कंटेंट और पहुंच दोनों के मामले में बड़े हिट साबित होंगे ये प्लेटफॉर्म्स: अविनाश पांडेय

एबीपी नेटवर्क के सीईओ अविनाश पांडेय के अनुसार, स्थानीय अर्थव्यवस्था के उदय होने से पिछले कुछ वर्षों में रीजनल न्यूज में काफी बढ़ोतरी हुई है और इस क्षेत्र में निवेश का यह सबसे सही समय है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Thursday, 26 August, 2021
Last Modified:
Thursday, 26 August, 2021
Avinash Pandey

‘एबीपी नेटवर्क’ (ABP Network) ने अपने विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाते हुए इस साल अप्रैल में तमिल बोलने और समझने वालों के लिए तमिल भाषा में 'एबीपी नाडु' (ABP Nadu) नाम से डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च किया था। इसके बाद पिछले दिनों दक्षिण के मार्केट में अपना विस्तार करते हुए नेटवर्क ने तेलुगु बोलने और समझने वालों के लिए तेलुगु भाषा में ‘एबीपी देसम‘ (ABP Desam) नाम से डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च किया।

इस बारे में हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ एक बातचीत में ‘एबीपी नेटवर्क’ के सीईओ अविनाश पांडेय ने बताया कि दक्षिण के मार्केट में इंटरनेट की पहुंच ज्यादा है, जिससे डिजिटल की ओर बदलाव हो रहा है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि कैसे अपनी डिजिटल न्यूज पेशकशों के साथ नेटवर्क इसका अधिकतम लाभ उठा रहा है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:  

‘एबीपी देसम‘ के बारे में कुछ बताएं। क्या यह महज एक और विस्तार है या फिर यह मजबूत विकास से प्रेरित है, जिसे आपने ‘एबीपी नाडु‘ के लॉन्च के बाद देखा है?

‘एबीपी देसम‘ एक आधुनिक ब्रांड है जो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की स्थानीय सच्चाई को दर्शाता है। न्यूज को इस तरह के फॉर्मेट में पहले कभी नहीं दिया गया है। इसका उद्देश्य युवा, आधुनिक और प्रगतिशील तेलुगु मानसिकता को आकर्षित करना है।

स्थानीय अर्थव्यवस्था के आगे आने से पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय समाचारों में तेजी से वृद्धि हुई है। इसलिए दक्षिण के मार्केट में काफी अवसर हैं, क्योंकि लोग जानना चाहते हैं कि उनके आस-पास क्या हो रहा है। इसलिए, निश्चित रूप से डिजिटल कंटेंट का बिजनेस स्थानीय भाषा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

वास्तव में, हाल ही में लॉन्च हुआ हमारा प्लेटफॉर्म ‘एबीपी नाडु‘ अपने आगमन के बाद से केवल दो महीनों में ही तमिल दर्शकों को आकर्षित करने में कामयाब रहा है और इसके 3.2 मिलियन यूजर्स हो गए हैं। डिजिटल के क्षेत्र में बढ़ती संभावनाओं को देखते हुए ही हमने ‘एबीपी देसम‘ को लॉन्च करने का फैसला लिया। इससे दक्षिण के मार्केट में हमारी मौजूदगी का विस्तार हुआ है और मुझे विश्वास है कि निकट भविष्य में ‘एबीपी नाडु‘ और ‘एबीपी देसम‘ जैसे प्लेटफॉर्म्स कंटेंट और पहुंच दोनों के मामले में काफी बड़े हिट साबित होंगे।

कंटेंट प्लान के बारे में थोड़ा बताएं, इस प्लेटफॉर्म के लिए आपने किन्हें लक्षित किया है यानी आपके टार्गेट ऑडियंस कौन हैं?

स्थानीय भाषा में कंटेंट उपलब्ध के उद्देश्य से ‘एबीपी देसम‘ ने दक्षिण के मार्केट में कदम रखा है। इसकी टैगलाइन 'मन वार्तालु, मन ऊरी भाषालो!" रखी गई है, जिसका हिंदी में मतलब 'हमारी खबर, हमारे शहर की भाषा में' है। इसका मतलब साफ है इस प्लेटफॉर्म का उद्देश्य तेलुगु रीडर्स को उनकी भाषा में न्यूज उपलब्ध कराना है।

जैसा कि मैंने पहले बताया कि ‘एबीपी देसम‘ का उद्देश्य युवा, आधुनिक और प्रगतिशील तेलुगु मानसिकता को आकर्षित करना है। हम तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों के कोने-कोने से विशुद्ध स्थानीय न्यूज को कवर करने पर फोकस कर रहे हैं। हम व्यापक न्यूज पैकेज देते हैं, जिसमें स्थानीय मुद्दों से लेकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरें और विभिन्न जॉनर्स जैसे-खेल, मनोरंजन, राजनीति व अर्थव्यवस्था की खबरें शामिल होती हैं। कंटेंट की गुणवत्ता और विश्वसनीयता के साथ-साथ हमने यूजर एक्सपीरिएंस को बेहतर बनाने पर भी फोकस किया है।

‘एबीपी नाडु’ के बाद अब आपने दक्षिण मार्केट पोर्टफोलियो में ‘एबीपी देसम’ को शामिल किया है। इस मार्केट को लेकर आपका अगला बड़ा प्लान क्या है?

हम वर्तमान में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मार्केट्स में लगातार विकास सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। दक्षिण के मार्केट में विस्तार करने की फिलहाल हमारी और कोई योजना नहीं है।

इनमें से आपकी अधिकांश पेशकश डिजिटल को लेकर क्यों हैं?  क्या समानांतर न्यूज चैनल्स चलाने की भी कोई योजना है?

कोविड के दौर में, हर तरह से डिजिटल मीडिया ने अपनी क्षमता दिखाई है। कोविड के सामने आने से पहले ही डिजिटल आगे बढ़ रहा था। महामारी के कारण जब लॉकडाउन लगाया गया तो डिजिटल मीडिया की ग्रोथ में और तेजी आ गई। इसके साथ ही यदि हम दक्षिण के मार्केट की बात करें तो यहां इंटरनेट की पहुंच काफी ज्यादा है। जिसने डिजिटल की ओर बदलाव करने में काफी अहम भूमिका निभाई है।

हम वर्तमान में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में डिजिटल में अपना विस्तार करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं क्योंकि इन बाजारों में विकास की अपार संभावनाएं हैं। और यह अभी के लिए हमारी प्राथमिकता बनी हुई है।

इन प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापनदाताओं के प्रोफाइल के बारे में कुछ बताएं। ये आपके रेगुलर न्यूज चैनल एडवर्टाइजर्स से किस तरह समान अथवा अलग हैं? एक ब्रैंड के रूप में क्या आप अपने क्लाइंट्स को एकीकृत सौदे (integrated deals) की पेशकश कर रहे हैं?

इन प्लेटफार्म्स पर ब्रॉडकास्ट किए जाने वाले कंटेंट से सिर्फ कंटेंट अलग होता है। विज्ञापनदाताओं का प्रोफाइल कमोबेश एक जैसा ही है। बिल्कुल, हम अपने क्लाइंट्स को एकीकृत सौदे (integrated deals) की पेशकश कर रहे हैं। ये सौदे ब्रैंड्स के मीडिया प्लान को आगे बढ़ाने में काफी लाभकारी होते हैं। इसके साथ ही इस तरह के सौदे छोटे/नए विज्ञापनदाताओं को इस डर के बिना कि वे बड़े बजट का जोखिम उठा रहे हैं, धीरे-धीरे डिजिटल स्पेस में आने में मदद करते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

दुर्भाग्य है कि आज की पत्रकारिता सिर्फ ग्लैमर में फंसकर रह गई है: श्रवण गर्ग

वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के पास 50 साल से भी अधिक पत्रकारिता का अनुभव है। इतने वर्षों में उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी और गुजराती के विभिन्न अखबारों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 16 October, 2021
Last Modified:
Saturday, 16 October, 2021
Shravan Garg

वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के पास 50 साल से भी अधिक पत्रकारिता का अनुभव है। इतने वर्षों में उन्होंने अंग्रेजी, हिंदी और गुजराती के विभिन्न अखबारों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है। एक रिपोर्टर और सब-एडिटर के रूप में अपनी यात्रा शुरू करने वाले श्रवण गर्ग ने शीर्ष संपादकीय दायित्वों का निर्वहन किया है। प्रस्तुत हैं समाचार4मीडिया की उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-

आपने अपने जीवन के 50 वर्ष पत्रकारिता को दिए हैं। अपने प्रारंभिक जीवन और शिक्षा के बारे में कुछ बताइए।

मेरी शिक्षा तो सरकारी स्कूल में ही हुई है। उस समय सिर्फ सरकारी स्कूल में जिनकी फीस भी बेहद कम होती थी, मेरे ख्याल से मेरी फीस कोई 25 पैसे महीना थी। लेकिन अब वो सरकारी इमारतें ध्वस्त हो चुकी हैं। उनके साथ भी वही हुआ है, जैसा बाकी सरकारी संस्थानों के साथ होता आया है। चिमनी की रोशनी में पढ़े, नंगे पैर चले और किराए की साइकिल लेकर 15 रुपये महीने में ट्यूशन पढ़ाकर काम चलाते थे।

जीवन में ऐसा अनुभव होता है कि बचपन देखा ही नहीं, परिवार और मेरा दोनों का संघर्ष चलता रहा। वैसे मैं छोटी उम्र में ही पढ़ने-लिखने लग गया था, इसलिए शायद मन हमेशा से लेखन में ही रहा। इंजीनियरिंग भी की और कलकत्ता (अब कोलकाता) नौकरी करने भी गया, लेकिन 1966 में नौकरी छोड़कर वापस आ गया। तबसे आज तक पत्रकारिता ही कर रहा हूं। इंग्लिश, हिंदी और गुजराती भाषा में भी काम किया, पूरा देश घूमा और खूब अनुभव लिया।

आपने पत्रकारिता की पढ़ाई कहां से की? उसके बारे में बताइए।

देखिए, ये पढ़ाई तो बस एक बहाना है। इस फील्ड की कोई पढ़ाई नहीं होती है, ये तो जीवन से निकलती है। वैसे, भारतीय विद्या भवन से पढ़ाई की। उसके बाद स्कॉलरशिप पर लंदन, ऑस्ट्रिया, जापान जैसी जगह पर भी सीखने का मौका मिला, लेकिन मेरा कहना है कि ये पत्रकारिता तो जीवन के अनुभव से आती है।

हमारी पत्रकारिता पश्चिम से थोड़ी अलग है। वैसे हमारे यहां अखबार और प्रिंटिंग मशीन आजादी के काफी पहले ही आ गए थे, लेकिन फिर भी हमारी पत्रकारिता आजादी से निकली हुई है। वैसे भी आजकल तो लगभग हर नागरिक ही पत्रकारिता कर रहा है, उसके पास न तो डिग्री है और न ही अनुभव है। जिसके मन में जो आ रहा है, वो बोले जा रहा है। इसलिए मुझे लगता है कि आज तो देश में करोड़ों पत्रकार हैं। जो मुख्यधारा के पत्रकार हैं, वो भी सरकार के नजदीक ही नजर आ रहे हैं।

आपने 70 के दशक में बिहार आंदोलन को देखा, किताब भी लिखी, उस अनुभव के बारे में बताएं।

वो तो बड़े रोमांचक अनुभव रहे थे। उस समय इंदिरा जी के खिलाफ आंदोलन था और उस समय मैं जयप्रकाश नारायण जी के साथ सहयोगी के तौर पर था। मैं पूरे देश में उन दिनों घूम रहा था। उस समय हम ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ में काम कर रहे थे और उस दौर में काम करने का एक अलग ही रोमांच था। आपातकाल लागू हो गया था और लगातार पाबंदी लगाई जा रही थी। उस दौर में भी हमने काम करने का साहस दिखाया था, आज के समय को देखकर ऐसा लगता है कि कुछ डरे हुए पत्रकार हैं या कुछ गुलाम पत्रकार हैं। उस समय स्पष्ट था कि कौन पत्रकार समर्थन में है और कौन विरोध में है! आज किसी पत्रकार को देखकर आप अंदाजा नहीं लगा सकते हैं कि वो क्या करेगा?

वो दौर अलग था और उस समय के पत्रकार और लेखन शैली वापस नहीं लाई जा सकती है। आज लोगों को सिर्फ एकतरफा जानकारी मिल रही है, जो उनके लिए ठीक नहीं है। उस समय मोबाइल नहीं थे और पत्रकार फील्ड पर होता था, उसे किसी भी हालत में शाम तक अपनी स्टोरी टाइप करने वापस आना होता था, क्योंकि उस जमाने में हम टाइपराइटर पर लिखा करते थे। उस समय एक जुनून था, जिसकी आज मुझे कमी नजर आती है। दुर्भाग्य है कि आज की पत्रकारिता सिर्फ ग्लैमर में फंसकर रह गई है और एंकर पर निर्भर हो गई है। और देखिए मैं कोई आरोप नहीं लगा रहा हूं। दरअसल, आज जब हम किसी एंकर को कोसते हैं तो वो गलत है, क्योंकि उसके पीछे एक पूरी टीम काम करती है। कई बार संस्थान के कुछ ऐसे हित होते हैं, जो हमें दिखाई नहीं देते हैं और हम पूरा दोष कई बार एंकर पर लगा देते हैं। आज टीवी में आपको क्राइम, स्पोर्ट्स और ग्लैमर ही दिखाई देता है और आजकल तो पॉजिटिव न्यूज का भी एक दौर आ गया है।

आपने चंबल के डाकुओं का आत्मसमर्पण देखा है। आपकी किताब भी काफी प्रसिद्ध हुई। उस दौर के अनुभव बताइए।

आज के समय में वो अनुभव करना कठिन है। उस समय करीब 500 गिने-चुने डाकू थे, लेकिन आज देखा जाए तो लाखों-करोड़ों ‘डाकू’ हो गए हैं। अप्रैल 1972 में डाकुओं का समर्पण हुआ और उसे मैंने बड़े करीब से अनुभव किया था। वो भी एक बड़ा रोमांचक अनुभव था, जब चंबल में रहना पड़ा। उस दौर की कल्पना करना ही आज मुश्किल है। खूंखार डाकुओं से मैंने बात की और उनके इंटरव्यू भी किए। उनके आत्मसमर्पण की पक्रिया भी काफी लंबी चली थी।

उस समय सरकारों से बात करना, उनसे सहमति लेना बड़ा काम था। मैं आपको बता दूं कि इस कार्य की बुनियाद बिनोवा भावे ने 1960 में रखी थी, उनके सामने भी डाकुओं का आत्मसमर्पण हुआ था। आज तो समर्पण इस समाज से खत्म हो गया है, सीधे एनकाउंटर कर दिया जाता है। उस समय जयप्रकाश नारायण को इंदिरा जी और एमपी के सीएम से समर्थन भी मिला था, जब उन्होंने डाकुओं के आत्मसमर्पण की बात की थी।

हमने अक्सर ऐसा सुना है कि उस जमाने में डाकू सिर्फ अमीरों को परेशान करते थे, महिलाओं-बच्चों को नहीं मारते थे। क्या आपने ये सब अनुभव किया, जब उनसे बात की?

आदमी डाकू क्यों बनता था? दरअसल, वो एक ऐसे तबके से ताल्लुक रखता था, जिसको प्रताड़ित किया गया है। इसलिए उसको लोगों से मदद मिलती थी। गांव के लोगों से भी मदद मिलती थी। डाकू के पास कोई बैंक तो होता नहीं तो वो धन गरीबों में बांट देता था। उस समय तो आदमी सिर्फ अपमान का बदला लेने के लिए कई बार डाकू बन जाता था। आज भी हमारे यहां नक्सल की समस्या है। उस समय डाकू थानों को लूटकर हथियार जमा कर लेते थे। हालांकि किसी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता है। जेपी आंदोलन का तो मकसद ही यही था कि हिंसा से सदैव दूर रहना है। उस समय राजमाता सिंधिया जी तो साफ़ कहती थीं कि इनका महिमामंडन नहीं होना चाहिए। वो डाकुओं के समर्पण के बिल्कुल खिलाफ थीं।

आपने जीवन के 50 साल मीडिया को दिए हैं। क्या कुछ ऐसे लोग याद आते हैं, जिनका व्यक्तित्व अद्वितीय था! जिनकी लेखन क्षमता मन को मोहने वाली थी? 

मैंने तो इन 50 सालों में हिंदी और अंग्रेजी के जितने भी बड़े नाम हैं, सबके साथ काम किया है। जिस छत के नीचे उन्होंने काम किया, उसी छत के नीचे मैंने भी काम किया है। कुछ नाम मैं लेना चाहूंगा और जिनमें पहले हैं राजेंद्र माथुर जी,  उनके साथ मैं काफी जुड़ा रहा और मेरे भावनात्मक संबंध भी उनके साथ थे। उनकी ईमानदारी, बेबाक बोलना, उनकी लेखन क्षमता आज भी याद आती है। दूसरे हैं प्रभाष जोशी जी, उनके साथ वर्षों काम करने का मौका मिला और शानदार अनुभव रहे। इसके अलावा वेद प्रताप वैदिक जी, उनके साथ भी बड़े अच्छे संबंध रहे और आज भी हैं।

ऐसे बहुत नाम हैं लेकिन ये तीन का नाम मैं प्रमुखता से लेना चाहूंगा। आज हिंदी मीडिया के जितने भी बड़े संपादक हैं, उन्होंने मेरे साथ कभी न कभी काम किया है और सब अच्छे हैं, जवान हैं और अच्छा काम कर रहे हैं। कई बड़े संपादक ‘नई दुनिया‘ से निकले हैं और उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वो एक लोकतांत्रिक अखबार है। उस समय में इस अखबार का एमपी ही नहीं, बल्कि पूरे देश में बड़ा नाम था लेकिन आज वो चीज बची नहीं है। आज के समय में अगर आप मुझसे पूछेंगे कि हिंदी का कौन सा अखबार आप पढ़ना चाहेंगे तो मुझे आधा घंटा सोचना पड़ेगा कि मैं आपके सवाल का क्या जवाब दूं? जब मैं ‘दैनिक भास्कर‘ में था तो दबाव हमारे ऊपर भी आता थे, लेकिन हम उसे झेलते थे। उस समय हमारे मालिकों का हमें पूरा समर्थन होता था। आज के समय में जिस तरह एक विचारधारा का प्रभाव मीडिया पर आ गया है, उस दौर में मालिकों के लिए भी बड़ा मुश्किल हो गया है।

समाचार4मीडिया के साथ श्रवण गर्ग की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

मीडिया में आप जीवन के इतने आयाम देख लेते हैं, जो कहीं और संभव नहीं हैं: पंकज शर्मा

कांग्रेस नेता और वरिष्ठ पत्रकार पंकज शर्मा ने अपनी जीवन यात्रा के बारे में समाचार4मीडिया के साथ बातचीत की है। इस इंटरव्यू में आप उनके जीवन के कुछ ऐसे पहलू जान पाएंगे, जो आपको अब तक ज्ञात नहीं हैं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 09 October, 2021
Last Modified:
Saturday, 09 October, 2021
Pankaj Sharma

कांग्रेस नेता और वरिष्ठ पत्रकार पंकज शर्मा ने अपनी जीवन यात्रा के बारे में समाचार4मीडिया के साथ बातचीत की है। इस इंटरव्यू में आप उनके जीवन के कुछ ऐसे पहलू जान पाएंगे, जो आपको अब तक ज्ञात नहीं हैं। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए। मीडिया में कैसे आना हुआ?

मेरा जन्म तो मध्य प्रदेश के चंबल इलाके में हुआ है। मेरे पिता सरकारी अधिकारी थे और गांधीवादी विचारों को मानते थे। मेरे ऊपर उनका बड़ा प्रभाव रहा। मेरा बचपन तो आप यूं कह लीजिए कि चंबल के बीहड़ों और आदिवासी इलाकों में ही बीता है। माध्यमिक शिक्षा तक कस्बे तक आना हुआ और आगे की पढ़ाई शहरों में हुई है। इंदौर से मुझे पोस्ट ग्रेजुएशन करने का मौका मिला। चूंकि मेरे नानाजी अध्यापक थे, तो मेरी पट्टी पूजा भी ननिहाल में ही हुई थी। गर्मियों की छुट्टी में अक्सर वहां जाने का मौका मिल जाया करता था और काफी कुछ सीखने को मिलता था। जहां तक बात मीडिया जगत में आने की है तो मैंने ऐसा कभी कुछ सोचा नहीं था। छात्र जीवन से ही पढ़ने लिखने का शौक था, इसके अलावा वाद विवाद और निबंध प्रतियोगिता में भी मैं विजयी रहता था तो शायद इसका असर मुझ पर था। वहीं मेरे पिताजी तो चाहते थे कि बेटा पढ़-लिखकर सरकारी अधिकारी ही बने, लेकिन मैं उतना मेधावी नहीं था। मेरा ध्यान दूसरी गतिविधियों में अधिक रहता था-जैसे खेलकूद, वाद-विवाद और साहित्य में, तो मेरे सरकारी अधिकारी या डॉक्टर बनने की संभावना शून्य ही थी।

जब मैंने बीएससी में दाखिला लिया तो मैं प्रायोगिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया था। इसके बाद तो मुझे पिताजी ने भी कह दिया कि विज्ञान तुम्हारे बस का नहीं है। इसके बाद मैंने अपनी आगे की पढ़ाई कला संकाय से की। इसके बाद मेरे जीवन में कुछ अहम मोड़ आए। दरअसल, राजेंद्र माथुर जी से तो छात्र जीवन से मेरा परिचय था, उस समय ‘नई दुनिया‘ अखबार पूरे देश और प्रदेश में प्रसिद्ध था। उस समय ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ का अपना खुद का एक प्रशिक्षण संस्थान था और वो पूरे देश से सिर्फ दो हिंदी पत्रकारों को चुनते थे। इसके बाद मुंबई में उनको प्रशिक्षण दिया जाता था और उसके बाद उन्हें नौकरी दी जाती थी। साल 1979 में मैंने एमए फाइनल की परीक्षा दी ही थी कि वो विज्ञापन निकला और मेरे मन में भी इच्छा जाग उठी। उसमें चयनित होने के लिए किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर 4000 शब्दों का एक लेख लिखकर देना होता था फिर अगर उनको ठीक लगता तो आगे जो चयन के चरण थे, उनको आपको पार करना होता था।

उस समय अटल जी विदेश मंत्री थे और चीन का दौरा बीच में छोड़कर आ गए थे। मैंने उसी मुद्दे पर लेख लिखा और मेरा चयन आगे के चरण के लिए हुआ। इस लेख को लिखने के लिए राजेंद्र माथुर जी ने न सिर्फ मुझे मार्गदर्शन दिया बल्कि मुझे ‘नई दुनिया‘  का पुस्तकालय भी मुहैया करवाया गया। लेख के बाद एक लिखित परीक्षा होती थी और उसके बाद अंतिम चरण साक्षात्कार होता था। मेरा सौभाग्य रहा कि मेरा चयन किया गया और मुझे एक वर्ष के उस प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए चुना गया। काम मुझे मुंबई ही करना था, लेकिन उन्होंने मुझे दिल्ली भेजा और इस प्रकार मुझे ‘टाइम्स ग्रुप‘ के साथ जुड़ने का मौका मिला और ‘नवभारत टाइम्स‘ के साथ जो मेरी यात्रा शुरू हुई, वो कभी खत्म नहीं होने वाली थी। मैंने जब मीडिया छोड़ा तब भी मैं वहीं था। मैंने अपने जीवन में कभी कोई दूसरी नौकरी नहीं की है।

जैसा कि आपने बताया कि ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ समूह खुद ही पत्रकारों को प्रशिक्षित करता था, जरा उसके बारे में कुछ बताइए।

उस समय में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में चयनित होने का मतलब बड़ी सफलता माना जाता था। हमें टाइपिंग सिखाई जाती थी और स्टेनोग्राफी भी, इसके अलावा बहुत कुछ पढ़ाया और सिखाया जाता था। पत्रकारिता के क्या नियम कायदे और कानून हैं, इसकी समझ भी विकसित की जाती थी। इसके अलावा बीच-बीच में छोटे प्रोजेक्ट्स पर भी काम करवाया जाता था। वहीं एक अखबार भी निकलता था तो उसमें भी काम करने का मौका मिलता था। इसके अलावा अखबार की प्रिंटिंग कैसे होती है, वो सिखाया और समझाया जाता था। आज समस्या यह है कि तमाम पत्रकारों को इस बात की जानकारी ही नहीं है कि आपका अखबार छपने की पूरी प्रक्रिया क्या है। उस समय एक जुड़ाव होता था। अपने लिखे हुए को मुद्रित देखना एक सुखद अनुभव होता था, पर आज के समय में उस भावना की कमी मैं महसूस करता हूं।

जैसा कि आपने बताया कि आपने एक संस्थान में ही नौकरी की है तो आप उस दौर के अपने अनुभव के बारे में कुछ बताइए।

अनुभव तो बेहद ही शानदार रहे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि ये मीडिया एक ऐसी दुनिया है, जिसमें आप जीवन के इतने आयाम देख लेते हैं, जो कहीं और संभव नहीं है। मैंने साहित्यकारों, राजनेताओं और समाजसेवियों के इंटरव्यू तो लिए ही हैं, पर भिंडरावाला जैसे आतंकी तक के इंटरव्यू करने का मुझे मौका मिला। मीडिया ही एक ऐसा पेशा है, जिसमें आपको दुनिया भर के लोगों से मिलने-जुलने का मौका मिलता है, इंटरव्यू करने का मौका मिलता है और समझने का भी मौका मिलता है। जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे, तो श्रीलंका में भारत ने शांति सेना भेजी थी। उस समय जाफना के जंगलों से भी मैंने रिपोर्टिंग की है। वो एक ऐसा समय था, जब रिपोर्टिंग करने के खुलकर मौके दिए जाते थे। मुझे बहुत अच्छा लगता है, जब मैं अपने उन दिनों को याद करता हूं। मैंने जो लिखा है, उस पर मैं एक किताब भी लाने की सोच रहा हूं और जब भी मैं उसे पढ़ता हूं तो मुझे अच्छा लगता है कि आज के दौर से तो कम से कम उसकी तुलना नहीं हो सकती है।

अपने रिपोर्टिंग के दिनों में कोई ऐसी घटना याद आती है जो आप साझा करना चाहेंगे?

बिल्कुल, पंजाब के स्वर्ण मंदिर की घटना हम सबको याद है। उस समय आतंक अपने चरम पर था। उसके कई किस्से दिल में हैं। इसके अलावा जब एक बार मैं अमेरिकी सरकार के बुलावे पर वहां गया था तो मुझे पता चला कि किसी खालिस्तान के आतंकी ने अपनी सरकार वहां बना रखी थी और खुद स्वयंभू प्रेजिडेंट बनकर राज कर रहे थे। मैं उनसे मिला, उन्होंने मुझसे कहा कि आजकल पत्रकार के रूप में भी ‘रॉ‘ (RAW) के एजेंट घूमते हैं और ऐसी कई बातें मुझसे कहीं। अंत में जब मैं जाने लगा तो मुझसे कहा कि पंकज जी आपसे अगली मीटिंग अब खालिस्तान में होगी। मैंने उनसे कहा कि आपका ये सपना तो पूरा हो नहीं पाएगा।

इसके बाद वो मुझे उनके साहित्य, वीडियो कैसेट, ऑडियो कैसेट का एक बैग देने लगा, फिर उन्होंने मुझसे कहा कि ये हम आपके पते पर पहुंचा देंगे, लेकिन हुआ ये कि वो मेरे भारत के पते पर चला गया और उस समय ऐसा संवेदनशील पार्सल किसी के घर जाना बड़ी बात थी तो आईबी के लोग मेरे घर आ गए और उस वक्त सिर्फ मेरी पत्नी वहीं थी। हालांकि उस समय राजेश पायलट जी थे और पीएम भी जानते थे, अखबारों में मेरी स्टोरी छप ही रही थी, तब जाकर आईबी वालों ने इस घटना को हल्के में लिया। मैं तो बस एक ही बात कहता हूं कि मेरे मीडिया के सफर में सड़कों की धूल से पाला पड़ा है, जंगलों की ख़ाक छानी है और आलीशान होटलों में पैर भी पसारे हैं। एक बात और मैं आपको बताऊं कि उड्डयन मंत्रालय से जुड़ी खबरों को तो समाचार पत्रों में जगह ही नहीं दी जाती थी, फिर मैंने इस विषय पर लिखना शुरू किया। एसपी सिंह ने मुझे मौका दिया तो उस समय भी नेवी, आर्मी और अधिकारियों के साथ खूब घूमने का मौका मिलता था।

आपने अपने इस सफर में कई बड़े पत्रकारों और संपादकों के साथ काम किया होगा। किसी की याद आती है, जिसने आपको निखारा हो?

इस विषय में तो मैं दो-तीन लोगों का नाम लेना चाहूंगा। एक राहुल बारपुते जी जो कि ‘नई दुनिया‘ के प्रधान संपादक थे। मैं कभी उनके साथ काम नहीं कर पाया, लेकिन मेरी लेखनी पर उनका प्रभाव सदैव रहा है। मैं उनसे अक्सर मिलता भी रहता था। इसके अलावा पत्रकारिता के संस्कार मेरे अंदर राजेंद्र माथुर जी से आए। एक सकारात्मक सोच उनके मार्गदर्शन में मेरी बनी। आखिर में एसपी सिंह, उनके अंदर एक अलग प्रकार की चेतना और समझ थी, उन्होंने मुझे बहुत काम करने का मौका दिया। मेरे जीवन में इन तीन लोगों का मार्गदर्शन मेरे बहुत काम आया है।

आपने ‘नवभारत टाइम्स‘ में कई पदों पर कार्य किया है। आपको ऐसा नहीं लगता कि आपको संपादक होना चाहिए था? क्यों नहीं बने?

मुझे लगता है कि मुझे इस पद पर बिठाना किसी के लिए आसान नहीं होता। वैसे मुझे ऐसा लगता है कि राजेंद्र माथुर जी का इतना जल्दी दुनिया से चले जाना मेरे संपादक बनने की राह का सबसे बड़ा रोड़ा था। अगर वो जीवित होते तो मैं जरूर संपादक बनता। वैसे भी मेरे जैसे व्यक्ति के साथ समाजोयन कर पाना बड़ा कठिन काम है। मैं हर काम को अकेले ही करना पसंद करता हूं। इसलिए मुझे लगता है कि मैं संपादक शायद ही बन पाता और मैं अपने जीवन से खुश हूं।

आपने मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के मीडिया सलाहकार के तौर पर काम किया है। क्या आपने मीडिया पर दबाब बनाया?

आपने बहुत अच्छा सवाल किया है। मैं आपको बताऊं कि जब मैं कमलनाथ जी का मीडिया सलाहकार बना तो मैंने पहले ही दिन उनसे कह दिया कि मैं मीडिया में सरकार का नहीं, बल्कि सरकार में मीडिया का प्रतिनिधि हूं और मैं जो काम करूंगा मीडिया के हित में करूंगा और वही मैंने किया था। मुझे इस बात की ख़ुशी है की इस बाबत मुझे कमलनाथ जी का पूरा सहयोग प्राप्त हुआ।

वर्तमान में आप कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं, वहां आपको क्या जिम्मेदारी मिली हुई है, उसके बारे में कुछ बताइए।

जब मैंने ‘एनबीटी‘ छोड़ा तो सोनिया गांधी जी ने मुझे कांग्रेस के मुखपत्र ‘कांग्रेस संदेश‘ में काम करने का मौका दिया। करीब तीन साल तक मैं उस मुखपत्र से जुड़ा रहा। उसके बाद जब वह अध्यक्ष बनीं तब उन्होंने मुझे राष्ट्रीय सचिव बना दिया। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के हिंदी विभाग में मुझे राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी मिली हुई है। बात रही योजनाओं की तो मैं मानता हूं कि आपकी बनाई गई योजनाओं से कुछ नहीं होता है और राजनीति में तो आप भूल ही जाइए। वर्तमान में इंदौर लोकसभा में सक्रिय हूं और मैंने तो तय किया हुआ है कि जब भी मौका आएगा, जीतने के लिए या हारने के लिए ही सही, मैं लोकसभा का चुनाव लडूंगा। नमस्कार।

समाचार4मीडिया के साथ पंकज शर्मा की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

अगर आप हार्डकोर रिपोर्टर नहीं हैं तो कभी भी अच्छे एंकर नहीं बन सकते हैं: भूपेंद्र चौबे

वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे वर्तमान में ‘इंडिया अहेड’ (India Ahead) के एडिटर-इन-चीफ हैं। इन्होंने मीडिया जगत को बड़ी बारीकी से जाना और समझा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Saturday, 02 October, 2021
Last Modified:
Saturday, 02 October, 2021
Bhupendra Chaubey

वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे वर्तमान में ‘इंडिया अहेड’ (India Ahead) के एडिटर-इन-चीफ हैं। इन्होंने मीडिया जगत को बड़ी बारीकी से जाना और समझा है। समाचार4मीडिया के साथ एक खास बातचीत में भूपेंद्र चौबे ने अपने इस सफर के बारे में विस्तार से बताया है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

आपने एक लंबा सफर मीडिया में तय किया है। अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताइए।

मेरा जन्म बनारस में हुआ, मेरे पिताजी (अब दिवंगत) दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक थे। मेरी चार बड़ी बहनें थीं और मैं सबसे छोटा था। पढ़ाई वैसे ही हुई जैसे एक मिडिल क्लास के बच्चे की होती है। चीजों को संभाल कर रखना, एक-एक पैसा बचाकर चलना, सच कहूं तो वो संस्कार आज भी मेरे अंदर जीवित हैं। हमारे पास स्कूल फीस भरने तक के पैसे कई बार नहीं होते थे, इसलिए उस कठिन समय की छाप आज भी मेरे अवचेतन पर मौजूद है लेकिन वो समय बेहद सुखद भी था। दरअसल, सबके पास एक-दूसरे के लिए समय होता था, लेकिन आज ऐसा नहीं है। ऐसा लगता है कि जिंदगी की भागदौड़ में वो समय अब किसी के पास नहीं रहा। बचपन से ही डिबेट में भाग लेना अच्छा लगता था, निबंध प्रतियोगिता में कई बार मैं विजयी हुआ तो समाज से एक जुड़ाव तो बचपन में ही हो गया था। मुंबई में जब मैं मास्टर्स करने गया तो वहां जीवन में एक अहम मोड़ आया। दरअसल, मेरे कुछ साथियों ने मुझसे कहा कि तुम्हें सामाजिक विषयों की इतनी अच्छी समझ है तो मीडिया और संचार के फील्ड में क्यों नहीं जाते? वहीं मुझे किताबें पढ़ने और फिल्में देखने का बड़ा शौक था तो वो बात मेरे दिमाग में बैठ गई। फिर मैंने एक छोटा सा कोर्स भी कर ही लिया, उस वक्त मेरा बस एक ही सपना था कि अपनी खुद की फिल्म लिखूं और उसे खुद ही निर्देशित करूं, लेकिन जैसा कि आप जानते हैं, वो सपना अधूरा रह गया।

जैसा कि आपने बताया कि आपने मीडिया और संचार में पढ़ाई की तो पहली नौकरी आपको कैसे मिली?

वो किस्सा भी दिलचस्प है। दरअसल, मेरे सास और ससुर का शिष्य ‘आजतक’ में काम करता था। उस दौर में ‘आजतक’ सिर्फ एक घंटे का बुलेटिन बनाया करता था। उस शिष्य ने मेरी पत्नी से मेरे बारे में बात की और मेरी पत्नी ने फिर मुझसे बात की। उस वक्त ‘आजतक’ और ‘एनडीटीवी‘ दो बड़े नाम थे तो मेरी पत्नी ने ही मेरा सीवी बनाकर भेज दिया था। उन्होंने मेरा बड़ा अच्छा सीवी बनाया और लगभग हर महीने वो ऐसा करती थीं, जबकि मैं उन सब बातों को भूल चुका था। ऐसे ही एक दिन फिर मुझे प्रणब रॉय के ऑफिस से कॉल आया और उस समय में देहरादून में ऐड फिल्म की शूटिंग कर रहा था जो कि केतन मेहता जी के साथ थी। इसके बाद मैं जब प्रणव जी से मिलने गया तो उन्होंने मुझसे कहा कि ये जो तुम्हारा सीवी है, वो इतना परफेक्ट है कि इसकी तारीफ़ में उनके पास शब्द नहीं हैं। ये सब मेरी श्रीमती जी का कमाल था। इसके बाद मैंने प्रणव जी से कहा कि मुझे सिनेमा में रुचि है तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम बतौर वीडियोग्राफर हमसे जुड़ जाओ। वो मीडिया में मेरी पहली नौकरी थी और उस समय मैंने बिल्कुल नहीं सोचा था कि मेरी यात्रा यहां तक आ जाएगी।

आपने वीडियोग्राफर के तौर पर करियर की शुरुआत की थी। एंकरिंग में आना कैसे हुआ?

हमारे यहां एंकरिंग को एक अलग कला माना जाता है, जो कि ठीक नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि अगर आप हार्डकोर रिपोर्टर नहीं हैं तो कभी भी एक अच्छे एंकर नहीं बन सकते हैं। रिपोर्टर को ही मुद्दों की सही और सटीक समझ होती है। मैंने अपने शुरुआती दस साल सिर्फ ग्राउंड वर्क को दिए थे और उसके बाद किसी चीज में कोई कठिनाई महसूस नहीं हुई। वर्तमान में एंकर सबको बनना है, लेकिन हार्डकोर रिपोर्टिंग में मेहनत भी नहीं करनी है। उस दौर में सोशल मीडिया नहीं था, मोबाइल कम थे, किसी से मिलने के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती थी और बड़ा अनुशासन था। मैं तो आह्वान करता हूं मीडिया के लोगों का कि जब आप किसी को एंकरिंग करने का मौका दें तो पहले ये देखें कि क्या उस व्यक्ति ने जीवन में अच्छी रिपोर्टिंग की है या नहीं की? मैं स्टूडियो कल्चर को अपनाने वाला आदमी नहीं हूं। मैं अपने शो में एक रिपोर्टर की भावना को लेकर शो को संचालित करता हूं और जब आप ऐसा करते हैं तो लोग आपको अपने आप पसंद करने लग जाते हैं।

आपने बहुत कम मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है और बड़ा लंबा काम किया है। ‘सीएनएन न्यूज18’ में यात्रा कैसे शुरू हुई?

दरअसल, मेरे जीवन पर राजदीप सरदेसाई का बड़ा गहरा प्रभाव रहा है। मैं उन्हें दूसरी और अपने आप को तीसरी पीढ़ी के तौर पर गिनता हूं। जब उन्होंने वहां से निकलने का मन बनाया तो उसके बाद अरनब ने भी छोड़ने का निर्णय ले लिया था। इसके बाद मैं भी राजदीप जी के साथ साल 2005 में जुड़ गया। मुझे प्रणव जी की तरफ से रोकने की भी कोशिश हुई लेकिन मैंने जीवन में आगे बढ़ने का निर्णय ले लिया था। हमने साथ में काम किया और एक से एक नायाब स्टोरी कीं। मुझे लगता है कि इंसान को जीवन में समय के साथ निर्णय लेना सीखना चाहिए। आज मैं ‘इंडिया अहेड‘ से जुड़ा हूं और देखता हूं कि कितने युवा, ऊर्जावान और विद्वान मेरे साथी हैं। अगर मैं वहीं 25 साल ‘एनडीटीवी‘ में रहता तो शायद आज जो अनुभव कर रहा हूं, वो नहीं कर पा रहा होता।

जैसा कि आपने बताया कि ‘इंडिया अहेड‘ में बड़े ऊर्जावान साथियों के साथ आप काम कर रहे हैं। डिजिटल के भविष्य को किस तरह से देखते हैं?

मुझे बड़ा गर्व है कि ‘इंडिया अहेड‘ सही मायनों में देश का पहला डिजिटल न्यूज चैनल है, जहां बाकायदा डिजिटल फॉर्मेट में हम कंटेंट तैयार कर रहे हैं, न कि जो टीवी पर चल रहा है, उसी को डाल रहे हैं। आप टीवी और डिजिटल को एक नहीं कर सकते हैं। ऋचा अनिरुद्ध जैसी बुद्धिमान एंकर और लेखिका हमसे जुड़ी हुई हैं। उनका आप शो देखेंगे तो आपको अहसास होगा कि क्यों वो सबसे श्रेष्ठ कही जाती हैं! मैं शर्तिया कह सकता हूं कि डिजिटल में इतनी गहराई के साथ कोई शो नहीं कर सकता है। मेरी टीम में सुमित पांडेय, अद्वैता काला जैसे गुणी लोग हैं तो हम बिल्कुल अलग काम कर रहे हैं। ‘इंडिया अहेड‘ सिर्फ न्यूज फॉर्मेट है, जिसकी कमी महसूस की जा रही थी।

क्या आपको लगता है कि देश में पत्रकारों को लिखने और बोलने की आजादी नहीं है? एक बड़ा वर्ग है जो इस प्रकार की बातें करता है। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?

मेरा मत यही है कि इस देश में कोई आपातकाल नहीं है। दरअसल, समस्या यह है कि कुछ लोग जो ये समझते थे कि पत्रकारिता सिर्फ उन्हीं के हिसाब से चलेगी, समस्या उनको हो रही है। उनको लगता था कि देश की जनता की राय बनाने में सिर्फ उनका हाथ है और वो अब अपना काम कर नहीं पा रहे! देश की जनता अब पूरी तरह से जागरूक हो चुकी है और वो फैक्ट्स को जांचना और परखना सीख गई है। ‘सीएनएन आईबीएन‘ में एक हफ्ते तक प्राइम टाइम शुरू होने से पहले और उसके खत्म होने तक पी चिदंबरम जी के लिए माफीनामा चलाया गया था। डॉक्टर स्वामी को एक बार सिर्फ इसलिए बोलने नहीं दिया गया कि मंत्री जी नाराज हो जाएंगे। ये कोई नई चीज नहीं है और सब संस्थानों में पहले भी होती थी। पहले सोशल मीडिया नहीं था तो बात उतनी आगे तक नहीं जाती थी अब कोई भी चीज आग की तरह फैल जाती है और लोग कुछ भी आरोप लगाना शुरू कर देते हैं।

समाचार4मीडिया के साथ भूपेंद्र चौबे की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

टाटा सन्स के हरीश भट्ट ने मार्केटर्स को दिए टिप्स, किताब से दे रहे सकारात्मकता का संदेश

पिछले दिनों हुई ‘पिच सीएमओ समिट’ (Pitch CMO Summit) 2021  में ‘टाटा सन्स’ (Tata Sons) के ब्रैंड कस्टोडियन हरीश भट्ट (Harish Bhat) ने टाटा ग्रुप की सफलता की कहानी बयां की।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 27 September, 2021
Last Modified:
Monday, 27 September, 2021
harishbhatt5454

पिछले दिनों हुई ‘पिच सीएमओ समिट’ (Pitch CMO Summit) 2021  में ‘टाटा सन्स’ (Tata Sons) के ब्रैंड कस्टोडियन हरीश भट्ट (Harish Bhat) ने टाटा ग्रुप की सफलता की कहानी बयां की। ‘Future Proofing Brands’ थीम पर हुई इस समिट में उन्होंने बताया कि टाटा ग्रुप किस तरह से तमाम पीढ़ियों से प्रासंगिक बना हुआ है।

हमारी सहयोगी ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के को-फाउंडर और डायरेक्टर नवल आहूजा ने एक सेशन को मॉडरेट किया। इस दौरान भट्ट ने अपनी किताब ‘#Tatastories’ पर भी चर्चा की और उन तथ्यों के बारे में बताया, जिन पर यह आधारित है और जिनके बारे में लोग कम जानते हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि ये तथ्य वर्तमान सीएमओ को कई तरह से कैसे मदद कर सकते हैं।

‘Future Proofing Brands’ के बारे में बात करते हुए भट्ट ने टाटा सन्स का उदाहरण सबके सामने रखा, जो इस साल 153 साल का हो गया है।

उन्होंने कहा, ‘टाटा ब्रैंड इस साल 153 साल का हो गया है। ऐसे कुछ ही ब्रैंड्स हैं जो 100 साल पुराने हैं और 150 साल पुराने ब्रैंड्स तो काफी कम हैं और भी भी आज की दुनिया में प्रासंगिक बने हुए हैं। टाटा समूह 100 बिलियन डॉलर का उद्यम है, जिसका बाजार पूंजीकरण (market cap) 300 बिलियन डॉलर से अधिक है। यह दुनिया के शीर्ष 100 ब्रैंड्स में एकमात्र भारतीय ब्रैंड है और दुनिया भर के 150 देशों में मौजूद है। टाटा ब्रैंड की कहानी अपने आप में काफी अनोखी है।’

इस दौरान भट्ट ने बताया कि उन्हें अपनी हालिया किताब #Tatastories की प्रेरणा कहां से मिली। भट्ट का कहना था, ‘मार्च से अप्रैल, 2020 तक दुनिया में हर जगह सब कुछ ठहर सा गया था। मैं भी घर से काम कर रहा था और यह हमारे जैसे बहुत से लोगों के लिए अच्छा समय नहीं था। तमाम लोगों की नौकरी चली गई थी और कई लोगों की कमाई घट गई थी। ऐसे में मैंने सोचा कि मेरे जैसे व्यक्ति के लिए जो लिखना पसंद करता है, इस नकारत्मकता को दूर करने के लिए सकारात्मक प्रेरक कहानियां लिखूं। टाटा समूह के साथ 34 वर्षों तक काम करने के बाद, इन स्टोरीज को खोजने के लिए टाटा समूह से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती है। मैंने कुछ स्टोरी लिखीं और यह देखने के लिए कि क्या यह लोगों को प्रेरित करती हैं, उन्हें लिंक्डइन पर पोस्ट कर दिया। जल्दी ही मैंने देखा कि इन्हें यूजर्स की ओर से काफी ज्यादा और अच्छी प्रतिक्रिया मिलने लगी। कई युवा महिला प्रोफेशनल्स ने मुझे लिखकर कहा कि वे रात को अपने बच्चों को सोते समय ये कहानियां पढ़कर सुनाती हैं। इससे मुझे और ज्यादा से ज्यादा लिखने का प्रोत्साहन मिला। जब मैंने 30-40 स्टोरी पूरी कर लीं तो मैंने उन्हें एक किताब की शक्ल दे दी। इस किताब की सबसे खास बात यह है कि एक स्टोरी को पढ़ने में छह मिनट से भी कम समय लगता है।’

अपनी इस किताब में भट्ट ने एक अध्याय स्वामी विवेकानंद को समर्पित किया है। यह पूछे जाने पर कि कॉरपोरेट की दुनिया में कैसे एक धार्मिक विद्वान ने अपनी जगह बनाई? भट्ट ने बताया, ‘इस किताब के कवर पेज पप टाटा ग्रुप के फाउंडर जमशेद जी टाटा हैं। उनका दृढ़ विश्वास था कि अगर हमें प्रगति करनी है तो भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी में एक शोध विश्वविद्यालय की आवश्यकता है।’

हरीश भट्ट के अनुसार, ‘एक बार जेआरडी टाटा जापान से कनाडा की यात्रा कर रहे थे। उस जहाज (ship) पर उनकी मुलाकात स्वामी विवेकानंद से हुई और उन्होंने भारत का पहला शोध विश्वविद्यालय स्थापित करने की बात कही। जब जेआरडी टाटा भारत में वापस आए, तो उन्हें विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारत का पहला शोध विश्वविद्यालय स्थापित करने का विचार आया। अंग्रेजों ने उसमें तमाम बाधाएं डालने की कोशिश की, इसलिए जमशेदजी टाटा ने स्वामी विवेकानंद को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने लिखा- आप मुझे समुद्री यात्रा के दौरान मिले थे और आपको याद होगा कि हमने एक विश्वविद्यालय के बारे में बात की थी, जिसे मैं स्थापित करना चाहता हूं। मैं उस योजना को मूर्त रूप देना चाहता हूं और क्या आप इस विश्वविद्यालय के पक्ष में एक अपील प्रकाशित करने में मेरी मदद करेंगे।’

भट्ट ने बताया, ‘स्वामी विवेकानंद ने तुरंत जवाब दिया और उस मैगजीन में इसके बारे में लिखा जिसे उन्होंने संपादित किया था। उन्होंने इसके समर्थन में जोरदार अपील की। उसके बाद, मैसूर के महाराजा ने इस विश्वविद्यालय के लिए मैसूर में अपनी जमीन दी और अन्य संसाधन जुटाए गए। आखिरकार, आज जिसे हम भारतीय विज्ञान संस्थान के नाम से जानते हैं, वह अस्तित्व में आया। यह आज भी नंबर एक रैंक वाले विश्वविद्यालय के रूप में बना हुआ है। इस तरह इस देश की भलाई के लिए इस विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए उद्योगपति और धार्मिक विद्वान एक साथ आए।’

इस दौरान भट्ट ने किताब में अपने पसंदीदा अध्याय के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा, ’इस किताब में मेरी पसंदीदा स्टोरी कल्पना चावला और जेआरडी हैं। जब कल्पना चावला अंतरिक्ष में गई थीं, तो तो अपने साथ एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर ले गईं जो उड़ान में जेआरडी की पहली तस्वीर थी। 1982 में 78 वर्ष की आयु में जेआरडी ने भी उड़ान भरी और कल्पना चावला इसे देख रही थीं। इससे उन्हें एक एयरोनॉटिकल इंजीनियर के रूप में अपना करियर बनाने और बाद में नासा में शामिल होने की प्रेरणा मिली।’

भरोसेमंद और टिकाऊ ब्रैंड्स के निर्माण के बारे में भट्ट ने कहा कि इसके लिए गुणवत्ता के साथ जुनून भी होना चाहिए, यह तभी संभव है। उन्होंने कहा, ‘किसी भी व्यवसाय में सबसे पहले आपको आर्थिक पक्ष तैयार करना होता है। ऐसा तब होता है जब आप प्रॉडक्ट्स और सर्विसेज में उत्कृष्टता प्रदान करते हैं ताकि कस्टमर्स वापस आते रहें।’

ब्रैंड्स कम्युनिटी को क्या वापस देते हैं, के बारे में भट्ट ने कहा कि देश में ऐसे तमाम उद्योगपति हैं जिन्होंने समाज को वापस देने का रास्ता दिखाया है। भट्ट ने कहा, ‘मेरा मानना है कि प्रतिस्पर्धी बनें, अच्छे प्रॉडक्ट बनाएं और अपने कस्टमर्स को बनाए रखें, लेकिन इसके ऊपर खुद से पूछें कि आप समाज के लिए क्या कर सकते हैं। मैंने इस समूह के लिए 34 वर्षों तक काम किया है और इस समूह के साथ इतने लंबे समय तक काम करने का एक कारण यह है कि मैं जो कर रहा हूं, वह राष्ट्र के निर्माण में मदद कर रहा है। हमारा सारा मुनाफा टाटा चैरिटेबल ट्रस्ट को जाता है, जिसके पास हमारी कंपनी का 66 फीसदी हिस्सा है।’

 

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

आज हर दूसरा व्यक्ति संपादक बना हुआ है, जिससे भ्रम की स्थिति है: वाशिंद्र मिश्र

वरिष्ठ पत्रकार वाशिंद्र मिश्र लगभग 31 वर्षों से पत्रिकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्हें टेलिविजन इंडस्ट्री में 19 वर्षों और प्रिंट इंडस्ट्री में करीब 12 वर्षों का अनुभव है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Monday, 20 September, 2021
Last Modified:
Monday, 20 September, 2021
Vasindra Mishra

वरिष्ठ पत्रकार वाशिंद्र मिश्र लगभग 31 वर्षों से पत्रिकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्हें टेलिविजन इंडस्ट्री में 19 वर्षों और प्रिंट इंडस्ट्री में करीब 12 वर्षों का अनुभव है। समाचार4मीडिया के साथ एक बातचीत में उन्होंने अपने इस सफर के बारे में विस्तार से बात की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

अपने प्रारंभिक जीवन और शिक्षा के बारे में कुछ बताइए, पत्रकार कैसे बने?

मुझे तो ग्रामीण विरासत मिली है, मैंने अपनी शुरुआती पढ़ाई भी गांव से ही की है। इसके बाद लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी से वेस्टर्न हिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। उस समय मैं लेखन और पढ़ाई में रुचि लेने लग गया था। ‘पॉयनियर’ में मेरा साप्ताहिक लेख आने लग गया था। जब मैं पीएचडी कर रहा था उसी समय एक वरिष्ठ पत्रकार का सानिध्य मुझे मिला और वहीं से मेरे पत्रकार बनने की कहानी शुरू हुई। शुरु में मुझे रिपोर्टिंग का काम दिया गया था। लगभग 12 साल तक मैंने प्रिंट में काम किया है और बड़े-बड़े अखबार जैसे ‘हिंदुस्तान टाइम्स‘ तक की टीम के साथ मुझे काम करने का मौका मिला। उसके बाद मैं टीवी पत्रकारिता में आ गया।

जब मैं ‘जी मीडिया‘ में आया तो मुझे लखनऊ ब्यूरो का चीफ बनाकर भेजा गया। उसके बाद मेरी मेहनत से प्रभावित होकर मुझे दिल्ली बुला लिया गया और बाद में प्रादेशिक चैनल्स की जिम्मेदारी मुझे दे दी गई। शुरू में यूपी से हमने शुरू किया और बाद में एमपी, राजस्थान और बिहार जैसे कई राज्यों में हमने प्रादेशिक चैनल शुरू किया और मुझे एडिटर की जिम्मेदारी दी गई। उसके बाद ‘नेटवर्क18‘ ग्रुप में सलाहकार संपादक की भूमिका में भी काम किया। इसके बाद एक और चैनल को रीलॉन्च किया और वर्तमान में मैं अपने खुद के डिजिटल नेटवर्क को बड़ा करने की कोशिश कर रहा हूं।

जैसा कि आपने बताया कि आपने 12 साल प्रिंट में काम किया तो कोई खास वजह रही कि आप फिर प्रिंट को छोड़कर टीवी में चले गए?

दरअसल,, जब टीवी इंडस्ट्री आगे बढ़ने लगी तो उस समय विद्वान लोग उनके पास नहीं थे। लगभग सभी बड़े लोग प्रिंट में होते थे तो टीवी में जितने भी लोग शुरुआती दौर में शामिल हुए, वो सब प्रिंट से ही थे। मेरे साथ भी कमोबेश यही हुआ था। मेरे भी दो सीनियर साथियों ने मुझे टीवी में आने का आग्रह किया था और मैं मना नहीं कर पाया। इसके अलावा मुझे लगता है कि प्रिंट में टैलेंट अधिक है और कार्यप्रणाली भी उत्तम है। प्रिंट में आप इतनी आसानी से किसी भी खबर को पेज पर नहीं छाप सकते हैं। उसका अपना एक तरीका है लेकिन टीवी में कई बार ऐसी गलती होती है। इसके अलावा आज भी प्रिंट का पत्रकार सामाजिक मुद्दों को लेकर अधिक मुखर है, लेकिन टीवी में कहीं ना कहीं ग्लैमर अधिक है। टीवी में ऐसा लगता है कि बस आदमी अपनी नौकरी कर रहा है, लेकिन प्रिंट में अखबार छपने के बाद भी घंटों उस पर बात चलती रहती है।

आपने बताया कि आपको ‘जी मीडिया‘ के प्रादेशिक चैनल्स की कमान दी गई। क्या आपको ऐसा लगता है कि इस देश में रीजनल मीडिया को उतनी तवज्जो नहीं दी जाती?

मुझे ऐसा लगता है कि रीजनल चैनल अधिक शक्तिशाली होते हैं। दरअसल लोकल स्तर की खबरें जो आम आदमी से जुड़ी हुई रहती हैं, वो रीजनल मीडिया ही दिखा सकता है, नेशनल मीडिया नहीं। नेशनल मीडिया के पास उतना स्पेस नहीं होता कि वो छोटी-छोटी खबरों को जगह दे सके। अखबार को ही आप देख लीजिए, लोग सभी प्रकार के अखबार पढ़ते हैं लेकिन हां, भाषा कभी-कभी समस्या बन जाती है। दक्षिण में आप देखिए कि कैसे वहां के स्थानीय स्तर के चैनल और समाचार पत्र हमसे अच्छा कर रहे हैं जबकि मध्य भारत में ऐसा नहीं देखने को मिलता है। इसके लिए हिंदी चैनल लाने वाले लोग भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जितना कि एक हिंदी का पत्रकार, अगर आप अपने दर्शकों से जुड़ नहीं सकते हैं और उनके हिसाब से आप कंटेंट नहीं बना सकते हैं तो वो आपसे रिश्ता तोड़ लेता है।

क्या आपको संपादक रहते हुए कभी ऐसा महसूस हुआ कि रीजनल टीवी में पत्रकार को डराना धमकाना अधिक होता है? क्या उतनी आसानी से सुनवाई होती है?

मेरे अनुसार यह समस्या सिर्फ टीवी नहीं बल्कि हर जगह आती है। इसमें रीजनल और नेशनल का कोई भेद नहीं है और पूरी जांच भी करनी जरूरी होती है। मैं आपको प्रिंट का एक उदाहरण देता हूं। वर्षों पहले ‘एनबीटी‘ के एक जिला स्तर के पत्रकार ने एक खबर छापी, जिसको लेकर डीएम और एसपी नाराज थे। पत्रकार के खिलाफ मुकदमे लिखकर जेल भेजने की कोशिश हुई और स्थानीय पत्रकार प्रदर्शन करने लगे। धीरे-धीरे वो मुद्दा राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन गया। फिर प्रेस काउंसिल की एक फैक्ट चेक करने वाली कमेटी को भेजा गया और जांच में पाया गया कि उस जिला स्तर के पत्रकार ने अपनी विचारधारा के तहत खबरों को अलग मोड़ दिया और एसपी और डीएम के निजी जीवन पर भी गलत लिखा, वहीं पशुओं की तस्करी में भी स्थानीय मीडिया की भूमिका संदिग्ध थी। इसलिए मेरा कहना यह है कि कोई भी मामला रीजनल बनाम नेशनल नहीं होता। अच्छे से जांच लगभग सभी मामलों की होती रही है। हालांकि कुछ सालों से मैं चीजों में बदलाव देख रहा हूं। पहले पत्रकार का एक नियम होता था कि वो दोनों पक्षों को अपनी रिपोर्ट में जगह देता था लेकिन वर्तमान में ये चीज बदल गई है। आजकल मैं देख रहा हूं कि ज्यादातर बस एक ही पक्ष को दिखाया जाता है। अगर आप पक्ष में लिख रहे हैं तो ठीक लेकिन अगर आप आलोचक हैं तो आपको दुश्मन की तरह मान लिया जाता है। इसलिए अब वो संस्थान खत्म हो रहे हैं, जो ईमानदारी की मिसाल हुआ करते थे।

जैसा कि आपने बताया कि आपने वर्तमान में अपने डिजिटल चैनल की जिम्मेदारी संभाली हुई है तो क्या आपको लगता है कि अब डिजिटल ही भविष्य है?

मुझे पूरी तरह से ऐसा नहीं लगता है। दरअसल डिजिटल में पिछले कुछ समय से फेक कंटेंट की शिकायत बड़ी आ रही है और ऐसे में लोग इससे परेशान हो रहे हैं। मुझे नहीं लगता है कि यह मीडिया का विकल्प बन सकता है। आज हर दूसरा व्यक्ति संपादक बना हुआ है और इससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है। कई लोग तो बस एजेंडा चलाते हुए दिखाई दे रहे हैं और ऐसे में उसकी उम्र कितनी होगी, कह नहीं सकते! कई लोग जो अखबार और टीवी में अपने बेकार काम के कारण निकाल दिए गए और अब यहां आकर अपनी कुंठा निकाल रहे हैं। आज देश डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ चुका है और ऐसे में आप देश की जनता को अपनी एकतरफा रिपोर्टिंग से पागल नहीं बना सकते है। अब वो समय खत्म हो गया है कि एक पत्रकार मामले को तूल देकर अपना हित साध ले, ऐसा करने वाले अब खत्म होने की कगार पर है। कुछ पत्रकार विदेशी घटनाओं में भी भारत को घसीटने का काम करते हैं, लेकिन एक-दो दिन से अधिक वो मुद्दा चलता नहीं है। अब जनता जागरूक और समझदार हो चुकी है। 

क्या आपको ऐसा लगता है कि देश में आज लिखने और बोलने की आजादी नहीं है?

नहीं! मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं मानता हूं कि देश में बोलने और लिखने की आजादी नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता तो हम और आप संवाद कैसे कर रहे होते? दरअसल ये एजेंडा कुछ लोगों की कुंठा का नतीजा है। संविधान ने आपको अधिकार दिए हैं तो सीमाएं भी बनाई हैं। समस्या तब आती है जब आप अधिकारों की आड़ में सीमाओं को लांघ जाते हैं। एक आम आदमी से लेकर पीएम तक सब दायरे से बंधे हुए हैं। हमें एक जागरूक और समझदार पत्रकार होकर बात कहनी चाहिए। देश सबसे बड़ा होता है, अगर कोई मीडिया हाउस किसी अखबार या चैनल को चला रहा है तो उसकी एक पॉलिसी होती है और हर व्यक्ति को उसे समझना चाहिए।

समाचार4मीडिया के साथ वाशिंद्र मिश्र की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

India Ahead के इन सवालों पर योगी आदित्यनाथ ने कुछ यूं रखी ‘मन की बात’

‘इंडिया अहेड’ के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला ने एक खास कार्यक्रम के जरिये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ संवाद किया।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 08 September, 2021
Last Modified:
Wednesday, 08 September, 2021
Interview

उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव में अब छह महीने से भी कम का समय बचा है और ऐसे में सबकी निगाहें सीएम योगी आदित्यनाथ पर टिकी हुई हैं कि कैसे वह इतने प्रचंड बहुमत को बरकरार रख पाएंगे। ‘इंडिया अहेड’ (India-Aheadd) के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब लेने के लिए सीएम योगी से मिलने पहुंचे और एक खास कार्यक्रम के जरिये उनके साथ संवाद किया। यह इंटरव्यू अपने आप में इसलिए भी खास रहा, क्यूंकि इसमें व्यापर जगत की बड़ी हस्तियां भी शामिल हुईं और सीएम योगी से विकास के रोडमैप पर उन्होंने चर्चा की। अपने इस इंटरव्यू में सीएम योगी ने लगभग सभी बड़े मुद्दों पर बेबाकी से जवाब दिए। भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला ने यूपी की राजनीति से जुड़े सभी अहम सवाल तो उनसे पूछे ही, इसके अलावा भी देश-विदेश के मुद्दों पर भी उनकी राय जानी। आइये जानते हैं कि इस इंटरव्यू की बड़ी बातें क्या रहीं-

कोरोना नियंत्रण: आज यूपी वैक्सीन लगाने के मामले में टॉप पर बना हुआ है और कोरोना के नियंत्रण में भी सफलता प्राप्त की है। वहीं, केरल जैसे राज्यों में आज भी 30 हजार से अधिक केस आ रहे हैं। सीएम योगी ने कहा कि जब देश ने स्वदेशी वैक्सीन का उत्पादन किया तो विपक्ष ने दुष्प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसे बीजेपी की वैक्सीन का नाम दे दिया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उन लोगों की बातों में आकर कई लोगों ने वैक्सीन से दूरी बनाई और दूसरी लहर की चपेट में आ गए। योगी ने कहा कि इस पाप का जवाब जनता विपक्ष से लेगी। उन्होंने कहा कि आज 24 करोड़ की आबादी में सिर्फ 22 केस आए हैं। हमारे 28 जनपद कोरोना मुक्त हैं और इसके साथ-साथ समय-समय पर हम सैनिटाइजेशन का कार्य कर रहे हैं।

अर्थव्यवस्था: इस बारे में सवाल पूछे जाने पर सीएम योगी ने कहा कि जब हम वर्ष 2017 में आए थे, तब उत्तर प्रदेश देश की छठी अर्थव्यवस्था था और आज नंबर दो पर है। इसके लिए हमने बेहतर कानून व्यवस्था को आधार बनाया और फिर निवेशकों के लिए निवेश करने का माहौल बनाया, हमने इंफ्रास्ट्रक्चर पर कार्य किया। पहले प्रदेश की पहचान थी कि जहां से गड्ढे शुरू हों वो उत्तर प्रदेश, लेकिन आज जहां से फोरलेन शुरू हों, वो उत्तर प्रदेश है। चाहे आप दिल्ली से आइये, हरियाणा से आइये, बिहार से आइये, उत्तराखंड से आइये, राजस्थान से आइये, मध्यप्रदेश से आइये.. हमने अलग पहचान बनाई। इसके साथ साथ परंपरागत उद्यम को प्रोत्साहन दिया, एक डिस्ट्रिक एक उत्पाद इसका उदाहरण है।

ओबीसी फैक्टर: राष्ट्रीय जनगणना और जातीय जनगणना को लेकर भी राजनीति तेज हो रही है तो यह कैसे चुनाव को प्रभावित कर सकती है? यह पूछने पर सीएम योगी ने कहा कि जातिगत राजनीति ने उत्तर प्रदेश और बिहार को बदहाल कर दिया था। दलित, पिछड़ा वंचित समाज को कहीं का नहीं छोड़ा था। कोई भी पार्टी नहीं कह सकती कि उन्हें मौका नही मिला, कांग्रेस ने सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में राज किया और क्या किया उन्होंने यहां के लिए? यूपी का नौजवान, महिला और किसान सब कुछ जानते हैं और वो भारतीय जनता पार्टी के ही साथ हैं।

गुंडाराज का खात्मा और विपक्ष के आरोप: जब सीएम योगी से यह पूछा गया कि पूर्व सीएम अखिलेश यादव कह रहे हैं कि वो 400 सीट लाएंगे और जनता आपसे खुश नहीं है तो उसके जवाब में सीएम योगी ने कुछ आकंड़े दिए। उन्होंने कहा कि सपा, बसपा और कांग्रेस के संबंध माफिया मुख्तार से थे, उसे कुचलने का काम हमने किया है। हम महिलाओं के लिए मिशन शक्ति अभियान चला रहे हैं। थानों में महिला सहायता डेस्क और तहसीलों में अलग से महिलाओं की सुनवाई के कार्य हो रहे हैं वहीं पुलिस भर्ती में 20 फीसदी बालिकाओं की भर्ती की गई। बुंदेलखंड में पहले भीषण जल संकट था। हम सुनिश्चित कर रहे हैं कि लोगों को अब साफ पानी मिले, हम आरओ प्लांट लगा रहे हैं। बुंदेलखंड में पर्यटन रफ्तार पकड़ रहा है। चित्रकूट आज बिल्कुल अलग दिखता है, पिछली सरकारों ने राजनीतिक कारणों से बुंदेलखंड को समृद्ध नहीं होने दिया और अब हम उसे बदल रहे हैं।

‘इंडिया अहेड’ के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ भूपेंद्र चौबे, ऋचा अनिरुद्ध और अद्वैता काला का सीएम योगी के साथ यह इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

छोटे OTT प्लेटफॉर्म्स को एग्रीगेटर सर्विस का हिस्सा बनने से ये होगा फायदा: कुणाल दासगुप्ता

यूएस और यूके के स्ट्रीमिंग एग्रीगेटर ‘स्क्रीनहिट्स टीवी’ (ScreenHits TV) ने अपनी पहली जॉइंट वेचर पार्टनरशिप ‘वायल कंटेंट टेक’ (Vial Content Tech) कंपनी के साथ की है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Tuesday, 07 September, 2021
Last Modified:
Tuesday, 07 September, 2021
kunal Dasgupta

यूएस और यूके के स्ट्रीमिंग एग्रीगेटर ‘स्क्रीनहिट्स टीवी’ (ScreenHits TV) ने अपनी पहली जॉइंट वेचर पार्टनरशिप ‘सोनी टीवी’ (Sony TV) इंडिया के पूर्व सीईओ कुणाल दासगुप्ता और विवेक गुप्ता की कंपनी ‘वायल कंटेंट टेक’ (Vial Content Tech) के साथ की है। यह जॉइंट वेंचर भारत में SVOD/AVOD (Subscription video on demand/Advertising-based video on demand) कंटेंट क्यूरेटर के विस्तार का नेतृत्व करेगा। इस पार्टनरशिप के जरिये ‘स्क्रीनहिट्स टीवी’ ऐप के द्वारा सबस्क्राइबर्स अपने मौजूदा स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स को इंटीग्रेट कर सकेंगे।

अपने आईओएस (iOS) टैबलेट ऐप के साथ-साथ यह मोबाइल ऐप  ‘क्रोमकास्ट‘ (Chromecast) और ‘फायर टीवी‘ (Fire TV) के माध्यम से एंड्रॉयड टीवी के लिए भी अनुकूल होगा। ओटीटी एग्रीगेशन बिजनेस के बारे में दासगुप्ता ने हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) के साथ बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

ScreenHits TV के साथ इस पार्टनरशिप को लेकर आपका क्या मानना है?

हम भारत में ScreenHits TV टेक्नोलॉजी लेकर आ रहे हैं। बहुत सारे ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं और ओटीटी प्लेटफॉर्म की औसत खरीद प्रति व्यक्ति 2.5 है, जिसका मतलब है कि लोग सबस्क्राइब कर रहे हैं, लेकिन इनकी संख्या कम है और यह औसतन दो या तीन प्लेटफॉर्म है। लोग सात-आठ प्लेटफॉर्म्स सबस्क्राइब नहीं कर रहे हैं। ऐसे में एक ओटीटी एग्रीगेटर के लिए काफी अवसर हैं और इससे एक ही साइन अप अथवा आईडी के माध्यम से कई स्ट्रीमिंग सेवाओं का लाभ उठाया जा सकता है। ScreenHits TV पहले से ही यूएस और यूके में ओटीटी कंटेंट को एग्रीगेट कर रहा है और यह काफी अच्छा काम कर रहा है। भारत में भी हमारे पास तमाम ओटीटी प्लेटफॉर्म्स हैं और यहां वास्तव में एग्रीगेटर की काफी जरूरत है। 

क्या आपको लगता है कि बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म्स एग्रीगेटर सर्विस का हिस्सा बनने के लिए तैयार होंगे?

‘डिज्नी+हॉटस्टार’ (Disney+ Hotstar) जैसे बड़े नाम न कह सकते हैं। यूएस में ‘नेटफ्लिक्स’ (Netflix) को एग्रीगेशन से ऐतराज नहीं है और ‘स्क्रीनहिट्स‘ के पास पहले से ही विश्व स्तर पर उनके साथ एक डील है। ‘नेटफ्लिक्स‘ हमें वैसे भी मिल सकता है, लेकिन हो सकता है कि वे कोई छूट न दें। छूट का हिस्सा बनने के लिए अन्य प्लेटफॉर्म्स ठीक हैं। ALTBalaji, Eros Now और Shemaroo जैसे प्लेटफॉर्म्स इसके लिए ठीक हैं, क्योंकि इन्हें उस तरह का आकर्षण नहीं मिल रहा है। 

‘टाटा स्काई’ और ‘जियो फाइबर’ जैसे कुछ प्लेयर्स ने ओटीटी कंटेंट को एग्रीगेट करना शुरू कर दिया है। मार्केट के लिए आप किस तरह की पेशकश कर रहे हैं? 

टाटा स्काई ने बिंजे+सेट-टॉप बॉक्स (एसटीबी) लॉन्च किया है, जो ओटीटी सेवाओं की एक श्रृंखला प्रदान करता है। लेकिन ऐसा करने के लिए आपको टाटा स्काई कनेक्शन की आवश्यकता होगी। हम केवल Apple के iOS पर ही सेवा की पेशकश करेंगे। हम एंड्रॉयड  पर इसे भविष्य में लॉन्च करेंगे। हमें लगता है कि iOS के पास ऐसे ऑडियंस ज्यादा हैं जो इस तरह के प्रयोग करने के इच्छुक हैं। यूजर्स प्लेटफॉर्म को बदले बिना एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर आसानी से जा सकते हैं। हम आईओएस (iOS) के साथ शुरुआत करेंगे और फिर समय के साथ एंड्रॉयड को शामिल करेंगे। चुनौती यह है कि ये प्लेयर्स हमें एंड्रॉयड प्लेटफॉर्म के लिए कंटेंट नहीं देना चाहते, क्योंकि ये सभी उस बड़े बाजार में लड़ रहे हैं।

इस तरह की सर्विस के लिए क्या बाजार तैयार है?

इस सॉफ्टवेयर की एक खासियत है और लोग इसे उपयोगी पाएंगे। यह ‘क्रेड’ (Cred) की तरह है। हम हमेशा अलग-अलग बैंकों में अपने क्रेडिट कार्ड के बिलों का भुगतान करते रहे हैं, लेकिन अब ‘क्रेड’ ने एक ही प्लेटफॉर्म से बिलों का भुगतान करना आसान बना दिया है। हम ‘क्रेड’ कॉन्सेप्ट को अपनाने का प्रयास कर रहे हैं और हम एक छोटा सा कमीशन लेंगे, जिसे चुकाने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। आगे चलकर बाजार में और 20 प्लेटफॉर्म आने वाले हैं तो वे क्या करेंगे? बहुत सारे रीजनल ओटीटी प्लेटफॉर्म्स मार्केट में लॉन्च हो रहे हैं। उनके लिए हमारे पास अलग-अलग क्षेत्रीय बंडल हो सकते हैं। यह एक केबल ऑपरेटर के समान है, जो विभिन्न ब्रॉडकास्टर्स से कंटेंट एकत्र करता है।

आपकी मार्केट स्ट्रैटेजी क्या है?

हम फोन या हैंडहेल्ड डिवाइस के लिए तकनीक बनाने जा रहे हैं। हमने हाल ही में ScreenHits TV के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा हम इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं, जिसमें हमें कुछ समय लगेगा। इसके बाद हम सभी प्लेयर्स के साथ चर्चा शुरू करेंगे। ScreenHits TV पश्चिमी बाजारों में कारगर साबित हुआ है। सोनी ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए ScreenHits TV को अपना हिंदी जनरल एंटरटेनमेंट चैनल (Hindi GEC) पहले ही दे दिया है। नेटफ्लिक्स ने पुष्टि की है कि वे हमारे साथ आएंगे, क्योंकि उनकी एक अंतरराष्ट्रीय साझेदारी है।

छोटे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को एग्रीगेटर सर्विस का हिस्सा बनने से क्या फायदा होगा?

एक बंडल के रूप में ओटीटी प्लेटफार्मों को निश्चित रूप से रेवेन्यू का कुछ प्रतिशत मिलेगा जब भी कोई कस्टमर जुड़ेगा। शुरुआत में हम सभी प्लेटफॉर्म्स को बंडल के हिस्से के रूप में नहीं बेचेंगे। यूजर्स मौजूदा नेटफ्लिक्स या एमेजॉन प्राइम वीडियो सब्सक्रिप्शन जोड़ सकते हैं और इसके अलावा वे एचबीओ मैक्स और एएलटीबालाजी आदि जोड़ सकते हैं।

तो क्या छोटे प्लेटफॉर्म्स नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो का सहारा ले सकते हैं?

हां, लेकिन नेटफ्लिक्स या एमेजॉन प्राइम वीडियो पर कोई डिस्काउंट नहीं देना होगा। जिस व्यक्ति के पास नेटफ्लिक्स या एमेजॉन है, उसके पास पहले से ही सब्सक्रिप्शन है। यह कोई नई सदस्यता नहीं होगी। यूजर्स मेरे जरिए नेटफ्लिक्स या एमेजॉन नहीं खरीदेंगे। स्क्रीनहिट्स टीवी में नेटफ्लिक्स या एमेजॉन खाता जोड़ने पर वे अन्य प्लेटफार्मों तक पहुंच सकेंगे। अन्य प्लेटफॉर्म्स पहले तीन महीनों के लिए मुफ्त हो सकते हैं  और फिर इसके लिए भुगतान करना होगा। मान लीजिए कि आज Lionsgate Play या HBO Max जैसे बंडल हैं, कुछ दर्शक ऐसे सकते हैं जो उन सेवाओं को देखना चाहते हैं, लेकिन वे इसके लिए अलग से भुगतान नहीं करेंगे। हमारे द्वारा लोग नेटफ्लिक्स या एमेजॉन कंटेंट जोड़ सकते हैं और उन प्लेटफार्म्स को छह महीने तक देख सकते हैं और फिर वे भुगतान करना शुरू कर सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

वर्तमान में मुझे न्यूज रूम में बौद्धिक विमर्श की कमी नजर आती है: विनोद अग्निहोत्री

‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री को मीडिया जगत में तीन दशकों से भी अधिक का अनुभव है। अपनी इस यात्रा के बारे में विनोद अग्निहोत्री ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है

Last Modified:
Tuesday, 24 August, 2021
Vinod Agnihotri

‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री को मीडिया जगत में तीन दशकों से भी अधिक का अनुभव है। उन्होंने 'नवभारत टाइम्स', 'अमर उजाला', 'आउटलुक', 'नई दुनिया', 'इन टीवी', 'जी न्यूज' के मंच से देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास के सवालों को सशक्त ढंग से उठाया है। अपनी इस यात्रा के बारे में विनोद अग्निहोत्री ने समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-

अपने प्रारंभिक जीवन के बारे में कुछ बताएं, क्या आप शुरू से ही पत्रकार बनना चाहते थे? पहली नौकरी कैसे मिली?

मेरा जन्म कानुपर के निकट एक गांव में हुआ और पालन कानपुर में हुआ है। मेरे पिता सरकारी नौकरी में थे। मैंने राजनीति शास्त्र में एम.ए तक की पढ़ाई कानपुर से की है। मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं सिविल सेवा अधिकारी बनकर देश की सेवा करूं, लेकिन मेरा मन उधर नहीं था। शुरू से ही पढ़ना, लिखना, चिंतन, बौद्धिक विमर्श करना ये सब मुझे अच्छा लगता था, मुझे ऐसा लगता था कि मैं किसी बड़े कॉलेज में पढ़ाऊं। उसके बाद मैं ‘जेएनयू‘ दिल्ली आ गया और एमफिल की। स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में ‘चीन के सामाजिक और राजनीतिक अध्ययन‘ विषय को चुना।

उस समय तक तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं पत्रकार बन जाऊंगा। वैसे ‘दैनिक जागरण‘ से मेरा जुड़ाव था, मैं लेख भेज देता था और सब एडिटर का इम्तिहान भी पास किया था लेकिन मैं फिर दिल्ली आ गया था। उसी दौरान हॉस्टल में मेरे एक पड़ोसी थे, जिनका नाम गिरीश मिश्रा था। वो पीएचडी के साथ-साथ ‘एनबीटी‘ में नौकरी भी कर रहे थे और उन दिनों ‘टाइम्स ग्रुप‘ में जॉब करना बड़ी बात थी। अब हम दोनों गांधीवादी और समाजवादी थे तो अच्छी बनती थी,

एक बार मैंने उनसे कहा कि आपकी नौकरी बड़ी अच्छी है और ऐसी नौकरी मुझे मिल जाए तो मेरा काम हो जाए। उन्होंने मुझे प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित किया। कई जगह कोशिश की लेकिन कुछ खास हाथ आया नहीं। अब कुछ ऐसा हुआ कि ‘एनबीटी‘ में ही नौकरी निकली और मैं टेस्ट पास कर गया। इंटरव्यू लेने कई लोग बैठे हुए थे, जिनमें प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर जी भी थे। उन्होंने मेरा सीवी देखा और मुझसे विदेश नीति पर ही प्रश्न किए और जर्नलिज्म पर तो कुछ नहीं पूछा। एक हफ्ते बाद मिश्रा जी आए और मुझसे कहा कि लिस्ट निकलने वाली है और आपको इस नौकरी के लिए चयनित कर लिया गया है।

इसके बाद मुझे लखनऊ जाने को कहा गया, जिसमें मुझे कोई परेशानी नहीं थी लेकिन समस्या पढ़ाई की थी। जब मैंने मेरी नौकरी की बात प्रोफेसर दास को बताई तो वो बेहद खुश हुए और मिठाई खिलाई। समस्या बताने पर उन्होंने मुझसे कहा कि तुम अपने ऑफिस से चार-पांच दिन की छुट्टी लेकर आना और जो भी बाकी काम है, उसमें मैं तुम्हारी मदद कर दिया करूंगा। उसी दौरान मेरे पहले संपादक रामलाल जी भी बड़े सज्जन व्यक्ति थे। पूरा मामला जानने के बाद उन्होंने मुझे छुट्टी देने की हां कही और इस तरह से मेरी पहली नौकरी मुझे मिली और मेरी एमफिल भी पूरी हुई। 

पहली नौकरी मिलने का किस्सा तो दिलचस्प रहा, अब आगे की यात्रा के बारे में कुछ बताएं।

‘एनबीटी‘ में मैंने लगभग 14 साल तक काम किया है। लखनऊ के बाद मैं दिल्ली आया और बाद में मुझे फील्ड करेसपॉन्डेंट हेड बनाकर मेरठ भेजा गया। वो मेरी पहली फील्ड पोस्टिंग थी और रिपोर्टिंग भी मेरी वहीं से शुरू हुई। पूरे तीन साल तक मैंने काम किया और कई बड़ी घटनाओं को कवर किया, जिसमें टिकैत का आंदोलन और मेरठ, मुजफ्फरनगर के दंगे शामिल थे। उसके बाद नंदन जी ने ‘इन टीवी‘ शुरू किया था तो मैं उनसे जुड़ा और टीवी का वो मेरा पहला अनुभव रहा।

इसके बाद उदयन शर्मा जी मुझे ‘अमर उजाला‘ लेकर आए और मुझे दिल्ली की जिम्मेदारी दी। उसके बाद मैं ‘जी न्यूज‘ में चला गया और वहां काम किया। जब आलोक मेहता जी ‘आउटलुक‘ के संपादक हुए तो वो मुझे अपने साथ ले आए, वो यात्रा पांच साल तक चली। साल 2008 में जब ‘नई दुनिया‘ दिल्ली से निकला तो मुझे फिर वहां का राजनीतिक संपादक बना दिया गया था। इसके बाद एक साल तक ‘नेशनल दुनिया‘ भी रहा और साल 2013 में एक बार फिर ‘अमर उजाला‘ में मेरी वापसी हुई और बतौर सलाहकार संपादक मुझे बुलाया गया और यात्रा अभी भी जारी है।

जैसा कि आपने बताया कि आपने महान कहे जाने वाले संपादकों के साथ काम किया। आप उनके व्यक्तित्व के बारे में हमें कुछ बताइए।

राजेंद्र माथुर जी-मैं उन्हें इस फील्ड का हिमालय कहता हूं। न कोई पूर्वाग्रह, ना घमंड, नए लोगों को आगे करने की इच्छा शक्ति और अपनी आलोचना सहन करने की क्षमता। एक बार उनकी एक पत्रिका में आलोचना हुई तो उन्होंने न सिर्फ उसे नोटिस पर लगवा दिया, बल्कि यह भी लिख दिया कि सभी साथी पढ़ें। इसके अलावा लेखनी तो अद्भुत थी और सभी युवाओं को उनके लेख पढ़ने चाहिए।

एसपी सिंह जी -इन्होंने और राजेंद्र माथुर जी ने पीढ़ियां तैयार कीं और मुझे गर्व हुआ जब इनके साथ काम किया। सामाजिक सरोकारों को लेकर उनके जबरदस्त आग्रह थे। उनकी जो टीम थी, उसमें उन्होंने सबको स्थान दिया हुआ था। आरएसएस से लेकर वामपंथी तक सबको वो साथ लेकर चलने में सक्षम थे। 

उदयन जी-वो तो अपने सहयोगियों को दोस्त बनाकर चला करते थे। अपने साथियों के साथ हंसी-मजाक करना उनकी आदत थी। चूंकि वो मेरे पड़ोसी रहे तो एक तरह से हम दोनों सुबह साथ घूमने जाते थे। मीडिया, राजनीति और खबरों को लेकर उनकी समझ को तो मैं आज भी सलाम करता हूं। उनका तो बस यही कहना था कि एक रिपोर्टर सिपाही की तरह होता है। उन्होंने कई ऐसे मुद्दों पर रिपोर्टिंग की है, जिनके बारे में वो कभी सोचकर नहीं जाते थे। जैसे ही उन्हें कोई खबर मिलती, रिपोर्टिंग करना शुरू कर देते।

नंदन जी-ये तो साहित्य और कविता के बड़े शौकीन थे। देखा जाए तो एक बेहतरीन इंसान मैं कहूंगा। जब मैंने उनके साथ काम किया तो मुझे उन्होंने कहा कि विनोद मैं तुम्हे अगाध स्नेह करता हूँ और विश्वास भी, तुम्हे काम करने की पूरी आजादी है। मैंने भी उनसे यही कहा कि इस स्नेह और विश्वास की मैं रक्षा करूंगा। मेरे और उनके संबंध सदैव पुत्रवत रहे। आनंद स्वरूप वर्मा ने उस समय नंदन जी को लेकर काफी तल्ख लिखा लेकिन उन्ही आनंद स्वरूप वर्मा को जब एक पुरस्कार देने की घोषणा हुई तो उन्हीं नंदन जी ने कहा कि इस खबर को प्रमुखता से चलाया जाए ये बड़ी खबर है। ऐसा शालीन हृदय व्यक्ति आपको कहां मिलेगा?

आलोक मेहता जी-इन्होंने पहले मुझे ‘एनबीटी‘ में मौका दिया, फिर ‘आउटलुक‘ और उसके बाद ‘नई दुनिया‘ में मुझे लेकर आए। एसपी सिंह और माथुर जी ने मुझे जहां तक पहुंचाया, वहां से आलोक जी ने मुझे संवारा है और यहां तक लेकर आए। एसपी सिंह, उदयन जी, आलोक मेहता मुझे लगता है कि इनसे बेहतर खबरों की समझ शायद ही किसी को हो, आप जब उनके पास कोई न्यूज लेकर जाएंगे तो ये आगे क्या होगा वो आपको बता देंगे! आलोक जी को खाने और खिलाने का बड़ा शौक है। आलोक जी इतने बड़े इंसान हैं कि वो लेख लिखते थे तो उस लेख को मेरे पास भेज देते थे, मैं आश्चर्य करता था कि वो अपना लेख मेरे पास क्यों भेज रहे हैं, लेकिन वो हमेशा मुझसे कहते थे कि एक बार तुम देख लो! कुछ एडिट करना हो तो बता देना।

रामपाल सिंह जी-ये मेरे पहले संपादक रहे, जब मैं लखनऊ गया तो उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम रहोगे किधर? मैनें कहा की सर अभी तो कोई व्यवस्था नहीं है। वो बोले कि कोई बात नहीं, मैं इंतजाम करता हूं और उन्होंने मेरा दस दिनों का रहने का इंतजाम करवाया और उसके बाद फिर मैंने अपने रहने की व्यवस्था की। आज के समय में किसको इतनी चिंता रहती है? उन्होंने मुझे डेस्क से रिपोर्टिंग करवाई और मेरे इंटरव्यू खूब छापे।

आपने कहा कि आप एसपी सिंह को या आलोक मेहता जी को भाईसाहब कहकर बुलाते थे, क्या वर्तमान में ऐसा संभव है? क्या बदलाव आप देखते हैं?

देखिए, कम से कम मीडिया के पेशे में तो मुझे किसी को ‘सर‘ बोलना अच्छा नहीं लगता है। मुझे लगता है कि ये हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। आज के समय में न्यूज रूम की संस्कृति बदल गई है। कॉरपोरेट कल्चर कहीं न कहीं दिखाई देता है। वर्तमान में एक बौद्धिक विमर्श की कमी मुझे न्यूज रूम में नजर आती है। दूसरा, आज हर पद में एडिटर लग गया है, एक समय था कि जब एडिटर एक ही होता था लेकिन आज तरक्की बड़े कम समय में मिल जाती है।

इसके अलावा पीढ़ी दर पीढ़ी जो ज्ञान स्थानांतरित होता था, अब उसकी कमी दिखाई देती है। आज के युवा के लिए तो बस ये ये सरकारी नौकरी की तरह हो गया है, वो काम करता है और जब उसके जाने का समय होता है तो वो ऑफिस में आकर कहता है कि नमस्ते सर, मैं जा रहा हूं। जब इस प्रकार का माहौल बन जाएगा तो कैसे आप अपने ज्ञान और बुद्धि का विकास कर पाएंगे? वर्तमान में संपादक तो एक मैनेजर हो गया है, पहले जो संपादक थे वो न सिर्फ अपने आप में ज्ञान का खजाना थे, बल्कि समाज में भी उनका पूर्ण सम्मान होता था।

समाचार4मीडिया के साथ विनोद अग्निहोत्री की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

जब तक कंटेंट लिखने का तरीका नहीं बदलेगा, पाठकों के दिल को नहीं छू सकते: अजय उपाध्याय

पत्रकारिता के क्षेत्र में कई दशकों से सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार अजय उपाध्याय ने अपने जीवन की इस यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो by
Published - Wednesday, 18 August, 2021
Last Modified:
Wednesday, 18 August, 2021
Ajay Upadhyay

वरिष्ठ पत्रकार अजय उपाध्याय ने अपने जीवन में हमेशा अपनी शर्तों के साथ काम किया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में कई दशकों से सक्रिय अजय उपाध्याय को प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया दोनों का लंबा अनुभव है। उन्होंने अपने जीवन की इस यात्रा को लेकर समाचार4मीडिया से खास बातचीत की है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के मुख्य अंश-

अपने शुरुआती दिनों के बारे में कुछ बताइए। मीडिया और समाचार पत्रों में रुचि कैसे पनपी?

मैं एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर था। दरअसल, समाचार पत्रों में तो रुचि हमेशा से ही थी। पढ़ाई के दौरान ही ये चीज समझ आ गई थी कि मुझे तो मीडिया की दुनिया में ही जाना है। मैं उस वक्त अपनी नौकरी छोड़कर बनारस में चला गया था और सोचा कि अब कोई काम देखा जाएगा। उस समय काशी के साहित्यकार मनु शर्मा जी ने ‘आज‘ अखबार के संपादक शार्दुल विक्रम गुप्ता जी के पास मुझे भेजा था। वो मेरी पहली नौकरी थी। उस समय उस अखबार में काम करके बहुत कुछ सीखने को मिला, लेकिन एक समय बाद मुझे काशी की पत्रकारिता में एक ठहराव सा दिखाई दिया तो मैंने दिल्ली जाने का निर्णय किया। हालांकि यहां कुछ तकलीफ झेलनी पड़ी, लेकिन एक समय के बाद अच्छा काम मिला।

जैसा कि आपने बताया कि आप दिल्ली आ गए थे तो उसके बाद दिल्ली में आपको सबसे पहली नौकरी कैसे मिली और उसके बाद के अनुभव बताएं।

जैसा कि मैंने आपको कहा कि शुरू में कुछ तकलीफ हुई। एक सज्जन के साथ हमारी बात हुई थी कि वो मुझे एक ग्रुप जॉइन करवाने वाले हैं, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं तो साल भर बड़ी कठिनाई से गुजरा, लेकिन मैं तय करके आया था कि दिल्ली से वापस नहीं जाऊंगा। उसी दौरान डालमिया समूह द्वारा ‘संडे मेल‘ निकलता था तो मैंने वहां काम करना शुरू कर दिया था। उसके बाद मेरी यात्रा ठीक रही। इसके बाद मुझे ‘माया‘ पत्रिका में भी काम करने का मौका मिला और उसके बाद मुझे ‘दैनिक जागरण‘ का राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख बना दिया गया। ‘नवभारत‘ जब मुंबई में लॉन्च हुआ तो मैं उसका पहला संपादक था। मुझे ‘आजतक‘ में भी काम करने का मौका मिला और फिर मैं ‘हिंदुस्तान‘ चला गया।

वर्तमान समय और 90 के दशक की जब आप तुलना करते हैं तो क्या आपको लगता है कि उस समय काम करना अधिक कठिन था?

मेरा मानना है कि इस प्रकार की तुलना ठीक नहीं है। दरअसल, समय कैसा भी हो, चुनौती बनी रहती है। हम ये कभी भी नहीं कह सकते हैं कि उस समय के लोग काम नहीं किया करते थे या काम का बोझ आज नहीं है। काम तो हमेशा रहता है और जो इस चुनौती का डटकर सामना करता है, वो सफल होता है। मानव सभ्यता में ऐसी कई घटनाएं हैं, जिन्होंने मनुष्य को डरा दिया लेकिन उनका सामना डटकर किया गया। जब मैं ‘हिंदुस्तान‘ में था मैंने वहां भी मल्टीएडीशन न्यूज पेपर का प्रयोग किया। इसके अलावा पटना, दिल्ली और भागलपुर जैसी जगह में हमने अखबार को रिलॉन्च किया।

आप ‘हिंदुस्तान‘ के संपादक रहे। उन दिनों की क्या कोई ऐसी घटना याद आती है, जिसका प्रभाव कई दिनों तक जहन पर रहा हो?

मुझे ऐसा लगता है कि अमेरिका में 9/11 का हमला एक ऐतिहासिक घटना थी। उस समय किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक हवाई जहाज से भी आतंकी हमला करवाया जा सकता है। वो अपने आप में एक अलग तरह की घटना थी और देखा जाए तो उस घटना ने दुनिया को बताया कि कैसे तकनीक पर मानव की निर्भरता उस पर खतरा बनकर भी वापस आ सकती है। ये सोचा नहीं जा सकता था कि एक देश के प्रेजिडेंट को कुछ दिनों के लिए गायब ही कर दिया जाए।

वर्तमान समय में क्या आपको ऐसा लगता है कि पाठक सिर्फ अब लेख पढ़ने भर तक ही सीमित रह गया है और उसका बौद्धिक विकास नहीं हो रहा है?

देखिए, आम आदमी की भागीदारी से किसी भी समाचार पत्र की लोकप्रियता में इजाफा होता है और उसके हिसाब से बदलाव होने चाहिए लेकिन मैं आज भी ये मानता हूं कि बेस्ट कंटेंट वही है जो पाठक के दिलो दिमाग पर सवार होता है, उसके मन में जगह बना लेता है और उसको प्रभावित करता है। इस प्रकार के कंटेंट की रचना करने के लिए मनुष्य का अत्यंत बुद्धिमान होना जरूरी है। कई ऐसे समाचार पत्र थे जो 50 से अधिक पेज तक चले गए थे, लेकिन एक समय के बाद उन्हें भी संख्या कम करनी पड़ी है। पिछले 50 साल के इतिहास को आप अगर देखे तो कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन पर अधिक काम नहीं कर पाए। आज भी सरकारी योजनाओं पर पेज नहीं हैं, स्वास्थ्य पर अच्छे लेख नहीं हैं। कोरोना काल में हम सबने इस कमी को महसूस किया है। रोजगार एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर आज भी बहुत कम पढ़ने को मिलता है। रिसर्च करने का मतलब किसी अखबार को पढ़कर कुछ लिखने भर तक सीमित नहीं है, वो बुद्धि से जुड़ा है।

क्या वर्तमान में ग्राउंड रिपोर्टिंग की कमी महसूस होती है? क्या आपको ऐसा लगता है कि मीडिया राजनीति और ग्लैमर में खो गया है?

आज की पत्रकारिता में ऐसे कई काम हैं जो बड़े अच्छे हैं। हम जब काम करते थे तो कई काम अधूरे रह जाते थे लेकिन आज वो काम पूरे हैं। जैसे कि अगर उस वक्त कहीं कोई आग लग जाती थी तो हमें घटनाक्रम के लिए किसी और पर निर्भर होना पड़ता था क्योंकि उतनी तेजी से हमारे पास सूचना आना असंभव थी, लेकिन आज ऐसा नहीं है। वर्तमान में कहीं भी हो रही घटना का विश्लेषण आप मिनटों में कर सकने में कामयाब हुए हैं। हमारे समय में रिपोर्टर ग्राउंड पर जाता था और सुविधाओं के अभाव के बाद भी जो स्टोरी फाइल करता था और उसमें जो कथानक होता था, मैं उसे याद करता हूं। आज के समय में किसी भी घटना को समझाने के लिए जो कथानक है, वो ठीक नहीं है। कथा एक अलग चीज है और उसे कथानक में कहना एक अलग चीज, उसे इस प्रकार से कहना कि वो पाठक के दिल में घर कर जाए, उसकी कमी आज मैं महसूस करता हूँ। जब तक कंटेंट लिखने का तरीका नहीं बदलता, तब तक पाठक के दिल को छू नहीं सकते।

क्या आपको कभी ऐसा कोई किस्सा याद आता है, जिसे आप भूलते नहीं हैं?

जी बिल्कुल, दरअसल एक सैटेलाइट का लॉन्च था। पीएम के साथ हम सबको इसरो सेंटर जाना था और दोपहर को हम सब पुडुचेरि पहुंच गए। मुझे मेरे कुछ साथियों ने कहा कि अब प्रेसवार्ता है और हमें लगता है कि हमारे तमिल साथी कुछ उनके राज्य के बारे में सवाल करेंगे तो इधर अभी रुकने का कोई फायदा नहीं है लेकिन मैं रुका रहा। मेरे मन में कारगिल को लेकर कुछ सवाल थे। दरअसल, हमारा जम्मू का आदमी रोज घुसपैठ की खबर भेज रहा था और मैंने उसी पर सवाल किया। उन्होंने जवाब दिया की ये गंभीर घटना है और देश कड़ी कार्यवाही करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। उन्होंने हवाई हमले करने तक की बात उस प्रेस वार्ता में मेरे सवाल के जवाब में कहीं। उसके बाद अगले दिन जैसे ही हम श्रीहरिकोटा उस रॉकेट लॉन्च की कवरेज के लिए उतरे, हमें खबर मिलती है कि कारगिल में भारत ने घुसपैठियों पर हवाई हमले कर दिए हैं। ये घटना बड़ी रोचक है और इसलिए आपसे इसका जिक्र मैंने किया। नमस्कार।

समाचार4मीडिया के साथ अजय उपाध्याय की बातचीत का वीडियो आप यहां देख सकते हैं।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए

प्रो. सुरभि दहिया से जानें, प्रादेशिक भाषाओं के बीच कैसा है इंग्लिश जर्नलिज्म का भविष्य

प्रोफेसर सुरभि दहिया ने समाचार4मीडिया से बातचीत में अपने जीवन, परिवार और आने वाली किताब को लेकर चर्चा की है।

Last Modified:
Friday, 13 August, 2021
surbhidaiya87454

देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) की प्रोफेसर  सुरभि दहिया यहां अंग्रेजी पत्रकारिता विभाग की डायरेक्टर हैं। इस पद तक पहुंचने के लिए उन्होंने न सिर्फ संघर्ष किया बल्कि अथक प्रयासों से सफल भी हुईं। डॉक्टर सुरभि एक लेखक भी हैं। समाचार4मीडिया से बातचीत में उन्होंने अपने जीवन, परिवार और आने वाली किताब को लेकर चर्चा की है।

अपने शुरुआती जीवन के बारे में कुछ बताएं। मीडिया और उसके बाद शिक्षा के क्षेत्र में कैसे आना हुआ?

मेरा जन्म लुधियाना के एक साधारण परिवार में हुआ है। पिता बैंक में सीनियर अधिकारी रह चुके हैं और मां शिक्षिका। मेरा एक छोटा भाई है, जो अपना खुद का बिजनेस करता है। पिता के बार-बार तबादले के कारण मेरा अलग 2 जगह पढ़ना हुआ और कई लोगों से बहुत कुछ सीखने को भी मिला जिसे मैं अपने लिए अच्छा मानती हूं।

लुधियाना, शिमला, चंडीगढ़, ऊना और हिसार जैसी जगह पर मैनें पढ़ाई की है। मीडिया में मुझे बचपन से ही रुचि थी और जब मैं दसवीं कक्षा में थी, तो मेरी इंग्लिश की टीचर ने मुझसे कहा कि तुम बड़ी होकर एंकर बनना। तभी से मुझे समझ आ गया था कि मुझे जर्नलिज्म पढ़ना है।

आपने बीएससी, एमएससी के बाद कहां काम किया? उस यात्रा के बारे में बताएं?

मैंने अपनी एमएससी करने के बाद इंटर्नशिप के लिए ‘द ट्रिब्यून’ (The Tribune) को चुना, जोकि चंडीगढ़ मीडिया में जाना पहचाना नाम है। इसके बाद मेरे काम से प्रभावित होकर उन्होंने मुझे एक फुल टाइम नौकरी दे दी। इसके बाद मैनें लगभग दो साल तक वहां काम किया। इस दौरान मैनें शिक्षा, कृषि जैसे मुद्दों को बड़ी नजदीकी और बारीकी से समझा। मेरी 500 से अधिक स्टोरी वहां पब्लिश हुई। बीच में मेरा रुझान खोजी पत्रकारिता की ओर भी आया और मैनें कई घोटाले भी उजागर किए।

आपने अपनी पीएचडी भी मीडिया मैनेजमेंट पर की है। उस अनुभव के बारे में हमारे दर्शकों को कुछ बताएं?

बिल्कुल, मैंने अपनी पीएचडी मीडिया मैनेजमेंट में हिसार से की है और मीडिया इंडस्ट्री में मेरी हमेशा से रुचि रही है। हमेशा से मेरी इसमें गहराइयों से अध्ययन करने की इच्छा रही है और आगे भी करती रहूंगी। साल 2015 से ही मैं भारत के मीडिया घरानों पर कुछ लिखना चाह रही थी और साल 2017 में शिकागो में एक कॉन्फ्रेंस थी और उसमें इसी प्रकार की एक बुक का लॉन्च हुई थी। वहीं से मेरे मन की इच्छा और मजबूत हो गई और उसी का परिणाम है कि ‘जी ग्रुप’ के ऊपर लिखी हुई मेरी पहली किताब मार्केट में आ गई है। इसके अलावा अलग-अलग मीडिया घरानों की कार्यप्रणाली को लेकर भी मेरी एक 800 पेज की किताब जल्द बाजार में उपलब्ध होने वाली है। 

आपने अपने इस कामयाबी के सफर में दिल्ली यूनिवर्सिटी के साथ भी लंबे समय तक काम किया है। इसके बारे में कुछ बताएं?

देखिए, बड़ा रोचक किस्सा है। मैं आपको बताऊं कि जीवन की ये यात्रा हर किसी के लिए आसान नहीं होती है। अगर आप सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ रहे है तो कई चीजें आसान हो जाती है। इंसान को हर दिन जीवन को बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए। दरअसल जब साल 2001 में मेरी शादी हुई, तो मुझे लगा कि क्यों न अब एक नई यात्रा शुरू की जाए। मैं साल 2003 से मीडिया शिक्षा में आई और साल 2006 तक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाया। साल 2006 तक वो यात्रा जारी रही और उसी साल दिल्ली यूनिवर्सिटी के फॉर्म निकले थे। जिस दिन मैं उस फॉर्म को देने गई संयोग से उस दिन अंतिम तिथि थी। उस दिन गॉर्ड मुझे कुछ कारणों से अंदर नहीं जाने दे रहा था और आखिरकार उसी गॉर्ड पर विश्वास करके मैनें उसे अपना फॉर्म दे दिया। 20 नवंबर को मेरा जन्मदिन था और उसी दिन मुझे साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। 9 लोग पैनल में थे और आखिरकार कई सवालों के बाद मुझे उन्होंने फाइनल किया और इस प्रकार एक प्रोफेसर के तौर पर मेरी यात्रा शुरू हुई। साल 2006 से साल 2014 तक मैनें वहां काम किया और वह मेरा बहुत अच्छा अनुभव था।

दिल्ली यूनिवर्सिटी से आप आईआईएमसी आईं और यहां आप कोर्स डायरेक्टर बनाई गईं। इस यात्रा के बारे में कुछ बताएं?

दरअसल, मेरा आठ साल का अनुभव हो गया था और मैं सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर थीं। जब मैंने आवेदन किया तो उस समय मेरे पास फील्ड का भी अनुभव था और आठ साल पढ़ाने का भी अनुभव था और आईआईएमसी शायद ऐसे ही किसी उम्मीदवार की तलाश में था, तो मुझे चुना गया।

जुलाई 2014 में मेरी यात्रा शुरू हुई और आज भी जारी है। मैनें देखा कि यहां का माहौल डीयू से अलग था और यहां सीखने के लिए कई अलग चीजें थीं। शुरू के 3 साल तक मैं एसोसिएट प्रोफेसर रही, फिर प्रोफेसर और बाद में मुझे कोर्स डायरेक्टर बना दिया गया। 

वर्तमान में हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं में दर्शक बढ़ रहे हैं, ऐसे में इंग्लिश जर्नलिज्म का क्या भविष्य देखती हैं?

देखिए, और भाषाओं में दर्शक तो बढ़ रहे हैं, लेकिन हम भी उसी हिसाब से अपने कोर्स में बदलाव भी कर रहे हैं। हम भी अपने छात्रों और उनके भविष्य को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रहे हैं। हमारा ध्यान सिर्फ प्रिंट पर ही नहीं है, बल्कि हम हर उस दिशा में काम कर रहे हैं, जिससे छात्र हर फील्ड में गुणी हों। हमनें यह भी तय किया है कि रिपोर्टिंग की ट्रेनिंग देते समय बच्चे को हर बीट पर काम करने का हुनर हो। इसके लिए हम समय-समय पर तमाम संस्थाओं के साथ मिलकर ट्रेनिंग भी देते हैं।  

इसके अलावा ‘यूनिसेफ’ जैसी संस्था के साथ मिलकर भी हम काम कर रहे हैं। इसके अलावा मोबाइल जर्नलिज्म के बाद हमनें ड्रोन जर्नलिज्म पर भी काम करना शुरू कर दिया है। अगर आप पूरे कोर्स को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि आने वाले समय को ध्यान में रखकर ही हम आगे बढ़ रहे हैं।

आप एक लेखिका भी हैं और आपकी नई किताब ‘The House That Zee Built’ को अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। किताब लिखने का विचार कैसे आया?

देखिए, शुरू में मेरा विचार 14 मीडिया संस्थानों के बारे में लिखने का था, जिनमें प्रिंट से लेकर टीवी तक शामिल थे। लेकिन जब मैनें उसे लिखना शुरू किया तो समझ आया कि ये तो बड़ा मुश्किल और बड़ा हो रहा है। इसी बीच 3 साल गुजर गए और इसके अलावा जब आप किसी मीडिया घराने के बारे में कुछ लिख रहे हैं तो आपको एक-एक फैक्ट्स देखने होते हैं।

एक मीडिया हाउस तो ऐसा था जिसमें 100 पन्नों का फैक्ट चेक होने में काफी समय लगा। उस समय मुझे अहसास हुआ कि इतने मीडिया घरानों पर आप एक किताब में नहीं लिख सकते हैं। इसी के बाद मैनें निर्णय लिया कि मैं सबसे पहले ‘Zee ग्रुप’ के बारे में लिखूंगी और इस तरह से इस किताब की रूपरेखा बनी।

समाचार4मीडिया की नवीनतम खबरें अब आपको हमारे नए वॉट्सऐप नंबर (9958894163) से मिलेंगी। हमारी इस सेवा को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए इस नंबर को आप अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट में सेव करें।
न्यूजलेटर पाने के लिए यहां सब्सक्राइब कीजिए