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चिटफंड कंपनी जैसी हरकतें न करें बैंक, बोले पत्रकार बृजेंद्र पटेल
बृजेंद्र एस. पटेल एडिटर, ‘कैम्पसपोस्ट डॉट इन’ (Campuspost.in) ।। चिटफंड कंपनी जैसी हरकतें न करें बैंक
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
बृजेंद्र एस. पटेल
एडिटर, ‘कैम्पसपोस्ट डॉट इन’ (Campuspost.in) ।।
चिटफंड कंपनी जैसी हरकतें न करें बैंक
आमतौर पर चिटफंड कंपनी अपने खाताधारकों को समय पर भुगतान नहीं करती हैं। यही कारण है, लोग अब उन पर भरोसा नहीं करते हैं। जब किसी पर से भरोसा उठ जाता है, तो उसे अपनी संपत्ति की हिफाजत के लिए नहीं देता है। नोटबंदी के बाद बैंकों की हरकत भी बेईमानों जैसी है। ये किसी बैंक का नियम नहीं होता है कि खाताधारक को उसका धन निकालने से रोके।
प्रधानमंत्री कितना भी प्रयास कर लें, खाताधारक को उसका पैसा निकालने से नहीं रोक पाएंगे। पहला तो भारत लोकतांत्रिक देश है। बैंक और न्यायालय पर सरकार का इतना अंकुश नहीं है कि वे किसी की वैध कमाई का पैसा ले ले। ये किसान की जमीन नहीं है जो जबरन अतिक्रमण कर लोगे।
यदि बैंक खाताधारकों को रुपये निकालने से रोकेंगी तो खाताधारक न्यायालय की शरण में जाएंगे। ऐसे में सरकार के पास क्या हथियार रह जाएगा, जो लोगों का पैसा रोक ले?
एक बात और…। जो लोग गरीबों के जनधन खातों में जमा रकम से सपने बुन रहे हैं कि उनके धन से मौज करेंगे। भूल जाऐं। लोग इस ‘आर्थिक आपदा’ से निकलने के बाद बैंक अकाउंट में पैसा रखना भूल जाएंगे। जिनको गलतफैमी हो, दूर कर लें। खाते तो होंगे, उनमें कोई रुपया नहीं रखेगा। रुपया उतना ही होगा, जितना उसे खर्चे की जरुरत होगी। भूमंडलीकरण का दौर है। जो लोग दुनिया में तेजी से बदलते आर्थिक जगत से वाकिफ नहीं हैं, वो नोटबंदी की चपेट में हैं। अब कोई भारतीय रुपये पर भरोसा नहीं कर रहा है और न ही भारतीय बैंकों पर। नोटबंदी के दौर में भारतीय बैंकों ने अपनी विश्वसनीयता खाक कर ली है।
कई विदेशी बैंक भारत में अपने खाताधारकों को इन दिनों अतिरिक्त सुविधा दे रहे हैं। भारतीय बैंकों में रुपये जमा करने और निकालने में जितनी असुविधा है, यूरोप की बैंकों में उतना ही सहज है।
बैंक अब वित्त मंत्रालय के दवाब में वो कर रही हैं, जिसे बैंकिंग सैक्टर में पेशागत बुरा माना जाता है। ये खाताधारक के साथ धोखा और बेईमानी की श्रेणी में आता है कि उसे उसके खाते से अकारण रुपये निकालने से रोके।
प्रधानमंत्री अपने साथ बैंकों को भी बदनाम करा रहे हैं। जब लोग भारतीय बैंकों में रुपये रखेंगे ही नहीं तो उनसे लोन कौन लेगा?
एक दशक पहले भारत में चिटफंड कपंनियों ने करीब तीन दशक तक कुछ ऐसी ही हरकतें की, जैसी भारत की नेशनलाइज बैंकें कर रही हैं। खाताधारकों का पैसा बेईमानी की नीयत से नहीं देना…। अब क्या हाल है पैरा बैंकिंग का ? सहारा जैसी भरोसेमंद पैराबैंकिंग कंपनी ढह गई। खाताधारक का भरोसा एक बार टूटता है तो फिर नहीं जुड़ता। जो लोग लाइन में खड़े हैं, वे इसलिए खड़े हैं क्योंकि वे अपने खून पसीने की गाढ़ी कमाई पाना चाहते हैं। उस पैसे की उसे सख्त जरुरत है। ज्ञानी बाबा उल्टा ज्ञान बांट रहे हैं। कह रहे हैं पैसा मत निकालो।
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