क्या स्क्रॉलिंग कल्चर बदल रहा है लोगों की न्यूज पढ़ने की आदत?

आज की युवा पीढ़ी के लिए खबरों का सबसे बड़ा माध्यम अब अखबार नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन बन गई है।

Vikas Saxena by
Published - Tuesday, 30 June, 2026
Last Modified:
Tuesday, 30 June, 2026
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आज की युवा पीढ़ी के लिए खबरों का सबसे बड़ा माध्यम अब अखबार नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन बन गई है। Instagram Reels पर कुछ ही सेकंड में न्यूज अपडेट मिल जाती है, WhatsApp पर खबरों के लिंक और फॉरवर्ड लगातार आते रहते हैं, जबकि YouTube पर पॉडकास्ट और एक्सप्लेनर वीडियो आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे में घर के दरवाजे पर आने वाला अखबार पहले जैसी अहमियत नहीं रखता।

यह बदलाव सिर्फ खबरें पढ़ने के तरीके का नहीं, बल्कि पूरी मीडिया खपत में आए बड़े बदलाव का संकेत है। BCG-Snapchat Report 2024 के मुताबिक, भारत की 37.7 करोड़ Gen Z आबादी का बड़ा हिस्सा अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए खबरें देख और समझ रहा है। यही वजह है कि प्रिंट मीडिया के सामने आज युवा पाठकों को अपने साथ जोड़कर रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

सुबह की आदत बदल चुकी है

Reuters Institute for the Study of Journalism की Digital News Report 2025  (जो करीब एक लाख लोगों पर 48 देशों में किए गए सर्वे पर आधारित है) में यह बात साफ सामने आई है। वैश्विक स्तर पर 18-24 आयु वर्ग के 44% युवा सोशल मीडिया और वीडियो नेटवर्क को अपना मुख्य न्यूज सोर्स मानते हैं। 25-34 आयु वर्ग में यह आंकड़ा 38% है।

भारत के लिए यह तस्वीर और भी साफ है। उसी रिपोर्ट के भारत-केंद्रित विश्लेषण के अनुसार, 18-34 आयु वर्ग के 41% भारतीय सोशल मीडिया और YouTube को अपना मुख्य न्यूज सोर्स बताते हैं, जबकि इसी उम्र के केवल 24% लोग पब्लिशर्स वेबसाइट पर जाते हैं। मतलब साफ है- खबर मिल रही है, लेकिन अखबार के जरिए नहीं और यह बदलाव सिर्फ "पढ़ने बनाम स्क्रॉल करने" तक सीमित नहीं है। Reuters की रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत उन देशों में शामिल है जहां लोग खबर पढ़ने की बजाय देखना ज्यादा पसंद करते हैं। सोशल वीडियो न्यूज की वैश्विक खपत 2020 में 52% थी, जो 2025 में 65% पर पहुंच चुकी है।

Gen Z न्यूज ले कहां से रही है?

DataReportal India 2025 के अनुसार, जनवरी 2025 तक भारत में 49.1 करोड़ सोशल मीडिया यूजर आइडेंटिटी हैं, जो कुल आबादी का 33.7% है। Gen Z (13-24 वर्ष) इस तबके में करीब 40% की हिस्सेदारी रखती है और रोजाना 3 घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर बिताती है।

इनकी पसंदीदा प्लेटफॉर्म्स हैं:

  • WhatsApp — 80.8% भारतीय इंटरनेट यूजर्स की पहुंच  
  • Instagram — 77.9% भारतीय इंटरनेट यूजर्स की पहुंच; भारत में 39.2 करोड़ यूजर  
  • YouTube — 50 करोड़ से ज्यादा यूजर, हर महीने 29 घंटे 37 मिनट की औसत खपत
  • Telegram और X — ब्रेकिंग न्यूज के लिए प्रमुख

यहां एक बड़ा सवाब उठता है: क्या ये प्लेटफॉर्म अब पब्लिशर बन चुके हैं? जवाब है- काफी हद तक, हां। Reuters की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 50% से ज्यादा अंग्रेजी भाषी इंटरनेट यूजर कभी-कभी खबरों से बचते हैं (news avoidance), और इसकी बड़ी वजह डिजिटल मीडिया का overwhelming volume है।

"हेडलाइंस" का दौर, "डीप रीडिंग" खत्म?

जब खबरें 15-30 सेकंड की Reels और Shorts में सिमटने लगें, तो गहराई से पढ़ने और समझने की आदत अपने आप कम होने लगती है। यही बड़ा बदलाव आज प्रिंट मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

Reuters Institute की मार्च 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट ‘Understanding Young News Audiences’ के मुताबिक, दुनिया भर में 18-24 साल के करीब 73% युवा हर हफ्ते कम से कम एक शॉर्ट वीडियो के जरिए न्यूज देखते हैं। भारत में TikTok भले ही बंद हो, लेकिन Instagram Reels और YouTube Shorts ने उसकी जगह काफी हद तक ले ली है।

इसका असर साफ दिख रहा है। युवा अब खबरों को पढ़ने से ज्यादा “स्क्रॉल” कर रहे हैं। कौन-सी खबर लोगों तक पहुंचेगी, यह अब एडिटोरियल टीम से ज्यादा सोशल मीडिया एल्गोरिदम और व्यूज-लाइक्स तय कर रहे हैं।

प्रिंट के आंकड़े क्या कहते हैं?

FICCI-EY Media & Entertainment Report 2026 के मुताबिक, भारत का प्रिंट मीडिया सेक्टर 2025 में करीब ₹25,900 करोड़ पर लगभग स्थिर रहा। विज्ञापनों से होने वाली कमाई में सिर्फ 2% की मामूली बढ़त दर्ज की गई, जिसकी बड़ी वजह luxury products, real estate और सरकारी विज्ञापन रहे। वहीं अखबारों की बिक्री यानी circulation revenue में 1% की गिरावट आई। लगातार दूसरे साल ऐसा हुआ जब प्रिंट सर्कुलेशन से होने वाली कमाई घटी।

दूसरी तरफ डिजिटल मीडिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में डिजिटल विज्ञापन बाजार 26% बढ़कर ₹94,700 करोड़ तक पहुंच गया। कुल विज्ञापन खर्च में इसकी हिस्सेदारी 63% रही।

प्रिंट मीडिया की घटती हिस्सेदारी dentsu-e4m Digital Advertising Report के आंकड़ों में भी साफ दिखती है। 2024 में कुल विज्ञापन बाजार में प्रिंट की हिस्सेदारी 17% थी, जो 2025 में घटकर 15% रह गई। 2026 में इसके 13% तक आने का अनुमान है। dentsu-e4m Report 2026 के मुताबिक, 2025 में प्रिंट विज्ञापन बाजार ₹16,594 करोड़ का रहा, जो कुल विज्ञापन बाजार का करीब 14% है।

हालांकि सर्कुलेशन के आंकड़े एक मिली-जुली तस्वीर दिखाते हैं। Audit Bureau of Circulations (ABC) के जनवरी-जून 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में अखबारों की कुल दैनिक सर्कुलेशन करीब 2 करोड़ 97 लाख प्रतियां रही, जो पिछले छह महीनों की तुलना में 2.77% ज्यादा थी। इसमें Dainik Bhaskar सबसे आगे रहा, जिसके बाद Dainik Jagran और Amar Ujala का स्थान रहा। यह बढ़त मुख्य रूप से छोटे शहरों और Tier-2/Tier-3 बाजारों से आई।

लेकिन ABC के जुलाई-दिसंबर 2025 के नए आंकड़े बताते हैं कि Dainik Jagran, Amar Ujala और Rajasthan Patrika जैसे बड़े अखबारों की सर्कुलेशन में गिरावट देखने को मिली। वहीं Dainik Bhaskar और Hindustan को मामूली बढ़त मिली।

युवा अखबार से क्यों दूर हो रहे हैं?

इसके पीछे सिर्फ मोबाइल नहीं है-  कंटेंट मिसमैच भी एक बड़ी वजह है।

पहली बात, अखबारों की भाषा और लेआउट पुरानी पीढ़ी के लिए डिजाइन है। Gen Z को क्रिएटर इकनॉमी, पॉप कल्चर, मेंटल हेल्थ, क्लाइमेट और गेमिंग जैसे विषयों में ज्यादा रुचि है- अखबार इन्हें गहराई से कवर नहीं करते।

दूसरी बात, मॉर्निंग हैबिट का टूटना। जिस पीढ़ी ने घर में अखबार देखते हुए बड़े होने का अनुभव नहीं किया, वह इस आदत को खुद क्यों शुरू करेगी?

तीसरी बात, तीसरी बड़ी वजह है पर्सनलॉइजेशन। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम हर यूजर को उसकी पसंद और रुचि के हिसाब से खबरें दिखाते हैं। किसी को स्पोर्ट्स ज्यादा दिखता है, किसी को एंटरटेनमेंट, तो किसी को बिजनेस या पॉलिटिक्स। वहीं अखबार हर पाठक को लगभग एक जैसा कंटेंट देता है। Gen Z की बड़ी आबादी को यही बात अब कम जुड़ाव वाली और कई बार “इर्रेलिवेंट” लगने लगी है।

चौथी बात, AI की बढ़ती भूमिका। Reuters Institute Digital News Report 2025 के अनुसार भारत में 44% लोग AI से पर्सनलाइज्ड न्यूज पाने में सहज हैं- यह वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है (तुलना के लिए ब्रिटेन में सिर्फ 11%)। साथ ही, 18% भारतीय हर हफ्ते AI चैटबॉट्स के जरिए खबर पढ़ते हैं- वैश्विक स्तर पर यह औसत महज 7% है।

क्या खुद अखबार भी जिम्मेदार हैं?

एक हद तक हां। भारत के अधिकांश बड़े अखबार समूहों ने डिजिटल-फर्स्ट थिंकिंग को देर से अपनाया। जब तक वे Instagram Reels, podcasts और WhatsApp न्यूजलेटर्स पर सक्रिय हुए, तब तक क्रिएटर इकनॉमी के नए चेहरे लाखों सब्सक्राइबर्स बना चुके थे।

Reuters Institute की अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट 'मैपिंग न्यूज क्रिएटर्स व इन्फ्लुएंसर्स' (24 देशों पर आधारित) यह बताती है कि न्यूज क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स अब कई ट्रेडिशनल न्यूज ब्रैंड्स से ज्यादा ध्यान खींच रहे हैं, खासकर सोशल और वीडियो नेटवर्क्स पर। इसी रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में 21% वयस्क और 30 साल से कम उम्र के 37% युवा अब रेगुलेट्री क्रिएटर्स या इन्फ्लुएंसर्स से खबर लेते हैं।

भारत में भी तस्वीर कुछ ऐसी ही है। YouTube पर ध्रुव राठी जैसे क्रिएटर्स के करोड़ों सब्सक्राइबर्स हैं। वहीं Instagram पर न्यूज एक्सप्लेनर और शॉर्ट न्यूज कंटेंट बनाने वाले कई अकाउंट्स की पहुंच अब कई रीजनल अखबारों के बराबर या उससे भी ज्यादा हो चुकी है। आसान भाषा, तेज फॉर्मेट और मोबाइल-फ्रेंडली कंटेंट की वजह से युवा तेजी से इन प्लेटफॉर्म्स की तरफ बढ़ रहे हैं। एक तरह से क्रिएटर इकनॉमी ने युवाओं के बीच वह जगह भर दी है, जहां प्रिंट मीडिया खुद को समय के साथ उतनी तेजी से नहीं बदल पाया।

लेकिन क्या सच में अखबार खत्म हो रहे हैं?

हालांकि कहानी का दूसरा पहलू भी है। Urban Gen Z यानी बड़े शहरों के युवा पूरे भारत की तस्वीर नहीं हैं।

TAM AdEx, RCS India और Excellent Publicity के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 की पहली छमाही में प्रिंट विज्ञापनों में 26% की अच्छी बढ़त दर्ज की गई। इसमें छोटे शहरों और नॉन-मेट्रो मार्केट्स का बड़ा योगदान रहा। यानी देश के कई हिस्सों में अखबार अब भी मजबूत माध्यम बने हुए हैं।

वहीं WARC के आंकड़े बताते हैं कि 72% भारतीय उपभोक्ता डिजिटल विज्ञापनों की ज्यादा संख्या से परेशान महसूस करते हैं। इतना ही नहीं, 60% से ज्यादा लोग आज भी डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म्स के मुकाबले प्रिंट और टीवी खबरों पर ज्यादा भरोसा करते हैं।

यही भरोसा प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि प्रिंट मीडिया समय के साथ खुद को बदले और नए दौर के पाठकों की जरूरतों के हिसाब से खुद को फिर से तैयार करे।

Trust की लड़ाई: सोशल मीडिया बनाम अखबार

AI और एल्गोरिदम से चलने वाली न्यूज की दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती यह बनती जा रही है कि सही और गलत खबर में फर्क करना मुश्किल होता जा रहा है। Reuters की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में 58% लोग ऑनलाइन गलत जानकारी और फेक न्यूज को लेकर चिंतित हैं। भारत में यह चिंता और ज्यादा गंभीर है। करीब 11% भारतीय यूजर्स मानते हैं कि कई बार दोस्त और परिवार के लोग भी अनजाने में गलत जानकारी आगे बढ़ा देते हैं।

WhatsApp ग्रुप्स के जरिए फैली अफवाहों को लेकर पहले भी कई गंभीर घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें हिंसा तक देखने को मिली। ऐसे माहौल में प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी ताकत उसकी एडिटोरियल अकाउंटबिलिटी, फैक्ट-चेकिंग और बाइलाइन जर्नलिज्म है, जहां खबरों की जिम्मेदारी तय होती है और जानकारी जांच-परख के बाद प्रकाशित की जाती है।

चुनौती बस इतनी है कि प्रिंट मीडिया इस भरोसे और विश्वसनीयता को नई पीढ़ी तक किस तरह पहुंचाता है।

प्रिंट मीडिया की नई रणनीति

अब न्यूजपेपर और मीडिया कंपनियां भी यह समझ चुकी हैं कि सिर्फ छपे हुए अखबार के जरिए Gen Z तक पहुंचना आसान नहीं है। यही वजह है कि अब कई न्यूजपेपर ब्रैंड्स शॉर्ट्स वीडियोज बना रहे हैं, AI आधारित वॉयस बुलेटिन शुरू कर रहे हैं, WhatsApp Channels पर सब्सक्राइबर्ट बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं और पॉडकास्ट स्टूडियो भी तैयार कर रहे हैं। इसके अलावा इवेंट्स और ब्रैंडेट कंटेंट भी कमाई का नया जरिया बनते जा रहे हैं।

FICCI-EY 2026 की रिपोर्ट भी बताती है कि प्रिंट पब्लिशर्स अब सिर्फ अखबारों पर निर्भर नहीं रहना चाहते। वे इवेंट्स, ब्रैंडेट कंटेंट और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए अपनी कमाई के नए रास्ते बना रहे हैं।

भविष्य क्या है?

आने वाले समय में भारत का प्रिंट मीडिया तीन रास्तों में से किसी एक दिशा में जाता दिख सकता है।

पहला रास्ता यह है कि प्रिंट धीरे-धीरे एक niche product बन जाए, यानी ऐसा माध्यम जो सिर्फ खास वर्ग के पाठकों तक सीमित रह जाए। इसमें premium readers, high-income वर्ग या UPSC और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले पाठक प्रमुख हो सकते हैं।

दूसरा रास्ता हाइब्रिड मॉडल का है, जहां अखबार सिर्फ प्रिंट तक सीमित न रहे, बल्कि वीडियो, ऑडियो, पॉडकास्ट्स, इवेंट्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के साथ मिलकर एक नया मीडिया इकोसिस्टम तैयार करे।

तीसरा और सबसे मजबूत रास्ता हाइपर लोकल जर्नलिज्म का माना जा रहा है। यानी जिला, शहर और तहसील स्तर की खबरों पर फोकस करने वाले रीजनल अखबार अपनी अहमियत बनाए रख सकते हैं। वजह साफ है- नेशनल न्यूज अब लोगों को मोबाइल पर मुफ्त में मिल जाती है, लेकिन स्थानीय खबरों के लिए आज भी बड़ी संख्या में लोग अखबारों पर भरोसा करते हैं।

आंकड़े बताते हैं कि Gen Z ने खबर पढ़ना नहीं छोड़ा — बस फॉर्मेट बदल दिया है। Reuters Digital News Report 2025 के मुताबिक वैश्विक स्तर पर 18-24 आयु वर्ग के 44% और भारत में 18-34 आयु वर्ग के 41% युवा सोशल मीडिया को मुख्य न्यूज सोर्स मानते हैं। FICCI-EY 2026 बताती है कि प्रिंट का सर्कुलेशन रेवेन्यू लगातार दूसरे साल घटा है। dentsu-e4m के अनुसार 2025 में प्रिंट की कुल विज्ञापन हिस्सेदारी सिमटकर 14% पर आ गई।

लेकिन इस सबके बीच एक उम्मीद की किरण भी है- WARC के अनुसार 60% से ज्यादा भारतीय उपभोक्ता अभी भी प्रिंट को डिजिटल से ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। जिस दिन प्रिंट मीडिया इस ट्रस्ट को Gen Z की भाषा में ट्रांसलेट कर पाएगा- चाहे वो Reels हो, Podcast हो या WhatsApp न्यूजलेटर, उस दिन शायद अखबार फिर से दरवाजे से उठाया जाएगा।

फिलहाल तो यह कहना गलत नहीं होगा कि युवा पीढ़ी अखबार छोड़ रही है, लेकिन खबरों की भूख खत्म नहीं हुई, बस उसका फॉर्मेट बदल गया है।

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पाठकों को अब पढ़ने को नहीं मिलेगा ‘सांध्य टाइम्स’, 46 साल का थमा सफर

अंतिम अंक में प्रकाशित संपादकीय ‘अलविदा नहीं, जुड़ाव की नई शुरुआत’ के जरिए अखबार ने पाठकों को भावुक संदेश देते हुए अपनी यात्रा के एक नए पड़ाव की घोषणा की।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 31 August, 2026
Last Modified:
Monday, 31 August, 2026
Sandhya Times

दिल्ली-एनसीआर की शामों को खबरों से जोड़ने वाला हिंदी का चर्चित शाम का अखबार ‘सांध्य टाइम्स’ अब प्रकाशित नहीं होगा। करीब 46 वर्षों तक पाठकों तक दिनभर की ताजा खबरें पहुंचाने वाले इस अखबार ने अपने अंतिम संस्करण के साथ प्रकाशन पर विराम लगा दिया। अंतिम अंक में प्रकाशित संपादकीय ‘अलविदा नहीं, जुड़ाव की नई शुरुआत’ के जरिए अखबार ने पाठकों को भावुक संदेश देते हुए अपनी यात्रा के एक नए पड़ाव की घोषणा की।

संपादकीय में कहा गया है कि पिछले 46 वर्षों से दिल्ली-एनसीआर की हर हलचल, विचार और जनसरोकार के मुद्दों पर अखबार ने अपने पाठकों के साथ एक मजबूत रिश्ता कायम किया। बदलते दौर और सूचना के नए माध्यमों के विस्तार के बीच पत्रकारिता की इस यात्रा को अब एक नए मोड़ पर ले जाने का फैसला किया गया है। हालांकि अखबार ने यह भी स्पष्ट किया कि जनसरोकार, निष्पक्षता और लोगों की आवाज बनने का उसका संकल्प आगे भी बना रहेगा।

करीब 46 वर्षों तक प्रकाशित रहा सांध्य टाइम्स राजधानी में हिंदी शाम के अखबार की एक मजबूत पहचान बनकर उभरा था। उस दौर में जब डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल न्यूज का चलन नहीं था, तब दफ्तरों से लौटते लोगों और बाजारों में मौजूद पाठकों के लिए दिनभर की ताजा खबरों का प्रमुख माध्यम सांध्य टाइम्स ही हुआ करता था। स्थानीय खबरों, नागरिक समस्याओं, अपराध, राजनीति और जनहित के मुद्दों पर इसकी विशेष पकड़ मानी जाती थी।

टाइम्स समूह के इस प्रकाशन ने दिल्ली-एनसीआर की स्थानीय पत्रकारिता को मजबूत पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और लंबे समय तक राजधानी के पाठकों के बीच लोकप्रिय बना रहा।

अंतिम संस्करण के प्रकाशित होने के बाद सोशल मीडिया पर भी पत्रकारों, पूर्व कर्मचारियों और पाठकों ने अपनी यादें साझा कीं। कई लोगों ने इसे हिंदी पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण अध्याय के अंत के रूप में देखा। अखबार के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर भी अंतिम संस्करण को लेकर पोस्ट साझा की गई, जिस पर बड़ी संख्या में प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। 

अंतिम अंक में प्रकाशित संपादकीय 'अलविदा नहीं, जुड़ाव की नई शुरुआत' में सांध्य टाइम्स ने अपने पाठकों को यह संदेश दिया:

पिछले 46 वर्षों से दिल्ली-एनसीआर की हर धड़कन की खबरों, विचारों और आपसे जुड़े तमाम मुद्दों पर बेखौफ कलम से रोशनी करने वाला आपका अखबार 'सांध्य टाइम्स' अब अपनी इस यात्रा को विराम दे रहा है। चार दशकों से भी लंबे इस अटूट रिश्ते से आपने हमें जो प्यार, विश्वास और अपनापन दिया, उसके लिए हम आपके सदैव आभारी रहेंगे।

पिछले दिनों लगातार आठ सप्ताह तक चले एक जटिल संघर्ष के बावजूद हम डटे रहे। बदलते दौर और सूचना के नए माध्यमों के साथ हमने अपनी पत्रकारिता यात्रा को एक नए मोड़ देने का निर्णय लिया है।

'सांध्य टाइम्स' के पन्ने भले ही अब आपके हाथों में न हों, लेकिन जनसरोकार, निष्पक्षता और आपकी आवाज बनने का हमारा संकल्प कायम रहेगा।

हमारा और आपका यह सफर यहीं समाप्त नहीं होता। आप 'नवभारत टाइम्स' (NBT) के माध्यम से हमारे साथ लगातार जुड़े रहेंगे। आपकी समस्याएं, आपके मुद्दे और आपके शहर की हर खबर को पहले की तरह पूरी मजबूती और प्रामाणिकता के साथ नवभारत टाइम्स से उठाते रहेंगे।

46 वर्षों के इस शानदार सफर में हमारा साथी बनने के लिए आप सभी पाठकों का हृदय से धन्यवाद।

— संपादकीय टीम, सांध्य टाइम्स

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जागरण प्रकाशन को GST से जुड़े मामले में मिला नोटिस, कंपनी ने कहा- मजबूत है केस

English Headline जागरण प्रकाशन को हरियाणा के हिसार के एक्साइज व टैक्सेशन ऑफिसर की ओर से ₹21.73 लाख के कथित GST बकाये को लेकर कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) मिला है।

Vikas Saxena by
Published - Friday, 28 August, 2026
Last Modified:
Friday, 28 August, 2026
JagranPrakashan9856

जागरण प्रकाशन (Jagran Prakashan Limited) को हरियाणा के हिसार के एक्साइज व टैक्सेशन ऑफिसर की ओर से ₹21.73 लाख के कथित GST बकाये को लेकर कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) मिला है। कंपनी ने शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि यह नोटिस 26 अगस्त 2026 को प्राप्त हुआ है।

यह नोटिस Central Goods and Services Tax Act, 2017 की धारा 74 के तहत जारी किया गया है। इसमें कंपनी से पूछा गया है कि कथित GST मांग के साथ धारा 50 के तहत ब्याज और धारा 74 के तहत जुर्माना क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए।

2020-21 की अवधि से जुड़ा है मामला

कंपनी के मुताबिक, यह मामला वित्त वर्ष 2020-21 की अवधि से संबंधित है। नोटिस में मुख्य तौर पर कंपनी की ओर से लिए गए Input Tax Credit (ITC) की पात्रता को लेकर टैक्स भुगतान या स्पष्टीकरण मांगा गया है। हालांकि, जागरण प्रकाशन ने कहा है कि कानूनी सलाह लेने के बाद उसका मानना है कि यह कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) टिकाऊ नहीं है और मामले में कंपनी का पक्ष मजबूत है।

तय समय में देगी जवाब

कंपनी ने बताया कि वह निर्धारित समय सीमा के भीतर इस नोटिस का उचित जवाब दाखिल करेगी। साथ ही, जरूरत पड़ने पर कंपनी इस मामले के खिलाफ दूसरे कानूनी विकल्पों पर भी विचार करेगी।

कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन पर असर नहीं

जागरण प्रकाशन ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा स्थिति में इस नोटिस का कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, कारोबार या अन्य गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़ा है। कंपनी के अनुसार, कानूनी सलाह के आधार पर उसका मानना है कि नोटिस में उठाई गई मांग उचित नहीं है और उसके पास मामले में मजबूत आधार हैं। इसलिए फिलहाल इस नोटिस से किसी वित्तीय प्रभाव की आशंका नहीं है।

कंपनी ने यह जानकारी SEBI Listing Regulations के Regulation 30 के तहत शेयर बाजारों को दी है।

 

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तीन मीडिया समूह जल्द शुरू करेंगे नए बिजनेस अखबार

भारत में अगले तीन से चार महीनों में तीन नए फाइनेंशियल डेली लॉन्च होने की उम्मीद है। एक्सप्रेस पब्लिकेशंस, कुमुदम और दिनमलर बिजनेस न्यूज सेगमेंट में उतरने की तैयारी में हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 22 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 22 August, 2026
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भारतीय मीडिया इंडस्ट्री में फाइनेंशियल न्यूज सेगमेंट में प्रतिस्पर्धा बढ़ने वाली है। अगले तीन से चार महीनों के दौरान तीन नए बिजनेस डेली लॉन्च होने की संभावना है। Express Publications (Madurai), Kumudam और Dinamalar अपने-अपने बिजनेस अखबार शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं।

एक्सप्रेस पब्लिकेशंस (Express Publications), जो The New Indian Express का प्रकाशन करता है, अक्टूबर के अंत तक एक नया राष्ट्रीय बिजनेस अखबार लॉन्च करने की योजना बना रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इसे राष्ट्रीय वित्तीय दैनिक के तौर पर पेश किया जाएगा। इसके लॉन्च के बाद देश में राष्ट्रीय स्तर के फाइनेंशियल डेली की संख्या छह हो जाएगी।

नए अखबार के संपादकीय नेतृत्व की जिम्मेदारी फिलहाल The New Indian Express के तमिलनाडु एडिटर रंजनाथन को दिए जाने की बात सामने आई है। वह कोच्चि से नए बिजनेस डेली के एडिटर के तौर पर काम संभाल सकते हैं।

वहीं, कुमुदम (Kumudam) सितंबर के मध्य तक चेन्नई से तमिल और अंग्रेजी भाषा में बिजनेस डेली शुरू करने की तैयारी कर रहा है। समूह की यह पहल दक्षिण भारत के बिजनेस न्यूज मार्केट में उसकी मौजूदगी को मजबूत कर सकती है।

इसके अलावा दिनमलर (Dinamalar) भी बिजनेस अखबारों के सेगमेंट में प्रवेश करने की योजना बना रहा है। समूह साल के अंत तक तमिल भाषा में अपना बिजनेस डेली लॉन्च कर सकता है।

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HT Media ने 95.30 करोड़ रुपये के वारंट किए आवंटित, 6 निवेशकों को मिला प्रेफरेंशियल इश्यू

एचटी मीडिया लिमिटेड (HT Media Limited) ने 3,87,87,137 वारंट आवंटित किए हैं। कंपनी के बोर्ड की शेयर अलॉटमेंट कमेटी ने 20 अगस्त 2026 को सर्कुलेशन के जरिए हुई बैठक में इस आवंटन को मंजूरी दी।

Vikas Saxena by
Published - Friday, 21 August, 2026
Last Modified:
Friday, 21 August, 2026
HTMedia6527

एचटी मीडिया लिमिटेड (HT Media Limited) ने 3,87,87,137 वारंट आवंटित किए हैं। कंपनी के बोर्ड की शेयर अलॉटमेंट कमेटी ने 20 अगस्त 2026 को सर्कुलेशन के जरिए हुई बैठक में इस आवंटन को मंजूरी दी। इन वारंट की इश्यू कीमत 24.57 रुपये प्रति वारंट तय की गई है।

कंपनी ने यह जानकारी BSE और NSE को भेजी गई सूचना में दी है। यह आवंटन 11 जुलाई 2026 को कंपनी की ओर से दी गई पिछली सूचना और 7 अगस्त 2026 को हुई असाधारण आम बैठक (EGM) में शेयरधारकों की मंजूरी के बाद किया गया है।

कंपनी को इस वारंट इश्यू के लिए BSE और NSE से इन-प्रिंसिपल अप्रूवल भी मिल चुका है।

कंपनी को मिले 23.82 करोड़ रुपये

HT Media ने बताया कि प्रस्तावित निवेशकों से वारंट की कुल कीमत का 25 फीसदी हिस्सा यानी 23,82,49,989.02 रुपये मिल चुका है। प्रेफरेंशियल इश्यू (Preferential Issue) के तहत कुल वारंट की कीमत करीब 95.30 करोड़ रुपये है।

हर वारंट की कीमत 24.57 रुपये है। इन वारंट के बदले कंपनी को अभी कुल रकम का 25 फीसदी हिस्सा मिला है, जबकि बाकी 75 फीसदी रकम बाद में वारंट को इक्विटी शेयर में बदलने के समय देनी होगी।

इन 6 निवेशकों को मिले वारंट

कंपनी ने कुल 3.88 करोड़ वारंट छह प्रस्तावित निवेशकों को आवंटित किए हैं। इनमें सबसे ज्यादा वारंट The Hindustan Times Limited को मिले हैं।

  • The Hindustan Times Limited: 1,34,31,013 वारंट
  • Tremis Consultancy LLP: 1,24,13,512 वारंट
  • Kiran Vyapar Limited: 71,22,507 वारंट
  • Zafar Ahmadullah: 40,70,004 वारंट
  • Zapfin Teknologies Private Limited: 4,07,000 वारंट
  • Peanence Commercial Private Limited: 13,43,101 वारंट

इन सभी वारंट की कुल कीमत 95,29,99,956.09 रुपये है, जिसमें से 25 फीसदी यानी 23,82,49,989.02 रुपये कंपनी को मिल चुके हैं।

एक वारंट पर मिलेगा एक इक्विटी शेयर

कंपनी के मुताबिक, हर वारंट धारक को एक वारंट के बदले HT Media का एक पूरी तरह चुकता इक्विटी शेयर लेने का अधिकार होगा। इस शेयर की फेस वैल्यू 2 रुपये है।

हालांकि, इसके लिए वारंट धारक को कुल वारंट कीमत की बाकी 75 फीसदी रकम का भुगतान करना होगा। यानी मौजूदा आवंटन के बाद भविष्य में इन वारंट को शेयरों में बदलने पर कंपनी की इक्विटी पूंजी में भी बढ़ोतरी हो सकती है।

HT Media ने बताया कि यह पूरा Preferential Issue SEBI के ICDR Regulations, 2018 के Chapter V के तहत किया गया है। कंपनी ने इस मामले में SEBI के Listing Obligations and Disclosure Requirements Regulations, 2015 के Regulation 30 के तहत स्टॉक एक्सचेंजों को जानकारी दी है।

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बड़े अखबार समूहों की कमाई में बड़ा बदलाव, अब करीब 25% रेवेन्यू नॉन-प्रिंट कारोबार से

देश के बड़े अखबार समूह अब प्रिंट से आगे बढ़कर डिजिटल, OOH विज्ञापन और इवेंट्स जैसे कारोबारों पर फोकस कर रहे हैं, जिसका असर उनकी कमाई में भी दिख रहा है।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 20 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 20 August, 2026
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देश के बड़े अखबार समूह अब सिर्फ अखबार बेचने और प्रिंट विज्ञापन पर निर्भर नहीं रहना चाहते। डिजिटल, आउटडोर विज्ञापन (OOH), इवेंट्स और दूसरे कारोबारों की ओर बढ़ते कदमों का असर अब उनकी कमाई में भी साफ दिखाई दे रहा है।

Crisil Ratings की एक स्टडी के मुताबिक, देश के बड़े अखबार समूहों की कुल कमाई में नॉन-प्रिंट कारोबार की हिस्सेदारी इस वित्त वर्ष करीब 25% तक पहुंचने की उम्मीद है, जो वित्त वर्ष 2019 में करीब 13% थी। यानी पिछले कुछ वर्षों में अखबार कंपनियों ने अपनी कमाई के स्रोतों में बड़ा बदलाव किया है।

प्रिंट से आगे बढ़ रहे हैं अखबार समूह

Crisil Ratings ने देश के पांच सबसे ज्यादा प्रसारित अखबारों को संचालित करने वाले बड़े अखबार समूहों का अध्ययन किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले सात वित्त वर्षों में इन कंपनियों के नॉन-प्रिंट कारोबार की हिस्सेदारी 11-13 प्रतिशत अंक बढ़ी है। इसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म, आउटडोर विज्ञापन, इवेंट मैनेजमेंट और दूसरे संबंधित कारोबार शामिल हैं।

इस बदलाव से साफ है कि अखबार कंपनियां अब केवल सर्कुलेशन बढ़ाने वाले पुराने मॉडल पर निर्भर रहने के बजाय अपने ब्रांड और बड़ी ऑडियंस का इस्तेमाल अलग-अलग तरह की कमाई के लिए कर रही हैं।

अखबारों की सर्कुलेशन में आई गिरावट

अखबार कंपनियों के लिए कारोबार में बदलाव की सबसे बड़ी वजह प्रिंट सर्कुलेशन में लगातार आ रही गिरावट है।

रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी अखबार कंपनियों का कुल सर्कुलेशन 2019 में करीब 1.5 करोड़ से घटकर 2025 में लगभग 1 करोड़ रह गया है। आने वाले समय में इसमें और गिरावट की आशंका है, क्योंकि युवा पाठक तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर जा रहे हैं।

इसका सीधा असर प्रिंट से होने वाली कमाई पर पड़ा है। पिछले सात वर्षों में प्रिंट से जुड़ी कमाई, जिसमें प्रिंट विज्ञापन भी शामिल है, में 1-2% की सालाना चक्रवृद्धि दर से गिरावट आई है।

नॉन-प्रिंट कारोबार तेजी से बढ़ेगा

Crisil Ratings के Senior Director और Deputy Chief Rating Officer Manish Gupta के मुताबिक, बड़े अखबार समूहों के लिए कारोबार में विविधता लाना अब विकल्प नहीं बल्कि जरूरत बन गया है।

उनके मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 से 2027 के बीच नॉन-प्रिंट कारोबार से होने वाली कमाई में 10-12% सालाना वृद्धि होने की उम्मीद है। इसके मुकाबले पारंपरिक प्रिंट कारोबार की वृद्धि सिर्फ 2-3% रहने का अनुमान है।

Gupta ने कहा कि बड़े मीडिया समूहों की मजबूत ब्रांड पहचान, देश के अलग-अलग क्षेत्रों में मजबूत पहुंच और प्रिंट, डिजिटल, रेडियो, इवेंट्स और आउटडोर मीडिया को एक साथ जोड़कर विज्ञापन समाधान देने की क्षमता नॉन-प्रिंट कारोबार को आगे बढ़ाने में मदद कर रही है।

डिजिटल कारोबार से बढ़ रही उम्मीद

नॉन-प्रिंट कारोबार बढ़ने से अखबार कंपनियों की कमाई के साथ-साथ मुनाफे पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक नॉन-प्रिंट कारोबार अभी भी पारंपरिक प्रिंट बिजनेस के मुकाबले कम मुनाफे वाला है।

इस वित्त वर्ष कंपनियों का मार्जिन करीब 12-13% पर स्थिर रहने की उम्मीद है। डिजिटल और उससे जुड़े कारोबार में बढ़ते पैमाने का फायदा कंपनियों को मिल रहा है।

आउटडोर विज्ञापन और इवेंट मैनेजमेंट में लागत ज्यादा होने और प्रतिस्पर्धा कड़ी होने के कारण मार्जिन पर दबाव रहता है। वहीं, डिजिटल कारोबार में शुरुआती निवेश का दौर धीरे-धीरे कम हो रहा है और कारोबार का पैमाना बढ़ने से EBITDA घाटे में सुधार देखने को मिल रहा है।

मजबूत बैलेंस शीट से मिल रहा सहारा

प्रिंट कारोबार में दबाव के बावजूद बड़े अखबार समूहों की वित्तीय स्थिति फिलहाल मजबूत बनी हुई है। इसकी वजह उनकी अपेक्षाकृत कम कर्ज वाली बैलेंस शीट, नेट कैश पोजिशन और बड़े लिक्विड निवेश हैं।

Crisil Ratings के Director Ankit Hakhu के मुताबिक, इन कंपनियों की क्रेडिट मजबूती अब सिर्फ प्रिंट कारोबार के प्रदर्शन पर निर्भर नहीं है, बल्कि उनकी मजबूत बैलेंस शीट भी अहम भूमिका निभा रही है।

उन्होंने बताया कि इन कंपनियों की नेटवर्थ का करीब 90% हिस्सा लिक्विड और निवेश वाली परिसंपत्तियों, जैसे वित्तीय संपत्तियों और कैश इक्विवेलेंट्स में है।

इन निवेशों से होने वाली आय और कम कर्ज का स्तर कंपनियों को नए कारोबारों में निवेश करने और उन्हें बड़ा करने के दौरान पुराने प्रिंट कारोबार से मिलने वाली कमाई में कमी की भरपाई करने में मदद कर सकता है।

डिजिटल से कमाई बढ़ाना अब बड़ी चुनौती

हालांकि, सेक्टर के सामने कुछ जोखिम भी बने हुए हैं। इनमें उम्मीद से ज्यादा तेजी से अखबारों के सर्कुलेशन में गिरावट, डिजिटल प्लेटफॉर्म से कमाई बढ़ाने में देरी और नॉन-प्रिंट कारोबार को तेजी से बड़े पैमाने पर पहुंचाने में आने वाली दिक्कतें शामिल हैं।

फिलहाल, डिजिटल, आउटडोर विज्ञापन और इवेंट जैसे कारोबारों से बढ़ती कमाई और मजबूत बैलेंस शीट देश के बड़े अखबार समूहों को प्रिंट बिजनेस पर लंबे समय से बने दबाव से निपटने में मदद कर रही है।

कुल मिलाकर, भारतीय अखबार उद्योग का कारोबार अब सिर्फ प्रिंट तक सीमित नहीं रह गया है। डिजिटल और दूसरे नॉन-प्रिंट कारोबार आने वाले वर्षों में मीडिया कंपनियों की कमाई और ग्रोथ की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

 

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न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों पर Emami का बयान, लागत बढ़ने का असर पूरी इंडस्ट्री पर

न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों के बीच देश के प्रमुख घरेलू निर्माताओं में से एक ने कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर उठ रहे सवालों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 19 August, 2026
Last Modified:
Wednesday, 19 August, 2026
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कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों को लेकर चल रही बहस में अब एक और पहलू जुड़ गया है। इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) ने घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के साथ-साथ आयातित न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत को लेकर चिंता जताई थी। इसके कुछ दिनों बाद भारत के प्रमुख घरेलू न्यूजप्रिंट निर्माताओं में से एक ने कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर उठ रहे सवालों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। कंपनी का कहना है कि घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में बदलाव लागत बढ़ने की वजह से हुआ है और यह पूरे इंडस्ट्री में देखने को मिल रही है।

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी के मुताबिक, भारतीय अखबार इंडस्ट्री हर साल करीब 13 लाख टन न्यूजप्रिंट इस्तेमाल करती है, जबकि देश में घरेलू उत्पादन करीब 5 लाख टन है। देश के प्रमुख घरेलू न्यूजप्रिंट उत्पादकों में ओडिशा की Emami Paper Mills, पंजाब की Khanna Paper Mills और सरकार के स्वामित्व वाली केरल की Hindustan Newsprint तथा मध्य प्रदेश की NEPA शामिल हैं।

एक्सचेंज4मीडिया ने सभी प्रमुख खिलाड़ियों और Indian Newsprint Manufacturers Association (INMA) से यह समझने के लिए संपर्क किया कि महंगाई का उन पर किस तरह असर पड़ रहा है। INMA के महासचिव विजय कुमार ने कहा, “एसोसिएशन बाजार की कीमतों पर नजर नहीं रखता है, इसलिए हम इस पर टिप्पणी नहीं कर पाएंगे।”

जहां दूसरे निर्माताओं ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, वहीं हर साल करीब 75,000 मीट्रिक टन (MT) न्यूजप्रिंट बनाने वाली Emami Paper Mills का कहना है कि कई तरह की कच्चे माल से जुड़ी और वित्तीय लागतें निर्माताओं पर दबाव डाल रही हैं।

Emami Paper Mills Ltd के होल टाइम डायरेक्टर व सीईओ एस. के. खेतान ने एक्सचेंज4मीडिया को बताया कि घरेलू न्यूजप्रिंट की मौजूदा कीमत करीब 58 से 62 रुपये प्रति किलो एक्स-मिल है। कीमत GSM, गुणवत्ता और स्थान के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। खेतान के मुताबिक, “घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतें अभी भी वित्त वर्ष 2022-23 में देखे गए स्तर से नीचे हैं, जबकि निर्माताओं को लागत से जुड़े कई तरह के दबावों का सामना करना पड़ रहा है।”

खेतान ने कहा, “कीमतों में यह बदलाव मुख्य रूप से लागत बढ़ने की वजह से है और पूरे इंडस्ट्री में देखने को मिल रहा है।”

उन्होंने चार प्रमुख दबावों की ओर इशारा किया। इनमें रुपये की कीमत में गिरावट, आयातित फाइबर और केमिकल की बढ़ती लागत, पूंजी की ऊंची लागत और खाड़ी क्षेत्र की स्थिति के कारण शिपिंग तथा लॉजिस्टिक्स खर्च में बढ़ोतरी शामिल है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पब्लिशर्स पहले से ही आयातित न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों, कमजोर रुपये और बढ़ी हुई माल ढुलाई लागत से परेशान हैं। दूसरी ओर, प्रतिस्पर्धी विज्ञापन बाजार के कारण पब्लिशर्स के लिए बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ पाठकों या बाजार पर डालना भी आसान नहीं है।

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) के प्रमुख विवेक गुप्ता ने इससे पहले e4m को बताया था कि मार्च से घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में 30-40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और इसके लिए “कोई वजह नहीं” बताई गई है। उन्होंने यह भी कहा था कि आयातित और घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतें लगातार एक-दूसरे के करीब आ रही हैं।

हालांकि, Emami ने इस व्यापक धारणा से असहमति जताई है कि घरेलू निर्माताओं ने वैश्विक बाजार में आई परेशानी का फायदा उठाकर केवल अपनी कीमतें बढ़ाई हैं।

पब्लिशर्स के लिए अलग-अलग लागत दबावों के बीच यह अंतर तत्काल असर को ज्यादा नहीं बदलता। न्यूजप्रिंट उनके सबसे बड़े ऑपरेशनल खर्चों में से एक है और इसकी खरीद लागत बढ़ने से कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ता है।

INS की ओर से किए गए प्रमुख दावों में से एक यह भी था कि घरेलू न्यूजप्रिंट को पहले जो कीमत का फायदा मिलता था, वह अब काफी कम हो गया है। INS के मुताबिक, घरेलू और आयातित न्यूजप्रिंट की कीमत करीब 65 से 68 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।

Emami की राय इससे अलग है। खेतान ने कहा कि घरेलू न्यूजप्रिंट अभी भी प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध है और यह हमेशा आयातित न्यूजप्रिंट से सस्ता रहता है। हालांकि, दोनों के बीच कीमत का अंतर वैश्विक न्यूजप्रिंट की कीमतों और मुद्रा में होने वाले बदलाव के आधार पर बदलता रहता है।

भारत में पर्याप्त उत्पादन क्षमता है: INMA

INMA के महासचिव कुमार का कहना है, “हमारे पास पूरी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त क्षमता है। चूंकि न्यूजप्रिंट का इस्तेमाल एक खास उद्देश्य के लिए होता है और इसे केवल वास्तविक उपयोगकर्ताओं को ही बेचा जाना है, इसलिए उत्पादन पूरी तरह उपभोक्ताओं से मिले वास्तविक और पक्के ऑर्डर के आधार पर किया जाता है।”

हालांकि, पब्लिशर्स का कहना है कि कीमतों की तुलना सिर्फ लागत के आधार पर नहीं की जा सकती। उनका कहना है कि देश में तैयार होने वाला न्यूजप्रिंट हर बार आयातित न्यूजप्रिंट की गुणवत्ता के बराबर नहीं होता, खासकर हाई-स्पीड अखबार प्रिंटिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले पेपर में।

इसी वजह से कई पब्लिकेशन प्रीमियम जरूरतों के लिए आयातित पेपर का इस्तेमाल करते हैं, जबकि घरेलू न्यूजप्रिंट का इस्तेमाल मुख्य रूप से अंदर के पन्नों के लिए किया जाता है। किसी पब्लिकेशन और उसकी पेपर जरूरतों के आधार पर घरेलू न्यूजप्रिंट किसी अखबार के कुल संस्करण में 30-40 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सा रख सकता है।

विवेक गुप्ता ने घरेलू बाजार में गुणवत्ता के मानकों को लेकर भी चिंता जताई है। उनका आरोप है कि कुछ घरेलू निर्माता कम गुणवत्ता वाले न्यूजप्रिंट को Grade 1 के रूप में बेचते हैं। इससे पब्लिशर्स के लिए वास्तविक कीमत और गुणवत्ता के अंतर को समझना मुश्किल हो जाता है।

हालांकि, e4m इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका है। घरेलू निर्माताओं ने भी इस व्यापक धारणा पर आपत्ति जताई है कि स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाला न्यूजप्रिंट स्वाभाविक रूप से घटिया गुणवत्ता का होता है।

गुणवत्ता को लेकर यह बहस नई नहीं है। INS पहले भी घरेलू और आयातित न्यूजप्रिंट के बीच अंतर की ओर इशारा कर चुका है। इसमें अलग-अलग ग्रेड और गुणवत्ता के अंतर की बात कही गई है। INS की हालिया वार्षिक रिपोर्ट में भी “गुणवत्ता से जुड़ी समस्याओं” और घरेलू बाजार में कुछ कम-GSM वाले उत्पादों की सीमित उपलब्धता का जिक्र किया गया है।

इसका नतीजा यह है कि बाजार में पब्लिशर्स और निर्माता एक ही कीमत में हुए बदलाव को अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। पब्लिशर्स के लिए घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में बढ़ोतरी ऐसे समय में एक अतिरिक्त बोझ है, जब आयातित न्यूजप्रिंट पहले से ही महंगा हो रहा है।

वहीं, घरेलू निर्माताओं का कहना है कि वे भी उसी महंगाई और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच काम कर रहे हैं और बढ़ती कच्चे माल तथा वित्तीय लागतों को हमेशा अपने ऊपर नहीं ले सकते।

क्या कीमतों में कमी आ सकती है?

जो पब्लिशर्स वैश्विक न्यूजप्रिंट संकट से कुछ राहत के लिए घरेलू बाजार की ओर देख रहे हैं, उनके लिए Emami की ओर से फिलहाल कोई स्पष्ट राहत नहीं मिली है।

जब खेतान से पूछा गया कि आने वाले महीनों में घरेलू न्यूजप्रिंट की कीमतों में कमी आ सकती है या नहीं, तो उन्होंने कहा कि इस समय भविष्य का अनुमान लगाना मुश्किल है।

उन्होंने कहा, “मौजूदा भू-राजनीतिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय बाजार की अनिश्चित परिस्थितियों को देखते हुए इस समय भविष्य में कीमतों में होने वाले बदलाव का अनुमान लगाना मुश्किल होगा।”

इस अनिश्चितता के कारण पब्लिशर्स के सामने एक मुश्किल स्थिति बनी हुई है। आयातित न्यूजप्रिंट की कीमतें मुद्रा, माल ढुलाई और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों से प्रभावित होती रहेंगी। घरेलू न्यूजप्रिंट कम लागत वाला विकल्प हो सकता है, लेकिन निर्माताओं का कहना है कि उन्हें भी कच्चे माल और वित्तीय लागत में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ रहा है।

ऐसे इंडस्ट्री के लिए, जो पहले से ही प्रतिस्पर्धी विज्ञापन बाजार में काम कर रहा है, अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया है कि घरेलू या आयातित न्यूजप्रिंट में से कौन सस्ता है। सवाल यह भी है कि कीमत और गुणवत्ता के बीच संतुलन क्या होगा और न्यूज पब्लिशर्स बढ़ी हुई लागत का कितना हिस्सा खुद वहन कर पाएंगे।

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सम्भाव मीडिया: AGM में दो प्रस्ताव पास, डायरेक्टर के पद पर जगदीश पावरा की दोबारा नियुक्ति

सम्भाव मीडिया (Sambhaav Media Limited) की 36वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) में कंपनी के शेयरधारकों ने रखे गए दोनों प्रस्तावों को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है।

Vikas Saxena by
Published - Saturday, 15 August, 2026
Last Modified:
Saturday, 15 August, 2026
Sambhaav8745

सम्भाव मीडिया की AGM में दोनों प्रस्तावों को शेयरधारकों की मंजूरी, 99.99% वोट पड़े पक्ष में

सम्भाव मीडिया (Sambhaav Media Limited) की 36वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) में कंपनी के शेयरधारकों ने रखे गए दोनों प्रस्तावों को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। AGM का आयोजन 13 अगस्त 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यमों के जरिए किया गया था।

कंपनी के मुताबिक, 6 अगस्त 2026 की कट-ऑफ डेट के आधार पर कुल 27,016 शेयरधारक वोटिंग के लिए पात्र थे। बैठक में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप के 7 और पब्लिक कैटेगरी के 30 शेयरधारकों ने हिस्सा लिया।

इन दोनों प्रस्तावों को मिली मंजूरी

पहला प्रस्ताव-

AGM में पहला प्रस्ताव कंपनी के 31 मार्च 2026 को समाप्त वित्त वर्ष के ऑडिटेड स्टैंडअलोन और कंसोलिडेटेड वित्तीय परिणामों को स्वीकार करने और मंजूर करने से जुड़ा था। इसमें बैलेंस शीट, प्रॉफिट एंड लॉस अकाउंट, कैश फ्लो स्टेटमेंट के साथ ऑडिटर्स और डायरेक्टर्स की रिपोर्ट को अपनाना शामिल था।

इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 11,92,59,567 वोट पड़े, जबकि विरोध में सिर्फ 17,072 वोट आए। इस तरह कुल वैध वोटों में करीब 99.99% वोट प्रस्ताव के पक्ष में रहे। प्रस्ताव को जरूरी बहुमत के साथ मंजूरी मिल गई।

दूसरा प्रस्ताव-

दूसरा प्रस्ताव जगदीश पावरा (DIN: 02203198) को डायरेक्टर के तौर पर दोबारा नियुक्त करने से संबंधित था। जगदीश पावरा कंपनी के उन डायरेक्टर्स में शामिल हैं, जो रोटेशन के आधार पर रिटायर हो रहे थे और दोबारा नियुक्ति के लिए पात्र थे।

इस प्रस्ताव को भी शेयरधारकों का जबरदस्त समर्थन मिला। इसके पक्ष में 11,92,59,567 वोट पड़े, जबकि 17,072 वोट इसके खिलाफ रहे। यानी करीब 99.99% वैध वोट प्रस्ताव के पक्ष में पड़े।

जगदीश पावरा गुजरात यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रॉनिक्स में डिप्लोमा इंजीनियर हैं। उन्हें कॉरपोरेट और टेक्निकल क्षेत्र में लंबे समय से काम करने का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत टेक्निकल फील्ड से की थी।

शुरुआत में उन्होंने इंस्टॉलेशन ऑफिसर के तौर पर काम किया, जहां वह टीवी ट्रांसमीटर, रेडियो एफएम ट्रांसमीटर, रेडियो स्टूडियो और टीवी स्टूडियो की स्थापना से जुड़े प्रोजेक्ट्स को संभालते थे। इसके अलावा उन्हें मीडिया से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए सरकारी विभागों से जरूरी मंजूरियां लेने, सोर्सिंग और लायजनिंग का भी अच्छा अनुभव है।

मीडिया इंडस्ट्री में उनकी अच्छी पकड़ है और उन्होंने अलग-अलग तरह की व्यावसायिक गतिविधियों में भी काम किया है। उन्हें भारत में टीवी चैनल और एफएम रेडियो चैनल स्थापित करने और ब्रॉडकास्टिंग मीडिया से जुड़े प्रोजेक्ट्स की अच्छी समझ है।

जगदीश पावरा कई कंपनियों के साथ निदेशक के तौर पर भी जुड़े हुए हैं। इनमें Ved Technoserve India Private Limited में Whole-Time Director, Ahmedabad Radio and Mast Services Private Limited और Neri Hydro Projects Private Limited शामिल हैं।

कुल 11.92 करोड़ से ज्यादा वोट पड़े

कंपनी की ओर से जारी वोटिंग डिटेल के मुताबिक, AGM में कुल 11,92,76,639 वोट पड़े। इनमें से 11,92,59,567 वोट पक्ष में और 17,072 वोट विरोध में थे। कुल वोटिंग प्रतिशत कंपनी के बकाया शेयरों के मुकाबले 62.41% रहा।

प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप के पास कुल 12,02,73,982 शेयर थे, जिनमें से 11,33,75,982 शेयरों के लिए वोटिंग हुई। प्रमोटर ग्रुप के सभी वोट प्रस्तावों के पक्ष में रहे।

पब्लिक नॉन-इंस्टीट्यूशनल शेयरधारकों की ओर से 59,00,657 वोट पड़े। इनमें 58,83,585 वोट प्रस्तावों के पक्ष में, जबकि 17,072 वोट विरोध में रहे। पब्लिक इंस्टीट्यूशनल शेयरधारकों की ओर से वोटिंग नहीं हुई।

स्क्रूटिनाइजर रिपोर्ट में भी प्रस्ताव पास

कंपनी के लिए स्क्रूटिनाइजर की भूमिका निभाने वाली Umesh Ved & Associates, Company Secretaries ने अपनी रिपोर्ट में भी दोनों प्रस्तावों को जरूरी बहुमत से पास घोषित किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, रिमोट ई-वोटिंग और AGM के दौरान की गई ई-वोटिंग के नतीजों को कंपनी के रिकॉर्ड और रजिस्ट्रार एवं ट्रांसफर एजेंट के रिकॉर्ड से मिलाकर देखा गया। वोटों को AGM खत्म होने के बाद अनब्लॉक किया गया।

स्क्रूटिनाइजर रिपोर्ट में कहा गया कि AGM के नोटिस में शामिल दोनों प्रस्ताव आवश्यक बहुमत के साथ पास हो गए हैं।

AGM में ऑनलाइन हुई वोटिंग

सम्भाव मीडिया की 36वीं AGM 13 अगस्त 2026 को सुबह 11:30 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग/अन्य ऑडियो-विजुअल माध्यमों से आयोजित हुई। शेयरधारकों के लिए रिमोट ई-वोटिंग की सुविधा 10 अगस्त 2026 सुबह 9 बजे से 12 अगस्त 2026 शाम 5 बजे तक उपलब्ध थी।

AGM के दौरान उन शेयरधारकों को भी ई-वोटिंग की सुविधा दी गई, जिन्होंने पहले रिमोट ई-वोटिंग के जरिए अपना वोट नहीं डाला था।

कुल मिलाकर, सम्भाव मीडिया के शेयरधारकों ने कंपनी के वित्तीय खातों को मंजूरी देने और जगदीश पावरा की डायरेक्टर के तौर पर दोबारा नियुक्ति, दोनों प्रस्तावों पर लगभग सर्वसम्मति से मुहर लगा दी।

 

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सुकुमार रंगनाथन : उत्कृष्टता से समझौता न करने वाले संपादक

हिंदुस्तान टाइम्स के एडिटर-इन-चीफ रहे सुकुमार रंगनाथन का नेतृत्व सिर्फ संपादकीय फैसलों तक सीमित नहीं रहा। उनकी सादगी, निष्पक्षता और उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता ने अलग पहचान बनाई।

Samachar4media Bureau by
Published - Friday, 14 August, 2026
Last Modified:
Friday, 14 August, 2026
sukumar

हिंदुस्तान टाइम्स (Hindustan Times) के एडिटर-इन-चीफ पद से सुकुमार रंगनाथन (Sukumar Ranganathan) के हटने की खबर ने मीडिया जगत में कई लोगों को चौंकाया है। हालांकि, उनके जाने का यह दौर उनके करीब से काम करने वाले लोगों के लिए उनके नेतृत्व, सोच और पत्रकारिता के मूल्यों को याद करने का अवसर भी है।

पिछले चार वर्षों से सुकुमार रंगनाथन ई4एम इंग्लिश जर्नलिज्म 40 अंडर 40 अवॉर्ड्स (e4m English Journalism 40 Under 40 Awards) की जूरी के अध्यक्ष रहे हैं। इस दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि यह सम्मान केवल हर साल 40 नाम पूरे करने की औपचारिक प्रक्रिया बनकर न रह जाए।

उनके नेतृत्व में जूरी ने हमेशा काम की गुणवत्ता को संख्या से ऊपर रखा। हर साल 40 पत्रकारों को सम्मान देने की परंपरा के बावजूद उन्हीं उम्मीदवारों का चयन किया गया, जिनका काम तय मानकों पर खरा उतरा। अब तक सबसे ज्यादा 26 पत्रकार चुने गए, जबकि इस साल यह संख्या सिर्फ 17 रही। यह अंतर अपने आप में बताता है कि सुकुमार के लिए सम्मान की विश्वसनीयता कितनी महत्वपूर्ण थी।

जूरी की जिम्मेदारी को वह बेहद गंभीरता से लेते थे। हर उम्मीदवार की प्रोफाइल और उसके काम को ध्यान से पढ़ना, जरूरी बातें नोट करना और बैठकों में उनसे जुड़े छोटे-छोटे पहलुओं को याद रखना उनकी कार्यशैली का हिस्सा था। कई बार चयन प्रक्रिया महीनों तक चलती थी, लेकिन अगली बैठक में भी उन्हें पिछली चर्चाओं, सवालों और तर्कों की पूरी जानकारी रहती थी।

उनकी खासियत सिर्फ पेशेवर गंभीरता तक सीमित नहीं थी। इतने बड़े पद पर रहने के बावजूद उनकी सादगी और विनम्रता हमेशा लोगों के बीच चर्चा का विषय रही। व्यस्त कार्यक्रम हो या किसी आयोजन में देरी, उन्होंने कभी अपने पद या कद को सामने नहीं रखा। वह सहजता और धैर्य के साथ लोगों से मिलते और बातचीत करते रहे।

हिंदुस्तान टाइम्स में उनका कार्यकाल संपादकीय दृष्टि, संस्थान निर्माण और पत्रकारिता में बौद्धिक कठोरता के लिए याद किया जाएगा। उनका प्रभाव केवल उन खबरों और संपादकीय फैसलों तक सीमित नहीं रहेगा, जिनका उन्होंने नेतृत्व किया, बल्कि उस कार्यसंस्कृति में भी दिखाई देगा, जिसे उन्होंने अपने आसपास विकसित किया।

सुकुमार रंगनाथन की पत्रकारिता की सबसे बड़ी पहचान शायद यही रही कि उन्होंने उत्कृष्टता को केवल एक शब्द नहीं माना। उन्होंने अपने काम और फैसलों के जरिए यह दिखाया कि पत्रकारिता में विश्वसनीयता, ईमानदारी, विनम्रता और गुणवत्ता से समझौता किए बिना भी नेतृत्व किया जा सकता है।

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INS की 15% विज्ञापन सरचार्ज की सलाह पर पब्लिशर्स हिचकिचाए, अभी तक लागू नहीं की बढ़ी दरें

न्यूजपेपर इंडस्ट्री ने भले ही विज्ञापन दरें बढ़ाने की जरूरत पर एकजुट होकर अपनी बात रखी हो, लेकिन जब वास्तव में विज्ञापनदाताओं से ज्यादा पैसा लेने की बात आई है, तो पब्लिशर्स काफी सावधानी बरत रहे हैं।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 13 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 13 August, 2026
Newspaper6524

कंचन श्रीवास्तव, सीनियर एडिटर, एक्सचेंज4मीडिया ।।

भारत की न्यूजपेपर इंडस्ट्री ने भले ही विज्ञापन दरें बढ़ाने की जरूरत पर एकजुट होकर अपनी बात रखी हो, लेकिन जब वास्तव में विज्ञापनदाताओं से ज्यादा पैसा लेने की बात आई है, तो पब्लिशर्स काफी सावधानी बरत रहे हैं।

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) ने 22 जुलाई को अपने सदस्यों को 1 अगस्त से विज्ञापनों पर 15% सरचार्ज लगाने की सलाह दी थी। इसके 12 दिन से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी ज्यादातर बड़े अंग्रेजी, हिंदी और रीजनल पब्लिशर्स ने इसे लागू नहीं किया है। यह हिचकिचाहट प्रिंट मीडिया के सामने मौजूद एक पुराने संकट को दिखाती है। बढ़ती लागत से मुनाफे पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन प्रतिस्पर्धी विज्ञापन मार्केट में दरें बढ़ाने से पब्लिशर्स को वही कारोबार खोने का डर है, जिसे वे बचाना चाहते हैं।

INS ने यह सलाह 22 जुलाई को जारी की थी। इससे पहले 17 जुलाई को हुई उसकी एग्जिक्यूटिव कमेटी की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी। INS ने घरेलू और आयातित न्यूजप्रिंट की कीमतों में तेज बढ़ोतरी और लगातार बढ़ते ऑपरेशनल खर्च का हवाला दिया था। इस सिफारिश का मकसद पब्लिशर्स को मिलकर अपनी बढ़ी हुई लागत का कम से कम कुछ हिस्सा विज्ञापनदाताओं तक पहुंचाने का एक तरीका देना था।

लेकिन मार्केट में इसका असर सीमित ही दिखाई दिया है। एक वरिष्ठ पब्लिशिंग एग्जिक्यूटिव ने कहा, “मार्केट की स्थिति मुश्किल है, प्रतिस्पर्धा बहुत ज्यादा है और विज्ञापनदाताओं की ओर से दबाव भी है। इसलिए हमने कुछ और समय तक इसे लागू नहीं करने का फैसला किया है।” यह बयान बताता है कि पब्लिशर्स ऐसे समय में दरें बढ़ाने से क्यों बच रहे हैं, जब विज्ञापन से मिलने वाले हर अतिरिक्त रुपये के लिए भी कड़ी प्रतिस्पर्धा है।

'एक्सचेंज4मीडिया' ने सभी प्रमुख अंग्रेजी और हिंदी प्रकाशनों से संपर्क किया। ऑफ द रिकॉर्ड उन्होंने माना कि उन्होंने अभी तक इसे लागू नहीं किया है।

'द हिंदू' ने भी अभी तक सरचार्ज लागू नहीं किया है। चेन्नई स्थित इस ग्रुप के चीफ रेवेन्यू ऑफिसर सुंदर कोंडूर ने इसकी पुष्टि की।

'मातृभूमि' के मैनेजिंग डायरेक्टर एमवी श्रेयम्स कुमार ने कहा कि ग्रुप ने अब तक सरचार्ज लागू नहीं किया है। उन्होंने बताया कि केरल में भी अखबारों ने बड़े पैमाने पर इसे लागू करने से फिलहाल दूरी बनाए रखी है।

एक प्रमुख मैगजीन पब्लिकेशन के एमडी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यह सरचार्ज मैगजीन के मुकाबले अखबारों के लिए ज्यादा प्रासंगिक है, क्योंकि दोनों के लागत ढांचे और मार्केट की स्थिति अलग-अलग है।

INS के प्रेजिडेंट विवेक गुप्ता ने बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद कोई जवाब नहीं दिया। 

त्योहारी सीजन ने बढ़ाई मुश्किल

रीजनल पब्लिशर्स के लिए इस समय को लेकर एक और चुनौती सामने आई है। पब्लिशर्स का कहना है कि ओणम (16-26 अगस्त), जो केरल के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है, ने इस समय को और संवेदनशील बना दिया है।

ओणम भारत में त्योहारी सीजन की शुरुआत का संकेत माना जाता है। इसके बाद रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, नवरात्र और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आते हैं। यह समय रीजनल मीडिया के लिए विज्ञापन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान रिटेल, ऑटो, ज्वेलरी, FMCG, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और स्थानीय कारोबारों से जुड़े विज्ञापनदाता अपनी मौजूदगी बढ़ाते हैं।

एक प्रमुख पब्लिशर ने कहा, “ज्यादातर विज्ञापनदाता त्योहारी सीजन के दौरान भारी डिस्काउंट चाहते हैं। यह लंबे समय से चली आ रही परंपरा है। ऐसे समय में हम रेट बढ़ाने की मांग करने की स्थिति में नहीं हैं, भले ही मौजूदा हालात इसकी जरूरत बता रहे हों।”

पब्लिशर्स के सामने जोखिम साफ है। 15% की बढ़ोतरी से हर विज्ञापन से होने वाली कमाई बढ़ सकती है, लेकिन इससे बातचीत, ज्यादा डिस्काउंट की मांग या विज्ञापन बजट को दूसरी जगह ले जाने की स्थिति भी बन सकती है। और यह ठीक उसी समय हो सकता है जब पब्लिशर्स विज्ञापन की मात्रा बढ़ाना चाहते हैं।

INS की सिफारिश पर अलग-अलग पब्लिशर्स का अलग-अलग रुख एक बड़ी समस्या को सामने लाता है। लागत का दबाव सभी पर समान है, लेकिन सभी पब्लिशर्स के पास विज्ञापन दरें बढ़ाने की एक जैसी क्षमता नहीं है।

मार्केट कुछ और संकेत दे रहा है

पब्लिशर्स की हिचकिचाहट यह भी दिखाती है कि ज्यादा कमाई की उनकी जरूरत और मार्केट की ज्यादा कीमत चुकाने की इच्छा के बीच कितना बड़ा अंतर है।

पब्लिशर्स कई सालों से यह कहते रहे हैं कि विज्ञापन दरें न्यूजप्रिंट, प्रिंटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन की बढ़ती लागत के हिसाब से नहीं बढ़ी हैं। लेकिन जब भी किसी पब्लिशर ने अकेले विज्ञापन दरें बढ़ाने की कोशिश की है, उसे अक्सर विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों के विरोध का सामना करना पड़ा है। INS की सलाह इसी लंबे समय से चली आ रही समस्या के लिए पब्लिशर्स को एक साथ लाने की कोशिश थी।

लेकिन एक साथ इरादा जाहिर करने का मतलब यह नहीं है कि सभी के पास कीमत बढ़ाने की ताकत भी एक जैसी हो। एक प्रमुख FMCG कंपनी के CMO ने कहा, “अखबार और टीवी मीडिया स्पेस की खरीद-बिक्री डिमांड और सप्लाई के आधार पर होती है। यहां दरें मार्केट तय करता है, पब्लिशर्स की संस्था नहीं।”

मार्केटर्स का कहना है कि विज्ञापन की दरें पाठकों की संख्या, सर्कुलेशन, मार्केट में स्थिति, उपलब्ध इन्वेंट्री, किसी कैटेगरी की मांग और विज्ञापनदाता के साथ रिश्ते जैसे कई फैक्टर के आधार पर तय होती हैं। किसी राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक, बड़े हिंदी अखबार और किसी रीजनल प्रकाशन के पास 15% की बढ़ोतरी को विज्ञापनदाताओं पर डालने की समान क्षमता जरूरी नहीं है। INS की सलाह सामने आने के बाद विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों की ओर से यह एक प्रमुख चिंता थी।

एक विज्ञापन एग्जिक्यूटिव ने कहा, “अगर कोई पब्लिकेशन अपनी ऑडियंस की क्वालिटी, रीडरशिप, कंटेंट और असर के आधार पर ज्यादा कीमत को सही साबित कर सकता है, तो मीडिया बायर्स उसके लिए भुगतान करेंगे। लेकिन कीमत तय करना आदर्श रूप से खरीदार और विक्रेता के बीच का फैसला होना चाहिए, न कि किसी तीसरे पक्ष की ओर से तय किया जाना चाहिए।”

इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) की गैरमौजूदगी ने इस पूरी बातचीत को और मुश्किल बना दिया है। पिछले IRS को करीब सात साल हो चुके हैं। इसके बावजूद विज्ञापनदाताओं के पास ऐसा कोई सर्वमान्य रीडरशिप करेंसी नहीं है, जिसके आधार पर अलग-अलग प्रकाशनों की ऑडियंस के आकार, क्वालिटी और अतिरिक्त पहुंच की तुलना की जा सके। डाबर इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट, हेड ऑफ मीडिया और हेड ऑफ ब्रांड एक्टिवेशंस राजीव दुबे ने भी कहा है कि इससे प्रिंट मीडिया के लिए ज्यादा दरों को सही ठहराना मुश्किल होता है।

हालांकि पब्लिशर्स का इसके उलट तर्क है कि उनकी कारोबारी वैल्यू को सिर्फ एक रीडरशिप नंबर से नहीं आंका जा सकता। पाठकों का भरोसा, एडिटोरियल प्रभाव, प्रीमियम माहौल और बड़े आयोजनों या महत्वपूर्ण घटनाओं के आसपास प्रभाव पैदा करने की क्षमता भी उनकी वैल्यू का हिस्सा है।

INS के प्रेजिडेंट विवेक गुप्ता ने भी इन्हीं आधारों पर सरचार्ज का बचाव किया है। इससे पहले एक्सचेंज4मीडिया के साथ बातचीत में उन्होंने 15% सरचार्ज को स्थायी बढ़ोतरी के बजाय एक अस्थायी उपाय बताया था। उनका तर्क था कि जब अलग-अलग सेक्टर की कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल रही हैं, तो अखबारों से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वे महंगाई से बढ़ी लागत को खुद ही वहन करते रहें।

विवेक गुप्ता ने कहा था, “अगर युद्ध और दूसरी ऐसी परिस्थितियां, जिन्होंने हमें इस स्थिति में पहुंचाया है, सामान्य हो जाती हैं और कीमतें नीचे आती हैं, तो हम सरचार्ज को हटा सकते हैं। यह स्थायी सरचार्ज नहीं है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि INS पब्लिशर्स के लिए एक फैसिलिटेटर और गाइड के रूप में काम कर रही है, न कि उनकी कीमतें तय कर रही है।

 

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जागरण प्रकाशन: चार पूर्णकालिक निदेशकों की होगी पुनर्नियुक्ति, शेयरहोल्डर्स की मंजूरी जरूरी

जागरण प्रकाशन लिमिटेड के बोर्ड ने कंपनी के चार पूर्णकालिक निदेशकों को एक बार फिर पांच साल के लिए नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है।

Vikas Saxena by
Published - Thursday, 13 August, 2026
Last Modified:
Thursday, 13 August, 2026
JagranPrakashan5421

जागरण प्रकाशन लिमिटेड के बोर्ड ने कंपनी के चार पूर्णकालिक निदेशकों को एक बार फिर पांच साल के लिए नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है। बोर्ड की 12 अगस्त 2026 को हुई बैठक में धीरेंद्र मोहन गुप्ता, सुनील गुप्ता, संजय गुप्ता और शैलेश गुप्ता की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। हालांकि, इन नियुक्तियों के लिए अब शेयरहोल्डर्स की मंजूरी जरूरी होगी।

इन चारों की मौजूदा अवधि 30 सितंबर 2026 को खत्म हो रही है। प्रस्तावित पुनर्नियुक्ति 1 अक्टूबर 2026 से अगले पांच साल के लिए होगी।

धीरेंद्र मोहन गुप्ता को 60 साल से ज्यादा का प्रिंट मीडिया अनुभव

धीरेंद्र मोहन गुप्ता की उम्र 82 साल है और उनके पास प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में 60 साल से ज्यादा का अनुभव है। उन्होंने बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की है। वह महेंद्र मोहन गुप्ता, देवेंद्र मोहन गुप्ता और शैलेंद्र मोहन गुप्ता के भाई हैं।

सुनील गुप्ता 64 साल के हैं। उन्होंने कॉमर्स में बैचलर और मास्टर डिग्री हासिल की है। उनके पास प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में 45 साल से ज्यादा का अनुभव है।

संजय गुप्ता और शैलेश गुप्ता की भी होगी पुनर्नियुक्ति

संजय गुप्ता की उम्र 63 साल है और उन्होंने साइंस में बैचलर डिग्री हासिल की है। उनके पास प्रिंट मीडिया क्षेत्र में 45 साल से ज्यादा का अनुभव है। वह संदीप गुप्ता के भाई हैं।

वहीं, शैलेश गुप्ता 57 साल के हैं और उनके पास कॉमर्स में बैचलर की डिग्री है। उन्हें प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में 35 साल से ज्यादा का अनुभव है। वह महेंद्र मोहन गुप्ता के बेटे हैं।

1 अक्टूबर से शुरू होगा नया कार्यकाल

कंपनी के मुताबिक, चारों पूर्णकालिक निदेशकों की नई पांच साल की अवधि 1 अक्टूबर 2026 से शुरू होगी। यह फैसला कंपनी की नामांकन और पारिश्रमिक समिति व ऑडिट समिति की सिफारिश के आधार पर लिया गया है।

हालांकि, अंतिम नियुक्ति के लिए कंपनी के शेयरहोल्डर्स की मंजूरी लेना जरूरी होगा।

करीब 2 घंटे में खत्म हुई बोर्ड मीटिंग

जागरण प्रकाशन के बोर्ड की बैठक 12 अगस्त को दोपहर 2:30 बजे शुरू हुई और 3:35 बजे खत्म हुई। बैठक में चारों पूर्णकालिक निदेशकों की पुनर्नियुक्ति के अलावा कंपनी से जुड़े अन्य मामलों पर भी विचार किया गया।

इस फैसले से कंपनी के शीर्ष प्रबंधन में मौजूदा नेतृत्व की निरंतरता बनी रहने की उम्मीद है, खासकर ऐसे समय में जब प्रिंट मीडिया कंपनियां डिजिटल विस्तार और बदलते मीडिया कारोबार के बीच अपनी रणनीति को लगातार मजबूत कर रही हैं।

 

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