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‘लैंगिक समानता और मानवाधिकार अविभाज्य, आधारभूत और बिना शर्त हैं’

लैंगिक समानता और मानवाधिकार अविभाज्य, आधारभूत और बिना शर्त हैं, यह कहना है संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य अधिकार पर विशेष प्रतिवेदक, डॉ. त्लालेंग मोफ़ोकेंग का।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 8 months ago

शोभा शुक्ला, सिटीजन न्यूज़ सर्विस।।

लैंगिक समानता और मानवाधिकार अविभाज्य, आधारभूत और बिना शर्त हैं, यह कहना है संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य अधिकार पर विशेष प्रतिवेदक, डॉ. त्लालेंग मोफ़ोकेंग का। यदि सतत विकास लक्ष्यों पर सबके लिए खरा उतरना है तो हमें सभी लक्ष्यों पर खरा उतरना होगा। यदि सरकारें चंद लक्ष्यों की ओर कार्य करेंगी और बाक़ी को नज़रअंदाज़ करेंगी, तो हम सभी लक्ष्यों पर असफल होंगे क्योंकि सतत विकास लक्ष्य तो एक-दूसरे पर निर्भर हैं।

आईपीपीएफ की डॉ. हरज्योत खोसा ने कहा कि कोविड महामारी के दौरान, समाज के हाशिए पर रह रहे समुदाय के लोगों ने सबसे अधिक त्रासदी झेली क्योंकि वह स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और जेंडर न्याय संबंधित सभी तरह की सेवाओं से वंचित हो गए थे। कोविड के दौरान महिला हिंसा बढ़ रही थी। यदि हम समाज के हाशिए पर रह रहे लोगों को स्वास्थ्य व्यवस्था को परिवर्तित और सुधारने में शामिल करेंगे तो ही वह जेंडर न्याय और मानवाधिकार के मापदंडों ने अनुकूल बन सकेगी। वह 78वें विश्व स्वास्थ्य असेंबली के दौरान जिनेवा में आयोजित एक विशेष सत्र को संबोधित कर रही थीं। इस सत्र को आयोजित करने में ग्लोबल सेंटर फॉर हेल्थ डिप्लोमेसी एंड इंक्लूज़न, सीएनएस, आईपीपीएफ, आदि संगठनों का योगदान रहा।

क्या स्वास्थ्य प्रणाली जेंडर संवेदनशील है? डॉ. हरज्योत खोसा ने कहा कि यह विवेचना करनी चाहिए कि क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था जेंडर संवेदनशील है? क्या वह सिर्फ़ 'पारंपरिक रूप से सही' शादीशुदा महिला और पुरुष के लिए संवेदनशील है और बाक़ी विभिन्न जेंडर के लोगों के लिए या जिन्होंने शादी या बच्चे न करने का निर्णय लिए है, उनके लिए भी संवेदनशील है? स्वास्थ्य व्यवस्था में भी पित्तरात्मकता व्याप्त है इसीलिए इसका ईमानदारी से मूल्यांकन कर के इसको सुधारने की ज़रूरत है जिससे कि कोई भी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित न रहे।

डोमिनिकन रिपब्लिक के डॉ. एलिज़र लपोट्स एब्रो जो हेल्थ हॉरिज़न्स से जुड़े हैं, ने कहा कि उनके मरीज़ों को सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था इसलिए मना कर दी जाती है क्योंकि या तो वह स्थानीय भाषा नहीं बोलतीं या फिर उनके पास नागरिकता के पूरे दस्तावेज़ नहीं हैं। डॉ. एलिज़र के एक महिला मरीज़ को सर्वाइकल कैंसर का इलाज सरकारी अस्पताल में मना हो गया क्योंकि उसको स्थानीय भाषा नहीं आती थी। जब, अनुवादक साथ गया तो सरकारी अस्पताल ने कहा कि नागरिकता के दस्तावेज़ के बिना कैंसर का इलाज नहीं मिलेगा।

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज या यूएचसी का क्या मायने हैं यदि हम भेदभाव करेंगे और जीवनरक्षक स्वास्थ्य सेवाएं लोगों को नहीं देंगे?

पब्लिक सर्विसेज इंटरनेशनल के बाबा आए ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान होने वाली मृत्यु में से 13% सिर्फ़ असुरक्षित गर्भपात के कारण होती हैं। दो-तिहाई स्वास्थ्य-कर्मी महिला हैं पर कई देशों की कानून और व्यवस्था ने सुरक्षित गर्भपात पर प्रतिबंध लगा रखा है।

लेप्रोसी (कुष्ठ रोग), जेंडर न्याय, मानवाधिकार और सतत विकास: लेप्रोसी या कुष्ठ रोग, जिसे "हैनसेन रोग" के नाम से भी जाना जाता है, एक पुरानी बीमारी है जो सदियों से मानव इतिहास का हिस्सा रही है और कलंक तथा गलत धारणाओं में लिपटी हुई है। यह एक दीर्घकालिक संक्रामक रोग है जो माइको-बैक्टीरियम लेप्री नामक जीवाणु के कारण होता है।

कुष्ठ रोग का इलाज मल्टी-ड्रग थेरेपी (बहु-औषधि चिकित्सा) से संभव है। रोग की गंभीरता को देखते हुए यह इलाज 1 से लेकर 2 वर्षों तक चल सकता है। लेकिन अगर इस रोग का शुरुआती चरण में पता नहीं लगाया जाता और इलाज नहीं किया जाता है, तो प्रभावित व्यक्ति में स्थायी विकलांगता और विकृति हो सकती है, जिनके चलते समुदाय में ऐसे व्यक्तियों और उनके परिवार के सदस्यों के प्रति भेदभाव व्याप्त होता है। यदि कुष्ठ रोग की जल्दी जांच हो, सही इलाज बिना-विलंब मिले, तो शारीरिक विकृति भी नहीं होती और सही इलाज शुरू होने के 72 घंटे बाद से रोग फैलना भी बंद हो जाता है।

तब क्यों कुष्ठ रोगियों को भेदभाव और शोषण झेलना पड़ता है? कुष्ठ रोग का इलाज पूरा कर चुकी सुश्री माया रनवाड़े जो एसोसिएशन फॉर पीपल अफेक्टेड बाय लेप्रोसी की अध्यक्ष हैं, ने कहा कि कुष्ठ रोग से गुज़र चुकी लड़कियों और महिलाओं को अनेक गुणा अधिक शोषण और भेदभाव झेलना पड़ता है। इसी शोषण और भेदभाव के कारण लोग स्वास्थ्य सेवा से लाभान्वित नहीं हो पाते।

माया रनवाड़े का कहना है कि कुष्ठ रोग से प्रभावित महिलाओं को अनेक संघर्ष करने पड़ते हैं। पित्तरात्मक सामाजिक व्यवस्था के कारण उनको अधिक झेलना पड़ता है। कार्यस्थल तक पर पुरुषों की तुलना में उनको कम दिहाड़ी या दैनिक आय मिलती है। यदि कुष्ठ रोग से प्रभावित महिलाओं की ज़िंदगी सुधारनी है तो जेंडर-आधारिक अन्याय भी समाप्त करने होंगे।

भारत में एचआईवी के साथ जीवित लोगों के संगठन (नेशनल कोएलिशन ऑफ़ पीपल लिविंग विथ एचआईवी इन इंडिया) की सह-संस्थापिका और पूर्व अध्यक्ष दक्षा पटेल ने सराहा कि भारत सरकार ने एचआईवी के साथ जीवित लाखों लोगों को जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवाएं मुहैया करवायी हैं, अनेक सरकारी एचआईवी स्वास्थ्य सेवा केंद्रों के कारण लोग स्वस्थ और भरपूर जीवन जी पा रहे हैं। परंतु उनकी अपील है कि एचआईवी के साथ जीवित लोगों को भी सरकारी सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज योजनाओं के तहत लाभार्थी बनाया जाये जिससे कि एचआईवी के अलावा अन्य स्वास्थ्य सेवाएं भी उन्हें सम्मान और अधिकार स्वरूप समय से मिल सकें।

अफगानिस्तान में मानवाधिकार और मानवीय संकट के खतरे सभी के लिए गहरा रहे हैं, लेकिन महिलाओं समेत जेंडर विविध लोगों की स्थिति और भी गंभीर है। उन्हें तालिबान अधिकारियों से हिंसा, और यहां तक कि मौत, का भी गंभीर खतरा है।

अफ़ग़ानी महिलाओं की स्थिति भी बहुत दयनीय है। अफ़गानिस्तान की एक समलैंगिक महिला परवीन ने अपनी हृदय विदारक कहानी सुनाते हुए कहा कि उन्हें लगातार उत्पीड़न और जोखिम का सामना करना पड़ रहा है।

वह मार्च 2025 का एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन था जब परवीन और उनकी प्रेमिका मरियम ने एक ट्रांसजेंडर दोस्त मावे के साथ अफ़ग़ानिस्तान छोड़ के ईरान जाने की कोशिश की। लेकिन मामला उलट गया। तालिबान ने मरियम और मावे को पकड़ कर हिरासत में ले लिया और तब से वे कैद में हैं। सौभाग्य से परवीन हवाई अड्डे पर सुरक्षा जांच से गुजरने में सफल रही क्योंकि उसका भाई उसके पुरुष संरक्षक के रूप में उसे अनुमति देने हेतु हस्ताक्षर करने के लिए सहमत हो गया। जब तक तालिबान परवीन की तलाश में हवाई अड्डे पर पहुंचे, तब तक उसका विमान उड़ान भर चुका था।

तालिबान परवीन की तलाश कर रहे हैं। लेकिन वह अपनी लड़ाई जारी रखने के लिए दृढ़ संकल्प है क्योंकि वह नहीं चाहती कि भविष्य में किसी अन्य जेंडर विविध व्यक्ति को तकलीफ़ उठानी पड़े।

परवीन के सहयोगी नेमत सादत हैं, जो रोशनिया (जेंडर विविध अफ़गानों की सहायता के लिए समर्पित एक नेटवर्क है) के अध्यक्ष हैं। नेमत उन पहले अफ़गानों में से एक हैं जिन्होंने 2013 में खुले तौर पर अपने समलैंगिक होने की बात स्वीकार की थी और जेंडर विविध लोगों के अधिकारों के लिए अभियान चलाया।

नेमत ने बताया "हमारे पास 1,000 से ज़्यादा जेंडर विविध लोगों की सूची है जो अभी भी अफ़गानिस्तान में रह रहे हैं। आज तक हमने 265 लोगों को पश्चिमी देशों और ओमान में सुरक्षित पहुचाने में मदद की है और हमें उम्मीद है कि परवीन भी सुरक्षित जगह पर पहुँच जाएँगी, हालाँकि अभी उनका भविष्य बहुत अनिश्चित लग रहा है।"

दक्षिण सूडान में चल रही लड़ाई और कलह ने जेंडर विविध समुदाय, एचआईवी के साथ जीवित लोगों, यौनकर्मी, और विकलांग व्यक्ति जैसे हाशिए पर रह रहे लोगों को आघात पहुंचाया है। उन्हें शारीरिक हिंसा, घरेलू हिंसा और यौन शोषण का सामना करना पड़ रहा है।

दक्षिण सूडान में महिला अधिकारों पर कार्यरत और डबल्यूईसीएसएस की अध्यक्ष रेचल अडाऊ के अनुसार साउथ सूडान की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली टूट रही है। मातृ और बाल स्वास्थ्य सेवाएं बहुत बुरी स्थिति में हैं। संक्रामक रोगों का जोखिम भी बढ़ गया है। अभी दक्षिण सूडान में नदी के दूषित पानी के कारण हैजा का प्रकोप फैला हुआ है। नदी के किनारे रहने वाले लोगों को साफ पानी नहीं मिल पा रहा है। संघर्ष के कारण खाद्य असुरक्षा होने से युवतियों तथा गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं और पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण और एनीमिया अधिक है। लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर भी बहुत अधिक है। इन सबके परिणामस्वरूप मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ भी पैदा हो रही हैं।

दक्षिण सूडान में दो न्यायिक प्रणालियाँ हैं - संविधान और प्रथागत पारंपरिक कानून। परंपरा के अनुसार, पुरुष ही कमाते हैं। महिलाओं के पास संसाधनों तक पहुंच नहीं है, निर्णय लेने की पहुंच नहीं है, नेतृत्व में उनकी कोई आवाज़ नहीं है क्योंकि उन्हें अल्पसंख्यक माना जाता है। संविधान के अनुसार दक्षिण सूडान में सभी महिलाओं को समान अधिकार हैं, लेकिन वे कानूनों के खराब क्रियान्वयन के कारण उनका प्रयोग करने में असमर्थ हैं। उदाहरण के लिए, भले ही उनके पास संपत्ति रखने का कानूनी अधिकार है , लेकिन अक्सर उन्हें इस अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। साथ ही महिला हिंसा के अपराधियों को सज़ा नहीं मिलती।

क्या सरकारें अगले माह जेंडर न्याय और स्वास्थ्य अधिकार पर ठोस निर्णय लेंगी? जुलाई 2025 में भारत समेत दुनिया के सभी देश, संयुक्त राष्ट्र उच्च-स्तरीय राजनीतिक फोरम में सतत विकास लक्ष्यों पर हुई प्रगति का मूल्यांकन करेंगे - इनमें जेंडर और स्वास्थ्य से संबंधित लक्ष्य प्रमुख हैं। आशा है कि सभी सरकारें, मानवाधिकार के पक्ष्य में ठोस निर्णय लेंगी।

(शोभा शुक्ला, सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस) की संस्थापिका-संपादिका हैं और लखनऊ-स्थित लोरेटो कॉलेज की भौतिकी विज्ञान की सेवानिवृत्त वरिष्ठ शिक्षिका हैं। उनको ‘एक्स’ पर पढ़ें: @Shobha1Shukla)


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