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मीडिया पर भी सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है, बोले वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। ‘मीडिया का काम है कि वह समस्याओं को सामने लाए लेकिन वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हो।’ ये कहना है कि वरिष्ठ पत्रकार और आउटलुक हिंदी के संपादक आलोक मेहता का।
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
‘मीडिया का काम है कि वह समस्याओं को सामने लाए लेकिन वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हो।’ ये कहना है कि वरिष्ठ पत्रकार और आउटलुक हिंदी के संपादक आलोक मेहता का।
‘नोटबंदी का सच और मीडिया की भूमिका’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया पूर्वाग्रह से समाचार को दिखाएगी या प्रस्तुत करेगी तो इसकी विश्वसनीयता कम होगी। उन्होंने कहा कि मीडिया की भूमिका तभी अच्छी होगी जब वह स्वतंत्र ढंग से काम होगा। उन्होंने मीडिया पर भी सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत बताते हुए कहा कि कई ऐसे मीडिया मालिक है जिनके पास कालाधन है लेकिन उन पर छापा नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि मीडिया संजय की भूमिका निभाए लेकिन धृतराष्ट्र जैसा कोई शासक न हो।
आलोक मेहता ने यह बात नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) और दिल्ली पत्रकार संघ द्वारा बुधवार को कांस्टिट्यूशन क्लब में आयोजित सेमीनार में कही।
कार्यक्रम के दौरान डीडी न्यूज के वरिष्ठ संपादकीय सलाहकार विजय क्रांति ने कहा कि मीडिया आज कौरव और पांडव में बंटा हुआ है। एक खास नजरिए से अखबार का दुरुपयोग हो रहा है। मीडिया का काम संजय का था जो कि वह नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि मीडिया उस भारतीय को इज्जत देना भूल गया जो लाइन में लगने और दिक्कतों के बावजूद भी किसी बैंक का शीशा नहीं तोड़ा।
वहीं भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक के.जी. सुरेश ने कहा कि नोटबंदी पर मीडिया की वही भूमिका रही जो रहती आई है। मीडिया दो धड़ों में बंट गया। राजनीतिक झुकाव दिखा। समाचार और संपादकीय में अंतर नहीं दिखा। स्टूडियो बहस पर जोर रहा। सनसनी फैलाई गई। हैदराबाद के एक नेता ने कहा कि समुदाय विशेष के साथ भेदभाव हो रहा है तो इसको तवज्जो देना अनुचित लगा। उन्होंने मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि कश्मीर में पत्थरबाज चुप हो गए, आतंकी और नक्सली हमले नहीं हो रहे, मीडिया में इस पर क्यों नहीं बात की गई। उन्होंने कहा कि हमें मध्यम मार्ग की तरफ जाने की जरूरत है।
उर्दू दैनिक ‘हमारा समाज’ के मुख्य संपादक खालिद अनवर ने कहा कि नोटबंदी भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ एक कदम है लेकिन पिछले 40 दिनों में आम आदमी और मजदूरों के काम छिन गए हैं, यह चिंताजनक है।
इंडियन वुमेन प्रेस कोर की महासचिव अरुणा सिंह ने कहा कि देश के हालात ऐसे नहीं थे और न ही हमारी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो रही थी कि नोटबंदी की जाए। मीडिया ने पहले इसका स्वागत किया और जब तीन दिन बाद ही इसकी पोल खुलनी शुरू हुई तब आलोचना शुरू की।
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