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अब अखबारों को इन दोनों मॉडल्स पर करना होगा काम: प्रोबल घोषाल, अमर उजाला

अमर उजाला लिमिटेड के डायरेक्टर प्रोबल घोषाल ने हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं के अखबारों द्वारा अपनाए जा रहे डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल को लेकर रखी अपनी बात

समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago

कोरोनावायरस (कोविड-19) के खौफ के कारण देश में चल रहे लॉकडाउन के बीच विभिन्न अखबारों के ई-पेपर्स और ऑनलाइन कंटेंट की मांग में काफी इजाफा हुआ है। इस बीच तमाम अखबार अपने ई-पेपर्स को पेवॉल (paywalls) यानी पेड सबस्क्रिप्शन की ओर ले जा रहे हैं। हिंदी और प्रादेशिक भाषा के कई अखबारों द्वारा डिजिटल सबस्क्रिप्शन मॉडल की दिशा में बढ़ाए जा रहे कदम को लेकर हमारी सहयोगी बेवसाइट ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) ने ‘अमर उजाला लिमिटेड’ के डायरेक्टर प्रोबल घोषाल से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

देश के तमाम बड़े अंग्रेजी अखबार अपने ऑनलाइन कंटेंट से मुद्रीकरण (monetisation) के लिए इसे पेवॉल के पीछे ले जाने की प्लानिंग कर रहे हैं। इस बारे में आपका क्या नजरिया है। आपको क्या लगता है कि अन्य अखबार खासकर हिंदी और प्रादेशिक भाषा के अखबार भी इस राह पर चलेंगे?

हाल के दिनों में देखें तो विभिन्न अखबारों के डिजिटल कंटेंट का उपभोग (consumption) यानी इस्तेमाल काफी बढ़ा है, चाहे वह ई-पेपर का सबस्क्रिप्शन हो अथवा यूजर्स द्वारा ऑनलाइन न्यूज कंटेंट का इस्तेमाल किया जाना हो। हाल ही में आई ‘इंडियन रीडरशिप सर्वे’ (IRS) की रिपोर्ट में भी इस पर प्रकाश डाला गया है। इस बढ़ते हुए ट्रेंड को देखते हुए ही हमने अपने आप पहल करते हुए पिछले साल नाममात्र के मूल्य पर ई-पेपर के लिए पेड मॉडल लॉन्च किया था। हालांकि, जब हम अंग्रेजी अखबारों के सबस्क्रिप्शन प्लान्स पर नजर डालते हैं तो उनके सबस्क्रिप्शन ऑफलाइन अखबारों की कीमत के बराबर ही हैं। चूंकि, ई-पेपर पढ़ने की आदत लोगों में काफी कम है, क्योंकि ई-पेपर की रीडरशिप एक पाठक तक ही सीमित होती है, जबकि जो अखबार फिजिकल घरों में पहुंचता है, उसे तमाम पाठक आपस में शेयर कर लेते हैं। यही कारण है कि महंगे सबस्क्रिप्शन प्लान की सफलता सीमित हो जाती है।    

हमने अपने सबस्क्रिप्शन प्लान के लिए काफी नाममात्र कीमत रखी है, क्योंकि हमारा प्राथमिक उद्देश्य पाठकों में इसे पढ़ने की आदत को बढ़ावा देना है। वास्तव में कोविड-19 के दौरान ई-पेपर/ऑनलाइन कंटेंट सबस्क्रिप्शन मॉडल्स के लिए यह बहुत जरूरी है, ताकि बिजनेस को निर्वाह और अस्तित्व को बनाए रखा जा सके। वर्तमान में इसकी उपलब्धता एक बड़ा इश्यू है, लोग विश्वसनीयता के कारण अपनी पसंद के अखबार को पढ़ने के लिए देख रहे हैं और यह पाठक की ब्रैंड के प्रति निष्ठा है। इसलिए यदि लोगों को अपने हाथ में अखबार नहीं मिल रहा है तो वे इसे ऑनलाइन हासिल कर रहे हैं और इसके लिए भुगतान भी करते हैं। वास्तव में, स्थिति सामान्य हो जाने के बाद भी लोग अपनी इसी आदत के कारण ई-पेपर पढ़ते रहेंगे और इस बदले हुए व्यवहार के कारण अखबारों को भी अपने कंटेंट के लिए मुद्रीकरण का अवसर मिलेगा।

भारतीय प्रिंट मार्केट के लिए सबस्क्रिप्शन आधारित मॉडल के बारे में आपका क्या कहना है? आपको इस बारे में किस तरह की उम्मीद है। यदि भारतीय कंपनियां अपने पाठकों से ऑनलाइन कंटेंट का भुगतान करने के लिए कहेंगी, तो उनके सामने किस तरह की चुनौतियां होंगी?

प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री में एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में हम पिछले कई सालों से स्थिरता देख रहे हैं। ऐसे में देश के न्यूजपेपर बिजनेस का भविष्य़ डिजिटल कंटेंट/ईपेपर के मुद्रीकरण के साथ ही अखबार की कीमत में बढ़ोतरी का मिश्रण होगा। चूंकि दोनों चीजों का सहअस्तित्व है, इसलिए एक भरोसेमंद और प्रतिष्ठित अखबार अपने अखबार के मूल्य को बढ़ाने के साथ ही ऑनलाइन कंटेंट से मुद्रीकरण करने में सक्षम होगा। हालांकि, टियर-दो/टियर-तीन (tier 2/tier 3) शहरों और ग्रामीण मार्केट में ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन का मूल्य जरूर प्रभाव डालेगा।

इसके साथ ही हमें यह भी समझने की जरूरत है कि अखबार पढ़ने की आदत, क्रेडिबिलिटी और इंफार्मेशन के कारण एक पाठक वर्ग हमेशा बना रहेगा। इसलिए एक प्रतिष्ठित न्यूजपेपर को ब्रैंड के लाभ को ध्यान में रखते हुए अखबार की कीमत यानी कवर प्राइस को बढ़ाने के साथ ही नई पीढ़ी के ऑडियंस/यूजर्स के लिए ऑनलाइन कंटेंट के मुद्रीकरण पर भी काम करना होगा।   

यही नहीं, निकट भविष्य में जीडीपी ग्रोथ बढ़ने के कारण टियर-दो/टियर-तीन मार्केट में प्रिंट की ग्रोथ बढ़ेगी। इसके अलावा इन मार्केट्स में अखबारों की अपनी भी वैल्यू है। इससे कुछ समय के लिए एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू को थोड़ा बल जरूर मिलेगा, लेकिन यह समग्र लाभ के दृष्टिकोण से पर्याप्त नहीं होगा। ऐसे में ब्रैंड्स को ऐसे मिक्स प्लान पर काम करना होगा, जिसमें अखबार का कवर मूल्य बढ़ाने के साथ ही ऑनलाइन सबस्क्रिप्शन मॉडल से भी कमाई हो। हालांकि, शुरुआत में समग्र परिदृश्य में ई-पेपर के सबस्क्रिप्शन मॉडल का योगदान इसमें काफी कम होगा, लेकिन तेजी से बदलती हुईं कंज्यूमर्स की आदतों और ई-पेपर व ऑनलाइन कंटेंट की स्वीकार्यता बढ़ने के साथ भविष्य में बदलाव जरूर होगा।


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