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नोटबंदी के असर से छलका जब एक संपादक का दर्द...

<p style="text-align: justify;">'कैसी अद्भुत मीडिया स्थिति है। बड़े अखबार-चैनल मालिक और उनके तुर्रमखां एंकर, संपादक सभी समझ कर भी नासमझ बनते हुए देश को कैसलेश बनाने की तुताड़ी उठाए हुए है। लाइने दिखाते–दिखाते भी ये गुंजा देते हैं कि कोई बात नहीं, आगे अच्छे दिन हैं। कह सकते हैं बड़े अखबारों के लिए स्थिति वैसी ही है जो बाकि क्षेत्रों के बड़े लोगों, ब

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

'कैसी अद्भुत मीडिया स्थिति है। बड़े अखबार-चैनल मालिक और उनके तुर्रमखां एंकर, संपादक सभी समझ कर भी नासमझ बनते हुए देश को कैसलेश बनाने की तुताड़ी उठाए हुए है। लाइने दिखाते–दिखाते भी ये गुंजा देते हैं कि कोई बात नहीं, आगे अच्छे दिन हैं। कह सकते हैं बड़े अखबारों के लिए स्थिति वैसी ही है जो बाकि क्षेत्रों के बड़े लोगों, बड़े खिलाड़ियों की है। अदानी, अंबानी, टाटा, बिड़ला और बड़ी कंपनियों को अभी क्या फर्क पड़ना है। पहले तो छोटे, लघु, मझौले उद्योग, कामधंधों वाले कारोबारी और उसके मजदूर मरेंगे!'  हिंदी दैनिक अखबार ‘नया इंडिया’ में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हरिशंकर व्यास का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

अखबारः मोटे पतले, छोटे मरते!

लक्ष्मीजी की चंचलता पर नोटबंदी के ताले ने कई ताले बनवा दिए हैं। जरा गौर करें 8 नवंबर से पहले के अंग्रेजी-हिंदी के बड़े अखबारों को। तब वे मौटे थे। दिल्ली में टाइम्स, हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार लोकल-पेज-4 और बाजार के जो सप्लीमेंट लिए होते थे उनमें बीस-बत्तीस पेज होते थे। अब ये छह-आठ-बारह पेज में सिकुड़ गए हैं। वक्त यों क्रिसमस और नए साल के खरीदी सीजन का है लेकिन जैसे दिल्ली के बड़े शॉपिंग मॉल सूने हैं वैसे अखबार भी सूखे-पतले हुए पड़े हैं। भर्ती के पुराने विज्ञापनों को डाल कर जबरदस्ती विज्ञापन सप्लीमेंट बन रहे हैं।

विज्ञापन, मार्केटिंग के धंधे से जो भी जुड़ा हुआ है वे सब आगाह कर दे रहे हैं कि अभी तो शुरुआत है। अक्टूबर-दिसंबर की तिमाही पर अनुमान है कि इस अवधि में बड़े अखबारों को 1200 से 1500 करोड़ रु का विज्ञापन मिलेगा। लेकिन जनवरी से मार्च की चौथाई में बहुत हवा–हवाई हो चुका होगा, जबकि इन तीन महीनों में साल का 35 से 40 प्रतिशत विज्ञापन आता है। बड़े अखबारों की कमाई के दो बड़े सेक्टर रियल एस्टेट, शिक्षा संस्थाओं की विज्ञापनबाजी 2017 में 2016 के मुकाबले 20-30 प्रतिशत भी नहीं होनी है। इसे समझते हुए भोपाल के एक बड़े अखबार ने रास्ता निकाला। उसने रियल एस्टेट वालों को प्रस्ताव दिया कि नकदी नहीं है तो कोई बात नहीं जितनी राशि का विज्ञापन पैकेज बनता है उसके बदले फ्लैट दे दें। मतलब बड़े अखबार बार्टर सिस्टम के लिए तैयार हैं। इस पर रियल एस्टेट कंपनियां यह कहते हुए टरका रही हैं कि ग्राहक कहां होगा जो छह महीने या अगले साल का मार्केटिंग-विज्ञापन प्लान बनाएं!

एक और असर जानिए। दिल्ली, जयपुर, भोपाल, रांची आदि शहरों में कई बड़े अखबार खुद सुबह डिपो पर केस बिक्री कराते थे। बिक्री खत्म होने के बाद केस उठता था। 8 नवंबर को नोटबंदी हुई तो अरबपति अखबारों को भी क्रेडिट, उधार पर उतर आना पड़ा। न ग्राहक से पैसा, न हॉकर से पैसा और न एजेंट पैसा देने की स्थिति में। कईयों ने हाथों हाथ एजेंट बना उन्हीं के खातों में पैसे डलवा कर चेक पेमेंट लेने शुरू किए। कौन कितनी उधारी चला रहा है और किसने कैसे नकदी घुमाई, उस पर सोचे तो लगेगा मीडिया पूरा घूम गया है। अपन ने चैनलों की दशा मालूम नहीं की है लेकिन यदि अखबार में कमर्शियल विज्ञापन सूखेंगे तो चैनलों में तो ज्यादा सूखा पड़ेगा।

अखबारों को दोहरी मार है। विज्ञापन घटने और ग्राहक से नकदी वसूलने की दोहरी मार। यों इसमें बड़े खरबपति मीडिया समूहों को उतनी चिंता नहीं होगी। ये छह–आठ महीने उधारी या मुफ्त में अखबार बटवा कर जिंदा रह सकते हैं। धंधा करते रह सकते हैं। मगर अफरात की कमाई यदि सूखने लगे तो ये नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को कैसे कोस रहे होंगे इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। हर अखबार मालिक समझ रहा है कि 2017 का साल बरबादी का और पता नहीं 2018 में भी आर्थिकी उठे या नहीं। बावजूद इसके इन मीडियों समूहों में हिम्मत नहीं है कि जो ये समझ रहे हैं, जो इन्हें दिख रहा है उसको लेकर ईमानदारी से रिपोर्टिंग करवाएं, विश्लेषण करवाएं और झलकाए कि कैसा सत्यानाश हो रहा है।

कैसी अद्भुत मीडिया स्थिति है। बड़े अखबार-चैनल मालिक और उनके तुर्रमखां एंकर, संपादक सभी समझ कर भी नासमझ बनते हुए देश को कैसलेश बनाने की तुताड़ी उठाए हुए है। लाइने दिखाते–दिखाते भी ये गुंजा देते हैं कि कोई बात नहीं, आगे अच्छे दिन हैं। कह सकते हैं बड़े अखबारों के लिए स्थिति वैसी ही है जो बाकि क्षेत्रों के बड़े लोगों, बड़े खिलाड़ियों की है। अदानी, अंबानी, टाटा, बिड़ला और बड़ी कंपनियों को अभी क्या फर्क पड़ना है। पहले तो छोटे, लघु, मझौले उद्योग, कामधंधों वाले कारोबारी और उसके मजदूर मरेंगे!

छोटों के बंद होने की कगार!

जैसा मैने पहले लिखा कि छोटे व्यक्ति, छोटे कामधंधों यानि अनौपचारिक क्षेत्र पर नोटबंदी की ज्यादा मार इसलिए अधिक होगी क्योंकि जितना छोटा पैमाना होगा उसकी उतनी छोटी जरूरत कैश, नकदी से ही पूरी होती रही है। यह बात उन छोटे अखबारों पर भी लागू है जिसने प्रेस भले लगा रखी हो लेकिन कागज, प्लेट, स्याही आदि सब वह नकदी से खरीदता है।

नवंबर के पहले सप्ताह में मैने सीरीज लिखी थी कि नरेंद्र मोदी और उनके पीएमओ व भारत सरकार के सूचना मंत्रालय ने डीएवीपी और आरएनआई को औजार बना कर छोटे–मझौले अखबारों को खत्म करने की नीति बनाई है। सरकार के उस रोडमैप को नोटबंदी ने लगभग सौ फीसद सफल बना दिया है। इसलिए कि बड़ा अखबार उधार या फ्री दे कर महीनों अपना सर्कुलेशन बनाए रख सकता है पर छोटे के लिए तो बिक्री, हॉकर या एजेंट से केस नहीं आया या 15 अगस्त, दीपावली पर छपे विज्ञापनों का पेमेंट खटाई में पड़ा व नववर्ष की शुभकामना संदेश के पेज नहीं बने तो बज गया बाजा। जब बड़े अखबारों को पेमेंट नहीं है तो छोटे अपने आप खड्डे में चले जाएंगे। और ये चले गए हैं। अधिकांश अखबार मालिक अखबार बचाओं के वॉट्सऐप ग्रुप बनाकर, सर्क्युलेशन खत्म करके नाम के लिए फर्रा छापने को मजबूर हैं। उस नाते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का 2016 का यह भी इतिहास बनेगा कि उन्होंने अखबारों को बंद कराया। मीडिया को खत्म व गुलाम बनाने का नया इतिहास रचा।

नया इंडिया अपवाद नहीं!

और हां, यह जो अखबार आपके हाथ में है इसकी भी सांसे उखड़ी हुई है। अपने को 10 नवंबर को ही समझ आ गया था कि देश पर लक्ष्मीजी का श्राप लग गया है। तभी प्रिंट को काट, संस्करण और प्रसार घटा डिजिटल की और अपन दौड़े। सुखद आश्चर्य यह हुआ कि उधर फोकस बनाया नहीं कि www.nayaindia.com को पढ़ने वालों में ऐसा जंप हुआ कि 10 नवंबर को वैश्विक रैंकिग थी 83,791 तो 10 दिसंबर को वह 66,441 थी। भारत में नया इंडिया अब बिना कुछ किए, बिना मार्केटिंग के भी कल 3,735 की रैंकिग पर था। एंड्रयॉड हो या एप्पल सभी पर नया इंडिया चल पड़ा है। आपसे भी आग्रह है कि अब वेबसाइट या ऐप से ही नया इंडिया पढ़ने की आदत बनाएं। प्रिंट यानी कि कागज काले करते जाने पर तो जनवरी या अप्रैल में, फैसला करना ही होगा। यह तो अपनी हिम्मत है और अपने प्रति सदभावनाओं, सदइच्छा की ताकत है जो प्राण वायु सुखा कर अपन ने अखबार निकालने का भी दुस्साहसी प्रयोग कर डाला। और इस प्रयोग के साथ भारत राष्ट्र-राज्य के मीडिया की कुल तस्वीर का जो अनुभव हुआ है उसका निचोड़ यह है कि हम हिंदुओं की नियति में बुद्धि और तलवार (कलम की तलवार भी) नहीं है। हम डर और भक्ति की बंदिश में जिए हैं, जी रहे हैं और जिएंगे। यह नोटबंदी से भी फिर प्रमाणित हो रहा है।

(साभार: नया इंडिया)

(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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