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अमेरिकी मंत्री की भारतीय मीडिया को दी सलाह पर वरिष्ठ पत्रकारों की अलग-अलग राय...
अभिषेक मेहरोत्रा ।। भारत में आने से पहले अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जॉन
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
भारत में आने से पहले अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जॉन केरी नौ घंटे तक बांग्लादेश की यात्रा पर थे, जहां उन्होंने मीडिया को आतंकी हमलों पर रिपोर्ट न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि दहशत फैलाने का यह आसान तरीका है।
केरी ने अपने बयान में कहा कि अगर मीडिया बहुत अधिक इसकी कवरेज न करे तो शायद वह एक तरह से हम सभी की सेवा ही करेगा। उन्होंने कहा कि इससे लोगो को पता भी नहीं चलेगा कि क्या हो रहा है? केरी ने यह टिप्पणी फ्रेंच मीडिया का हवाला देते हुए कही, जहां की मीडिया ने लगातार बढ़ रहे आतंकी हमलों को देखते हुए जुलाई में यह निर्णय लिया था कि वे आतंकियों के नाम और फोटो का प्रकाशन नहीं करेंगे, क्योंकि यहां की मीडिया इस बात को लेकर काफी सतर्क हैं कि आतंकियों के मरने के बाद उसकी कवरेज कर उसे महिमामंडित न किया जाए।
केरी द्वारा उठाय गए इस अहम मसले पर हमने मीडिया जगत के कई सम्मानित और नीतिनिर्धारक संपादकों से बात की है। पेश है उनके विचार...
मीडिया में एक लंबे अनुभव के बाद में मैं इस विषय पर यही कहूंगा कि सिर्फ आतंकी हमला ही नहीं, दंगों के समय और रेप की खबरों के समय भी मीडिया को बेहद संयमशाली होना चाहिए और एक बड़े स्तर तक भारतीय मीडिया समझदारी और संयमशाली होने का परिचय देती है। इस तरह की खबरों को चलाते समय ध्यान रखना होगा कि कहीं गलत चीज ग्लोरिफाई तो नहीं हो रही है।
साथ ही मैं आज के टीवी सीरियल्स का मुद्दा भी उठाता हूं। अक्सर हम पढ़़ते हैं कि फलां अपराध करने वाले अपराधी ने अमुक टीवी शो से प्रेरणा पाई थी, तो हमें देखना होगा कि कहीं गलत प्रेरणा का व्यापक प्रसार तो हम नहीं कर रहे हैं। फ्रांस की स्थिति ज्यादा गंभीर होगी, इसलिए वहां की मीडिया ने इस तरह का फैसला लिया होगा।
मेरा साफ कहना है कि कई विषयों पर मीडिया को जितना संवेदनशील होना चाहिए, भारतीय मीडिया उस कसौटी पर खरा उतरता है। हम छिपाते नहीं हैं, जब जो जरूरी है, उसे दिखाते हैं। और जो दिखाते हैं, पूरी जिम्मेदारी को ध्यान में रखकर करते हैं। सेल्फ रेग्युलेशन से हम लोग बंधे हुए हैं। आतंकी घटनाओं का लाइव टेलिकास्ट नहीं करते हैं, पर कई बार किसी आतंकी के नाम और उसके बारे में जानकारी देना जरूरी होता है। पूरी पारदर्शिता के साथ टेलिकास्ट करते हैं। हमारे लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है और कई आयामों पर चर्चा होती है। हाल ही में आतंकी बुरहान वानी की मौत पर भी मीडिया की भूमिका को लेकर वृहत स्तर पर चर्चा ही रही है।
देखिए इस बात के दो पहलू हैं। पहला तो ये कि किसी आतंकी घटना के होने के चलते किस तरह की प्रशासनिक चूक हैं, इसे उठाना अहम है। आज के अर्बन टेरिरिज्म के दौर में जब भी कोई हमला होता है तो कहीं न कहीं से सरकार और सिस्टम की असफलता का सूचक है। अगर मैं मुंबई हमले की बात करूं तो आतंकी उसी समुद्री रास्ते से आए थे, जिसका प्रयोग कभी अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद भी करता था, ऐसे में इस हमले और आतंकियों के तरीके पर बात होगी और प्रशासन को आड़े हाथ लिया ही जाएगा। आतंकी घटनाओं का विश्लेषण ही सिस्टम को उसकी खामियों से परिचित कराता है।
दूसरी बात ये है कि जब आतंकी घटना या किसी अन्य दुर्घटना के बाद बड़ी संख्या में लोगों की मौत या चोटें आई हैं, ऐसे में इसका लाइव प्रसारण नहीं होना चाहिए। पर किसी आतंकी की लाश दिखाने को उसका ग्लोरिफिकेशन नहीं मानता हूं। हम उसकी मौत के साथ ही अपने जवानों का यशगान दिखाते हैं।
आतंकवादियों को किसी भी तरह ग्लोरीफाई नहीं किया जाना चाहिए, इसलिए मैं अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी की राय का सम्मान करता हूं। साथ ही स्पष्ट तौर पर मानता हूं कि रक्तरंजित शव जैसी वीभत्स तस्वीरें भी प्रकाशित नहीं होनी चाहिए। जब मैं 2003 में स्टार न्यूज में था, तो प्रबंधन ने फैसला किया था कि चैनल किसी भी तरह की वीभत्स तस्वीरें टेलिकास्ट नहीं करेगा और 2005 तक वहां ये नीति पूरी तरह से लागू रही थी। भारत आतंकवाद का बड़ा भुक्तभोगी है, ऐसे में यहां मीडिया को आतंकियों के प्रचार-प्रसार को हर तरह से रोकना ही चाहिए।
मेरा कहना है कि आज हम जिस तरह आइएसआइआइ के विडियो जो मीडिया द्वारा हमें दिखाए जाते हैं, को देखने के बाद भय, डर, घृणा पैदा होती है। हम ऐसे वीभत्स दृश्य देखने के बाद आतंकित महसूस करते हैं, ऐसे में फ्रेंच मीडिया ने जो कदम उठाया है, उसका सीमित महत्व तो है ही। ऐसे प्रचार-प्रसार से बगावती स्वभाव रखने वाले युवा भी ऐसे संगठनों की तरफ आकर्षित होते हैं। पर आतंकवाद पर मेरा कहना है कि मीडिया को इस समस्या के मूल निदान पर बात करनी होगी। समस्या की जड़ पर हम नहीं जा रहे हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में पारंपरिक मीडिया इसे थोड़ा ही रोक सकता है। इस तरह की पहल प्रतीकात्मक तौर पर सही है। पर इससे आतंकवाद का खात्मा नहीं हो सकता है।
मैं स्पष्ट तौर पर कहता हूं कि केरी की यह सलाह भारतीय संदर्भ में बिलकुल सही नहीं है। मीडिया आतंकवाद की रिपोर्टिंग से बच नहीं सकता, क्योंकि इस तरह की कवरेज पब्लिक को सचेत करती है और आतंकवाद की भयावहता के बारे में भी सरकार को पता चलता है। मेरा तर्क है, ‘मीडिया रिपोर्ट की कमी से राजनीतिक दल आतंकवाद को बहुत हल्के में लेंगी। हालांकि साथ ही ये भी चेतावनी दूंगा कि मीडिया को आतंकवादियों को हीरो नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जहां तक मीडिया का सबंध है तो भारत में सार्वजनिक सूचना वितरण प्रणाली का स्तर पूरी तरह से अलग है।’
आखिर में वरिष्ठ पत्रकार एन.के. सिंह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि केरी का यह बयान संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए प्रासंगिक हो सकता है लेकिन हमारे देश में जहां की एक राज्य सरकार चुनाव से ठीक पहले ही कुछ वोट के लिए आंतकवादियों को छोड़ देती है, वहां इस पहल को बहुत आधिक समय तक फॉलो नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इस तरह की जो खतरनाक राजनीतिक तैयार की जाती है उसके बारे में लोगों को पता होना चाहिए।
प्रमोद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार-पूर्व संपादक(हिंदुस्तान-दिल्ली संस्करण)
विदेशों में जिस तरह आतंकी घटनाओं की कवरेज होती है, उनसे हमें सीखना चाहिए। 9/11 में अमेरिका में हुए आतंकी घटना के बाद जिस तरह वहां की मीडिया ने वीभत्स दृश्य नहीं दिखाए, वे जिम्मादारी पूर्ण व्यवहार था। वहां मीडिया की कोशिश थी कि लोगों पर निगेटिव इम्पैक्ट न पड़े। राष्ट्रपति कैनेडी की हत्या पर भी न्यूजवीक ने पूरी जिम्मेदारी के साथ खबरें प्रकाशित की थी। पर भारत में राजीव गांधी हत्याकांड की कवरेज के वक्त मीडिया में क्षत-विक्षत रक्तरंजित शव दिखाए गए थे।
आज हमारी मीडिया में रिपोर्टिंग कम हो गई है, तो डिस्कशन शो ज्यादा बढ गए हैं । विवादित मुद्दों पर बात करते हुए मीडिया की विशेष भूमिका होती है, पर कई बार हम देखतें है कि आइडिलॉडी थोपने की कोशिश की जाती है।
केरी की बात पर भारतीय मीडिया को सोचना चाहिए और ऐसे में एक ंमंच के तौर पर चाहे प्रेस काउंसिल हो या एनबीए या बीईए, इन्हें मीडिया की भूमिका और छवि को लेकर कुछ कड़े मापदंड बनाने ही चाहिए।
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