OTT का बढ़ता खर्च: क्या दर्शक अब सब्सक्रिप्शंस से बनाने लगा है दूरी?

भारतीय दर्शक अब एक नई तरह की थकान महसूस कर रहा है। इंडस्ट्री की भाषा में इसे “Subscrption Fatigue” कहा जाता है, यानी OTT खर्चों से थकता दर्शक।

Vikas Saxena by
Published - Thursday, 17 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
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मान लीजिए आप एक सामान्य शहरी परिवार हैं। महीने के अंत में बिजली का बिल, किराया और राशन जैसे जरूरी खर्चों के साथ अब एक नई जिम्मेदारी भी जुड़ गई है- OTT सब्सक्रिप्शंस। Netflix, Amazon Prime Video, JioHotstar, Sony LIV, Zee5 जैसे प्लेटफॉर्म्स, और अगर घर में क्रिकेट देखने वाले हैं तो अलग से स्पोर्ट्स पैक। ऐसे में यह खर्च आसानी से ₹1,500 प्रति महीने के पार पहुंच जाता है।

कोरोना काल के दौरान OTT प्लेटफॉर्म्स भारत में मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम बनकर उभरे। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। हर प्लेटफॉर्म अलग सब्सक्रिप्शन मांग रहा है, हर बड़ा कंटेंट किसी एक ही ऐप पर “एक्सक्लूसिव” हो गया है और हर साल कीमतें भी बढ़ रही हैं। इसका असर यह है कि भारतीय दर्शक अब एक नई तरह की थकान महसूस कर रहा है। इंडस्ट्री की भाषा में इसे “Subscrption Fatigue” कहा जाता है, यानी OTT खर्चों से थकता दर्शक।

पहले एक बिल था, अब एक दर्जन ऐप्स

केबल टीवी के दौर में मामला काफी आसान था- एक DTH कनेक्शन, एक मंथली रिचार्ज और सैकड़ों चैनल्स। लेकिन OTT के दौर में यह पूरा फॉर्मूला बदल गया है। अब हर प्लेटफॉर्म का अपना कंटेंट किला है और अपनी अलग दीवारें हैं।

Ormax Media की ताजा रिपोर्ट (2025) के मुताबिक भारत में OTT दर्शकों की संख्या 60.12 करोड़ तक पहुंच चुकी है। यानी देश की 41% आबादी किसी न किसी रूप में ऑनलाइन वीडियो देखती है। इनमें से पेड सब्सक्रिप्शंस की संख्या 14.82 करोड़ है। भारत का OTT मार्केट 2025 में $5.4 बिलियन का हो चुका है और 2034 तक इसके $28.1 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।

हालांकि इन चमकदार आंकड़ों के पीछे एक असुविधाजनक सच भी छिपा है। भारतीय दर्शक अब प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती संख्या और लगातार बढ़ती कीमतों से ऊबने लगा है। 

Subscrption Fatigue क्या है?

Subscrption Fatigue वह मनोवैज्ञानिक थकान है, जो तब पैदा होती है जब दर्शकों को लगने लगता है कि OTT प्लेटफॉर्म्स की संख्या जरूरत से ज्यादा हो गई है। लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि कौन-सा कंटेंट किस प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।

इसके साथ ही हर प्लेटफॉर्म अलग से पेमेंट मांग रहा है। किसी एक शो के लिए एक ऐप, तो दूसरी फिल्म के लिए दूसरा ऐप लेना पड़ता है। कंटेंट पूरी तरह बिखर गया है- एक शो यहां, दूसरा वहां।

दर्शकों की परेशानी सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। हर महीने OTT पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन कई लोगों को उसके मुकाबले उतनी “वैल्यू” महसूस नहीं होती। यही वजह है कि लोग अब OTT सब्सक्रिप्शंस से थकान महसूस करने लगे हैं।

यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। अमेरिका जैसे मैच्योर OTT मार्केट्स में भी लोग अब अपने सब्सक्रिप्शंस को रोटेट करने लगे हैं। यानी एक महीने Netflix लिया, अगले महीने Disney+, फिर जरूरत खत्म होने पर कैंसल कर दिया। भारत में भी यही पैटर्न धीरे-धीरे उभरता दिखाई दे रहा है।

भारतीय घर का मंथली OTT बिल: असली हिसाब

आइए एक सामान्य शहरी परिवार का हिसाब देखते हैं, जो सभी मुख्य OTT प्लेटफॉर्म्स सब्सक्राइब करती है:

प्लेटफॉर्म

प्लान (2026)

Netflix (Standard)

₹499/माह

Amazon Prime Video

₹299/माह

JioHotstar (Premium)

₹299/माह

Sony LIV (Premium monthly)

₹399/माह

Zee5 (All Languages + KidZ)

₹299/माह

कुल मासिक खर्च (approx.)

~₹1,795/माह

यानी सिर्फ इन पांच OTT प्लेटफॉर्म्स पर ही अगर सालाना पैकेज लिया जाए, तो दर्शकों का खर्च लगभग ₹8,000 से ₹10,000 तक पहुंच जाता है। इसमें अगर Crunchyroll (anime), Lionsgate Play या कोई रीजनल OTT प्लेटफॉर्म भी जोड़ दिया जाए, तो यह खर्च और ज्यादा बढ़ जाता है।

MiQ की Advanced TV Report India के अनुसार भारतीय दर्शक औसतन 3 स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स subscribe करते हैं और इस पर करीब ₹1,360 प्रति माह खर्च करते हैं। यह आंकड़ा भारत के मध्यम वर्ग के लिए किसी बड़े बोझ से कम नहीं है, क्योंकि जरूरी खर्चों के बाद बचने वाली कमाई पर पहले से ही कई जिम्मेदारियां होती हैं।

Netflix ने मार्च 2026 में अमेरिका में अपने प्लान्स की कीमत एक बार फिर बढ़ाई। पिछले 6 साल में यह 5वीं बार है, जब कंपनी ने कीमतों में इजाफा किया है। हालांकि भारत में Netflix के प्लान्स फिलहाल नहीं बदले गए हैं- Mobile ₹149, Standard ₹499 और Premium ₹649- लेकिन पिछले ट्रेंड बताते हैं कि अमेरिका में कीमतें बढ़ने के 6-12 महीने बाद उसका असर भारत में भी देखने को मिलता है।

वहीं, JioHotstar ने जनवरी 2026 से अपने प्रीमियम सालाना प्लान की कीमत ₹1,499 से बढ़ाकर ₹2,199 कर दी। यानी इसमें करीब 47% की बढ़ोतरी हुई है।

Amazon Prime Video ने June 2025 से अपने स्टैंडर्ड प्लान में विज्ञापन दिखाने शुरू कर दिए हैं। अब विज्ञापन मुक्त कंटेंट देखने के लिए यूजर्स को ₹699 प्रति वर्ष या ₹129 प्रति माह अलग से चुकाने पड़ रहे हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या कीमत को लेकर संवेदनशील भारतीय बाजार यह बढ़ता OTT खर्च लंबे समय तक झेल पाएगा?

Telecom Bundling: थकान का अस्थायी इलाज

OTT इंडस्ट्री की असली लाइफलाइन फिलहाल Telecom Bundling बनती जा रही है।

Reliance Jio का ₹749 वाला पोस्टपेड प्लान Netflix Basic, Amazon Prime Lite और JioHotstar तीनों का एक्सेस एक साथ देता है। वहीं Airtel के Xstream bundles में भी कई OTT सर्विसेज शामिल हैं। यानी बड़ी संख्या में यूजर्स को OTT का डायरेक्ट बिल अलग से नहीं भरना पड़ता, क्योंकि उसका खर्च उनके मोबाइल रिचार्ज में ही जुड़ा होता है।

यह मॉडल इसलिए कारगर माना जा रहा है, क्योंकि इसमें यूज़र्स को अलग-अलग पेमेंट करने का झंझट नहीं रहता। साथ ही टेलीकॉम कंपनियों की सब्सक्राइबर रिटेंशन बेहतर होती है और OTT प्लेटफॉर्म्स को एक भरोसेमंद सब्सक्राइबर बेस मिल जाता है।

हालांकि यह समाधान पूरी तरह परफेक्ट नहीं है। Bundled प्लान्स में अक्सर सिर्फ बेसिक टियर ही मिलता है। HD या 4K क्वॉलिटी और प्रीमियम प्लान्स के लिए यूज़र्स को अलग से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इसके अलावा जैसे-जैसे टेलीकॉम प्लान्स महंगे हो रहे हैं, वैसे-वैसे यह “फ्री” OTT भी लोगों को महंगा पड़ने लगा है।

पॉसवर्ड शेयरिंग: OTT का साइलेंट क्राइसेस

भारत में एक OTT सब्सक्रिप्शन को घर के कई लोग, दोस्त और रिश्तेदार मिलकर इस्तेमाल करते हैं। यह कोई सिक्रेट नहीं, बल्कि एक आम सामाजिक प्रैक्टिस बन चुकी है।

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर OTT प्लेटफॉर्म्स पॉसवर्ड शेयरिंग को प्रभावी तरीके से रोक दें, तो वे अपने पेड सब्सक्राइबर बेस को दोगुना तक बढ़ा सकते हैं।

Netflix ने पॉसवर्ड शेयरिंग रोकने के लिए दुनियाभर में सख्ती शुरू की थी। इसका फायदा कंपनी को तुरंत मिला। सिर्फ Q2 2023 में ही Netflix को 59 लाख नए सब्सक्राइबर्स मिले, जबकि इससे एक साल पहले इसी तिमाही में कंपनी ने 10 लाख सब्सक्राइबर्स खो दिए थे।

लेकिन भारत में यह तरीका उतना आसान नहीं है। यहां सबसे बड़ी समस्या एफोर्डबिलिटी (affordability) यानी लोगों की खर्च करने की क्षमता है। अगर कोई परिवार अब तक एक ही Netflix अकाउंट मिल-बांटकर चला रहा था और अब सभी को अलग सब्सक्रिप्शन लेना पड़े, तो कई लोग सीधा कहेंगे- “Netflix बंद कर दो।”

इसी वजह से भारत में पॉसवर्ड शेयरिंग को पायरेसी का एक “सॉफ्ट वर्जन” माना जाने लगा है। लोग पैसे कम खर्च करना चाहते हैं, लेकिन अपने पसंदीदा कंटेंट को छोड़ना भी नहीं चाहते।

 Ad-Supported OTT: फ्री का जादू वापस आ रहा है

OTT इंडस्ट्री इस समय एक बड़ा U-turn लेती दिखाई दे रही है। जिन प्लेटफॉर्म्स ने शुरुआत में सिर्फ सब्सक्रिप्शन मॉडल के दम पर अपनी पहचान बनाई थी, वे अब तेजी से ऐडवर्टाइजिंग की तरफ लौट रहे हैं।

SVOD यानी Subscription Video On Demand- यह Netflix-style पेड मॉडल है, जहां दर्शकों को कंटेंट देखने के लिए हर महीने या सालाना शुल्क देना पड़ता है। वहीं AVOD यानी ऐडवर्टाइजिंग Video On Demand- YouTube-style मॉडल है, जिसमें कंटेंट मुफ्त होता है, लेकिन बीच-बीच में विज्ञापन दिखाए जाते हैं।

अब OTT इंडस्ट्री का झुकाव तेजी से AVOD मॉडल की तरफ बढ़ रहा है।

Amazon Prime Video ने जून 2025 में अपने स्टैंडर्ड प्लान को AVOD मॉडल में बदल दिया। इसका मतलब यह है कि अब रेगुलर प्राइम मेंबर्स को भी कंटेंट देखते समय विज्ञापन दिखाई देते हैं। अगर कोई यूज़र विज्ञापन-मुक्त अनुभव चाहता है, तो उसे इसके लिए अलग से पैसे देने पड़ते हैं।

वहीं Netflix का ad-supported tier भी तेजी से नए सब्सक्राइबर्स जोड़ रहा है। FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के मुताबिक AVOD अब OTT रेवेन्यू ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन बनता जा रहा है और इसकी रफ्तार SVOD मॉडल से भी ज्यादा तेज है।

इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत मूल रूप से फ्री कंटेंट का बाजार माना जाता है। YouTube, MX Player और JioCinema के फ्री cricket स्ट्रीमिंग एक्सपेरिमेंट्स ने यह बात साफ कर दी है।

IPL 2023 में जब JioCinema ने फ्री स्ट्रीमिंग शुरू की, तो टूर्नामेंट के पहले 17 मैचेस में ही 550 करोड़ cumulative video views दर्ज किए गए। वहीं फाइनल मुकाबले के दौरान एक साथ 3.2 करोड़ concurrent व्युअर्स जुड़े, जो एक नया वर्ल्ड रिकॉर्ड था। यह वह स्केल है, जहां तक किसी भी पेड OTT प्लेटफॉर्म का पहुंचना बेहद मुश्किल माना जाता है।

इसी वजह से माना जा रहा है कि भारत में सिर्फ पैसे देकर चलने वाला OTT मॉडल लंबे समय तक टिक नहीं पाएगा।

Sports राइट्स: सबसे बड़ी Fragmentation की जड़

आज OTT की दुनिया में दर्शकों को अपनी पसंद के कंटेंट के हिसाब से अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स का सब्सक्रिप्शन लेना पड़ रहा है।

अगर आप क्रिकेट फैन हैं, तो JioHotstar जरूरी है, क्योंकि IPL राइट्स उसी के पास हैं। अगर आप फुटबॉल देखना पसंद करते हैं, तो उसके लिए अलग प्लेटफॉर्म चाहिए। WWE देखने वालों को Sony LIV लेना पड़ता है। Anime पसंद करने वाले दर्शकों के लिए Crunchyroll जरूरी हो जाता है। वहीं Hollywood का लेटेस्ट कंटेंट देखने के लिए Netflix या Prime का सहारा लेना पड़ता है।

यानी अब दर्शकों को कंटेंट के हिसाब से अलग-अलग OTT सब्सक्रिप्शंस लेने पड़ रहे हैं।

केबल टीवी के दौर में स्थिति काफी अलग थी। उस समय “one pack, many channels” का मॉडल चलता था। लेकिन OTT के दौर में अब “many ऐप्स, many bills” नई रियलटी बनती जा रही है।

स्पोर्ट्स राइट्स को लेकर प्लेटफॉर्म्स के बीच होड़ ने यह समस्या और बढ़ा दी है। अब लगभग हर बड़ी स्पोर्ट्स लीग किसी एक OTT प्लेटफॉर्म पर ही देखने को मिलती है। ऐसे में दर्शकों के पास दो ही रास्ते बचते हैं- या तो उस प्लेटफॉर्म का सब्सक्रिप्शन लें, या फिर अपना पसंदीदा मैच और कंटेंट छोड़ दें।

रीजनल OTT: दिल जीता, जेब नहीं

Regional OTT: दिल जीता, जेब नहीं

भारत कई भाषाओं वाला देश है और रीजनल OTT प्लेटफॉर्म्स ने इस बात को अच्छी तरह समझा है।

Hoichoi (बंगाली), ManoramaMAX (मलयालम), Sun NXT (तमिल, तेलुगु) और Chaupal (पंजाबी) जैसे प्लेटफॉर्म्स ने अपनी-अपनी भाषाओं के दर्शकों के बीच मजबूत पहचान बनाई है।

Market Research Future के मुताबिक 2025 में रीजनल language content में 40% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह trend साफ दिखाता है कि दर्शक अपनी भाषा में कंटेंट देखना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

लेकिन यहां भी सबसे बड़ी समस्या वही है- हर रीजनल ऐप का अलग subscription।

उदाहरण के तौर पर, अगर मुंबई में रहने वाला कोई मराठी परिवार Bengali content भी देखना चाहता है, तो उसे national OTT प्लेटफॉर्म्स के अलावा दो रीजनल ऐप्स का अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ता है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या रीजनल OTT प्लेटफॉर्म्स अपने survival के लिए telecom bundling या national aggregation का रास्ता अपनाएंगे? 2026 में यह OTT इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ा strategic सवाल माना जा रहा है।

Aggregator ऐप्स: Cable Operator की वापसी?

OTT इंडस्ट्री में अब एक नई संभावना भी दिखाई दे रही है। जैसे पहले cable operators एक ही subscription में सैकड़ों चैनल्स उपलब्ध कराते थे, वैसे ही अब OTT aggregator ऐप्स का चलन बढ़ सकता है।

Tata Play Binge पहले से इस मॉडल पर काम कर रही है। इसमें users को एक ही app में कई OTT प्लेटफॉर्म्स का एक्सेस और एक ही billing system मिलता है।

Smart TV ecosystems और broadband bundles में भी यह trend तेजी से दिखाई देने लगा है।

अगर यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल हो जाता है, तो यह subscription fatigue का सबसे practical समाधान बन सकता है। हालांकि सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि OTT प्लेटफॉर्म्स आपस में revenue share करने के लिए कितने तैयार होते हैं।

Connected TV: Big Screen पर Big Business

सब्सक्रिप्शन fatigue के बीच एक बड़ा बदलाव Connected TV यानी CTV के रूप में भी देखने को मिल रहा है।

Ormax की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में active CTV users की संख्या 12.92 करोड़ तक पहुंच गई है। यह 2024 के मुकाबले 87% की बड़ी छलांग है।

FICCI-EY 2026 रिपोर्ट के अनुसार यह करीब 6.8 करोड़ CTV households तक फैल चुका है, जिनमें से 4 करोड़ weekly active हैं।

इसी रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में CTV ऐडवर्टाइजिंग revenues 42% बढ़कर ₹9,900 करोड़ तक पहुंच गए।

वहीं WPP की TYNY 2026 report का अनुमान है कि 2026 में CTV ऐडवर्टाइजिंग में 22% की growth देखने को मिलेगी।

यह advertisers के लिए एक नई opportunity बनकर उभर रहा है। जैसे-जैसे लोग पेड सब्सक्रिप्शंस से हटकर फ्री और ad-supported प्लेटफॉर्म्स की तरफ बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे ब्रैंड्स को बड़े स्क्रीन पर टार्गेटेड ऐडवर्टाइजिंग का मौका मिल रहा है।

अनुमान है कि CTV ऐडवर्टाइजिंग 2026 तक ₹8,000 करोड़ तक पहुंच सकती है।

Consumer Psychology: “कुछ देखने को नहीं” का Paradox

OTT इंडस्ट्री में एक दिलचस्प स्थिति भी देखने को मिलती है। आज 600 करोड़ वीडियोज, हजारों शोज और दर्जनों प्लेटफॉर्म्स मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद भारतीय दर्शक अक्सर शिकायत करता है- “कुछ देखने को नहीं।”

यह स्थिति जरूरत से ज्यादा कंटेंट होने की वजह से बनती है। जब देखने के लिए बहुत ज्यादा विकल्प होते हैं, तो लोग समझ नहीं पाते कि आखिर क्या देखें।

Auto-debit frustration, मंथली सब्सक्रिप्शन रिमाइंडर्स और अलग-अलग ऐप्स में कंटेंट ढूंढने की परेशानी- यह सब मिलकर व्युअर्स को मानसिक रूप से थका देता है।

MiQ की रिपोर्ट के मुताबिक 67% भारतीय व्युअर्स आने वाले समय में अपने streaming सब्सक्रिप्शंस बढ़ाने की सोच रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ वही दर्शक प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती कीमतों से नाराज भी हैं।

यही उलझन भारतीय OTT बाजार की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

Advertisers के लिए क्या मायने?

अगर दर्शक पेड सब्सक्रिप्शंस कम करते हैं और फ्री या ad-supported प्लेटफॉर्म्स की तरफ जाते हैं, तो इसका सबसे बड़ा फायदा डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री को मिल सकता है।

FICCI-EY की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक भारत में डिजिटल ऐडवर्टाइजिंग 2025 में 26% बढ़कर ₹94,700 करोड़ ($11.4 बिलियन) तक पहुंच गई। अनुमान है कि 2028 तक यह आंकड़ा ₹1,39,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा।

YouTube अकेले 2030 तक भारत में $3.05 बिलियन का ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू जनरेट करेगा।

OTT प्लेटफॉर्म्स पर ऐड इन्वेंट्री बढ़ने से ब्रैंड्स को टार्गेटेड और डेटा संचालित वीडियो ऐडवर्टाइजिंग का बेहतर मौका मिलेगा। वहीं Connected TV पर प्रीमियम ऐप प्लेसमेंट्स की वैल्यू भी लगातार बढ़ेगी।

OTT का Next Phase: क्या होगा आगे?

2026 और उसके बाद भारत का OTT landscape कई बड़े बदलावों से गुजर सकता है।

Consolidation: छोटे OTT प्लेटफॉर्म्स या तो बड़े प्लेटफॉर्म्स में merge हो सकते हैं या फिर बाजार से बाहर हो सकते हैं। बढ़ते competitive pressure में survival आसान नहीं रहेगा।

Flexible Pricing:  भविष्य में वीकली प्लान्स, event-based सब्सक्रिप्शंस (जैसे सिर्फ IPL सीजन के लिए) और माइक्रो-पेमेंट्स जैसे एक्सपेरिमेंट्स बढ़ सकते हैं।

Hybrid Models का विस्तार: फ्री + विज्ञापन वाला टियर लगभग हर प्लेटफॉर्म पर स्टैंडर्ड बन सकता है। वहीं सिर्फ पेड मॉडल धीरे-धीरे लग्जरी सेगमेंट तक सीमित हो सकता है।

AI-Powered Personalization: आने वाले समय में OTT प्लेटफॉर्म्स की कंटेंट सुझाव इतनी बेहतर हो सकती है कि लोगों को अलग-अलग ऐप्स पर जाकर कंटेंट ढूंढने की जरूरत न पड़े। उन्हें एक ही जगह अपनी पसंद का ज्यादा कंटेंट आसानी से मिल सकता है।

MPA यानी Media Partners Asia के मुताबिक 2030 तक भारत में SVOD सब्सक्रिप्शंस की संख्या 357 मिलियन तक पहुंच सकती है। इसके साथ भारत, China को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे बड़ा SVOD सब्सक्रिप्शन मार्केट बन सकता है। लेकिन यह तभी संभव होगा, जब OTT प्लेटफॉर्म्स सही कीमत पर अच्छा कंटेंट देकर दर्शकों को बेहतर अनुभव दे पाएंगे।

बैलेंस ही असली जवाब

भारत में OTT की कहानी अब सिर्फ technology और entertainment तक सीमित नहीं रह गई है। यह लोगों की बदलती आदतों और डिजिटल मनोरंजन के बदलते कारोबार की कहानी बन चुकी है।

एक तरफ देश में 60 करोड़ से ज्यादा OTT व्युअर्स हैं, Connected TV की पहुंच तेजी से बढ़ रही है और भारत दुनिया का सबसे बड़ा SVOD मार्केट बनने की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन दूसरी तरफ OTT प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती कीमतें, अलग-अलग ऐप्स में बंटा कंटेंट, पॉसवर्ड शेयरिंग की समस्या और बढ़ता खर्च लोगों को परेशान भी कर रहा है।

मिडिल क्लास दर्शक हर महीने यही सोचता है- “इस बार कौन सा OTT बंद करूं?”

यही वजह है कि भारत में OTT का भविष्य सिर्फ महंगे सब्सक्रिप्शंस पर नहीं टिका होगा। आने वाले समय में वही प्लेटफॉर्म ज्यादा सफल होंगे, जो कम कीमत, अच्छे कंटेंट, विज्ञापन और आसान एक्सेस के बीच सही संतुलन बना पाएंगे।

जो प्लेटफॉर्म दर्शकों की जरूरत और उनकी जेब- दोनों को समझेगा, वही सबसे आगे निकलेगा।

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OTT प्लेटफॉर्म्स पर कैसे रखती है सरकार नजर, शिकायतों के लिए क्या है तीन स्तरीय सिस्टम?

अगर किसी दर्शक को ओटीटी पर दिखाए जा रहे किसी कंटेंट से शिकायत है, तो वह कहां और कैसे अपनी बात रख सकता है? सरकार इन प्लेटफॉर्म पर किस तरह नजर रखती है और शिकायत मिलने पर क्या कार्रवाई होती है?

Vikas Saxena by
Published - Saturday, 31 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 31 October, 2026
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देश में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्मों, वेब सीरीज और दूसरे वीडियो कंटेंट की बढ़ती पहुंच के साथ उनके नियमन और निगरानी का मुद्दा भी अहम हो गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर किसी दर्शक को ओटीटी पर दिखाए जा रहे किसी कंटेंट से शिकायत है, तो वह कहां और कैसे अपनी बात रख सकता है? सरकार इन प्लेटफॉर्म पर किस तरह नजर रखती है और शिकायत मिलने पर क्या कार्रवाई होती है?

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में ओटीटी प्लेटफॉर्म की निगरानी, शिकायतों के निपटारे और नियमों के पालन को लेकर कई अहम जानकारियां दी गई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत तीन स्तरों वाली शिकायत निवारण व्यवस्था बनाई गई है। इस व्यवस्था में पहले प्लेटफॉर्म, फिर स्व-नियामक संस्था और अंत में केंद्र सरकार की भूमिका होती है।

2021 के नियमों के तहत मंत्रालय के दायरे में आए OTT प्लेटफॉर्म

सरकार ने 25 फरवरी 2021 को आईटी नियम, 2021 अधिसूचित किए थे। इन नियमों के तीसरे भाग यानी पार्ट-3 का प्रशासन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय करता है। इसके दायरे में डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स के साथ ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट यानी ओटीटी प्लेटफॉर्म भी आते हैं।

इन नियमों के तहत ओटीटी प्लेटफॉर्म को तय आचार संहिता का पालन करना होता है। साथ ही, उन्हें सरकार को जरूरी जानकारी देनी होती है और दर्शकों की शिकायतों के निपटारे के लिए व्यवस्था भी बनानी होती है।

मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, 4,300 से ज्यादा डिजिटल पब्लिशर्स ने सरकार को निर्धारित प्रारूप में जानकारी दी थी। इनमें 66 ओटीटी प्लेटफॉर्म शामिल थे। बाकी में डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स और अन्य डिजिटल प्रकाशक शामिल हैं। यह आंकड़ा रिपोर्ट में दी गई जानकारी पर आधारित है।

शिकायतों के निपटारे के लिए तीन स्तरों की व्यवस्था

ओटीटी प्लेटफॉर्म के खिलाफ शिकायतों को देखने के लिए तीन स्तरों वाला सिस्टम बनाया गया है। इसका मकसद यह है कि दर्शक की शिकायत पहले संबंधित प्लेटफॉर्म तक पहुंचे और जरूरत पड़ने पर उसे आगे की व्यवस्था में ले जाया जा सके।

पहला स्तर: खुद OTT प्लेटफॉर्म करेगा शिकायत का समाधान

पहले स्तर पर संबंधित ओटीटी प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी होती है कि वह दर्शकों की शिकायत सुने और उसका निपटारा करे। इसके लिए हर प्लेटफॉर्म को शिकायत अधिकारी यानी ग्रिवेंस ऑफिसर नियुक्त करना होता है। इस अधिकारी का नाम और संपर्क जानकारी प्लेटफॉर्म की वेबसाइट और ऐप पर उपलब्ध होनी चाहिए।

दर्शक किसी फिल्म, वेब सीरीज या दूसरे कंटेंट को लेकर अपनी शिकायत संबंधित प्लेटफॉर्म के शिकायत अधिकारी के पास दर्ज करा सकते हैं। मंत्रालय ने भी प्लेटफॉर्म को शिकायत अधिकारी की जानकारी साफ और प्रमुखता से दिखाने के निर्देश दिए हैं।

दूसरा स्तर: स्व-नियामक संस्था के पास जा सकती है शिकायत

अगर शिकायतकर्ता पहले स्तर पर मिले समाधान से संतुष्ट नहीं है, तो वह दूसरे स्तर पर संबंधित स्व-नियामक संस्था के पास जा सकता है। ये संस्थाएं ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए तय आचार संहिता के पालन और शिकायतों की समीक्षा का काम करती हैं।

मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, उसने कुल 11 स्व-नियामक संस्थाओं को पंजीकृत किया था। इनमें 9 डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स के लिए और 2 ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए हैं।

ओटीटी क्षेत्र की इन दो संस्थाओं में इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) के तहत बनी डिजिटल पब्लिशर्स कंटेंट ग्रिवेंस काउंसिल (DPCGC) और डिजिटल मीडिया कंटेंट रेगुलेटरी काउंसिल (DMCRC) शामिल हैं।

तीसरा स्तर: केंद्र सरकार की निगरानी और अंतर-विभागीय समिति

तीसरे स्तर पर केंद्र सरकार की निगरानी व्यवस्था आती है। इसके तहत इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी यानी अंतर-विभागीय समिति शिकायतों और संबंधित मामलों की समीक्षा करती है। इस समिति में महिला एवं बाल विकास, कानून एवं न्याय, गृह मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी, विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल हैं। इसके अलावा अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी इसमें शामिल हैं।

DPCGC ने जनवरी 2026 तक निपटाईं 137 शिकायतें

मंत्रालय की रिपोर्ट में शिकायतों के निपटारे को लेकर एक अहम आंकड़ा दिया गया है। इसके मुताबिक, DPCGC ने सितंबर 2021 से जनवरी 2026 के बीच कुल 137 शिकायतों का निपटारा किया।

रिपोर्ट में DPCGC की ओर से की गई एक महत्वपूर्ण कार्रवाई का भी जिक्र है। संस्था के शिकायत निवारण बोर्ड ने जून 2023 में एक सदस्य ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कुछ वेब सीरीज के कंटेंट पर गंभीर आपत्ति जताई थी। इसके बाद प्लेटफॉर्म को इन सीरीज को हटाने और अपनी लाइब्रेरी के दूसरे कंटेंट की भी समीक्षा करने की सलाह दी गई। मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, इस कार्रवाई के बाद संबंधित प्लेटफॉर्म ने अगस्त 2023 में 109 वेब सीरीज हटा दी थीं।

इसके अलावा, DPCGC ने प्लेटफॉर्म को उम्र के हिसाब से कंटेंट की रेटिंग, कंटेंट से जुड़ी जानकारी और बच्चों के लिए पैरेंटल कंट्रोल की व्यवस्था बेहतर करने की सलाह भी दी थी।

मंत्रालय को तीसरे स्तर पर मिली सिर्फ एक शिकायत

मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, तीन स्तरों वाली शिकायत निवारण व्यवस्था के तीसरे स्तर पर मंत्रालय को एक शिकायत मिली थी। इसे अंतर-विभागीय समिति के पास भेजा गया। समिति की सिफारिश के बाद संबंधित ओटीटी प्लेटफॉर्म को अपने कंटेंट के विज्ञापनों में भी उम्र के हिसाब से रेटिंग और दर्शकों के लिए जरूरी चेतावनी दिखाने की सलाह दी गई।

यह सलाह प्रिंट, टेलीविजन और रेडियो जैसे माध्यमों पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों के लिए भी थी, क्योंकि इन माध्यमों तक सभी उम्र के लोग पहुंचते हैं। साथ ही, प्लेटफॉर्म को अपनी वेबसाइट और ऐप पर शिकायत अधिकारी की जानकारी ज्यादा प्रमुखता से दिखाने को कहा गया। इस संबंध में मंत्रालय ने 18 जुलाई 2023 को सभी ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए एडवाइजरी भी जारी की थी।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि 137 शिकायतें DPCGC की ओर से निपटाई गई थीं, जबकि एक शिकायत मंत्रालय को तीसरे स्तर पर मिली थी। ये दोनों अलग-अलग आंकड़े हैं।

आपत्तिजनक कंटेंट पर सरकार ने की कार्रवाई

मंत्रालय की रिपोर्ट में आपत्तिजनक और अश्लील कंटेंट दिखाने वाले ओटीटी प्लेटफॉर्म के खिलाफ की गई कार्रवाई का भी जिक्र है।

रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2024 में 18 ओटीटी प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। इनसे जुड़े 19 वेबसाइट और 10 ऐप को भारत में सार्वजनिक पहुंच के लिए बंद किया गया था।

इसके बाद 23 जुलाई 2025 को 25 ओटीटी प्लेटफॉर्म के खिलाफ कार्रवाई की गई। इनसे जुड़े 26 वेबसाइट और 14 ऐप को भारत में सार्वजनिक पहुंच के लिए बंद किया गया। मंत्रालय के अनुसार, इन 25 प्लेटफॉर्म में से 5 ऐसे थे जिनके खिलाफ मार्च 2024 में भी कार्रवाई की गई थी, लेकिन उन्होंने नए डोमेन के जरिए दोबारा आपत्तिजनक कंटेंट उपलब्ध कराना शुरू कर दिया था।

रिपोर्ट में ALTT और ULLU का भी जिक्र है। अगस्त 2025 में मंत्रालय की ओर से इन दोनों प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद DPCGC ने उनकी सदस्यता समाप्त कर दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इन प्लेटफॉर्म को इससे पहले भी संस्था की ओर से चेतावनी और निर्देश दिए गए थे।

OTT कंटेंट के लिए उम्र के हिसाब से रेटिंग जरूरी

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कंटेंट को उम्र के हिसाब से वर्गीकृत करना भी जरूरी है। नियमों के तहत प्लेटफॉर्म को कंटेंट की श्रेणी और उसकी प्रकृति बताने वाली जानकारी देनी होती है, ताकि दर्शक यह तय कर सकें कि कौन-सा कंटेंट उनके या उनके बच्चों के लिए उपयुक्त है।

इसके तहत U, U/A 7+, U/A 13+, U/A 16+ और A जैसी आयु आधारित श्रेणियों का इस्तेमाल किया जाता है। प्लेटफॉर्म को कंटेंट की शुरुआत में जरूरी चेतावनी और जानकारी भी दिखानी होती है। बच्चों की पहुंच को नियंत्रित करने के लिए पैरेंटल कंट्रोल जैसे उपाय भी जरूरी हैं।

सरकार समय-समय पर जारी करती है एडवाइजरी

मंत्रालय ओटीटी प्लेटफॉर्म को नियमों के पालन के लिए समय-समय पर एडवाइजरी भी जारी करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, 27 अक्टूबर 2025 को गैंगस्टर और अपराधियों पर आधारित फिल्मों, वेब सीरीज, बायोपिक और डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी गई थी।

इसके अलावा 8 मई 2025 को पाकिस्तान से जुड़े कंटेंट को बंद करने, 22 अप्रैल 2025 को दिव्यांगजनों के अधिकारों और आईटी नियमों के पालन तथा 19 फरवरी 2025 को भारतीय कानूनों और आचार संहिता का पालन करने से जुड़ी एडवाइजरी जारी की गई थी।

मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म से जुड़े कंटेंट पर शिकायत मिलने पर उसे सीधे संबंधित प्लेटफॉर्म को भेजा जा सकता है या नियमों के तहत उसका जवाब दिया जा सकता है। इसके अलावा आईटी कानून की धारा 69A के तहत कुछ खास कानूनी आधारों पर कंटेंट को ब्लॉक करने की अलग व्यवस्था भी है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के नोडल अधिकारियों की व्यवस्था बनाई गई है।

कुल मिलाकर, मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट बताती है कि भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म की निगरानी के लिए शिकायत अधिकारी से लेकर स्व-नियामक संस्थाओं और केंद्र सरकार तक तीन स्तरों की व्यवस्था मौजूद है। इसके साथ ही उम्र आधारित रेटिंग, बच्चों के लिए नियंत्रण, एडवाइजरी और आपत्तिजनक कंटेंट के खिलाफ कार्रवाई जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं। दर्शकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि किसी कंटेंट को लेकर शिकायत करने की शुरुआत संबंधित ओटीटी प्लेटफॉर्म के शिकायत अधिकारी से की जा सकती है।

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5G की रफ्तार, ग्राहकों का भरोसा और बढ़ता मुनाफा, जियो ने यूं बदली दूसरी तिमाही की तस्वीर

जियो प्लेटफॉर्म्स ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मजबूत कारोबारी प्रदर्शन किया है।

Vikas Saxena by
Published - Saturday, 31 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 31 October, 2026
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जियो प्लेटफॉर्म्स ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में मजबूत कारोबारी प्रदर्शन किया है। जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान कंपनी का परिचालन से मिलने वाला राजस्व सालाना आधार पर 11.4 फीसदी बढ़कर 40,475 करोड़ रुपये हो गया। वहीं, कंपनी का शुद्ध मुनाफा 13.7 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 8,387 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इस दौरान कंपनी के कुल ग्राहकों की संख्या 54.24 करोड़ हो गई, जबकि 5G सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों की संख्या 30 करोड़ के पार पहुंच गई।

कंपनी ने 30 अक्टूबर को वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही और पहली छमाही के नतीजे जारी किए। नतीजों के मुताबिक, पिछले साल की समान तिमाही में कंपनी का परिचालन राजस्व 36,332 करोड़ रुपये था, जो इस बार बढ़कर 40,475 करोड़ रुपये हो गया। वहीं, कंपनी का कुल राजस्व 11.3 फीसदी बढ़कर 47,485 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल की दूसरी तिमाही में यह 42,652 करोड़ रुपये था।

EBITDA में 16.6 फीसदी की बढ़ोतरी

कंपनी के कामकाज से होने वाली कमाई यानी EBITDA में भी अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई। दूसरी तिमाही में EBITDA 16.6 फीसदी बढ़कर 21,879 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 18,757 करोड़ रुपये था। EBITDA मार्जिन भी बढ़कर 54.1 फीसदी हो गया, जो एक साल पहले 51.6 फीसदी था। यानी इसमें 2.5 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई।

EBITDA किसी कंपनी की ब्याज, टैक्स, मूल्यह्रास और अमॉर्टाइजेशन से पहले की कमाई को दर्शाता है। इसे कंपनी के कारोबारी प्रदर्शन को समझने का एक अहम पैमाना माना जाता है।

पहली छमाही में भी दोहरे अंकों में बढ़ा राजस्व

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान जियो प्लेटफॉर्म्स का परिचालन राजस्व 11.6 फीसदी बढ़कर 79,648 करोड़ रुपये रहा। पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह 71,364 करोड़ रुपये था।

इस दौरान कंपनी का EBITDA 42,744 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल की पहली छमाही में यह 36,892 करोड़ रुपये था। वहीं, पहली छमाही में कंपनी का शुद्ध मुनाफा 16,151 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की समान अवधि के 14,485 करोड़ रुपये से ज्यादा है।

54.24 करोड़ हुआ जियो का ग्राहक आधार

ग्राहकों की संख्या के लिहाज से भी कंपनी ने बढ़त दर्ज की है। सितंबर 2026 के अंत तक जियो का कुल ग्राहक आधार बढ़कर 54.24 करोड़ हो गया। पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 50.64 करोड़ थी। यानी सालाना आधार पर कंपनी के ग्राहक आधार में करीब 3.6 करोड़ की बढ़ोतरी हुई।

दूसरी तिमाही के दौरान कंपनी ने 91 लाख नए ग्राहक जोड़े। वहीं, 5G सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों की संख्या बढ़कर 30 करोड़ हो गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 23.44 करोड़ थी। कंपनी ने बताया कि तिमाही के दौरान उसके 5G ग्राहक आधार में करीब 1.5 करोड़ की बढ़ोतरी हुई।

कंपनी के मुताबिक, चीन के बाहर वह दुनिया की सबसे बड़ी 5G ऑपरेटर है।

ARPU बढ़कर 218.8 रुपये हुआ

जियो के प्रति ग्राहक औसत मासिक कमाई यानी ARPU में भी बढ़ोतरी हुई है। दूसरी तिमाही में यह 3.5 फीसदी बढ़कर 218.8 रुपये रहा, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 211.4 रुपये था।

इसके साथ ही ग्राहकों की डेटा खपत भी बढ़ी है। कंपनी के मुताबिक, प्रति ग्राहक औसत मासिक डेटा इस्तेमाल 44.2 GB तक पहुंच गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 38.7 GB था। इससे पता चलता है कि जियो के ग्राहक पहले के मुकाबले ज्यादा डेटा इस्तेमाल कर रहे हैं।

होम ब्रॉडबैंड और एयरफाइबर में भी बढ़त

कंपनी ने होम ब्रॉडबैंड कारोबार में भी विस्तार किया है। सितंबर 2026 के अंत तक जियो के होम ब्रॉडबैंड ग्राहकों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ हो गई, जबकि पिछले साल यह संख्या 2.27 करोड़ थी।

वहीं, एयरफाइबर ग्राहकों की संख्या भी बढ़कर 1.51 करोड़ पहुंच गई, जो पिछले साल की समान अवधि में 96 लाख थी। कंपनी के लिए होम ब्रॉडबैंड और एयरफाइबर कारोबार भविष्य में कमाई के नए अवसर तैयार कर सकते हैं।

कैपिटल खर्च के बाद भी बेहतर रही कमाई

कंपनी की प्रस्तुति के मुताबिक, EBITDA में से नकद पूंजीगत खर्च घटाने के बाद बची रकम यानी EBITDA Less Cash Capex दूसरी तिमाही में 15,449 करोड़ रुपये रही। पिछले साल की समान अवधि में यह 10,129 करोड़ रुपये थी। इस तरह इसमें 52.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

वहीं, 30 सितंबर 2026 के अंत में कंपनी का शुद्ध कर्ज 8,822 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 41,161 करोड़ रुपये था। कंपनी का नेट लीवरेज अनुपात भी घटकर 0.10 गुना रह गया, जो पिछले साल 0.55 गुना था।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि सितंबर के अंत का कर्ज का आंकड़ा कंपनी की अक्टूबर में पूरी हुई शेयर बाजार में लिस्टिंग और आईपीओ से मिली रकम को शामिल नहीं करता। इसलिए इसे आईपीओ से मिली रकम के बाद की कर्ज स्थिति नहीं समझना चाहिए।

डिजिटल सेवाओं और नए कारोबार पर भी जोर

जियो प्लेटफॉर्म्स का कारोबार अब केवल मोबाइल कनेक्टिविटी तक सीमित नहीं है। कंपनी डिजिटल सेवाओं, कंटेंट, क्लाउड कंप्यूटिंग, गेमिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और एंटरप्राइज सेवाओं जैसे क्षेत्रों में भी विस्तार कर रही है।

कंपनी की पेशकश में जियो टीवी प्लस और जियोगेम्स जैसी सेवाएं शामिल हैं। वहीं, जियोपीसी के जरिए क्लाउड आधारित कंप्यूटर सुविधा देने पर भी काम किया जा रहा है। इसके अलावा कंपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वित्तीय सेवाओं और क्लाउड से जुड़े कारोबार में भी अवसर तलाश रही है।

कुल मिलाकर, दूसरी तिमाही के नतीजे बताते हैं कि जियो प्लेटफॉर्म्स के राजस्व और मुनाफे में बढ़ोतरी के साथ उसके 5G, होम ब्रॉडबैंड और डिजिटल सेवाओं का कारोबार भी आगे बढ़ रहा है। आने वाले समय में कंपनी के लिए यह देखना अहम होगा कि वह अपने बड़े ग्राहक आधार और बढ़ते डेटा इस्तेमाल को किस तरह कमाई के नए अवसरों में बदलती है।

 

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नेपाल पहुंचा JioHotstar, DGO के साथ की साझेदारी

भारत के प्रमुख स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म JioHotstar ने नेपाल में अपनी सेवाएं शुरू करने के लिए स्थानीय स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म DGO के साथ साझेदारी की है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 28 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 28 October, 2026
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भारत के प्रमुख स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म JioHotstar ने नेपाल में अपनी सेवाएं शुरू करने के लिए स्थानीय स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म DGO के साथ साझेदारी की है। इस साझेदारी के तहत नेपाल के दर्शक DGO के जरिए जियोहॉटस्टार की फिल्में, ओरिजिनल सीरीज, टीवी कार्यक्रम, रियलिटी शो और बच्चों से जुड़ा कंटेंट देख सकेंगे।

इस सेवा का सब्सक्रिप्शन DGO के मोबाइल और प्लस प्लान के तहत मिलेगा। इसकी शुरुआती कीमत 249 नेपाली रुपये प्रति माह रखी गई है। इस कदम के साथ जियोहॉटस्टार ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने विस्तार को आगे बढ़ाया है। इससे पहले प्लेटफॉर्म ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर और मध्य पूर्व व उत्तरी अफ्रीका (MENA) क्षेत्र में भी अपनी मौजूदगी बढ़ा चुका है।

‘12वीं फेल’ से ‘स्पेशल ऑप्स’ तक मिलेगा कंटेंट

नेपाल में जियोहॉटस्टार के कंटेंट कैटलॉग में कई लोकप्रिय भारतीय फिल्में और सीरीज शामिल होंगी। इनमें ‘भेड़िया’, ‘12वीं फेल’, ‘केसरी चैप्टर 2’, ‘सुपर 30’ और ‘वेलकम टू द जंगल’ जैसी फिल्में शामिल हैं।

इसके अलावा दर्शकों को जियोहॉटस्टार की ओरिजिनल सीरीज भी देखने को मिलेंगी। इनमें ‘हुंकार’, ‘प्रीतम एंड पेड्रो’, ‘अली बाबा और 40 भूत’, ‘स्पेशल ऑप्स’ और ‘चिरैया’ जैसे नाम शामिल हैं।

प्लेटफॉर्म पर ‘बिग बॉस’, ‘कॉफी विद करण’ और ‘इंडिया का टॉप 1 परसेंट’ जैसे लोकप्रिय टीवी और रियलिटी शो भी उपलब्ध होंगे।

क्षेत्रीय कंटेंट को भी इस पेशकश में जगह दी गई है। ‘बेथलेहम कुडुंबा यूनिट’ और ‘थुडक्कम’ जैसे क्षेत्रीय शीर्षक हिंदी में उपलब्ध होंगे।

क्या हैं DGO के सब्सक्रिप्शन प्लान?

नेपाल में दर्शकों के लिए DGO ने दो तरह के प्लान रखे हैं। इनकी कीमत इस प्रकार है:

प्लान

एक महीने

तीन महीने

एक साल

मोबाइल

NPR 249

NPR 699

NPR 2,499

प्लस

NPR 399

NPR 899

NPR 2,699

दर्शक DGO की वेबसाइट www.watchdgo.com या उसके ऐप के जरिए सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं। यह ऐप आईओएस, एंड्रॉयड, एंड्रॉयड टीवी और स्मार्ट टीवी पर उपलब्ध है।

जियोहॉटस्टार का कंटेंट DGO पर पहले से मौजूद नेपाली फिल्मों और कार्यक्रमों के साथ मिलेगा। DGO की योजना हर हफ्ते एक नई नेपाली फिल्म जोड़ने की भी है।

खेल प्रेमियों को भी मिलेगा फायदा

इस साझेदारी में मनोरंजन के साथ खेलों को भी जगह दी गई है। DGO के मौजूदा सब्सक्रिप्शन के तहत दर्शक ला लीगा (LaLiga), मोटोजीपी (MotoGP) और काराबाओ कप (Carabao Cup) जैसे अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों का लाइव प्रसारण देख सकेंगे। इनके लिए अलग से भुगतान नहीं करना होगा। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इन आयोजनों की कवरेज से जुड़ी विस्तृत शर्तें नहीं बताई गई हैं।

जियोहॉटस्टार के अंतरराष्ट्रीय कारोबार को मिलेगी मजबूती

जियोस्टार में अंतरराष्ट्रीय कारोबार के प्रमुख अमित मल्होत्रा ने कहा कि कंपनी भारत में तैयार किए गए अपने कंटेंट और विदेशों में भारतीय मनोरंजन की मांग को एक साथ जोड़ने की दिशा में काम कर रही है। उन्होंने नेपाल को इस विस्तार का अहम बाजार बताया, जहां कई पीढ़ियों से भारतीय फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों को पसंद किया जाता रहा है।

उनके मुताबिक, DGO के साथ साझेदारी से नेपाली दर्शकों को स्थानीय प्लेटफॉर्म की सुविधा के साथ भारतीय मनोरंजन की बड़ी पेशकश मिलेगी।

वहीं, DGO के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोशन निरौला ने इस साझेदारी को प्लेटफॉर्म और नेपाल के मनोरंजन उद्योग के लिए अहम कदम बताया। उन्होंने कहा कि इससे भारतीय मनोरंजन, नई नेपाली फिल्मों और अंतरराष्ट्रीय खेलों को एक ही सब्सक्रिप्शन के तहत उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।

स्थानीय प्लेटफॉर्म के साथ विस्तार की रणनीति

नेपाल में शुरुआत जियोहॉटस्टार की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत कंपनी विदेशी बाजारों में स्थानीय प्लेटफॉर्म के साथ साझेदारी कर रही है। इससे उसे हर देश में अलग से अपना प्लेटफॉर्म खड़ा करने के बजाय वहां पहले से मौजूद सेवाओं के जरिए दर्शकों तक पहुंचने का अवसर मिलता है।

नेपाल में भारतीय फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों की लोकप्रियता को देखते हुए यह साझेदारी जियोहॉटस्टार को नए दर्शकों तक पहुंचने में मदद कर सकती है। साथ ही, DGO को भी अपने मौजूदा नेपाली कंटेंट के साथ भारतीय मनोरंजन और अंतरराष्ट्रीय खेलों की पेशकश करने का मौका मिलेगा। 

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Amazon Prime Video पर लगा जुर्माना, ग्राहक को लौटाने होंगे 9499 रुपये

एमेजॉन प्राइम वीडियो को ग्राहक की पेड सालाना मेंबरशिप के दौरान विज्ञापन दिखाना महंगा पड़ा है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 26 October, 2026
Last Modified:
Monday, 26 October, 2026
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एमेजॉन प्राइम वीडियो को ग्राहक की पेड सालाना मेंबरशिप के दौरान विज्ञापन दिखाना महंगा पड़ा है। हैदराबाद की जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-I ने इसे सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार मानते हुए प्लेटफॉर्म को ग्राहक को कुल 9,499 रुपये देने का आदेश दिया है। इसमें सालाना सब्सक्रिप्शन के 1,499 रुपये का रिफंड, 5,000 रुपये मुआवजा और 3,000 रुपये मुकदमे के खर्च के तौर पर शामिल हैं।

आयोग का यह आदेश 1 अक्टूबर 2026 का है। मामले के मुताबिक, कोंढोबा राजेश नाम के एक वकील ने 11 मई 2025 को 1,499 रुपये में एमेजॉन प्राइम की सालाना मेंबरशिप ली थी। शिकायत और उससे जुड़े दस्तावेजों के अनुसार, इस पैकेज में मोबाइल फोन, टीवी और लैपटॉप पर प्राइम वीडियो का कंटेंट 12 महीने तक बिना विज्ञापनों के देखने की सुविधा शामिल थी।

सब्सक्रिप्शन खत्म होने से पहले दिखने लगे विज्ञापन

राजेश ने शिकायत में कहा कि शुरुआत में प्राइम वीडियो पर विज्ञापन नहीं आते थे, लेकिन 17 जून 2025 से विज्ञापन दिखने लगे, जबकि उनकी सालाना मेंबरशिप अभी खत्म नहीं हुई थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विज्ञापनों के बिना कंटेंट देखने के लिए उनसे अलग से 699 रुपये मांगे गए।

राजेश ने ग्राहक सहायता टीम से संपर्क कर पहले वाली सुविधा बहाल करने या सब्सक्रिप्शन की पूरी रकम लौटाने की मांग की। हालांकि, शिकायत के मुताबिक, प्लेटफॉर्म ने दोनों मांगें स्वीकार नहीं कीं और केवल इस्तेमाल की अवधि के हिसाब से आंशिक रिफंड देने की पेशकश की।

राजेश का तर्क था कि जब उन्होंने सालाना मेंबरशिप खरीदी थी, तब विज्ञापन-मुक्त स्ट्रीमिंग उस पैकेज का हिस्सा थी। सब्सक्रिप्शन की अवधि पूरी होने से पहले इस सुविधा को हटाना और इसे जारी रखने के लिए अतिरिक्त पैसे मांगना तय शर्तों में बदलाव था।

आयोग ने क्या कहा?

आयोग की अध्यक्ष बी. उमा वेंकट सुब्बा लक्ष्मी और सदस्य सी. लक्ष्मी प्रसन्ना व बी. राजी रेड्डी की पीठ ने सब्सक्रिप्शन से जुड़े दस्तावेजों और शिकायत की जांच की।

आयोग ने पाया कि विज्ञापन उस समय दिखाए जाने लगे, जब ग्राहक की सालाना मेंबरशिप अभी चालू थी। साथ ही, प्लेटफॉर्म यह साबित नहीं कर पाया कि मेंबरशिप खरीदते समय ग्राहक को बताया गया था कि पेड अवधि के दौरान विज्ञापन-मुक्त सुविधा वापस ली जा सकती है या इसके लिए अलग से शुल्क देना पड़ सकता है।

एमेजॉन की ओर से आयोग में न तो कोई प्रतिनिधि पेश हुआ और न ही लिखित जवाब दाखिल किया गया। इसके बाद कंपनी को जवाब देने का अधिकार नहीं दिया गया और आयोग ने उपलब्ध सबूतों के आधार पर मामले का फैसला किया।

आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि तय विज्ञापन-मुक्त अवधि के दौरान विज्ञापन दिखाना और उस सुविधा को जारी रखने के लिए अतिरिक्त भुगतान मांगना सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार है। इसके बाद आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।

45 दिनों के भीतर करना होगा भुगतान

आयोग ने प्लेटफॉर्म को 45 दिनों के भीतर 1,499 रुपये का सब्सक्रिप्शन शुल्क लौटाने, 5,000 रुपये मुआवजा देने और 3,000 रुपये मुकदमे के खर्च के तौर पर चुकाने का निर्देश दिया है। इस तरह कुल भुगतान 9,499 रुपये होगा।

गौरतलब है कि शिकायतकर्ता ने मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए 25,000 रुपये मुआवजे और मुकदमे के खर्च के लिए 10,000 रुपये की मांग की थी। हालांकि, आयोग ने इससे कम रकम देने का आदेश दिया। 

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Netflix-Hoichoi की साझेदारी, बंगाली वेब सीरीज अब हिंदी, तमिल और तेलुगु में भी होंगी रिलीज

ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix ने बंगाली स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म Hoichoi के साथ साझेदारी की है।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 24 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 24 October, 2026
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ओटीटी प्लेटफॉर्म Netflix ने बंगाली स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म Hoichoi के साथ साझेदारी की है। इस साझेदारी के तहत Hoichoi की आने वाली बंगाली वेब सीरीज अगले दो साल में Netflix पर हिंदी, तमिल और तेलुगु भाषाओं में भी रिलीज की जाएंगी। ये सीरीज अपनी मूल भाषा बंगाली में Hoichoi पर भी उपलब्ध होंगी।

इस समझौते में Hoichoi की पहले से रिलीज हो चुकी 14 सीरीज भी शामिल हैं। इनमें ‘Eken Babu’, ‘Sampurna’, ‘Lajja’, ‘Madam Inspector’, ‘Mahanagar’ और ‘Parineeta: A Love Story’ जैसे टाइटल शामिल हैं। इन सीरीज में क्राइम, जासूसी, हॉरर और रोमांस जैसे अलग-अलग विषय देखने को मिलते हैं।

6 नवंबर को रिलीज होगी पहली नई सीरीज

इस साझेदारी के तहत आने वाली पहली नई सीरीज ‘The Cursed Temple of Kauriburi’ होगी। यह हॉरर सीरीज 6 नवंबर को रिलीज होगी। इसमें जीतू कमल, सोलंकी रॉय और पाओली दाम मुख्य भूमिकाओं में नजर आएंगे। सीरीज की कहानी लोककथाओं और डरावने रहस्य पर आधारित है।

Hoichoi की कहानियों पर बनेंगी नई सीरीज

इस साझेदारी के तहत दोनों कंपनियां Hoichoi की चुनिंदा ओरिजिनल सीरीज पर आधारित नए शो भी विकसित करेंगी। इनका निर्माण Hoichoi Studios करेगा। हालांकि, इन नई सीरीज की कहानी, कलाकारों और रिलीज से जुड़ी जानकारी अभी साझा नहीं की गई है।

क्षेत्रीय कंटेंट को मिलेगा बड़ा दर्शक वर्ग

Netflix के साथ यह साझेदारी Hoichoi के बंगाली कंटेंट को बंगाली भाषी दर्शकों से आगे ले जाने में मदद कर सकती है। हिंदी, तमिल और तेलुगु में उपलब्धता से इन कहानियों को देश के दूसरे हिस्सों में भी दर्शक मिल सकेंगे।

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर क्षेत्रीय भाषा की कहानियों को दूसरी भाषाओं में पेश करने का चलन बढ़ रहा है। ऐसे में यह साझेदारी Hoichoi के कंटेंट की पहुंच बढ़ाने के साथ Netflix के भारतीय भाषाओं वाले कंटेंट को भी मजबूत कर सकती है। 

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Jioप्लेटफॉर्म्स के IPO ने बनाया रिकॉर्ड, एक करोड़ से ज्यादा मिले आवेदन

जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ ने आवेदन के मामले में नया रिकॉर्ड बना दिया है। 23 अक्टूबर को बोली लगाने की समयसीमा खत्म होने से करीब पांच घंटे पहले ही इस आईपीओ को 1 करोड़ से ज्यादा आवेदन मिल चुके थे।

Samachar4media Bureau by
Published - Saturday, 24 October, 2026
Last Modified:
Saturday, 24 October, 2026
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जियो प्लेटफॉर्म्स (Jio Platforms) के आईपीओ ने आवेदन के मामले में नया रिकॉर्ड बना दिया है। 23 अक्टूबर को बोली लगाने की समयसीमा खत्म होने से करीब पांच घंटे पहले ही इस आईपीओ को 1 करोड़ से ज्यादा आवेदन मिल चुके थे। इस तरह कंपनी ने वारी एनर्जीज (Waaree Energies) के करीब 97 लाख आवेदनों के पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। एक्सचेंज के आंकड़ों के मुताबिक, यह किसी आईपीओ के लिए अब तक का सबसे बड़ा आवेदन आंकड़ा है।

इससे पहले बजाज हाउसिंग फाइनेंस और भारत कोकिंग कोल के आईपीओ में करीब 90-90 लाख आवेदन आए थे। जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ में बोली लगाने की प्रक्रिया उस समय जारी थी, इसलिए आवेदन की अंतिम संख्या और बढ़ने की संभावना थी।

आईपीओ को मिला 7.5 गुना सब्सक्रिप्शन

23 अक्टूबर को दोपहर 12:40 बजे तक जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ को कुल 7.5 गुना सब्सक्रिप्शन मिला था। यानी कंपनी की ओर से सार्वजनिक पेशकश में उपलब्ध कराए गए शेयरों की तुलना में 7.5 गुना बोलियां मिली थीं। उस समय उपलब्ध 19.75 करोड़ शेयरों के मुकाबले निवेशकों ने बड़ी संख्या में बोलियां लगाई थीं।

निवेशकों की अलग-अलग श्रेणियों में संस्थागत निवेशकों की मांग सबसे ज्यादा रही। वहीं, गैर-संस्थागत और खुदरा निवेशकों की ओर से भी अच्छी भागीदारी देखने को मिली।

संस्थागत निवेशकों ने दिखाई सबसे ज्यादा दिलचस्पी

आईपीओ में निवेशकों की श्रेणी के हिसाब से सब्सक्रिप्शन के आंकड़े इस प्रकार रहे:

  • क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIBs): इनके लिए आरक्षित हिस्से को 16.27 गुना सब्सक्रिप्शन मिला। इस श्रेणी के निवेशकों ने 4.9 करोड़ शेयरों के मुकाबले 79.75 करोड़ शेयरों के लिए बोलियां लगाईं।
  • गैर-संस्थागत निवेशक (NIIs): इनके हिस्से को 10.44 गुना सब्सक्रिप्शन मिला। इस श्रेणी में 3.64 करोड़ शेयरों के मुकाबले 38.04 करोड़ शेयरों के लिए बोलियां आईं।
  • खुदरा निवेशक (Retail Investors): इनके लिए आरक्षित हिस्से को 2.14 गुना सब्सक्रिप्शन मिला। खुदरा निवेशकों ने 8.5 करोड़ शेयरों के मुकाबले 18.18 करोड़ शेयरों के लिए बोलियां लगाईं।

इन आंकड़ों से पता चलता है कि आईपीओ में सबसे ज्यादा मांग बड़े संस्थागत निवेशकों की ओर से आई। हालांकि, खुदरा निवेशकों ने भी अपने लिए आरक्षित शेयरों से दोगुने से ज्यादा शेयरों के लिए आवेदन किया।

100 मिनट में पूरी तरह सब्सक्राइब हुआ था आईपीओ

रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार को बोली शुरू होने के महज 100 मिनट के भीतर ही जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ को पूरा सब्सक्रिप्शन मिल गया था। उस समय इसे भारत के बड़े आईपीओ में सबसे तेजी से पूरी तरह सब्सक्राइब होने वाले इश्यू के तौर पर बताया गया था। आखिरी दिन 1 करोड़ से ज्यादा आवेदन मिलने से इस आईपीओ ने एक और बड़ा आंकड़ा पार कर लिया।

Hyundai और LG के आईपीओ से कैसे अलग है Jio का इश्यू?

जियो प्लेटफॉर्म्स का आईपीओ हाल के कुछ बड़े आईपीओ से इस मामले में अलग है कि यह फ्रेश इश्यू है। हुंडई मोटर इंडिया और एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया के आईपीओ में मुख्य रूप से मौजूदा शेयरधारकों ने अपने शेयर बेचे थे।

फ्रेश इश्यू में कंपनी नए शेयर जारी करके पैसा जुटाती है और इससे मिलने वाली रकम कंपनी को मिलती है। इसके उलट, ऑफर फॉर सेल (OFS) में मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर बेचते हैं और बिक्री की रकम उन्हें मिलती है।

इसलिए जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ को कंपनी के लिए सीधे पूंजी जुटाने के अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है।

एंकर निवेशकों से पहले ही जुटाए 8,109.85 करोड़ रुपये

सार्वजनिक आईपीओ खुलने से पहले जियो प्लेटफॉर्म्स ने 212 एंकर निवेशकों को शेयर आवंटित करके 8,109.85 करोड़ रुपये जुटाए थे। एंकर निवेशक वे बड़े संस्थागत निवेशक होते हैं, जिन्हें आईपीओ खुलने से पहले तय प्रक्रिया के तहत शेयर आवंटित किए जाते हैं।

कंपनी ने शेयरों का मूल्य दायरा 1,065 से 1,119 रुपये प्रति शेयर रखा था। एंकर निवेशकों को ऊपरी मूल्य यानी 1,119 रुपये प्रति शेयर पर शेयर आवंटित किए गए।

रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, एंकर निवेशकों की ओर से करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये की मांग आई थी, जो उनके लिए उपलब्ध आवंटन से 30 गुना से ज्यादा थी। सार्वजनिक आईपीओ के दौरान मिली बोलियों को मिलाकर कुल मांग करीब 4.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी।

केवल सार्वजनिक इश्यू में करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये की बोलियां मिली थीं। हालांकि, ये आंकड़े निवेशकों की ओर से लगाई गई बोलियों की कुल रकम बताते हैं, न कि कंपनी की ओर से वास्तव में जुटाई गई पूंजी।

28 अक्टूबर को शेयर बाजार में लिस्टिंग की उम्मीद

जियो प्लेटफॉर्म्स के आईपीओ के लिए बोली लगाने की प्रक्रिया 23 अक्टूबर को समाप्त होनी थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कंपनी के शेयरों की बाजार में लिस्टिंग 28 अक्टूबर को प्रस्तावित थी। लिस्टिंग के बाद निवेशक शेयर बाजार में इन शेयरों की खरीद-बिक्री कर सकेंगे।

1 करोड़ से ज्यादा आवेदन मिलना आईपीओ के लिए एक बड़ा आंकड़ा है, लेकिन निवेशकों की दिलचस्पी को समझने के लिए केवल आवेदन संख्या ही काफी नहीं है। अंतिम सब्सक्रिप्शन आंकड़े, शेयरों का आवंटन और लिस्टिंग के बाद शेयर का प्रदर्शन भी अहम होगा।

फिलहाल, उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर जियो प्लेटफॉर्म्स ने आईपीओ में आवेदन का नया रिकॉर्ड बनाया है। संस्थागत निवेशकों की मजबूत मांग और खुदरा निवेशकों की भागीदारी ने इस इश्यू को बाजार की प्रमुख गतिविधियों में शामिल कर दिया है। 

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फ्री OTT या पेड सब्सक्रिप्शन: दर्शक किस मॉडल को कर रहे हैं ज्यादा पसंद?

भारत में OTT बाजार का विस्तार जारी है, लेकिन अब इस कारोबार के सामने एक अहम सवाल है कि दर्शक मनोरंजन के लिए पैसे खर्च करना चाहते हैं या विज्ञापन देखकर मुफ्त कंटेंट देखना पसंद करते हैं।

Vikas Saxena by
Published - Friday, 23 October, 2026
Last Modified:
Friday, 23 October, 2026
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भारत में OTT बाजार का विस्तार जारी है, लेकिन अब इस कारोबार के सामने एक अहम सवाल है कि दर्शक मनोरंजन के लिए पैसे खर्च करना चाहते हैं या विज्ञापन देखकर मुफ्त कंटेंट देखना पसंद करते हैं। OTT कंपनियों के लिए यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनकी कमाई का आधार केवल सब्सक्रिप्शन नहीं, बल्कि विज्ञापन और दर्शकों को लंबे समय तक अपने साथ बनाए रखना भी है।

सितंबर 2026 में जारी ऑरमैक्स मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में सक्रिय पेड OTT सब्सक्रिप्शन की संख्या 2026 में 17.26 करोड़ रहने का अनुमान है। यह 2025 के 14.82 करोड़ के मुकाबले 16 फीसदी अधिक है। इन सब्सक्रिप्शन में टेलीकॉम कंपनियों के बंडल और एग्रीगेटर के जरिये मिलने वाली सेवाएं भी शामिल हैं। रिपोर्ट का सर्वेक्षण जून-जुलाई 2026 में 15,000 लोगों के बीच किया गया था।

यह आंकड़ा बताता है कि पेड OTT की पहुंच बढ़ रही है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में 17.26 करोड़ अलग-अलग लोग सब्सक्रिप्शन के लिए भुगतान कर रहे हैं। एक ही व्यक्ति के पास कई सेवाओं की सदस्यता हो सकती है और कुछ सेवाएं टेलीकॉम पैकेज में भी मिलती हैं।

66.49 करोड़ लोगों तक पहुंचा ऑनलाइन वीडियो

ऑरमैक्स मीडिया की इसी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में ऑनलाइन वीडियो देखने वाले दर्शकों की संख्या 2026 में 66.49 करोड़ पहुंच गई है। 2025 में यह संख्या 60.12 करोड़ थी। इस तरह दर्शकों के आधार में करीब 11 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

रिपोर्ट में उस व्यक्ति को OTT दर्शक माना गया है, जिसने पिछले एक महीने में कम से कम एक ऑनलाइन वीडियो देखा हो। इसमें मुफ्त और पेड, दोनों तरह का कंटेंट शामिल है। इसलिए 66.49 करोड़ दर्शकों को पेड OTT सब्सक्राइबर्स कहना सही नहीं होगा।

यह अंतर बाजार को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। ऑनलाइन वीडियो देखने वालों का बड़ा वर्ग मुफ्त वीडियो से भी जुड़ा हुआ है। दूसरी ओर, पेड सेवाओं के सब्सक्राइबर खास फिल्मों, वेब सीरीज, खेलों और दूसरे प्रीमियम कंटेंट के लिए भुगतान कर सकते हैं। इससे पता चलता है कि OTT कंपनियों के सामने केवल दर्शकों की संख्या बढ़ाने की चुनौती नहीं है। उन्हें यह भी तय करना है कि कितने दर्शकों को मुफ्त कंटेंट के जरिये विज्ञापन दिखाए जाएं और कितने दर्शक पेड सेवाओं के लिए भुगतान करने को तैयार हैं।

मुफ्त मॉडल में विज्ञापन से कमाई का मौका

मुफ्त OTT मॉडल को एवीओडी (AVOD) कहा जाता है। इसमें दर्शक वीडियो देखने के लिए सीधे सब्सक्रिप्शन फीस नहीं देता। इसके बदले प्लेटफॉर्म कंटेंट के पहले, बीच में या उसके आसपास विज्ञापन दिखाकर कमाई करता है। इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि प्लेटफॉर्म उन दर्शकों तक भी पहुंच सकता है, जो हर महीने सब्सक्रिप्शन का खर्च नहीं उठाना चाहते या भुगतान नहीं करना चाहते। हालांकि, दर्शकों की संख्या बढ़ने से विज्ञापन की कमाई अपने आप नहीं बढ़ती। इसके लिए विज्ञापनदाताओं की मांग, विज्ञापन की कीमत और दर्शकों की भागीदारी भी जरूरी है।

सितंबर 2026 में रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स की रिपोर्ट ने भारत में माइक्रोड्रामा बाजार के जरिये इस अवसर को समझाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, माइक्रोड्रामा के लिए संभावित दर्शक वर्ग 25 से 28 करोड़ लोगों का है, जबकि वित्त वर्ष 2026 में औसतन 1.5 से 1.7 करोड़ लोग हर महीने इसके लिए भुगतान कर रहे थे।

रेडसीर का अनुमान है कि माइक्रोड्रामा से विज्ञापन की कमाई वित्त वर्ष 2026 के करीब 24 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2032 तक 5,000 से 5,500 करोड़ रुपये हो सकती है। यह भविष्य का अनुमान है, सितंबर-अक्टूबर 2026 की वास्तविक विज्ञापन आय नहीं। यह आंकड़ा पूरे OTT बाजार का भी नहीं, बल्कि माइक्रोड्रामा श्रेणी का है।

इससे संकेत मिलता है कि विज्ञापन आधारित मॉडल छोटे वीडियो और धारावाहिक कहानियों वाले कंटेंट में कमाई का नया रास्ता बन सकता है।

पेड सब्सक्रिप्शन की कीमत भी है अहम

पेड OTT मॉडल में दर्शक हर महीने या साल के हिसाब से भुगतान करता है। इसके बदले उसे प्लेटफॉर्म के प्लान के अनुसार फिल्में, वेब सीरीज, खेल और दूसरी सुविधाएं मिलती हैं। लेकिन दर्शक किसी सेवा के लिए कितना खर्च करेगा, यह उसकी जरूरत, बजट और कंटेंट की पसंद पर निर्भर करता है।

12 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित कीमतों की तुलना के अनुसार, जियोहॉटस्टार मोबाइल का शुरुआती प्लान 79 रुपये प्रति माह, नेटफ्लिक्स मोबाइल का 149 रुपये, एमेजॉन प्राइम का 299 रुपये और सोनीलिव प्रीमियम का 399 रुपये प्रति माह है। ये शुरुआती प्लान की कीमतें हैं और सुविधाओं में अंतर हो सकता है।

मसलन, जियोहॉटस्टार के सबसे सस्ते मोबाइल प्लान में विज्ञापन आते हैं और यह मोबाइल डिवाइस तक सीमित है। नेटफ्लिक्स के भारतीय प्लान विज्ञापन रहित हैं। एमेजॉन प्राइम वीडियो में विज्ञापन आते हैं, जबकि विज्ञापन रहित देखने के लिए अतिरिक्त भुगतान का विकल्प उपलब्ध है। सोनीलिव के प्रीमियम प्लान में भी कुछ तरह के कंटेंट पर विज्ञापन दिख सकते हैं।

इसलिए केवल कीमत देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन-सा प्लान सबसे बेहतर है। दर्शक को यह भी देखना होगा कि वह किस डिवाइस पर कंटेंट देखना चाहता है, उसे कितनी स्क्रीन की जरूरत है और क्या उसके पसंदीदा कार्यक्रम उस प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं।

हाइब्रिड मॉडल से बढ़ सकती है कमाई

OTT बाजार में विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन को साथ लेकर चलने वाला मॉडल भी महत्वपूर्ण हो रहा है। इसे हाइब्रिड मॉडल कहा जा सकता है। इसमें प्लेटफॉर्म मुफ्त विज्ञापन आधारित कंटेंट के साथ पेड प्लान भी उपलब्ध कराता है।

इसका फायदा यह है कि कम खर्च करना चाहने वाले दर्शक विज्ञापन देखकर वीडियो देख सकते हैं, जबकि खास कंटेंट या अधिक सुविधाएं चाहने वाले दर्शक सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं।

रेडसीर की अक्टूबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में भारत के माइक्रोड्रामा कारोबार की हर 100 रुपये की कमाई में करीब 99 रुपये सब्सक्रिप्शन से और एक रुपये से भी कम विज्ञापन से आया। रिपोर्ट का अनुमान है कि विज्ञापन की कमाई आगे चलकर इस श्रेणी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

इस आंकड़े को पूरे OTT उद्योग पर लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन यह दिखाता है कि माइक्रोड्रामा जैसे बाजार में विज्ञापन की कमाई बढ़ाने की गुंजाइश है। इसके लिए प्लेटफॉर्म को दर्शकों की संख्या के साथ विज्ञापनदाताओं का भरोसा भी बढ़ाना होगा।

बड़ी स्क्रीन पर बढ़ रही ऑनलाइन वीडियो की पहुंच

OTT बाजार में एक और बदलाव कनेक्टेड टीवी के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़ा है। ऑरमैक्स मीडिया की सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कनेक्टेड टीवी पर ऑनलाइन वीडियो देखने वाले दर्शकों की संख्या 20.69 करोड़ पहुंच गई है। 2025 में यह संख्या 12.92 करोड़ थी। यानी एक साल में करीब 60 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

यह बदलाव विज्ञापनदाताओं और स्ट्रीमिंग कंपनियों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। बड़ी स्क्रीन पर फिल्में, वेब सीरीज और दूसरे कार्यक्रम देखने वाले दर्शकों तक विज्ञापन पहुंचाने के नए अवसर बन सकते हैं। हालांकि, कनेक्टेड टीवी पर वीडियो देखने वाले सभी लोग पेड सब्सक्राइबर नहीं हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में फास्ट (FAST) चैनलों का अनुमानित दर्शक वर्ग 3.52 करोड़ है। इन चैनलों पर इंटरनेट के जरिये लगातार कंटेंट दिखाया जाता है और कमाई मुख्य रूप से विज्ञापन से होती है। यह मॉडल उन दर्शकों के लिए एक विकल्प है, जो पारंपरिक टीवी की तरह लगातार कार्यक्रम देखना चाहते हैं, लेकिन इंटरनेट आधारित सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं।

सब्सक्राइबर को बनाए रखना भी बड़ी चुनौती

OTT प्लेटफॉर्म के लिए नए सब्सक्राइबर जोड़ने के साथ पुराने सब्सक्राइबरों को बनाए रखना भी जरूरी है। कारोबार में इसे चर्न कहा जाता है, यानी वे सब्सक्राइबर जो सब्सक्रिप्शन बंद कर देते हैं या सेवा का इस्तेमाल छोड़ देते हैं।

उदाहरण के लिए, कोई दर्शक किसी खास फिल्म या क्रिकेट टूर्नामेंट के लिए एक महीने का सब्सक्रिप्शन ले सकता है। कंटेंट देखने के बाद अगर उसे आगे कुछ खास नहीं मिलता, तो वह अगली अवधि में भुगतान बंद कर सकता है।

ऐसे में प्लेटफॉर्म को बार-बार नए सब्सक्राइबर जोड़ने पर खर्च करना पड़ता है। दूसरी ओर, मुफ्त सेवाओं में भी चुनौती है कि विज्ञापन बहुत ज्यादा होने पर दर्शक वीडियो देखना बंद कर सकते हैं।

सितंबर-अक्टूबर 2026 के उपलब्ध स्रोतों में पूरे भारतीय OTT बाजार के लिए सब्सक्राइबरों के सब्सक्रिप्शन छोड़ने की कोई एक समान, सत्यापित दर नहीं मिली है। इसलिए यह दावा करना सही नहीं होगा कि बाजार में एक निश्चित प्रतिशत सब्सक्राइबर हर महीने सेवा छोड़ रहे हैं।

दोनों मॉडलों की अपनी जगह

सितंबर और अक्टूबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों से पता चलता है कि भारत में मुफ्त और पेड, दोनों तरह के OTT मॉडल के लिए अवसर मौजूद हैं। सक्रिय पेड सब्सक्रिप्शन में 16 फीसदी की अनुमानित वृद्धि भुगतान आधारित सेवाओं की पहुंच बढ़ने का संकेत देती है। वहीं, माइक्रोड्रामा के लिए रेडसीर के अनुमान बताते हैं कि विज्ञापन आधारित मॉडल भविष्य में अतिरिक्त कमाई का स्रोत बन सकता है।

हालांकि, उपलब्ध आंकड़े यह साबित नहीं करते कि दर्शक मुफ्त मॉडल को पेड मॉडल से ज्यादा पसंद कर रहे हैं या इसका उलटा सच है। इसके लिए दोनों मॉडलों के इस्तेमाल, भुगतान की इच्छा और दर्शकों की पसंद पर तुलनात्मक सर्वेक्षण की जरूरत होगी।

OTT कंपनियों के लिए असली चुनौती यही है कि वे दर्शकों को पसंद का कंटेंट दें, कीमत को उनकी क्षमता के अनुसार रखें और विज्ञापनों से होने वाली कमाई को बढ़ाते हुए देखने का अनुभव खराब न होने दें। आने वाले समय में मुफ्त, पेड और हाइब्रिड मॉडल का साथ-साथ इस्तेमाल ही भारतीय स्ट्रीमिंग बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

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Jio Platforms IPO ने एंकर निवेशकों से जुटाए 8110 करोड़, LIC सबसे बड़ा निवेशक

रिलायंस इंडस्ट्रीज की कंपनी जियो प्लेटफॉर्म्स (Jio Platforms) के आईपीओ को लेकर निवेशकों में काफी दिलचस्पी देखने को मिल रही है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 21 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 21 October, 2026
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रिलायंस इंडस्ट्रीज की कंपनी जियो प्लेटफॉर्म्स (Jio Platforms) के आईपीओ को लेकर निवेशकों में काफी दिलचस्पी देखने को मिल रही है। कंपनी ने शेयर बाजार में आम निवेशकों के लिए आईपीओ खुलने से पहले ही एंकर निवेशकों से 8,110 करोड़ रुपये जुटा लिए हैं। इस निवेश में भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) सबसे आगे रहा है। एलआईसी ने कंपनी के शेयरों में करीब 500 करोड़ रुपये का निवेश किया है।

नियामकीय जानकारी के मुताबिक, जियो प्लेटफॉर्म्स की आईपीओ समिति और बुक-रनिंग लीड मैनेजर्स ने एंकर निवेशकों को कुल 7,24,74,066 इक्विटी शेयर आवंटित किए हैं। इन शेयरों का आवंटन 1,119 रुपये प्रति शेयर की दर से किया गया है, जो तय मूल्य दायरे का ऊपरी स्तर है। हर शेयर का मूल मूल्य 10 रुपये है, जबकि इसमें 1,109 रुपये का प्रीमियम शामिल है।

LIC ने लगाए करीब 500 करोड़ रुपये

एंकर निवेशकों में एलआईसी को सबसे बड़ा आवंटन मिला है। कंपनी को 44,68,128 शेयर आवंटित किए गए हैं, जिनकी कुल कीमत करीब 499.98 करोड़ रुपये है। एंकर निवेशकों को किए गए कुल शेयर आवंटन में एलआईसी की हिस्सेदारी 6.17 प्रतिशत रही।

एलआईसी के अलावा कई बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और संस्थानों ने भी जियो प्लेटफॉर्म्स के शेयरों में निवेश किया है। न्यू वर्ल्ड फंड इंक ने करीब 486.27 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे, जबकि सिंगापुर सरकार को 340.93 करोड़ रुपये के शेयर आवंटित किए गए। वहीं, बीएनपी पारिबा फाइनेंशियल मार्केट्स को 303.25 करोड़ रुपये के शेयर मिले।

कई बड़े वैश्विक निवेशकों ने दिखाई दिलचस्पी

जियो प्लेटफॉर्म्स के एंकर निवेशकों की सूची में दुनिया के कई बड़े निवेश संस्थान शामिल हैं। इनमें कैपिटल ग्रुप, फिडेलिटी इन्वेस्टमेंट्स, ब्लैकरॉक, जेपी मॉर्गन एसेट मैनेजमेंट और श्रोडर्स जैसे नाम शामिल हैं।

इसके अलावा, अबू धाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी और कतर इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी जैसे बड़े सरकारी निवेश संस्थानों ने भी इसमें हिस्सा लिया है। घरेलू म्यूचुअल फंड और बीमा क्षेत्र से जुड़े निवेश संस्थानों ने भी शेयरों के लिए निवेश किया है।

एंकर निवेशक वे बड़े संस्थागत निवेशक होते हैं, जिन्हें आईपीओ खुलने से पहले शेयर आवंटित किए जाते हैं। इनके निवेश को बाजार में कंपनी के प्रति संस्थागत निवेशकों की दिलचस्पी के संकेत के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, इससे आईपीओ की सफलता या शेयर के भविष्य के प्रदर्शन की गारंटी नहीं मिलती।

21 अक्टूबर से आम निवेशकों के लिए खुलेगा IPO

जियो प्लेटफॉर्म्स का आईपीओ बुधवार, 21 अक्टूबर से आम निवेशकों के लिए खुलेगा और शुक्रवार, 23 अक्टूबर को बंद होगा। कंपनी ने प्रति शेयर 1,065 रुपये से 1,119 रुपये का मूल्य दायरा तय किया है।

एंकर निवेशकों को शेयरों का आवंटन इसी मूल्य दायरे के ऊपरी स्तर यानी 1,119 रुपये प्रति शेयर पर किया गया है। अब आम निवेशक तय अवधि के दौरान इस आईपीओ में आवेदन कर सकेंगे।

एंकर निवेशकों से जुटाई गई 8,110 करोड़ रुपये की रकम और वैश्विक निवेश संस्थानों की भागीदारी ने इस आईपीओ को लेकर बाजार की दिलचस्पी बढ़ा दी है। हालांकि, आम निवेशकों की प्रतिक्रिया और शेयर बाजार में कंपनी के प्रदर्शन की तस्वीर आईपीओ की सदस्यता और लिस्टिंग के बाद ही स्पष्ट होगी। 

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बड़ी मीडिया कंपनियां माइक्रोड्रामा पर क्यों लगा रही हैं दांव?

एक-दो मिनट के वर्टिकल एपिसोड वाले माइक्रोड्रामा अब स्टार्टअप का प्रयोग भर नहीं रहे। जी, बालाजी टेलीफिल्म्स और यशराज फिल्म्स जैसे पुराने खिलाड़ी इसमें उतर चुके हैं

Vikas Saxena by
Published - Friday, 16 October, 2026
Last Modified:
Friday, 16 October, 2026
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एक-दो मिनट के वर्टिकल एपिसोड वाले माइक्रोड्रामा अब स्टार्टअप का प्रयोग भर नहीं रहे। जी, बालाजी टेलीफिल्म्स और यशराज फिल्म्स जैसे पुराने खिलाड़ी इसमें उतर चुके हैं और रेड चिलीज एंटरटेनमेंट के भी उतरने की रिपोर्ट्स हैं। दूसरी ओर पॉकेट FM ने अपना माइक्रोड्रामा ऐप पॉकेट TV बंद कर दिया। यह लेख सितंबर-अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट्स के आधार पर देखता है कि कंपनियां क्या खोज रही हैं और स्टूडियो व ऐप की रणनीतियां कैसे अलग हैं।

मार्केट: आंकड़े कितने भरोसेमंद

माइक्रोड्रामा के मार्केट को लेकर अलग-अलग एजेंसियों के अनुमान काफी बिखरे हुए हैं। रेडसीर के अनुसार भारत का माइक्रोड्रामा मार्केट FY26 में करीब 275-280 मिलियन डॉलर था और FY32 तक 2.8 से 3 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। व्हेल्सबुक की 1 अक्टूबर की रिपोर्ट इससे मिलता-जुलता चित्र देती है: FY26 में राजस्व लगभग ₹2,300 करोड़ और यूजर आधार 4 करोड़ रहा, जबकि FY32 तक ₹25,500 करोड़ का लक्ष्य बताया गया है। 

तुलना के लिए 2025 की तस्वीर देखें तो मार्केट का विस्तार बहुत तेज रहा। रेडसीर के अनुसार वार्षिक आवर्ती राजस्व सितंबर 2025 के करीब 125 मिलियन डॉलर से नवंबर 2025 तक लगभग 260 मिलियन डॉलर हो गया, यानी करीब दोगुना। वहीं लुमिकाई का आकलन है कि 2025 में मार्केट करीब 300 मिलियन डॉलर के पार गया। इसके उलट EY-FICCI ने 2025 के लिए मार्केट का आकार ₹6.5 अरब (₹650 करोड़) आंका था और 2028 तक ₹23.2 अरब का अनुमान दिया था।  

सबसे ऊंचा आंकड़ा खुद एक कंपनी का है। Story TV के संस्थापक ने FICCI FRAMES 2026 में कहा कि मार्केट पहले ही 600-700 मिलियन डॉलर का है। लेकिन यह कंपनी का अनुमान है, ऑडिट किया गया इंडस्ट्री-स्तरीय आंकड़ा नहीं। 

इन सबको साथ रखें तो 2025 के आंकड़े ₹650 करोड़ से लेकर 300 मिलियन डॉलर तक बिखरे हैं, इसलिए किसी एक संख्या को अंतिम मानना ठीक नहीं होगा। फिर भी सभी अनुमानों का रुझान एक है: मार्केट तेजी से बढ़ा है। 

बड़ी कंपनियां आखिर क्या खोज रही हैं

  1. सस्ता और तेज प्रयोग: कुछ प्रोडक्शन मॉडल में वर्टिकल ड्रामा का प्रति एपिसोड खर्च ₹20,000-50,000 बताया गया है। एक औसत सीरीज की लागत ₹2.5 से ₹5 लाख है और AI ने बुनियादी खर्च करीब 25% घटाया है। लंबी OTT सीरीज के बड़े दांव की तुलना में स्टूडियो कम पैसे में कई कहानियां आजमा सकते हैं।

  2. पुराने IP की नई विंडो: जी ने एजेंट राघव, संतोषी मां और फियर फाइल्स जैसी प्रॉपर्टी Story TV को छोटे फॉर्मेट के लिए लाइसेंस की हैं और बालाजी व एप्लॉज एंटरटेनमेंट ने भी Story TV से गठजोड़ किया है। पहले से विकसित कहानी को नए दर्शक वर्ग तक ले जाने का यह सबसे सीधा रास्ता है।

  3. दर्शकों का समय: Story TV के COO के अनुसार उनके यूजर अब रोज औसतन 95-100 मिनट बिताते हैं, जबकि करीब एक साल पहले यह 82 मिनट था। ये कंपनी के अपने आंकड़े हैं।

  4. मीडिया घरानों की नई एंट्री: इंडिया टुडे ग्रुप ने 9 अक्टूबर 2026 को Life Tak प्लेटफॉर्म और AI की मदद से बनी रामायण-आधारित सीरीज का टीजर जारी किया, जिसका प्रीमियर 18 अक्टूबर को होना है। 

स्टूडियो बनाम ऐप: कारोबार का फर्क

स्टूडियो के पास कहानी, ब्रैंड और प्रतिभा है। उन्हें डिस्ट्रीब्यूशन और उपयोगकर्ता-डेटा की कमी है, इसलिए वे साझेदारी चुन रहे हैं। यशराज का उदाहरण देखें: YRF ने रस्क मीडिया में रणनीतिक निवेश किया, जिसके तहत वह मौलिक एनिमेशन और वर्टिकल माइक्रोड्रामा IP की रचनात्मक दिशा संभालेगा और रस्क अपने Alright! TV प्लेटफॉर्म पर निर्माण व वितरण करेगा। निवेश की राशि सार्वजनिक नहीं की गई है और शुरुआत में फोकस YRF की मौजूदा फिल्म फ्रेंचाइजी को ढालने के बजाय नई प्रॉपर्टी बनाने पर है। रेड चिलीज के बारे में रिपोर्ट्स के अनुसार वह "शून्य" नाम से प्लेटफॉर्म पर काम कर रही है, पर कंपनी की ओर से पुष्टि नहीं मिल पाई। इसे अभी रिपोर्ट के स्तर पर ही देखना चाहिए।  

जी का दोहरा दांव: BULLET और लाइसेंसिंग।

जी ने खुद को सिर्फ अपने IP बाहर देने तक सीमित नहीं रखा। जून 2025 में जी ने स्टार्टअप BULLET के साथ रणनीतिक इक्विटी साझेदारी की घोषणा की, जिसमें वह हिस्सेदारी लेगा और ऐप ZEE5 के भीतर चलाया जाना था। हिस्सेदारी की राशि का खुलासा नहीं किया गया। दूसरी तरफ वह Story TV को IP लाइसेंस भी देता है, यानी अपना प्लेटफॉर्म भी और तीसरे पक्ष के ऐप पर लाइसेंसिंग भी। BULLET अब पहला साल पूरा कर रहा है और उसकी माइक्रोड्रामा "डेडलाइन" को एशियन एकेडमी क्रिएटिव अवॉर्ड्स 2026 में भारत की सर्वश्रेष्ठ माइक्रो-ड्रामा चुना गया, जो इस श्रेणी का पहला संस्करण था। प्लेटफॉर्म अपनी Trinetra AI तकनीक से 100 से ज्यादा AI-संचालित शीर्षकों की स्लेट बना रहा है। ब्रैंड-फंडेड कंटेंट भी यहां आ रहा है: JK Super Cement की 53-एपिसोड सीरीज "तेरा घर मेरा घर" 21 अगस्त 2026 को BULLET और ZEE5 ऐप पर आई और टाटा मोटर्स कमर्शियल व्हीकल्स ने सितंबर में BULLET के साथ "अपना सुपरस्टार" सीरीज की।

अब फोकस विदेश पर है: 15 अक्टूबर को BULLET ने वैश्विक मार्केट तलाशने के लिए Vitrina से साझेदारी की और वह अपनी AI-आधारित डबिंग व लोकलाइजेशन तकनीक विदेशी ग्राहकों तक भी ले जाना चाहता है। यानी जी माइक्रोड्रामा को घरेलू फॉर्मेट के साथ-साथ निर्यात योग्य तकनीक और कंटेंट के रूप में भी देख रहा है। 

ऐप्स का कारोबार अलग है। उनकी ताकत है उत्पादन की रफ्तार और दर्शकों का डेटा। Story TV रोज पांच-छह नए शो जारी करता है और उसकी लाइब्रेरी में 5,000 से ज्यादा माइक्रोड्रामा हैं। लेकिन कमजोरी भी साफ है। ज्यादातर प्लेटफॉर्म अपने लगभग 99% राजस्व के लिए सब्सक्रिप्शन और एपिसोड-पेवॉल पर निर्भर हैं और 89% यूजर सोशल मीडिया फीड से कंटेंट खोजते हैं, इसलिए मार्केटिंग का खर्च भारी पड़ता है। इसी वजह से 40 मिलियन यूजर के बावजूद प्लेटफॉर्म मुनाफे के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

पॉकेट TV: एक बंद प्रयोग और उसका सबक

पॉकेट TV एक बीटा प्रोडक्ट था जो करीब पांच महीने चला। कंपनी ने 25 जून 2026 को इसे बंद करने की पुष्टि की और कहा कि यह उसके कारोबार में महत्वपूर्ण योगदान नहीं देता था। फोर्ब्स के अनुसार सीईओ रोहन नायक ने कम यूजर रिटेंशन और महंगे प्रोडक्शन को वजह बताया। फोर्ब्स का अनुमान है कि पिछले 12 महीनों में पॉकेट का कुल राजस्व करीब 40 करोड़ डॉलर रहा। कंपनी के अनुसार उसके कारोबार का बड़ा हिस्सा ऑडियो से आता है।

कहानी यहीं नहीं रुकती। कंपनी करीब दो महीने बाद "पॉकेट सागा" नाम के नए ऐप के साथ माइक्रोड्रामा में लौट आई। नायक का दावा है कि यह ऐप हर महीने 10 लाख डॉलर से ज्यादा कमा रहा है। यह कंपनी का अपना दावा है और स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं है। निष्कर्ष यह निकलता है कि पॉकेट FM ने फॉर्मेट को नहीं, बल्कि लाइव-एक्शन वीडियो वाले अपने मॉडल की अर्थव्यवस्था को खारिज किया। 

कंटेंट अधिकार: असली लड़ाई यहां है

सवाल अब यह है कि माइक्रोड्रामा कौन बना सकता है, इससे आगे बढ़कर यह कि उन कहानियों पर नियंत्रण किसका है जिन्हें बार-बार ढाला, बांटा और भुनाया जा सके। इसके उदाहरण:

  • प्रतिलिपि की Double Tap Films: कंपनी के अनुसार उसके पास 2 करोड़ से ज्यादा कहानियां और 20 लाख से ज्यादा लेखक हैं और इन कहानियों को हर महीने 80 करोड़ से ज्यादा बार पढ़ा जाता है। सितंबर में उसने फ्लिपकार्ट के साथ 30 माइक्रोड्रामा शीर्षकों की कंटेंट साझेदारी की, जो किसी भारतीय ई-कॉमर्स ऐप के साथ उसका पहला गठजोड़ है। मोहल्ला टेक भी 75 से ज्यादा प्रतिलिपि कहानियों को ढाल रही है।  

  • बंटी हुई वैल्यू चेन: कहानी एक कंपनी के पास हो सकती है, निर्माण दूसरी के पास और वितरण तीसरी के पास। EPIC और रस्क 50 मौलिक सीरीज की स्लेट से शुरुआत कर अगले साल के मध्य तक 250 से ज्यादा शीर्षकों का लक्ष्य रख रहे हैं। 

  • IP में हिस्सेदारी: फिल्मकार कुशल श्रीवास्तव का तर्क है कि IP में हिस्सा न हो तो निर्माता सिर्फ विक्रेता बनकर रह जाता है। 

यानी लाइसेंस की अवधि, व्युत्पन्न (derivative) अधिकार और राजस्व-बंटवारा तय करने वाले अनुबंध ही यह तय करेंगे कि फायदा स्टूडियो को मिलेगा या प्लेटफॉर्म को। यह मेरा विश्लेषण है। सौदों की शर्तें अक्सर सार्वजनिक नहीं होतीं।

कब सफल होगा यह निवेश

  1. रिटेंशन और ग्राहक-अधिग्रहण की लागत: जब तक 89% खोज सोशल फीड पर निर्भर है, मार्केटिंग मुनाफा खाती रहेगी। सब्सक्रिप्शन पर निर्भरता से चर्न का जोखिम बढ़ता है, इसलिए विज्ञापन-समर्थित मॉडल की ओर झुकाव बढ़ रहा है, हालांकि ब्रैंड सेफ्टी और ROI मापने की चुनौतियां हैं।  

  2. मात्रा नहीं, टिकाऊ IP: बड़ी संख्या में शो बनाना तभी कारगर है जब उनमें से कुछ फ्रेंचाइजी बनें। सितंबर के एक लेख में उद्धृत फिल्मकार युब्राज भट्टाचार्य का मत है कि शीर्ष रचनात्मक प्रतिभा को आकर्षित करने लायक गंभीर निवेश अभी नहीं दिखता।  

  3. लागत पर नियंत्रण, गुणवत्ता से समझौता नहीं: AI से करीब 25% की बचत फायदेमंद है, पर कहानी की गहराई बनी रहनी चाहिए।

  4. भूमिकाओं का बंटवारा: स्टूडियो कहानी में, ऐप्स डिस्ट्रीब्यूशन और डेटा में और टेक कंपनियां लोकलाइजेशन में माहिर हों, तो साझेदारी हर पक्ष का जोखिम घटाती है।

  5. वास्तविक मार्केट आकार: ऊपर दिए अनुमानों में भारी अंतर है। निवेश तब सुरक्षित होगा जब राजस्व के स्वतंत्र, ऑडिट योग्य आंकड़े सामने आएं।

कुल मिलाकर, बड़े स्टूडियो माइक्रोड्रामा को अंतिम मंजिल नहीं, IP की सस्ती प्रयोगशाला के रूप में देख रहे हैं। ऐप्स के लिए यह दर्शक जोड़ने और टिकाए रखने की दौड़ है। इनमें से जो भी पक्ष स्वामित्व वाली कहानियों और टिकाऊ कमाई को जोड़ पाएगा, उसकी स्थिति मजबूत होगी।

 

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Netflix में बड़ा बदलाव, अब पीटर राइस संभालेंगे कंटेंट की कमान

नेटफ्लिक्स ने वॉल्ट डिज्नी के पूर्व अधिकारी पीटर राइस को अपना नया चीफ कंटेंट ऑफिसर नियुक्त किया है।

Samachar4media Bureau by
Published - Friday, 16 October, 2026
Last Modified:
Friday, 16 October, 2026
Peter854

नेटफ्लिक्स ने वॉल्ट डिज्नी के पूर्व अधिकारी पीटर राइस को अपना नया चीफ कंटेंट ऑफिसर नियुक्त किया है। वह बेला बजेरिया की जगह लेंगे, जो करीब एक दशक तक कंपनी से जुड़ी रहने के बाद नेटफ्लिक्स छोड़ रही हैं। राइस 26 अक्टूबर से अपनी नई जिम्मेदारी संभालेंगे।

इस भूमिका में राइस नेटफ्लिक्स के वैश्विक कंटेंट कारोबार की कमान संभालेंगे। उनके जिम्मे अलग-अलग देशों में बनने वाली स्क्रिप्टेड और अनस्क्रिप्टेड सीरीज, फिल्मों और लाइव इवेंट्स की देखरेख होगी। स्क्रिप्टेड कंटेंट में तय कहानी और पटकथा के आधार पर बनने वाले कार्यक्रम शामिल होते हैं, जबकि अनस्क्रिप्टेड कंटेंट में रियलिटी शो और दूसरे ऐसे कार्यक्रम आते हैं, जिनकी कहानी पहले से तय नहीं होती।

डिज्नी और फॉक्स में काम करने का अनुभव

राइस इससे पहले वॉल्ट डिज्नी टेलीविजन के चेयरमैन और वॉल्ट डिज्नी कंपनी में जनरल एंटरटेनमेंट के चेयरमैन रह चुके हैं। डिज्नी में उनकी जिम्मेदारी के दायरे में एबीसी, एफएक्स, हुलु, नेशनल ज्योग्राफिक और कंपनी के टेलीविजन स्टूडियो शामिल थे।

डिज्नी से पहले राइस ने 21st सेंचुरी फॉक्स में वरिष्ठ पदों पर काम किया था। वह फॉक्स सर्चलाइट पिक्चर्स का नेतृत्व भी कर चुके हैं। उनके कार्यकाल में इस स्टूडियो की कई चर्चित फिल्में रिलीज हुईं, जिनमें स्लमडॉग मिलियनेयर, जूनो और लिटिल मिस सनशाइन शामिल हैं।

बेला बजेरिया के कार्यकाल में बढ़ा अंतरराष्ट्रीय कंटेंट

बेला बजेरिया 2016 में नेटफ्लिक्स से जुड़ी थीं और जनवरी 2023 में उन्हें चीफ कंटेंट ऑफिसर बनाया गया था। उनके कार्यकाल में कंपनी ने अलग-अलग देशों की कहानियों और कार्यक्रमों पर अपना ध्यान बढ़ाया। इस दौरान स्क्विड गेम और ब्रिजर्टन जैसी सीरीज दुनियाभर में लोकप्रिय हुईं।

नेटफ्लिक्स ने इस दौरान लाइव कार्यक्रमों के क्षेत्र में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाई। इसके लिए कंपनी ने डब्ल्यूडब्ल्यूई और एनएफएल के साथ साझेदारी की। इन कदमों के जरिए नेटफ्लिक्स पारंपरिक फिल्मों और सीरीज से आगे बढ़कर लाइव मनोरंजन और खेलों के प्रसारण में भी अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

करीब 1,000 एम्प्लॉयीज की छंटनी के बीच बदलाव

राइस की नियुक्ति ऐसे समय हुई है, जब नेटफ्लिक्स अपने कारोबार में बड़े बदलाव कर रहा है। बेला बजेरिया के कंपनी छोड़ने की घोषणा से एक दिन पहले नेटफ्लिक्स ने एम्प्लॉयीज को करीब 1,000 नौकरियों में कटौती करने की जानकारी दी थी। यह कंपनी के कुल एम्प्लॉयीज का लगभग 6 प्रतिशत है। 2022 के बाद कंपनी की यह सबसे बड़ी छंटनी बताई गई है।

YouTube और TikTok से बढ़ रही चुनौती

नेटफ्लिक्स के सामने अब दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए यूट्यूब और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म से भी कड़ी चुनौती है। इन प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में यूजर खुद वीडियो और दूसरे तरह का कंटेंट बनाते हैं। इस वजह से इनके कारोबार का खर्च उठाने का तरीका नेटफ्लिक्स से काफी अलग है।

ऐसे में नेटफ्लिक्स के लिए केवल नए सब्सक्राइबर जोड़ना ही काफी नहीं रह गया है। कंपनी इस बात पर भी ज्यादा ध्यान दे रही है कि दर्शक उसके प्लेटफॉर्म पर कितना समय बिताते हैं और कितनी नियमितता से कंटेंट देखते हैं। इसे एंगेजमेंट कहा जाता है।

कंपनी की विकास रणनीति में विज्ञापन, लाइव इवेंट्स और खेलों की भूमिका भी बढ़ रही है। नेटफ्लिक्स इन क्षेत्रों के जरिए दर्शकों को लंबे समय तक अपने प्लेटफॉर्म से जोड़े रखने और कमाई के नए रास्ते बनाने की कोशिश कर रहा है।

कंटेंट रणनीति के लिए अहम होगी नई जिम्मेदारी

पीटर राइस की नियुक्ति ऐसे समय हुई है, जब नेटफ्लिक्स के लिए कंटेंट का मतलब केवल फिल्में और सीरीज बनाना नहीं रह गया है। कंपनी खेलों, लाइव मनोरंजन और ऐसे कार्यक्रमों पर भी ध्यान दे रही है, जिन्हें दर्शक तय समय पर देखना पसंद करते हैं।

राइस के सामने एक ओर अलग-अलग देशों के दर्शकों के लिए लोकप्रिय कंटेंट तैयार करने की जिम्मेदारी होगी, तो दूसरी ओर कारोबार की लागत पर भी ध्यान देना होगा। कंपनी में छंटनी और कंटेंट के बदलते स्वरूप के बीच उनकी भूमिका नेटफ्लिक्स की आगे की रणनीति के लिहाज से अहम मानी जा रही है। 

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