने भी 23 सितंबर 2026 को जारी अपने पत्र में BEDR Realcon Private Limited और Diligent Pinkcity Centre Private Limited को प्रमोटर कैटेगरी से हटाकर पब्लिक कैटेगरी में लाने के अनुरोध पर नो-ऑब्जेक्शन दिया है।
Infomedia Press Limited की 71वीं सालाना आम बैठक (AGM) 18 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित की गई।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
Infomedia Press Limited की 71वीं सालाना आम बैठक (AGM) 18 सितंबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित की गई। कंपनी ने बैठक में हुए कामकाज के मतदान के नतीजे और स्क्रूटिनाइजर की संयुक्त रिपोर्ट शेयर बाजारों को सौंप दी है। कंपनी के मुताबिक, बैठक में रखे गए सभी 4 प्रस्ताव जरूरी बहुमत के साथ पास हो गए।
कंपनी की ओर से 18 सितंबर 2026 को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) को यह जानकारी दी गई। 71वीं AGM शाम 4 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग/अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यम से हुई।
कंपनी के रिकॉर्ड के मुताबिक, 11 सितंबर 2026 कट-ऑफ तारीख थी और उस तारीख तक कंपनी के कुल 16,577 शेयरधारक थे। शेयरधारकों को प्रस्तावों पर रिमोट ई-वोटिंग और AGM के दौरान ई-वोटिंग के जरिए वोट करने की सुविधा दी गई थी।
पहला प्रस्ताव
पहले प्रस्ताव में 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के लिए कंपनी के ऑडिट किए गए फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स और उस पर बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स व ऑडिटर्स की रिपोर्ट को अपनाने की मंजूरी मांगी गई थी। यह प्रस्ताव साधारण प्रस्ताव (Ordinary Resolution) था और इसे जरूरी बहुमत के साथ मंजूरी मिल गई। इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 2,54,88,707 वोट पड़े, जबकि 11,25,657 वोट इसके खिलाफ रहे। कुल पड़े वोटों में 95.7705% वोट पक्ष में और 4.2295% वोट खिलाफ रहे।
दूसरा प्रस्ताव
दूसरे प्रस्ताव में करनवीर सिंह गिल को रोटेशन के आधार पर रिटायर हो रहे निदेशक के तौर पर दोबारा नियुक्त करने का प्रस्ताव था। यह भी साधारण प्रस्ताव था और इसे जरूरी बहुमत के साथ मंजूरी मिल गई। इस प्रस्ताव के पक्ष में 2,54,88,017 वोट पड़े, जबकि 11,26,247 वोट खिलाफ रहे। यानी कुल वोटों में 95.7683% वोट पक्ष में और 4.2317% वोट खिलाफ रहे।
तीसरा प्रस्ताव
तीसरे प्रस्ताव में बिंदु नवींचंद्र त्रिवेदी को रोटेशन के आधार पर रिटायर हो रही निदेशक के तौर पर दोबारा नियुक्त करने की मंजूरी मांगी गई थी। यह प्रस्ताव भी जरूरी बहुमत के साथ पास हुआ। इस प्रस्ताव के पक्ष में 2,54,88,017 वोट पड़े, जबकि 11,26,247 वोट इसके खिलाफ रहे। पक्ष में पड़े वोटों का प्रतिशत 95.7683% और खिलाफ पड़े वोटों का प्रतिशत 4.2317% रहा।
चौथा प्रस्ताव
चौथे प्रस्ताव में पुनीत सिंहवी को कंपनी के गैर-कार्यकारी, गैर-स्वतंत्र निदेशक (Non-Executive Non-Independent Director) के तौर पर नियुक्त करने की मंजूरी मांगी गई थी। यह प्रस्ताव भी जरूरी बहुमत के साथ पास हुआ।इस प्रस्ताव के पक्ष में 2,54,88,117 वोट पड़े, जबकि 11,26,247 वोट खिलाफ रहे। पक्ष में पड़े वोटों का प्रतिशत 95.7683% और खिलाफ पड़े वोटों का प्रतिशत 4.2317% रहा।
स्क्रूटिनाइजर की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 सितंबर 2026 को AGM के बाद ई-वोटिंग के नतीजों को अनब्लॉक किया गया और वोटों का कंपनी के रिकॉर्ड के साथ मिलान किया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि प्रस्तावों पर पड़े कुल वोटों में कोई अमान्य वोट नहीं था।
स्क्रूटिनाइजर नीलेश कुमार जैन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि नोटिस में दिए गए आइटम नंबर 1 से 4 तक के सभी प्रस्ताव जरूरी बहुमत के साथ पास हो गए।