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भारत-पाक: एनडीए सरकार का फैसला सही है, बोले वरिष्ठ पत्रकार निर्मलेंदु

निर्मलेंदु कार्यकारी संपादक, राष्ट्रीय उजाला ।। एक राष्ट्रीय चैनेल ने दिखाया और लिखा- घबराया पाकिस्तान अब जंग का बहाना ढूंढ रहा है। दरअसल,

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

निर्मलेंदु

कार्यकारी संपादक,

राष्ट्रीय उजाला ।।

एक राष्ट्रीय चैनेल ने दिखाया और लिखा- घबराया पाकिस्तान अब जंग का बहाना ढूंढ रहा है। दरअसल, जंग को लेकर लगभग सभी चैनलों में जिस तरह से डिबेट चल रहा है, जिस तरह से आक्रोश दिख रहा है, जिस तरह से सभी लोग जंग को ‘वेलकम’ कर रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि पाक और भारत के बीच जंग हो न हो, जुबानी जंग जरूर जारी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या जंग जरूरी है?

क्या कूटनीति, सियासी दांवपेच और आर्थिक दांव पेचों से ‘ना’पाक पाक को सबक नहीं सिखाया जा सकता। उरी हमले के बाद देश में गुस्से के माहौल के बावजूद एनडीए सरकार ने संयम से चलने का फैसला किया है। शायद यही फैसला सही है, क्योंकि संयम ही हर बड़ी विपत्ति की कुंजी है। बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि भावावेश में कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए। 2001 में संसद पर हमले के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी यही कहा था कि युद्ध जैसे फैसले भावावेश में और एकतरफा ढंग से नहीं लिए जाते। उनके बैठकों से तमाम संकेत मिल रहे हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार ने इस सीख को ही अपना मार्गदर्शक बनाया है। लेकिन शहीद के परिवार वाले यह नहीं चाहते, क्योंकि जब शहीद जांबाजों के पार्थिव शरीर परिवारवालों के घर पहुंचा, तो वह दृश्य देखकर लोगों का दिल दहल गया। संयम का बांध टूट पड़ा। मुंह से एक ही आवाज आई कि जवानों के बदले जवान चाहिए। पाकिस्तान को सबक सिखाएं। दरअसल, लोगों में कायराना तरीके से हुए हमले को लेकर बेहद गुस्सा है और सबकी आंखों में एक ही सवाल है कि पाकिस्तान को उसके गुनाहों की सजा कब और कैसे मिलेगी।

अब यह कहना गलत नहीं होगा कि मोदी सरकार ने पाकिस्तान पर वार करने के लिए जिस तरह से सूझ-बूझ के साथ रणनीति बनाई है, वह भले ही अभी, इस माहौल में सही न लगे, लेकिन आने वाले दिनों में हमें समझ में आएगा कि ऐसी रणनीति क्यों बनाई गई। केंद्र सरकार कूटनीतिक, राजनीतिक और सैन्य -- तीनों ही मोर्चों पर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करने जा रही है। कूटनीतिक स्तर पर पाक को घेरने की रणनीति को अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है। यूएन में कश्मीर मुद्दा उठाने की कोशिश कर रहे पाक पीएम को उन्हीं के भाषा में जवाब दिया जा रहा है। हम सब भूल गये, लेकिन इतिहास गवाह है कि द्वितीय विश्व युद्ध का हश्र क्या हुआ था।

जी हां, द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। पर्ल हार्बर में जापानी लड़ाकू विमानों के हमले से पूरा शहर हिल चुका था। इसके बदले में अमेरिका पूरी दुनिया को हिलाने के मूड में था। 6 और 9 अगस्त को अमेरिका ने यह कर भी डाला - हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिरा कर। मानव इतिहास में यही दो मौके हैं, जब किसी भी तरह के परमाणु हथियार का इस्तेमाल मानवता के खिलाफ किया गया। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि इस युद्ध में 11,29,000 लोगों की मौत हुई। साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध का अंत हुआ और अमेरिका सुपर पावर बनने की राह पर निकल पड़ा। अब पाकिस्तान सुपर पावर बनने की कोशिश में है। ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं।

समाज में जिस तरह से उरी में शहीदों को लेकर लोगों में गुस्सा है, वह जायज है, लेकिन हर चीज का एक वक्त होता है। अंग्रेजी में एक कहावत है- हिट द आइरॉन, ह्वेन इट इज हॉट, यानी लोहे पर तभी वॉर करें, जब वह गरम हो। जिस तरह से लोगों में इस घटना के बाद आक्रोश है, वैसे में लोग जंग ही चाहेंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या जंग किसी समस्या का समाधान है। हमें किसी को एक थप्पड़ जड़ने से पहले यह जान लेना आवश्यक होगा कि उसमें दो थप्पड़ जड़ने की क्षमता है या नहीं, क्योंकि जंग का मतलब होता है तबाही और तबाही का न ही कोई रूप होता है, और न ही कोई आकार-प्रकार। जंग में परिवार के परिवार उजड़ जाते हैं। बच्चे अनाथ हो जाते हैं। महिलाएं विधवा हो जाती हैं। देश का धरोहर नष्ट हो जाता है। करोड़ों टके की बात तो यह है कि अगर पाक भारत को उकसा रहा है, तो हम उसके उकसाने पर क्यों ध्यान दें। क्यों न हम अपने विवेक बुद्धि से काम न लें।

मान लें, अगर पाकिस्तान का सबसे भारी एटम बम (45 किलो टन) भारत में गिर जाए, तो क्या हम यह बता पाएंगे कि उससे कितने लोगों की जान जाएगी, कितने बच्चे तबाह हो जाएंगे, कितने परिवार बिखड़ जाएंगे, कितनी संपत्ति का नुकसान होगा और आखिरकार उसका असर क्या होगा? सच तो यही है कि हम सोच भी नहीं सकते, अगर सोचेंगे, तो रूह कांप उठेगी। जुबां लड़खड़ाने लगेगी। अब अगर दिल्ली और मुंबई की बात करें, तो पल भर में हजारों नहीं, लाखों लोग मौत की गोद में समा जाएंगे। मतलब यही है कि यदि हमारे शहर में परमाणु बम गिरा, तो कुछ भी हो सकता है तबाही का मंजर। क्या वह घाव हम भर पाएंगे? और युद्ध में ऐतिहासिक धरोहरों का जो नुकसान होगा, वह अलग।

जी हां, एक सच यह भी है कि हिरोशिमा और नागासाकी के बाद पूरी दुनिया एटम बम की ताकत से वाकिफ हो चुकी है। लोगों में डर और खौफ फैल चुका है। इसी खौफ को एक बार फिर से जिंदा किया जा रहा है- चैनल्स और अखबारों में केवल जंग की बात कह कर। यहां तक कि देश के प्रबुद्ध और चर्चित लोग भी जंग की ही बात कह रहे हैं। पत्रकारों से लेकर देश के बुद्धिजीवी भी यही चाहते हैं। लेकिन मैं उन लोगों से यह सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या वे कभी जंग के मैदान में गए हैं। क्या वे जानते हैं कि जंग का मतलब क्या है। क्या उन लोगों ने एसी रूम से बाहर निकल कर एसी गाड़ी में बैठने के अलावा, यह जानने की कभी कोशिश की कि जो जवान शहीद हो जाते हैं, उनका परिवार कैसे चलता है। परिवार का मुखिया न रहने पर, उस परिवार पर क्या बितती है। उन्हें जो रकम भरपाई के लिए दी जाती है, क्या वह पर्याप्त है। आम लोगों को बचाने के लिए वे खास जवान शरहद पर तैनात रहते हैं और हम नींद में खर्राटे मारते रहते हैं और फिर सुबह उठकर अपने अपने काम पर चले जाते हैं। क्या कभी हम उन शूरवीरों और उनके परिवार के बारे में सोचते हैं। क्या हम कभी उनके घर जाकर यह समझने की कोशिश करते हैं कि उनके बच्चे स्कूल गये या नहीं। सरकारी सहायत से क्या घर चल रहा है। ये सब नहीं करते। हम बस कटे पर नमक छिड़कने का काम करते हैं। जंग के बाद की स्थिति के बारे में नहीं सोचते। क्या जंग के बाद हम, आप आपके परिवार में कौन बचेगा और कौन नहीं, हम यह जानते हैं?

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