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...तो इस वजह से नहीं बढ़ पाई प्रिंट में FDI की लिमिट  

समाचार4मीडिया ब्‍यूरो ।। प्रिंट मीडिया में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा बढ़ाने को लेकर जहां सरकार इसके खिलाफ हैं वहीं इस मामले में इंडस्‍ट्री से जुड़े लोगों ने अपने अलग-अलग विचार दिए हैं। इनमें से कुछ लोग तो एफडीआई की सीमा बढ़ाने का समर्थन कर रहे हैं वहीं

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

समाचार4मीडिया ब्‍यूरो ।।

प्रिंट मीडिया में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा बढ़ाने को लेकर जहां सरकार इसके खिलाफ हैं वहीं इस मामले में इंडस्‍ट्री से जुड़े लोगों ने अपने अलग-अलग विचार दिए हैं। इनमें से कुछ लोग तो एफडीआई की सीमा बढ़ाने का समर्थन कर रहे हैं वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो प्रिंट में एफडीआई बढ़ाने के खिलाफ हैं।

दरअसल, पिछले महीने ही प्रेस ट्रस्‍ट ऑफ इंडिया (PTI) ने रिपोर्ट दी थी कि केंद्र सरकार प्रिंट न्‍यूज मीडिया में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा 26 से 49 प्रतिशत तक बढ़ाने के खिलाफ है।

डिपार्टमेंट ऑफ इंडिस्‍ट्रयल पॉलिसी एंड प्रमोशन (औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग) को इस मामले में विचार करने के लिए कहा गया था। वहां से डिपार्टमेंट ऑफ इकनॉमिक अफेयर्स को एफडीआई के नियमों में किसी भी तरह की और ढील देने से इन्‍कार किया गया था।

दिल्‍ली प्रेस (Delhi Press) के पब्लिशर और एडिटर परेश नाथ न्‍यूज मीडिया में एफडीआई के खिलाफ हैं। उनका कहना है, ‘भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 19 के अनुसार भारतीय नागरिकों को ही वाक् एवं अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का अधिकार है न कि विदेशियों को।’ नाथ का कहना है, ‘प्रिंट और टेलिविजन में एफडीआई होनी ही नहीं चाहिए।’

इस मामले में मिलेनियम पोस्‍ट के पब्लिशर और एडिटर-इन-चीफ दरबार गांगुली ने भी एफडीआई को लेकर दी गई छूट की खिलाफत की है। उनका कहना है, ‘मुझे नहीं लगता कि एफडीआई की सीमा को बढ़ाना चाहिए’ उनका कहना है कि विश्‍व के अन्‍य हिस्‍सों में भी प्रिंट मीडिया में एफडीआई की अनुमति नहीं है। न्‍यूज मीडिया काफी भी फायदे के लिए नहीं था लेकिन इसका लोगों पर बहुत प्रभाव था। उन्‍होंन सवाल उठाया कि आखिर कैसे विदेशी निवेशकों का कौन सा हित है जो विभिन्‍न मुद्दों पर लोगों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।

वहीं, हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स (Hindustan Times) के रेजिडेंट एडिटर नरदीप सिंह दहिया एफडीआई का समर्थन करने वालों में शामिल थे। उनका कहना है कि प्रिंट मीडिया शुरू से ही काफी दीन स्थित में रहा है ऐसे में इसे रेवेन्‍यू के लिए एफडीआई की काफी जरूरत है। जबकि गांगुली का कहना है कि सिर्फ एफडीआई का ही इसमें इनवेस्‍ट नहीं है बल्कि प्रिंट न्‍यूज संस्‍थानों को पैसा जुटाने के लिए अन्‍य विकल्‍पों जैसे स्‍टॉक मार्केट (stock market) आदि का भी इस्‍तेमाल करना चाहिए।

क्रिएटिव इंडस्‍ट्रीज पर बारीकी से नजर रखने वाले कम्‍युनिकेशन विचारक (communication theorist) विबोध पार्थसारथी का कहना है, ‘प्रिंट न्‍यूज में एफडीआई का मामला सबसे पहले 1991 में उठा था। उस समय बड़े अखबारों ने इसका काफी विरोध किया था। इन दिनों एफडीआई पर अध्‍ययन कर रहे पार्थसारथी का कहना है कि 1991 में एफडीआई का विरोध करने वाले कुछ अखबारों ने वर्ष 2001-2002 में अपना पाला बदल लिया था क्‍योंकि उस समय उन्‍हें पैसों की सख्‍त जरूरत थी।

वहीं सरकार के इस निर्णय का कुछ लोगों ने समर्थन भी किया है। इनमें चित्रलेखा (Chitralekha) के प्रेजिडेंट और पब्लिशर मित्रजीत भट्टाचार्य भी शामिल हैं। उनका कहना है कि प्रिंट न्‍यूज सेक्‍टर काफी संवेदनशील है। प्रिंट न्‍यूज में  एफडीआई पर सुस्‍त रफ्तार काफी विवेकपूर्ण निर्णय है। उनका कहना है 49 प्रतिशत पर भी काफी कम लोगों की सहमति थी, सरकार भविष्‍य में भी इस बारे में फैसला ले सकती है।

सेंटर फॉर मीडिया स्‍टडीज (Centre for Media Studies) की डायरेक्‍टर पीएन वसंती का कहना है कि प्रिंट में एफडीआई की सीमा न बढ़ाने का फैसला सिर्फ सुरक्षा से संबंधित ही नहीं था बल्कि इसके और भी कारण थे। उनका कहना है, ‘इलेक्‍ट्रोनिक न्‍यूज के विपरीत प्रिंट मीडिया को ट्रैक करना और उस पर नजर रखना आसान काम नहीं है। उदाहरण के लिए कोई भी रोजाना उर्दू अखबारों के कंटेंट पर नजर नहीं रख सकता है। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया में तो इस पर निगरानी के लिए सरकार के पास इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया मॉनीटरिंग सेंटर (EMMC) भी है जो चैनलों के कंटेंट पर नजर रखता है।’ वसंती का मानना है कि प्रिंट में एफडीआई को लेकर नेता उसी तरह चिंतित थे जैसे वे प्राइवेट रेडियो चैनल पर न्‍यूज को अनमुति देने को लेकर थे।

वसंती का कहना है, ‘अखबार एफडीआई से मिलने वाली पूंजी का इस्‍तेमाल अपनी टेक्‍नोलॉजी बढ़ाने में करना चाहते थे। इसके अलावा वे पेड न्‍यूज और विज्ञापनों पर भी अपनी निर्भरता कम करना चाहते थे।’ उनका कहना था कि इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया में एफडीआई की सीमा बढ़ने होने के बाद से लोगों को लगने लगा था कि प्रिंट में भी ऐसा हो सकता है।

पार्थसारथी का यह भी कहना था कि हालांकि प्रिंट में एफडीआई की सीमा 26 प्रतिशत थी लेकिन अधिकांश में इसका ज्‍यादा असर नहीं था। पार्थसारथी के अनुसार, ‘आंकड़े बताते हैं कि इससे पूंजी में इजाफा नहीं हुआ था लेकिन इसमें विदेशी उपकरणों की संख्‍या में बढ़ोतरी हो गई थी’ उनका कहना था कि इस बारे में सरकार और इंडस्‍ट्री को दोबारा से सोचने की जरूरत थी।

पार्थसारथी का कहना है कि एफडीआई के बारे में पहले कही जा रहीं बातें अब खत्‍म हो चुकी हैं और अब इसके खिलाफ कई नई बात कही जा रही हैं। उन्‍होंने कहा, ‘आज के इंटरनेट के युग में कोई भी व्‍यक्ति विदेशी अखबारों द्वारा प्रकाशित किसी भी न्‍यूज को आसानी से देख सकता है ऐसे में यह कहना है कि एफडीआई को बढ़ाने से यहां पर विदेशी अखबारों का प्रभुत्‍व बढ़ जाएगा, ठीक नहीं है।’ उनका यह भी कहना था कि प्रिंट और टेलिविजन न्‍यूज के लिए एफडीआई के नियम तो बना दिए गए हं लेकिन इंटरनेट पर इस तरह की न्‍यूज के लिए कोई सीमा तय हीं की गई है।

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