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...तो इस वजह से खुद को टीवी पत्रकार कहने में शर्म महसूस करते हैं भूपेंद्र चौबे
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। वरिष्ठ टीवी पत्रकार भूपेंद्र चौबे ने आज के परिप्रेक्ष्य में टीवी एंकर की भूमिका को लेकर कई सवाल उठाए हैं। न्यूज18डॉटकॉम (NEWS18.com) पर छपे एक आर्टिकल में उन्होंने बताया कि आज की टीवी पत्रकारिता किस तरह काफी बदल गई है और क्यों उन्हें अपने आपको टीवी पत्रकार कहने में शर्म महसूस होती है। भूपेंद्र च
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। वरिष्ठ टीवी पत्रकार भूपेंद्र चौबे ने आज के परिप्रेक्ष्य में टीवी एंकर की भूमिका को लेकर कई सवाल उठाए हैं। न्यूज18डॉटकॉम (NEWS18.com) पर छपे एक आर्टिकल में उन्होंने बताया कि आज की टीवी पत्रकारिता किस तरह काफी बदल गई है और क्यों उन्हें अपने आपको टीवी पत्रकार कहने में शर्म महसूस होती है। भूपेंद्र चौबे के आर्टिकल का हिंदी अनुवाद आप यहां पढ़ सकते हैं... ‘जब 1999 में मैंने टीवी पत्रकारिता में कदम रखा था तो उस समय तक मैंने टीआरपी (TRP) जैसा नाम नहीं सुना था। उस समय टीवी इतना आक्रामक भी नहीं था और लोग कुछ ऐसा देखना चाहते थे जो सही और गलत से परे हो। और मैंने लंबे समय तक इसकी अहमियत मानी। अब हाल यह है कि प्रत्येक गुरुवार की शुरुआत सिर्फ टीआरपी और टीआरपी से होती है। अब टीवी एंकर भी सिर्फ एंकर नहीं रह गया है, उससे कहीं ज्यादा हो गया है वर्तमान में इंफोर्मेशन को सिर्फ इंफोर्मेशन के रूप में नहीं दिखाया जा रहा है, उसका स्वरूप भी काफी बदल गया है। अब आप वही देखते हैं और महसूस करते है, जैसा एंकर आपको दिखाना चाहता है। हाल के घटनाक्रम की बात करें तो एक सप्ताह से अधिक समय से कश्मीर में चल रही हिंसा की कवरेज को मैं काफी गंभीरता से देख रहा हूं। इस समय यदि देखा जाए तो टीवी न्यूज एंकर खुद को इस तरह दिखाने लगे जैसे कश्मीर का विवाद निपटाने की जिम्मेदारी उनके कंधे पर ही है। इनमें से एक एंकर ने सभी पत्रकारों को कहा कि जो विषयों पर फैसला ने सुनाए, वे राष्ट्रविरोधी है। मुझे अपने देश के सुरक्षाबलों पर काफी गर्व है, जो आतंकवादियों से मोर्चा लेकर उन्हें मार गिराते हैं। ऐसे में काफी दुख होता है कि कुछ कथित बुद्धिजीवी जो अपने आपको पत्रकार कहने वाले कश्मीर में चल रहे आतंक की सच्चाई को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। कश्मीर की स्थिति को लेकर एक चैनल द्वारा कराए गए डीएनए टेस्ट (DNA test) का निष्कर्ष भी यही निकला। कश्मीर में भारत विरोधी लोग भरे पड़े हैं और उन्हें सबक जरूर सिखाया जाना चाहिए। एक दूसरे चैनल पर मैंने देखा कि एंकर हुर्रियत कांफ्रेंस के उदारवादी धडे के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारुख के बारे में कह रहा था, ‘जब तक हिंदुस्तान की सरहद में हो तब तक सुरक्षित हो। ये जो इंटरनेट इस्तेमाल करते हो, ये भी हिंदुस्तान का है।’ इस बात से साफ स्पष्ट हो जाता है कि आज के समय में नेशनल मीडिया के इस वर्ग का यह हाल हो गया है कि उनक लिए आतंकी गतिविधि या दंतेवाड़ा में माओवादी घटना और भारत में कहीं भी होने वाली आतंकी घटना में कोई फर्क ही नहीं रह गया है। मीडिया का ये वर्ग श्रीनगर को दंतेवाड़ा या ओडीसा से बदल सकता है, उनके लिए ये कोई मायने नहीं रखता है। मुझे पता है कि इस आर्टिकल के बाद मुझे भी कई तरह की बातें सुनने को मिलेंगी, लेकिन मैं इसकी परवाह नहीं करता। मुझसे भी माफी मांगने को कहा जाएगा, पर मैं ऐसा कतई नहीं करूंगा। मेरा अपना मानना है कि कश्मीर में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए बुरहान वानी का यही हश्र होना था। उसने जो रास्ता अख्तियार किया था, उसका यही अंजाम होना था। सवाल उठता है कि क्या इसका कोई दूसरा विकल्प भी मौजूद था? आप इस बात को किस रूप में लेंगे जब सुरक्षा बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन से की गई फायरिंग में 92 लोगों की आंखों की रोशनी चली गई? मीडिया का ये वर्ग जितने लोगों की आंखों की रोशनी गई है, उसकी तुलना कितने सैनिक घायल हुए हैं, उससे करेगा। ऐसा लगता था कि टीवी पर पीडि़तों के समर्थन व विरोध को लेकर दो धड़े बन गए हो। मीडिया का एक वर्ग ऐसा था जो सुरक्षा बलों की कार्रवाई में आंख गंवाने वाले लोगों से मिले गया जबकि दूसरा वर्ग सुरक्षा बलों के उन सैनिकों से मिला, जो घायल हुए थे। लेकिन वे आखिर में यह कहना भूल गए कि कश्मीर में सभी लोग आतंकवाद की आग में झुलस रहे हैं फिर चाहे वह आम नागरिक हों अथवा सुरक्षाकर्मी। इस घटना को लेकर एक युवा आईएएस अधिकारी ने नेशनल मीडिया के सामने पीड़ा व्यक्त की। उससे मीडिया के लोगों ने कई सवाल पूछे, जिसका आश्य ये है कि आज के समय में मीडिया को अपने अंदर झांकने की जरूरत है। पर वे ये सपना देख सकता है, लेकिन मीडिया टीआरपी के खेल से आगे कुछ सोच ही नहीं सकती। लोगों को पता ही होगा कि जेएनयू और कन्हैया की मीडिया कवरेज में क्या हुआ था। ऐसे में भविष्य में आने वाले टीवी शो को ज्यादा प्रभावी और आक्रामक बनाने के लिए अपने को इसके ही ईदगिर्द बांधने की जरूरत है। आखिरकार एंकर के लिए सिर्फ टीआरपी ही मायने रखती है। आप वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र चौबे द्वारा अंग्रेजी में लिखे गए मूल लेख को नीचे लिंक पर क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं... Why I Am Ashamed to Be a TV Journalist
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