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कैसे एक दिन की देरी कंग्रेस पर पड़ेगी भारी, बताया नईदुनिया के संपादक आनंद पांडे ने

<p style="text-align: justify;">‘मध्य प्रदेश में कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ेगी, इस पर फिलहाल सिर्फ कयास ही लगाए जा सकते हैं, लेकिन ये तय है कि अब एक-एक दिन की देरी भी कांग्रेस को भारी पड़ेगी।'  हिंदी दैनिक अखबार 'नईदुनिया' के जरिए ये कहना है अखबार के संपादक आनंद पांडे का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:</p> <p style="t

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

‘मध्य प्रदेश में कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ेगी, इस पर फिलहाल सिर्फ कयास ही लगाए जा सकते हैं, लेकिन ये तय है कि अब एक-एक दिन की देरी भी कांग्रेस को भारी पड़ेगी।'  हिंदी दैनिक अखबार 'नईदुनिया' के जरिए ये कहना है अखबार के संपादक आनंद पांडे का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

साहब, राजा, महाराजा में फंसी कांग्रेस - आनंद पांडे

मध्य प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव (2018) किसके नेतृत्व में लड़ा जाए? कांग्रेस इन दिनों इस मुद्दे पर बुरी तरह उलझी हुई है। कभी कमलनाथ (समर्थक 'साहब' कहते हैं) का नाम सुर्खियों में तैरता है तो कभी ज्योतिरादित्य सिंधिया (महाराजा) का। हालांकि दिग्विजय सिंह (राजा नाम से लोकप्रिय) को कमान सौंपी जाएगी, इस बात की फिलहाल कोई गुंजाइश दिखाई नहीं देती, तब भी उनके कट्टर समर्थक मानते हैं कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की वापसी केवल उन्हीं की अगुआई में हो सकती है।

उधर, मौजूदा प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव के चाहने वाले दावा कर रहे हैं कि बड़े नेताओं के समर्थक चाहे जो दावा करें, लेकिन चुनाव तो यादव की अध्यक्षता में ही होंगे। इन लोगों का कहना है कि असल में अरुण यादव कांग्रेस के उन युवा नेताओं में शामिल हैं जिन्हें खुद राहुल गांधी ने खड़ा किया है। इसलिए यादव को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। नेतृत्व किसके हाथों में होगा, इस पर फिलहाल सिर्फ कयास लगाए जा सकते हैं, लेकिन ये तय है कि अब एक-एक दिन की देरी भी कांग्रेस को भारी पड़ेगी। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि अगले कुछ दिनों में प्रदेश में चुनावी माहौल बनने लगेगा और एक बार जो माहौल (टोन) बन जाएगा, वो चुनाव तक कायम रहेगा। अब चूंकि चुनाव 2018 के आखिर में होना हैं, इसलिए वो पूरा साल तो चुनावी साल ही रहेगा। इसीलिए कांग्रेस के पास काम करने-दिखाने और अपने पक्ष में माहौल खड़ा करने के लिए सही मायने में 2017 का साल ही रहेगा।

असल में, यदि बीजेपी को कड़ी टक्कर देनी है तो कांग्रेस को जबर्दस्त मेहनत करनी पड़ेगी। पिछले तेरह साल पर नजर डालें तो इस दौरान कभी भी कांग्रेस ऐसी कोशिश करती नजर नहीं आई जिसके बलबूते बीजेपी को सत्ता से बेदखल किया जा सके। हालांकि अधिकांश कांग्रेस नेता व उनके समर्थक दावा कर रहे हैं कि इस दफा खुद जनता आगे आएगी, कांग्रेस के पक्ष में वोट करेगी और बीजेपी को सत्ता से बाहर कर देगी।

कांग्रेसियों के मुताबिक जनता बीजेपी सरकार से बेहद नाराज है। अव्वल तो जिस नाराजगी का दावा कांग्रेसी कर रहे हैं, वैसी नाराजगी फिलहाल जमीन पर तो कहीं दिख नहीं रही है। और थोड़ी देर के लिए अगर मान भी लें कि जनता सरकार या पार्टी से नाराज है, तो वो नाराजगी इलाके के विधायकों से ज्यादा है, बजाय मुख्यमंत्री के। इस नाराजगी को कम करने के लिए बीजेपी इस दफा जमकर अपने मौजूदा विधायकों के टिकट काटने का प्रयोग कर सकती है।

पार्टी के वरिष्ठ नेता इसे नाराजगी कम करने का एक टेस्टेड फॉर्मूला मानते हैं। और इस सबके सिवाय जब तक कांग्रेस इस नाराजगी को वोट में तब्दील करने की कोशिश नहीं करेगी, तब तक उसका सत्ता में लौटना महज सपना ही बना रहेगा। क्योंकि जनता विकल्प तलाशती है और विकल्प खड़ा करने का काम विपक्ष का होता है। इस बात को समझने के लिए हम 2003 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव को देख सकते हैं। 2003 के चुनाव तक प्रदेश की जनता दिग्विजय सिंह सरकार से आजिज आ चुकी थी, वो कांग्रेस सरकार से छुटकारा चाहती थी। बीजेपी ने उमा भारती को विकल्प बनाकर जनता के सामने खड़ा किया और गुस्से को वोट में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

कुछ ऐसा ही 2014 के लोकसभा चुनाव में भी हुआ था। मनमोहन सिंह के विकल्प के तौर पर नरेंद्र मोदी को उतारा गया, नतीजा सामने है। अगर हम विश्लेषण करें तो पाएंगे कि इन दोनों ही चुनावों में सत्ताधारी कांग्रेस से जनता लंबे वक्त से नाराज और दुखी थी, लेकिन उसके सामने चुनने को दूसरा विकल्प नहीं था। जैसे ही विपक्ष ने दमदार चेहरा सामने कर विकल्प खड़ा किया, जनता ने कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया। मगर फिलहाल मध्य प्रदेश में कांग्रेस ऐसा कोई विकल्प खड़ा करती दिखाई नहीं पड़ रही है। यानी कांग्रेस इस वक्त उस जायदाद के इंतजार में बैठी है जो बाप के मरने पर मिलने वाली है। वो लड़ाई के मैदान में है तो, लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए, जीतने के लिए नहीं। हालांकि अरुण यादव अपनी तरफ से पूरा जोर लगाए हुए हैं, लेकिन उस जोर में इतनी ताकत नहीं कि शिवराज को कुर्सी से उतार सके। उन्हें पार्टी के प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं का सहयोग मिलता नहीं दिख रहा है। हालात ये हैं कि प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक तक में कोई बड़ा नेता नहीं पहुंचता।

इस सबके सिवाय प्रदेश कांग्रेस को इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश में उसे सत्ता से बेदखल हुए तेरह साल हो चुके हैं। पिछले ढाई साल से वो केंद्र की सत्ता से भी बाहर है। ऐसे में पार्टी गतिविधियां चलाना उसके लिए दिनोंदिन मुश्किल होता जा रहा है। वैसे भी इन दिनों किसी भी पार्टी की रैली या कार्यक्रम में जनता अपने आप (स्व-स्फूर्त) तो आती नहीं। जनता को तो बाकायदा गाड़ियों से ढोकर लाया जाता है। बल्कि अधिकांश बार तो जिन दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर सरीखे लोगों को रैली में लाया जाता है तो उन्हें तो मजदूरी भी देनी पड़ती है। किसी भी राजनीतिक दल का एक ठीक-ठाक भीड़ वाला कार्यक्रम ही कम से कम पांच-सात लाख के खर्चे वाला होता है। ऐसे में जबकि पार्टी सत्ता से बाहर हो, तो उसके शुभचिंतक भी छिटक जाते हैं और उद्योगपति भी पार्टी फंड में पैसा देने से परहेज करने लगते हैं।

यही वजह है कि प्रदेश के चंद पुराने जमे जकड़े और प्रतिबद्ध कांग्रेसियों के भरोसे ही पार्टी अपनी गतिविधियों को अंजाम दे पा रही है। फिर तेरह साल तक विपक्ष में रहकर संघर्ष करते रहना भी किसी कार्यकर्ता के लिए आसान नहीं होता। साधारण कार्यकर्ता अमूमन विचारधारा से प्रेरित होकर नहीं बल्कि समाज में रसूख, पद और सत्ता की लालच में राजनीति करता है। जब पार्टी सत्ता से लगातार बाहर रहती है तो कार्यकर्ता का पाला बदल लेना या पार्टी से मोहभंग हो जाना कोई अचरज का विषय नहीं होता। यहां लिखने का ये आशय कतई नहीं है कि कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी को प्रदेश में कार्यकर्ताओं का टोटा पड़ रहा है। किंतु हां, ये जरूर है कि उसके प्रतिबद्ध और समर्पित सदस्यों में अब पहले जैसा जुझारूपन नहीं दिख रहा। शायद यही वजह है कि बड़े शहरों में तो कई दफा चुनावों के दिन कुछ पोलिंग बूथों पर कांग्रेसी कार्यकर्ता दिखाई ही नहीं पड़ता है और इसके उलट बीजेपी के बूथ पर न केवल बीजेपी, बल्कि संघ के स्वयंसेवक भी दिखाई दे जाते हैं।

इन तमाम विपरीत हालात में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाना आसान लक्ष्य नहीं होगा। आपसी सिर-फुटौव्वल से निपटना भी कांग्रेस के लिए हमेशा की तरह सिरदर्द बना हुआ है। सत्ता हासिल होने के बाद आपसी गुटबाजी या सत्ताधारी पार्टी की गुटबाजी और विपक्ष की गुटबाजी में भारी अंतर होता है। इसलिए कहा जा सकता है कि कांग्रेस तब तक कुछ नहीं कर पाएगी जब तक वो शिवराज सिंह चौहान जैसा जमीन से जुड़ा, जुझारू और उनसे ज्यादा मेहनती कोई दूसरा चेहरा जनता के सामने बतौर सीएम प्रोजेक्ट न कर दे।

(साभार: नईदुनिया)

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