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अब नहीं है वैसा संपादक, जो जेब में इस्तीफा लेकर घर से निकलता था: डॉ. नन्दकिशोर त्रिखा

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। ‘पत्रकार आंदोलन का गौरवशाली इतिहास रहा है। देश की आजादी के बाद पत्रकार हितों को लेकर सशक्त प्रयास हुए, लेकिन आज पत्रकारों में हिम्मत नहीं है कि वे हड़ताल करवा लें। पत्रकार जब संगठित रहेंगे तभी वे अपने अधिकार

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

‘पत्रकार आंदोलन का गौरवशाली इतिहास रहा है। देश की आजादी के बाद पत्रकार हितों को लेकर सशक्त प्रयास हुए, लेकिन आज पत्रकारों में हिम्मत नहीं है कि वे हड़ताल करवा लें। पत्रकार जब संगठित रहेंगे तभी वे अपने अधिकार लागू करवा पाएंगे।’ ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और प्रेस काउंसिल के दो बार सदस्य रहे डॉ. नन्दकिशोर त्रिखा का।

उन्होंने ये बातें दिल्ली पत्रकार संघ की ओर से आयोजित ‘पत्रकारों के अधिकार’ विषय पर आधारित व्याख्यान में कहीं। कार्यक्रम का आयोजन 27 दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित दत्तोपंत ठेंगड़ी सभागार में किया गया।

डॉ. त्रिखा ने अपने व्याख्यान में कहा कि समाचार-पत्र निकालना और सुरक्षा के वातावरण में काम करना पत्रकारों का मौलिक अधिकार है। उन्होंने पत्रकारों के अधिकारों को चार प्रकार से वर्गीकृत करते हुए संवैधानिक अधिकार, कानूनी अधिकार, आर्थिक और काम संबंधी अधिकार व अन्य विविध अधिकार के बारे में विस्तार से बताया। साथ ही उन्होंने प्रेस परिषद, मीडिया कानूनों, वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट और मजीठिया वेज बोर्ड पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि श्रमजीवी पत्रकार ही पत्रकार हैं। मालिक को निर्धारित वेतन से कम देने का अधिकार नहीं है। उन्हें पत्रकार को निकालने का अधिकार नहीं है। मालिक का अधिकार सिर्फ पत्रकारों को नियुक्त करना है। मालिक ये आदेश नहीं दे सकता कि यह छपेगा और यह नहीं छपेगा।

संपादक के रोजमर्रा के काम में वह हस्तक्षेप नहीं कर सकता। संपादक को अधिकार है नियंत्रण का और किसी को नहीं। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को पत्रकारिता करने का मौलिक अधिकार है। डॉक्टर, वकील, सीए सबको लाइसेंस की आवश्यकता होती है लेकिन पत्रकार बिना लाइसेंस के पत्रकारिता कर सकते हैं। पत्रकार देश-समाज की आकांक्षाओं को व्यक्त करता है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि संपादक संस्था मृतप्राय है। अब वैसा संपादक नहीं है जो जेब में इस्तीफा लेकर घर से निकलता था।

डॉ. त्रिखा ने आपातकाल के दौर को याद करते हुए कहा कि तब प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रहार हुआ। सैकड़ों समाचार-पत्र बिना कारण बंद कर दी गई, जबकि यह एक सिद्धांत है कि सरकार के विरुद्ध लिखने के कारण कोई समाचार-पत्र बंद नहीं होगा।

पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर उन्होंने कहा कि पत्रकार अगर भय में रहेगा, उस पर हमले होंगे तो वह समाज के हित में खुलकर कैसे लिख सकेगा? सरकार का दायित्व है पत्रकारों को सुरक्षा देना।

डॉ. त्रिखा ने पत्रकारों के कर्तव्य का जिक्र करते हुए कहा कि समाज के प्रति दायित्व का ध्यान रखा जाना चाहिए। कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए कि राष्ट्र, समाज और व्यक्ति की प्रतिष्ठा धूल-धूसरित हो जाए। समाज की मर्यादाओं का पालन आवश्यक है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रासबिहारी ने कहा कि पत्रकारिता के तेजी से बदलते स्वरूप के साथ-साथ अनेक चुनौतियां भी सामने आई हैं। आज संपादक संस्था कमजोर है। लंबे संघर्षों के बाद पत्रकार हितों में अनेक कानून बने, मजीठिया वेज बोर्ड बने। संगठित होकर लड़ाई लड़ने से यह सब हुआ। यदि हम एक साथ अपनी आवाज उठाते हैं तो आगे चलकर नुकसान नहीं उठाने पड़ेंगे। हम अपने अधिकार जानें और लड़ाई लड़ने के लिए कमर कसें।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि व दिल्ली पत्रकार संघ के पूर्व महासचिव मनोज मिश्र ने पत्रकारिता के सैद्धांतिक पक्षों के साथ-साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि खबरों का फॉलोअप होना चाहिए, लेकिन आजकल कम हो रहा है। पत्रकार समाज का महत्वपूर्ण घटक है इसलिए वह समाज को सही दिशा दें।

कार्यक्रम में नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र प्रभु ने भी अपने विचार रखे।

इस अवसर पर बड़ी संख्या में प्रिंट, टीवी और वेब मीडिया के पत्रकार मौजूद रहे।

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