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मनोज बाजपेयी के संघर्ष व हुनर का अफसाना है पत्रकार पीयूष पांडे की ‘कुछ पाने की जिद’
मुंबई पहुंचने वाले हर युवा का सपना सच नहीं होता, लेकिन कुछ हासिल करने की जिद पाल ली जाए और उसके लिए मेहनत की अति कर दी जाए तो सफलता इंसान की मुट्ठी में आ ही जाती है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago
मीतेन रघुवंशी, वरिष्ठ पत्रकार।।
‘कुछ पाने की जिद’ किस तरह एक सामान्य से व्यक्ति को फर्श से अर्श पर पहुंचा सकती है, इसकी मिसाल है अभिनेता मनोज बाजपेयी के संघर्ष की कहानी। मुंबई पहुंचने वाले हर युवा का सपना सच नहीं होता, लेकिन कुछ हासिल करने की जिद पाल ली जाए और उसके लिए मेहनत की अति कर दी जाए तो सफलता इंसान की मुट्ठी में आ ही जाती है। मनोज बाजपेयी की बायोग्राफी को पढ़ते हुए बार बार अहसास होता है कि उनके संघर्ष की दास्तां को हर उस युवा को पढ़ना चाहिए, जो किसी भी क्षेत्र में नाम बनाना चाहता है। मनोज बाजपेयी की बायोग्राफी हाल में बाजार में आई है, जिसे लिखा है वरिष्ठ पत्रकार पीयूष पांडे ने।
अब कुछ किस्सों पर गौर फरमाइए-
मनोज के नाटक कौशल का एक उदाहरण उनके पिता राधाकांत बाजपेयी देते हैं। उन्होंने मुझे बताया, ‘एक बार ‘गार्जियन डे’ पर हम मनोज के स्कूल गए। वहां मनोज एक नाटक में हिस्सा ले रहा था। इसमें मनोज एक देहाती पंडित के चेले का रोल निभा रहा था। नाटक के एक दृश्य में पंडित जी और उनका चेला (मनोज) मंच पर आते हैं। चेला मिट्टी के एक बर्तन में मिठाई लाकर पंडित जी को देता है। पंडितजी बर्तन से एक-एक रसगुल्ला निकालकर खाते हैं। चेला उन्हें ललचाई नजर से देखता है। अचानक संवाद बोलते हुए एक रसगुल्ला पंडित जी के हाथ से फिसलकर मंच पर गिर जाता है। लेकिन जैसे ही रसगुल्ला स्टेज पर गिरता है, चेला फुर्ती से रसगुल्ला उठाता है और मुंह में डाल लेता है। ये सीन नाटक का हिस्सा नहीं था। लेकिन जिस चपलता से मनोज ने यह किया, उसे देखकर दर्शकों ने खूब तालियां बजाईं। नाटक के मध्यांतर में मनोज मुझसे मिलने आया तो मैंने पूछा कि क्या वो हरकत नाटक का हिस्सा थी। वो बोला-नहीं। मैंने पूछा कि फिर कैसे किया? तो बोला-बस दिमाग में आया तो कर दिया। मुझे उसी वक्त लग गया था कि ये लड़का कुछ इधर-उधर का ही करेगा। इस नाटक का नाम था ‘बेमेल ब्याह’। इस नाटक में पहली बार मनोज ने बिना जाने वो कारनामा किया था, जिसे थिएटर और सिनेमा की भाषा में ‘इंप्रूवाइजेशन’ कहा जाता है।’
बेतिया के एक लड़के के लिए दिल्ली पहुंचना किसी सपने से कम नहीं था। दिल्ली का रंग ढंग मनोज के लिए अबूझ था। मनोज कहते हैं, ‘दिल्ली के शुरुआती दिनों की बात है। मुझे कुछ पता नहीं था। आलम ये कि मुझे 302 नंबर की बस पकड़ने को कहा गया तो मैं दो घंटे तक कमला नगर बस स्टॉप पर बसों की रजिस्ट्रेशन नंबर की प्लेट तकता रहा।’ इस किताब में 21 अध्याय हैं, जिसके शुरुआती अध्याय मनोज की पारिवारिक पृष्ठभूमि और मनोज के फिल्मी लत लगने के किस्सों से पटी पड़ी है। मनोज बाजपेयी कैसे बेतिया में फिल्म देखते हुए एक थिएटर में ऐसी लड़ाई में उलझ गए कि चाकू चल गए, उनके खिलाफ एफआईआर हो गई और उन्हें गोरखपुर भागना पड़ा-ऐसे तमाम किस्से किताब की शुरुआत में हैं।
पीयूष ने बेहद सरल भाषा में किताब को लिखा है और कई जगह उनका फिल्मी लेखन का अनुभव झलकता है, क्योंकि किताब पढ़ते हुए दृश्य दिमाग में कौंधने लगता है। खुद मनोज बाजपेयी ने एक इंटरव्यू में अपनी बायोग्राफी के विषय में कहा, ‘मुझे जीवन के कई पुराने किस्से याद आ गए, जिन्हें मैं भूल चुका था। पीयूष ने बहुत मेहनत से किताब को लिखा है और वो उन लोगों तक पहुंच गए हैं, जिनका मेरे जीवन में बहुत निकट संबंध रहा है।’ मनोज बाजपेयी की इस बायोग्राफी में कई ऐसे प्रसंग भी हैं, जिन्हें लेकर अभी तक ज्यादा कुछ नहीं लिखा गया या कहें कि इंटरनेट पर कोई जानकारी नहीं है। मसलन, उनकी पहली शादी के विषय में। या अनुराग कश्यप और रामगोपाल वर्मा से उनकी लड़ाई की असल वजह के विषय़ में।
मनोज बाजपेयी की इस जीवनी को उन लोगों के मनोज के विषय में अनुभव और खास बनाते हैं, जो उनसे बहुत करीब से जुड़े रहे हैं। लेखक ने अनुराग कश्यप, अनुभव सिन्हा, पीयूष मिश्रा, मकरंद देशपांडे, पंकज त्रिपाठी, प्रकाश झा, महेश भट्ट समेत कई नामचीन लोगों से बात की और उनकी बातों को मनोज की कहानी में इस तरह पिरोया है कि यह सब लोग कहानी का हिस्सा मालूम होते हैं।पेंगुइन इंडिया ने इस किताब को प्रकाशित किया है और हिंदी के बाद अंग्रेजी, मराठी और गुजराती संस्करण प्रकाशित होने वाले हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
किताब का नाम- मनोज बाजपेयी : कुछ पाने की जिद
लेखक- पीयूष पांडे
पेज- 218
पब्लिशर- पेंगुइन इंडिया
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