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क्या सेक्स स्कैंडल जैसी घटनाओं को मीडिया की हेडलाइन होना चाहिए, जानें क्या कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार...
क्या सेक्स स्कैंडल जैसी घटनाओं को मीडिया की हेडलाइन होना चाहिए, जानें क्या कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार...
अभिषेक मेहरोत्रा ।।
पिछले दो दिनों से राष्ट्रीय मीडिया में दिल्ली के महिला
समाचार4मीडिया ब्यूरो
9 years ago
अभिषेक मेहरोत्रा ।।
पिछले दो दिनों से राष्ट्रीय मीडिया में दिल्ली के महिला बाल विकास मंत्री संदीप सिंह की सेक्स सीडी सुर्खियों का अहम हिस्सा है। चैनलों और अखबारों की हेडलाइन के साथ-साथ इस मुद्दे पर कई वरिष्ठ संपादक अपनी राय और पैनल डिस्कशन कर रहे हैं। ऐसे में मीडिया का एक धड़ा इससे सहमत नहीं है। उन पत्रकारों का कहना है कि क्या सेक्स स्कैंडल अब हेडलाइन्स हो गए हैं, जिनका पीछा हम पत्रकार को तौर पर करेंगे?अब टीवी न्यूज में ठहराव और आत्मनिरीक्षण की जरुरत है। क्या एक मंत्री की विवादित और गैर-मर्यादित सीडी खबर का हिस्सा होनी चाहिए या नहीं, इस पर हमने बात की कुछ ऐसे वरिष्ठ संपादकों से, जो ये तय करते हैं कि क्या हेडलाइन हो और किस विषय पर पैनल डिस्कशन किया जाए...
अजय उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार
इस अहम मुद्दे पर मैं Marshall Mcluhan का एक कोटेशन कहूंगा जो ये हैं कि When the information travels with a speed of electricity and than the information will go with the light to the world than the world shall behaves in a tribal manner. इस कथन ने जरिए उम्मीद है कि आप मेरे कहने का आशय समझ जाएंगे।
विनोद शर्मा, पॉलिटिकल एडिटर, हिन्दुस्तान टाइम्स
इसके दो पत्र हैं। पहला पक्ष किसी व्यक्त की निजता से जुड़ा मामला है। ऐसे में मीडिया को कुछ भी खबर चलाने से पहले ये जांचना चाहिए कि ये सीडी किस वक्त की है। क्या है उनके राजनीति में आने या मंत्री बनने के बाद की है या फिर उससे पहले की? सवाल उठाने वाले मीडाय पर भी खूब सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि हड़बड़ाहट की पत्रकारिता आज का चलन हो गया है। अभी इस मामले में न तो उनकी पत्नी ने और न ही किसी अन्य महिला ने कोई मामला दर्ज कराया है और सीडी किस समय की है, ये भी ज्ञात नहीं है, ऐसे में मीडिया को बेहद संवेदनशीलता और समझदारी से खबर बनानी चाहिए।
सीएम केजरीवाल ने मंत्री को हटा दिया तो भी वे टारगेट हैं, नहीं हटाते तो भी उन पर निशाना होता। मीडिया को आत्मआंकलन कर अपने गिरेबां में भी झांकना चाहिए।
दूसरा पक्ष ये भी है कि हमारे देश के नेताओं को भी समझना होगा कि आपको हर काम बहुत नपे-तुले तरीके से करना है। पब्लिक फिगर है तो नैतिकता की हर कसौटी पर पब्लिक आपको कसेगी। एनडी तिवारी से लेकर संजय जोशी तक ऐसे मामलों के चलते विवादित हुए और अपनी साख खोई। इसलिए जरूरी है कि भारत के राजनेता इससे सबक लें।
अमिताभ अग्निहोत्री, सीईओ-एडिटर इन चीफ, K न्यूज चैनल
मैं मानता हूं कि सार्वजनिक जीवन वाली शख्सियत का अगर दृश्य सामने आया है, तो इस पर बात करना मीडिया की जिम्मेदारी है। इसलिए ये कहकर कि ये विषय उतना बड़ा नहीं है कि इस पर हेडलाइन नहीं बननी चाहिए, इसे डाइल्यूट मत कीजिए। अगर ये मामला किसी आम आदमी का होता तो चौकी के पुलिस इंस्पेक्टर तक की रह जाता पर चूंकि मंत्री का आचरण-व्यवहार का प्रभाव पब्लिक पर पड़ता है, ऐसे में सनसनी और पैपेरेजी के नाम पर उसे बख्शा नहीं जा सकता है। मैं यहां ये भी स्पष्ट कर दूं कि दो व्यक्तियों के निजी संबंधों को लेकर मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन अगर आप प्रशासनिक पद पर या सार्वजनिक पद पर है तो आप के कामों पर मीडिया पैनी नजर रखेगी और उसे रखनी भी चाहिए।
प्रवीण आत्रे, एडिटर, TOP STORY
मेरा स्पष्ट कहना है कि पत्रकारिता सियासत से अलग नहीं हो सकती है। सियासत के आचरण और व्यवहार पर बात करना पत्रकार का काम है। ये मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि दिल्ली सरकार के मुखिया ने देश से एक नई राजनीति की वादा किया था। उन्होंने स्पष्ट तौर पर नैतिकता और ईमानदारी की बात की थी, ऐसे में उनकी सरकार के मंत्री लगातार विवादों में फंस रहे हैं, तो उनसे जवाब मांगना मीडिया का काम है। ये मुद्दा भ्रष्टाचार से भी जुड़ा है। किस तरह की राजनीति की बात की थी केजरीवाल ने और उनकी सरकार का किस तरह का स्वरूप अब सामने दिख रहा है, इस विषय को मीडिया पुरजोर तरीके से उठा रहा है। केजरीवाल से ये सवाल सिर्फ कल के शो में ही नहीं, कई बार कई विषयों पर मैं पूछूंगा? प्रदेश के मुखिया वैसे तो छोटी-छोटी बातों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाते हैं, पर कल सिर्फ विडियो संदेश से ही काम चला गए, पर मीडिया को उनको जवाब देना ही होगा कि अब ये पार्टी कैसे दूसरी पार्टियों से अलग है और जिस शुचिता और मर्यादा की वे हरवक्त पुरजोर वकालत करते हैं, वे अब कहां है? अरविंद को मीडिया के सामने आकर बात करनी चाहिए, संवादहीनता से उनकी ही छवि कमजोर हो रही है?
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