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मीडिया में डॉ. अनुराग बत्रा के पूरे हुए 25 साल, इंडस्ट्री में बदलावों को लेकर कही ये बात
BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा ने ‘द गुड लाइफ पॉडकास्ट’ में बातचीत के दौरान अपने मीडिया सफर के 25 वर्षों पर विस्तार से चर्चा की।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 7 months ago
BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के फाउंडर डॉ. अनुराग बत्रा ने ‘द गुड लाइफ पॉडकास्ट’ में एक प्रेरणादायक बातचीत के दौरान अपने मीडिया सफर के 25 वर्षों पर विस्तार से चर्चा की।
बातचीत की शुरुआत में उन्होंने ब्रायन क्लास की किताब Fluke से एक गहरी बात साझा की, “हम अपनी कामयाबी का सारा श्रेय खुद को देते हैं, जबकि उसका बहुत हिस्सा संयोग या ईश्वर की देन होता है।” डॉ. बत्रा ने बताया कि एक्सचेंज4मीडिया की स्थापना कोई सोचा-समझा बिजनेस प्लान नहीं था, बल्कि यह एक संयोग और समय की कृपा से हुआ।
एक बी2बी मार्केटप्लेस के तौर पर शुरू हुआ एक्सचेंज4मीडिया आज एक व्यापक मीडिया इकोसिस्टम बन चुका है। पिच, इम्पैक्ट, रिएल्टी+, समाचार4मीडिया जैसी ब्रैंड्स इस नेटवर्क के हिस्से हैं, जो मीडिया, रियल एस्टेट और मार्केटिंग इंडस्ट्री की अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं। वहीं 45 साल पुराना बिजनेसवर्ल्ड स्वतंत्र रूप से संचालित होता है। दोनों का उद्देश्य—विश्वसनीयता, विशेषज्ञता और सार्थक कहानी कहना।
मीडिया, मार्केटिंग और तकनीक का विलय
बीते दो दशकों में मीडिया और विज्ञापन इंडस्ट्री में आए बदलावों पर चर्चा करते हुए डॉ. बत्रा कहते हैं, “आज कंटेंट, कम्युनिटी और कॉमर्स—इन तीन शक्तिशाली ताकतों का संगम हो रहा है। मैडिसन एवेन्यू (विज्ञापन), हॉलीवुड (मनोरंजन), और सिलिकॉन वैली (टेक्नोलॉजी) अब अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक हो चुके हैं।”
वो बताते हैं कि दुनिया की $1 ट्रिलियन की विज्ञापन इंडस्ट्री में से $650 बिलियन डिजिटल पर खर्च हो रहा है, जिसमें से $460 बिलियन सिर्फ दो कंपनियों—गूगल और मेटा के पास है।
“YouTube ने भारतीय क्रिएटर्स को 21,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान किया है”
यह आंकड़ा दर्शाता है कि क्रिएटर इकोनॉमी अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रभावशाली कमाई और ब्रैंड निर्माण का जरिया बन गई है। “क्रिएटर्स अब केवल इंफ्लुएंसर नहीं रहे, वे खुद में एक क्रिएटिव ब्रैंड बन चुके हैं,” डॉ. बत्रा कहते हैं।
AI से डरने की नहीं, उसे अपनाने की जरूरत
AI की बात करते हुए डॉ. बत्रा कहते हैं, “AI टेक्स्ट को वीडियो में बदल सकता है, ऑडियो बना सकता है, यहां तक कि AI एंकर भी तैयार कर सकता है। लेकिन पत्रकारों को यह समझना होगा कि AI उन्हें रिप्लेस नहीं करेगा—जब तक वे खुद इसका उपयोग करना न छोड़ दें।”
उनके अनुसार, पत्रकारों और न्यूजरूम को AI के साथ प्रयोग करने और उसे अपनाने की जरूरत है, ताकि उनकी प्रासंगिकता बनी रहे।
फेक न्यूज और ट्रस्ट का संकट
“हम आज नैरेटिव वॉरफेयर के युग में हैं। हम नहीं जानते कि कौन सी जानकारी सही है और कौन सी झूठ,” डॉ. बत्रा कहते हैं। उनका सुझाव है कि लोग WhatsApp और सोशल मीडिया पर दिख रही हर चीज पर यकीन न करें, बल्कि रक्षा मंत्रालय जैसी विश्वसनीय संस्थागत स्रोतों से जानकारी लें।
ग्राहक अब अनुभव चाहते हैं—और वे इसके लिए भुगतान करने को तैयार हैं
वो बताते हैं कि आज की पीढ़ी अनुभवों पर खर्च कर रही है। कॉन्सर्ट्स, समिट्स और लिटरेचर फेस्टिवल्स शहरों को हिला देते हैं। “अगर आप अच्छा, अलग और इमर्सिव कंटेंट देंगे तो लोग उसके लिए पैसे भी देंगे।” The Ken, Mint, Morning Context जैसी सब्सक्रिप्शन साइट्स इसका उदाहरण हैं।
डिजिटल का दौर, लेकिन परंपरागत मीडिया भी जिंदा है
“लोग कई सालों से कह रहे हैं कि अख़बार खत्म हो जाएंगे, लेकिन आज भी वे विश्वसनीयता के लिए सबसे ऊपर हैं,” डॉ. बत्रा कहते हैं। New York Times और Washington Post जैसे ब्रैंड्स ने यह साबित कर दिया है कि डिजिटल में भी गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनाए रखी जा सकती है।
इंफ्लुएंसर fatigue और डिजिटल विज्ञापन में धोखाधड़ी
डॉ. बत्रा मानते हैं कि कुछ इंफ्लुएंसर बहुत महंगे हो गए हैं और उनके रिटर्न भी घटते जा रहे हैं। इसके अलावा, डिजिटल विज्ञापन में धोखाधड़ी—जैसे बॉट्स और क्लिक फ्रॉड—भी बढ़ रही है। “20-30%, कभी-कभी 40% तक डिजिटल खर्च बेकार चला जाता है,” वे चेताते हैं।
AI पत्रकारों को नहीं हटाएगा—लेकिन पत्रकारों को खुद को अपग्रेड करना होगा
“लोग आज भी इंसानों को फॉलो करते हैं। एक एंकर की सोच, उसका अंदाज, उसकी राय—ये चीजें AI नहीं बना सकता,” डॉ. बत्रा स्पष्ट करते हैं।
‘YOLO’ युग में अनुभव की भूख
डॉ. बत्रा मानते हैं कि महामारी के बाद लोग असली अनुभवों के लिए तरस गए हैं। “एक कॉन्सर्ट ने अहमदाबाद जैसे शहर को हिला दिया,” वे उदाहरण देते हैं। उनका मानना है कि ईवेंट्स अब कंटेंट, कम्युनिटी और कॉमर्स का विस्तार बन चुके हैं।
मीडिया का राष्ट्रीय संकट में रोल
हाल की भारत-पाकिस्तान घटनाओं का जिक्र करते हुए वे कहते हैं, “जब प्रधानमंत्री ने बयान दिया, उन्होंने स्पष्टता और आश्वासन दोनों दिए। यह बताया कि सीजफायर भारत की शर्तों पर हुआ।” उनका मानना है कि ऐसे समय में मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, गलत जानकारी पर आधारित राय जनता को भटका सकती है।
AI और Deepfakes के युग में जिम्मेदार पत्रकारिता की जरूरत
वे आश्वस्त करते हैं, “Deepfake बनाने के 10 तरीके हैं, लेकिन पकड़ने के 20 टूल्स भी हैं।” उनका मानना है कि जैसे-जैसे डिजिटल इकोसिस्टम बढ़ेगा, फेक न्यूज को रोकने के उपाय भी मजबूत होंगे।
मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी
“फिल्टर किया हुआ ज्ञान ही उपयोगी होता है, जैसे आप सड़क का गंदा पानी नहीं पीते, वैसे ही अनफ़िल्टर्ड जानकारी भी नहीं पढ़नी चाहिए।” वे कहते हैं कि परंपरागत मीडिया संस्थानों को इस क्यूरेशन की भूमिका निभानी चाहिए।
‘गुड लाइफ’ क्या है?
डॉ. बत्रा के लिए अच्छी जिंदगी का मतलब है- रिश्तों की गहराई, सेहत और अपने काम में खुशी पाना। वे कहते हैं, “अगर आप वही काम कर रहे हैं जिससे आपको खुशी मिलती है और वह आपका व्यवसाय भी है तो आपने जीत हासिल कर ली है।”
और अंत में, वे अपने पसंदीदा लेखक रैंडी पॉश के शब्दों के साथ बातचीत खत्म करते हैं और कहते हैं, “अनुभव वही होता है, जो तब मिलता है जब हम वो नहीं पाते जो हम चाहते हैं।”
यहां देखें वीडियो इंटरव्यू:
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