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वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की इन दो किताबों ने मार्केट में दी दस्तक...

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। कश्मीर घाटी में पिछले लगभग तीन महीने से अशांति बनी हुई है। इस समय भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में भी दरार बढ़ गई है और मीडिया का न्यूजरूम वार रूम में तब्दील हो गया है, ऐसे में कश्मीर मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की किताब का लॉन्च होना ब

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

कश्मीर घाटी में पिछले लगभग तीन महीने से अशांति बनी हुई है। इस समय भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में भी दरार बढ़ गई है और मीडिया का न्यूजरूम वार रूम में तब्दील हो गया है, ऐसे में कश्मीर मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की किताब का लॉन्च होना बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह किताब कश्मीर के मौजूदा हालातों को बयां करती है।

तस्वीरों में देखें वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की बुक लॉन्चिंग समारोह की झलकियां…

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की किताब ‘कश्मीर विरासत और सियासत’ और ‘क्रिस्टेनिया मेरी जान’ का लोकार्पण 8 अक्टूबर को हुआ। कार्यक्रम का आयोजन नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में हुआ।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के तौर पर वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर, वरिष्ठ संपादक व स्तम्भकार प्रेमशंकर झा, जम्मू कश्मीर के प्रमुख अखबार 'राइजिंग कश्मीर' के प्रधान संपादक शुजात बुखारी, कश्मीर मामलो में भारत सरकार के वार्ताकार रहे एम.एम.अंसारी और फिल्म निदेशक संजय काक शामिल रहे।

कार्यक्रम के दौरान किताब पर रोशनी डालते हुए वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने बताया कि मुझे 1993-94 के दौरान पहली बार कश्मीर जाने का मौका मिला और तब से मेरे अंदर कश्मीर को जानने की उत्सुकता बनीं। अपनी पत्रकारिता के दौरान मैं बिहार को थोड़ा बहुत जान गया था, और मुझे उससे ही प्रेरणा मिली थी कि लोग हिन्दी को पढ़ना चाहते हैं। कश्मीर को लेकर तो अंग्रेजी में कई किताबें हैं, जिन्हें गिना नहीं जा सकता है। यह सुनकर आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि जब मेरी कश्मीर पर पहली किताब ‘झेलम किनारे दहकते चिनार’ आई तो पता चला कि आदरणीय बलराज मधोक की किताब के अलावा हिंदी की वो पहली किताब थी, जो किसी प्रोफेशनल जर्नलिस्ट ने लिखी है। तब मुझे लगा कि हमारे मुल्क के जो जटिल विषय हैं उन अंग्रेजी में, तमिल में, तेलुगु मराठी में तो कुछ हुआ भी है, लेकिन हिंदी में बहुत काम हुआ है। तब मैंने इस पर काम किया, क्योंकि बहुत सारे हिंदी साहित्यकार तो मानते ही नहीं है कि हिंदी में सामाजिक-आर्थिक विषयों पर लिखा जाना चाहिए और कोई लिखता भी है तो उसे तवज्जों देना नहीं चाहते। कश्मीर को लेकर बहुत सारे लोगों के पास सही सूचना नहीं है इसलिए मैंने ये कोशिश की मैं हिंदी भाषी लोगों को बताउं की कश्मीर की असल समस्या क्या है और उसका इतिहास क्या है।

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने बताया कि उन्होंने इस किताब में दो चैप्टर जोड़े हैं, जिसमें से एक चैप्टर का नाम है ‘समझौते के चार बड़े औसत’। इसमें दूसरा चैप्टर 16 जुलाई, 2016 तक की घटनाओं को कवर करता है, जिसका नाम है ‘हिंदू राष्ट्रवादी सोच और कश्मीर’। ‘समझौते के चार बड़े औसत’ चैप्टर के बारे में बताते हुए उर्मिलेश ने कहा कि ऐसा नहीं है कि कश्मीर की समस्या को समझने और उसे हल करने की कोशिश भारत में नहीं हुई हैं। ये मान लेना कि केवल लड़ाइयां ही हुईं हैं तो गलत है, समझौते के प्रयास भी हुए हैं और यही इस किताब में बताया गया है।

कश्मीर मामलो में भारत सरकार के वार्ताकार रहे एम.एम.अंसारी ने कहा कि जब हम कश्मीर के बारे में सुनते और बाते करते आ रहे हैं, ऐसे मौके पर किताब का आना अच्छी बात है और मैं समझता हूं कि उन लोगों के लिए तो और अच्छी बात है जो कश्मीर के मसलें को बहुत ही कम समझते-जानते हैं।

फिल्म निदेशक संजय काक ने इस मौके पर कहा कि किताब का टाइटल ही कुछ न कहकर बहुत कुछ कहता है। ‘कश्मीर- विरासत और सियासत’ यानी यहां सवाल है कि किसकी विरासत और किसकी सियासत? क्योंकि हिन्दुस्तान में जब भी कश्मीर के बारे में होती है, तो लोग यही सोचते हैं कि उनकी विरासत या उनकी सियासत की बात हो रही होगी। अभी तक लोग ये नहीं समझ पाए कि कश्मीर के लोग क्या सोचते हैं? उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान मे जब भी कश्मीर की बात होती है तो इतिहास 1947 से शुरू होता है और 1989 में खत्म हो जाता है और उसके बाद आतंकवादी और पाकिस्तान। यानी 1947 से पहले कोई इतिहास नहीं है और न ही 1989 के बाद कोई इतिहास है।

इस मौके पर जम्मू कश्मीर के प्रमुख अखबार 'राइजिंग कश्मीर' के प्रधान संपादक शुजात बुखारी ने कहा कि ये बड़ा चैलेंज है कि इतने बड़े मुल्क में जहां ज्यादातर लोग हिंदी बोलते हैं, वहां अभी यही एक मात्र किताब लिखी गई है। मुझे लगता है कि 100 किताबें होनी चाहिए थी और ऐसा होता तो आज जो श्रीनगर और दिल्ली के बीच दूरियां देख रहे हैं वे शायद नहीं होतीं।

वहीं वरिष्ठ संपादक व स्तम्भकार प्रेमशंकर झा ने कश्मीर के मुद्दे पर बोलते हुए कहा, ‘मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि कश्मीर और लद्दाख को अलग कर देना चाहिए और ऐसा नहीं किया तो एक दिन कश्मीर हमें छोड़कर चला जाएगा और वह भी इस तरीके से जाएगा, कि आप जमीन तो रख सकते हैं, लेकिन कश्मीरियों को नहीं।

कार्यक्रम संचालन राज्यसभा टीवी की मशहूर एंकर और प्रखर पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने किया। इस दौरान कई वरिष्ठ पत्रकार और अतिथिगण मौजूद रहे।

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