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क्या पत्रकारों को राजनीति का हिस्सा बनना चाहिए, जानिए क्या बोले वरिष्ठ पत्रकार...
क्या पत्रकारों को राजनीति का हिस्सा बनना चाहिए, जानिए क्या बोले वरिष्ठ पत्रकार...
अभिषेेक मेहरोत्रा ।।
इस चुनावी मौसम में अब पत्रकार भी राजनीति की मुख्यधारा से जुड़ र
समाचार4मीडिया ब्यूरो
9 years ago
अभिषेेक मेहरोत्रा ।।
इस चुनावी मौसम में अब पत्रकार भी राजनीति की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं। ऐसे में पत्रकारिता और राजनीति का जो घालमेल दिख रहा है उस पर सवाल उठना लाजिमी है। ये सवाल नए नहीं है पर आज के दौर के वरिष्ठ संपादकगण की इस पर क्या राय है इससे हम आपको रूबरू करा रहे हैं:
आलोक मेहता, प्रधान संपादक, आउटलुक (हिन्दी):
मैं पत्रकारों का राजनीति में शामिल होने के सख्त खिलाफ हूं। जब एक पत्रकार पत्रकारिता करते हुए अचानक किसी पार्टी से जुड़ जाता है, तो वह पूरी पत्रकारिता की विश्वसनियता पर ही सवाल उठा देता है। मेरा मानना है कि अगर पत्रकार को राजनीति से जुड़ना ही है तो जिस तरह से आईएएस/आईटीएस अपने रिटायरमेंट के कुछ निश्चित सालों के बाद ही सरकारी सेवा से जुड़ सकते हैं, इसी तरह का कोई नियम कानून होना चाहिए। अगर कोई पार्टी किसी पत्रकार को मनोनीत करती है तो कुछ हद तक ये सही है, पर यहां भी फैसला पत्रकार को अंतरात्मा की आवाज पर लेना होगा।
वेद प्रताप वैदिक, वरिष्ठ पत्रकार
पत्रकार चूंकि देश के नागरिक हैं तो इस नाते राजनीति में जाना उसका अधिकार है। व्यपारी, मजदूर, अफसर की ही तरह वे चुनाव के मैदान में उतर सकते हैं। वैसे पत्रकारिता मेरे लिए राजनीति ही है। मैं मानता हूं कि Journalism is politics by other mean. पत्रकार को राजनीति का निर्भीक, निष्पक्ष और गहरा विश्लेषण करना चाहिए और अगर जरूरत महसूस हो तो राजनीति के दंगल में कूद भी जाना चाहिए, पर पत्रकारिता का दुरुपयोग कर दलाली करने वाले पत्रकारों से ना सिर्फ पत्रकारिता बदनाम हो रही है, बल्कि राजनीति का भी अहित होता है।
दिबांग, वरिष्ठ पत्रकार, एबीपी न्यूज
मेरा मानना है कि प्रफेशनल पत्रकारों को राजनीति में नहीं जाना चाहिए। राजनीति और पत्रकारिता अलग-अलग है। जब एक पत्रकार पत्रकारिता के जरिए राजनीति में एंट्री करता है तो वह अपना अभी तक का सब काम और मीडिया की स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है। इस तरह से मीडिया की क्रेडबिलिटी पर भी निगेटिव इम्पैक्ट पड़ता है।
ओम थानवी, पूर्व संपादक, जनसत्ता:
जब पत्रकार अपनी पत्रकारिता की पारी पूरी कर चुका हो और वह जिस काम के लिए पत्रकारिता में आया था, उस काम को भी अंजाम दे दे और फिर जब उसे लगे कि उसे जनसेवा करनी है तो राजनीति के दरवाजे के अंदर वो जा सकता हैं। पत्रकारिता करते हुए राजनीति का हिस्सा बनना परोपतौर पर पत्रकारिता को सीढ़ी के तौर पर इस्तेमाल करना है और ये दर्शाता है कि आप अपने काम और साख को भुना रहे हैं। पत्रकारिता की आड़ में अपनी महत्वकांक्षा पूरी कर रहे है। पत्रकारिता पूरी करने के बाद कुछ नया करना चाह रहे तो राजनीति एक विकल्प है।
प्रमोद जोशी, पूर्व संपादक, हिन्दुस्तान दिल्ली :
व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि ये खराब प्रवृत्ति है, वैसे ही पत्रकार को लेकर तमाम तरह के कयास समाज के बीच में रहते हैं। चाहे आशुतोष का मामला हो या उससे पहले के पत्रकारों का। हमने देखा है जब-जब ऐसा होता है तो पत्रकार की छवि धूमिल होती है। जिनको राजनीति की करने की महात्वाकांक्षा है वो पत्रकारिता में न आए। कई पत्रकारों ने नेता बनकर दौलत-सौहरत तो खूब कमाई पर पाठकों के बीच से पत्रकारिता की विश्वसनीयता गवाई।
अमिताभ अग्निहोत्री, सीईओ, के न्यूज
निजी तौर पर मेरा मानना है कि पत्रकार राजनीति में जा सकते हैं और नेता पत्रकारिता कर सकते हैं इसमें कोई बुराई नहीं है, पर पत्रकारिता करते हुए अपनी भविष्य की राजनीतिक पारी के लिए जमीन तैयार करना पूर्ण रूप से गलत है। ये पत्रकारिता का दुरुपयोग है। हमने कई उदाहरण देखें है जब ब्यूरोक्रेट्स प्राइवेट पार्टीज को फायदा पहुंचाते हैं और वीआऱएस लेकर ‘रिश्वत’ के तौर पर उन प्राइवेट कंपनियों में औधा पाते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े कई लोग कवरेज और खबरों के नाम पर खेल करके बाद में पार्टी में पद या टिकट पाकर रिश्वत लेते हैं।
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