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वरिष्ठ पत्रकार कल्पेश याज्ञनिक बोले, मुफ़्त नहीं, मुक्त मोबाइल कॉल, डेटा चाहिए
कल्पेश याज्ञनिक ग्रुप एडिटर, दैनिक भास्कर ।। मुफ़्त नहीं, मुक्त मोबाइल कॉल, डेटा चाहिए ‘करोड़ों साइबर पाप इसलिए होने से रुक पाते हैं क्योंकि
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
कल्पेश याज्ञनिक
ग्रुप एडिटर, दैनिक भास्कर ।।
मुफ़्त नहीं, मुक्त मोबाइल कॉल, डेटा चाहिए
‘करोड़ों साइबर पाप इसलिए होने से रुक पाते हैं क्योंकि डेटा स्पीड नहीं मिलती।’ - ऑफ लाइन इंटरनेट से।
यह सही है कि मुफ़्त आखिर मुफ़्त ही होता है। किन्तु, कुछ भी मुफ़्त नहीं होता। संभवत: हम पहले भी चर्चा कर चुके होंगे। फिर भी दोहराना प्रासंगिक होगा। नथिंग इज़ फ्री। सिर्फ़ हमें पता नहीं चलता।
देश के सर्वाधिक धनी मुकेश अंबानी ने टेलिकॉम की दुनिया में बड़ा धमाका किया है। उन्होंने ‘डेटागिरी’ का नया नारा देते हुए वॉइस कॉलिंग पूरी तरह मुफ़्त करने की घोषणा से जबर्दस्त चौंकाया है। यूज़र्स के लिए यह बहुत अच्छी खबर है। क्योंकि मुफ़्त की एक लम्बी फेहरिस्त है उनकी घोषणाओं में।
और हम मुफ़्त तो पसंद करेंगे ही। पता नहीं। धीरे-धीरे समय, तेज़ी से बदल रहा है। तेज़ी, धीरे-धीरे हमारी पहली ज़रूरत होती जा रही है। अभी हम सभी इसे, इस बदलाव को आसानी से नहीं देख पा रहे हैं। किन्तु यह बदल रहा है।
मोबाइल, फीचर फोन और स्मार्टफोन सबकुछ बदलते जा रहे हैं। हमारी आदत भी। इसीलिए इतनी बड़ी और ‘क्रांतिकारी’ घोषणा के बाद भी हम आसानी से संतुष्ट कहां हुए? हमने सबसे पहले पूछा: क्या यह सब पूरी तरह सच है?
फिर हमने शंका जाहिर की : साल के अंत तक मुफ़्त देने के पीछे क्या है? फिर हमने कहा : देश के सबसे धनी उद्योगपति ने जब डेढ़ लाख करोड़ रु. लगा दिए हैं - तो सबसे बड़े दांव तो उन्हीं के हैं। इसलिए, उन्होंने करोड़ों उपभोक्ताओं वाले मौजूदा टेलिकॉम प्लेयर्स को दैत्याकारी धक्का पहुंचाने का यह तरीका ढूंढ़ा। मुफ़्त।
सचमुच, मुफ़्त से बड़ा क्या हो सकता है? और वही हुआ।
मौजूदा टेलिकॉम कंपनियां, सुनील भारती मित्तल की एयरटेल और कुमार मंगलम बिड़ला की आइडिया या बहुराष्ट्रीय वोडाफोन के वर्चस्व वाले सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ने रेगुलेटर ट्राई से शिकायत कर दी। कि ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ नहीं रहेगा।
जीवन निर्मम होता है। काहे का लेवल प्लेइंग फील्ड? फिर यह तो कारोबार ठहरा। वह भी टेलिकॉम।
एक जैसे अवसर, एक जैसा वातावरण, बराबरी की चुनौती, बराबरी का बंटवारा ये सब दिवास्वप्न हैं टेलिकॉम कारोबार में। और बराबरी के अवसर होने भी क्यों चाहिए? करोड़ों उपभोक्ताओं को संसार की सर्वाधिक धीमी गति देने का ‘समान अवसर’ लेकर ही तो मौजूदा टेलिकॉम कंपनियां सिरमौर बनी रहीं।
क्या वे चाहती हैं नए-पुराने सभी प्लेयर ‘धीमे’ बने रहें? महंगे थे। 16 या कि 18 रु. में पहले कॉल लगता था। कॉल उठाने के भी पैसे देने पड़ते थे।
खूब कमाया लेवल प्लेइंग फील्ड बनाकर। अब भारी बेचैनी क्यों? और कौन-सा रिलायंस जियो ने अभी पूरी तरह, सबकुछ बताया है?
सारे संदेह झूठे निकलें, उपभोक्ताओं को तभी फायदा होगा। रिलायंस को वास्तव में, तभी फायदा होगा। पैसे में नहीं। प्रतिष्ठा में। जो निश्चित ही वह पाना और बढ़ाना चाहेगा।
इस समय हम चीन के बाद दुनिया में दूसरे सबसे अधिक इंटरनेट यूज़र वाले देश हैं। संभवत: चीन के बराबर होंगे। क्योंकि कोई भी चीनी आंकड़ा, पता नहीं क्यों नकली-सा ही लगता है। जबकि होता असली ही होगा। किन्तु, नेट यूज़र्स की संख्या में अमेरिका को हराने के बाद भी हम स्पीड को लेकर दुनिया में 115वें क्रम पर हैं। एशिया में सबसे धीमे। कहने को 2.8 एमबीपीएस की औसत स्पीड। वास्तव में हम अधिकांश समय 512 केबीपीएस पर पड़े रहते हैं।
कोई नहीं सुनता। प्राइवेट की बात तो कोसों दूर। सरकारी भारी-भरकम बीएसएनएल ही अपने घोषित प्लान की स्पीड कभी भी बरकरार नहीं रख पाता। इसलिए सरकार किस मुंह से कुछ कहेगी? सबको काबू में रखने वाला ट्राई स्वयं 512 केबीपीएस को ‘ब्रॉडबैंड’ मानता है - इसलिए उनसे इस संदर्भ में कोई उम्मीद है ही नहीं।
इंटरनेट डेटा समूचे कम्प्यूटर-टेबलेट-मोबाइल फोन की क्रांति का आधार है। अब सबकुछ फोन पर शिफ्ट हो चुका है। 75% लोग फोन पर ही इंटरनेट कनेक्ट कर रहे हैं। इसीलिए तो रिलायंस का आधार ‘डेटा’ है। वॉइस कॉलिंग तो वे मुफ़्त कर चुके हैं। ऐसा तब है, जबकि सबसे बड़े प्लेयर एयरटेल की 70% या कि सभी टेलिकॉम कंपनियों की 70 से 75% कमाई वॉइस कॉल से है! उस हिसाब से तो बाकी सारी कंपनियां तबाह हो सकती हैं?
ऐसा नहीं है। ऐसा तब भी नहीं हुआ था, जब रिलायंस ने वायरलेस इन लोकल लूप लाकर ऐसा ही मार्केट डिस्रप्शन फैलाया था। हां, लोगों को ग़जब का फ़ायदा मिला था। कॉल रिसीव करने के पैसे तभी लगने बंद हुए थे। खूब पॉलिसी बनी थीं। झगड़े हुए थे। फिर रिलायंस के बिल, अजीबो-ग़रीब आते थे।
न जाने क्या था, कई लोग कहते थे कि उन्होंने बिल जमा ही नहीं किया। तो आया ही नहीं! जमा कराने वालों का बिल बढ़ता गया! पता नहीं क्या हुआ था। फिर सबकुछ ख़त्म हो गया। फिर मुकेश और अनिल अंबानी अलग हो गए। अब मुकेश, अनिल के रिलायंस कम्युनिकेशन का नेटवर्क इस्तेमाल करेंगे। जियो के लिए। एयरसेल होगा। एमटीएस होगा। ये एक तरफ़। सामने एयरटेल। आइडिया। वोडाफोन। कुल दस ही तो प्लेयर हैं। 90 करोड़ नंबर हैं। 75-80 करोड़ एक्टिव। फिर भी 35 हजार करोड़ का घाटा है। क्योंकि स्पेक्ट्रम की नीलामी में हजारों करोड़ ख़र्च कर दिए। दूसरे के लायसेंस अलग खरीदे। इसीलिए इन्फ्रास्ट्रक्चर कमजोर कर दिया।
लोगों का क्या? कोई फोन बगैर रह सकता है भला? चाहे जितनी धीमी गति दें। प्रात: स्मरणीय है फोन। प्रात: दर्शनीय, बल्कि। मैं हमेशा कहता हूं- बिजली-पानी की तरह आवश्यक और अनिवार्य हो गई है वाई-फाई सप्लाई। क्योंकि मनोरंजन तो मात्र एक हिस्सा है। न्यूज़। हेल्थ। एजुकेशन। पेमेंट।
सोशल मीडिया है ही। एप्स ही एप्स। रिलायंस इसीलिए एप्स भी लाया है। सैमसंग विफल हो चुका है हालांकि एप्स में। एप्स तो गूगल (प्ले) और एपल (एप स्टोर्स) के ही होते हैं। कुछ काम ऐसे हैं जिन पर इतने बड़े और चारों दिशाओं में कुछ संस्थान काम कर चुके हैं/रहे हैं - कि बाकी उनके सामने तिनके से महीन हो जाते हैं। जैसे, गूगल। सर्च में जो कुछ भी क्रांतिकारी होगा - वो गूगल में ही होगा। फेसबुक। पारिवारिक शेयरिंग में जो कुछ भी होगा- वो फेसबुक ही करेगा। ट्विटर। माइक्रोब्लॉगिंग व ओपीनियन मेकर्स-सेलेब्रिटीज़ ब्लॉगिंग में ट्विटर ही होगा। इन्स्टाग्राम। युवाओं के फोटो शेयरिंग का प्लेटफॉर्म ही अब इसका नया रूप तय करेगा। वॉट्सएप, मोबाइल पर मैसेजिंग को चैटिंग, मेल और कॉलिंग की क्रांति लाने वाला यह प्लेटफॉर्म ही मुकेश अंबानी का मॉडल रहा होगा।
मार्क ज़ुकरबर्ग ने परिवार, युवा और मोबाइल के इन तीनों प्लेटफॉर्म पर एकाधिकार जमा लिया है। इसी को ध्यान में रखते हुए, रिलायंस काफी सारे एप्स ला रहा है। अभी तो मुट्ठीभर ही हैं। आगे और आएंगे। फिर फोन तक सीमित नहीं रहना है। फोन, कंटेंट,कम्युनिटी।
कम्युनिटी जुटानी होंगी और तब जाकर कोई फ्रंट और बैकग्राउंड सब पर वर्चस्व जमा पाएगा। गूगल ने धीमी गति को ‘मौत’ माना, लून, ऑफ लाइन, टर्न बाय टर्न, सबकुछ अपनी ओर से लाया। फेसबुक भी काफी कुछ लाया। फ्री बेसिक्स में विफल रहा। किन्तु लाया। अब एक्सप्रेस वाई-फाई ला रहा है।
कहने का आशय यह है कि स्पीड ही जि़ंदगी है। यदि घोषित तेज़ी मिलेगी- तो ज्यादा उपयोग करने वाला ज्यादा पैसा देने को तैयार होगा। है। जैसे- विमान से यात्रा करने वाला कम पैसे में देरी से उड़ने और देर तक पहुंचाने वाली फ्लाइट में नहीं बैठना चाहता। ज्यादा किराया देकर, जल्दी पहुंचना चाहता है।
फ्री नहीं, फास्ट कॉलिंग डेटा चाहिए। फ्री नहीं, हर्डल-फ्री चाहिए। फ्री यानी मुफ़्त। नहीं, फ्री यानी मुक्त। उन्मुक्त।
उन्मुक्त क्रांति मिलेगी, असंभव है। किन्तु लेनी ही होगी।
डिज़िटल इंडिया तब तक एक धीमी गति का समाचार ही रहेगा। पैसे तो भारतीय खर्च कर ही रहे हैं। औसत 180 से 200 रु. महीना। जबकि, जन-धन योजना में लाखों खाते पूर्णत: खाली पड़े हैं।
गति सभी जगह चाहिए।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
(साभार: दैनिक भास्कर)
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