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JioStar ने बदली अपनी रेवेन्यू स्ट्रैटजी, टीवी व डिजिटल सेल्स अब अलग-अलग
'जियोस्टार' (JioStar) ने एक बार फिर अपनी कमाई यानी रेवेन्यू की स्ट्रैटजी में बड़ा बदलाव किया है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 1 day ago
'जियोस्टार' (JioStar) ने एक बार फिर अपनी कमाई यानी रेवेन्यू की स्ट्रैटजी में बड़ा बदलाव किया है। कंपनी ने अब टीवी और डिजिटल सेल्स टीमों को अलग कर दिया है। साथ ही टीवी के लिए पहले वाला चैनल-आधारित सेल्स मॉडल दोबारा लागू कर दिया है।
यानी अब बड़े और छोटे ग्राहकों (LCS और SMB) के आधार पर काम करने की व्यवस्था खत्म कर दी गई है। कंपनी अब फिर से उसी पुराने तरीके पर लौट आई है जिसमें हर चैनल या चैनल क्लस्टर की अलग सेल्स जिम्मेदारी होती है।
मर्जर के बाद अपनाया गया था नया मॉडल
नवंबर 2024 में Viacom18 और Disney Star के विलय के बाद JioStar बना था। उस समय कंपनी ने टीवी और डिजिटल सेल्स को एक साथ जोड़ दिया था। टीमों को चैनल के बजाय क्लाइंट के आकार के हिसाब से बांटा गया था। कुछ लोग बड़े क्लाइंट संभालते थे, कुछ एजेंसियां और कुछ छोटे-मध्यम व्यवसाय। उस दौरान एक ही टीम टीवी और डिजिटल दोनों प्लेटफॉर्म पर सेल्स करती थी। यह मॉडल उस समय लागू किया गया था जब अजीत वर्गीज एंटरटेनमेंट के रेवेन्यू हेड थे।
फिर हुआ नेतृत्व में बदलाव
जुलाई 2025 में अजीत वर्गीज के मैडिसन जाने के बाद महेश शेट्टी को एंटरटेनमेंट का रेवेन्यू हेड बनाया गया। हाल ही में कंपनी ने LCS और SMB वाला मॉडल खत्म कर दिया और टीवी के लिए पारंपरिक चैनल-आधारित ढांचा वापस ले आई। अब महेश शेट्टी की टीम में अनुराधा माथुर, प्रशांत शेट्टी, मिल्रेड रॉयअन (साउथ) और पवित्रा केआर शामिल हैं, जो टीवी स्ट्रक्चर के तहत काम कर रहे हैं।
डिजिटल सेल्स अब अलग वर्टिकल
टीवी में बदलाव के साथ ही डिजिटल सेल्स को भी अलग कर दिया गया है। कंपनी ने भास्कर रमेश को एंटरटेनमेंट डिजिटल सेल्स का हेड बनाया है। वह सीधे एंटरटेनमेंट के CEO केविन वज को रिपोर्ट करेंगे। पहले महेश शेट्टी टीवी और डिजिटल दोनों का रेवेन्यू देखते थे, लेकिन अब दोनों की जिम्मेदारियां अलग-अलग कर दी गई हैं।
पहले क्या था मकसद?
मर्जर के बाद कंपनी का मकसद था कि विज्ञापनदाताओं को एक ही जगह से टीवी और डिजिटल दोनों का पैकेज मिल जाए। जैसे क्रिकेट टूर्नामेंट जैसे बड़े इवेंट्स में ब्रैंड टीवी पर बड़ी पहुंच (रीच) लेते थे और डिजिटल पर टारगेटिंग और दोबारा दिखने (फ्रीक्वेंसी) का फायदा उठाते थे। इससे कंपनी को रेट तय करने और पैकेज बनाने में भी ताकत मिलती थी।
लेकिन टीवी और डिजिटल की भाषा अलग
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि टीवी और डिजिटल की सेल्स की “भाषा” अलग होती है। टीवी में बात होती है TRP, स्पॉन्सरशिप और लंबे समय के ब्लॉक डील्स की। यह रिश्तों और बड़े नेगोशिएशन पर चलता है। वहीं डिजिटल में इम्प्रेशन, टारगेटिंग, डेटा, परफॉर्मेंस और ऑप्टिमाइजेशन की बात होती है। यहां टेक्निकल समझ और लगातार मॉनिटरिंग जरूरी होती है।
कुछ सीनियर अधिकारियों का मानना है कि एक ही टीम से दोनों को संभालना मुश्किल हो जाता है। इसलिए अलग-अलग फोकस से काम बेहतर हो सकता है।
मार्केट में अलग-अलग राय
कुछ एजेंसी अधिकारियों का कहना है कि अलग-अलग करने से मार्जिन और रेट कंट्रोल बेहतर हो सकता है। लेकिन कुछ ब्रैंड्स का मानना है कि पहले वाला संयुक्त मॉडल खरीदारी को आसान बनाता था। एक ही पैकेज में टीवी और डिजिटल मिल जाता था, जिससे प्लानिंग आसान थी।
कुछ एक्सपर्ट्स का यह भी कहना है कि यदि टीवी और डिजिटल टीमें अलग-अलग काम करेंगी तो अंदरूनी प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनी के टॉप मैनेजमेंट दोनों के बीच तालमेल कैसे बनाए रखता है।
अब आने वाले महीनों में साफ होगा कि यह नया ढांचा कंपनी के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित होता है या विज्ञापनदाताओं के लिए नई चुनौतियां लेकर आता है।
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