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विष्णु शर्मा ने कांग्रेस को दिखाया आइना: जब जीरो MLA के होते भी बनाई थी सरकार

विष्णु शर्मा वरिष्ठ पत्रकार ।। 1980 में एक भी सीट न जीतने वाली कांग्रेस ने जब गोवा में बना ली थी अपनी सरकार आज भले ही बीजेपी की या मनोहर पर्रिकर की जमकर आलो

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

विष्णु शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार ।।

1980 में एक भी सीट न जीतने वाली कांग्रेस ने जब गोवा में बना ली थी अपनी सरकार

आज भले ही बीजेपी की या मनोहर पर्रिकर की जमकर आलोचना हो रही हो कि 13 विधायक रहते हुए भी गोवा में सरकार बना ली, जबकि कांग्रेस के 17 विधायक हैं, लेकिन कांग्रेस ने 1980 में इसी राज्य गोवा में जो किया उसे जानकर तो आप चौंक जाएंगे। उस साल गोवा में कांग्रेस का एक भी विधायक जीतकर नहीं आ पाया, फिर भी सरकार कांग्रेस ने ही बनाई और वो भी बिना राष्ट्रपति शासन लगाए। ये शायद भारत के इतिहास में अपनी तरह का पहला और काफी अनोखा मामला था।

 दरअसल 1961 में गोवा की मुक्ति के बाद 1963 में पहले चुनाव से लेकर 1979 की जनता पार्टी सरकार तक गोवा में एक ही पार्टी का शासन रहा और जनसंघ (बीजेपी) या कांग्रेस अपनी जड़ें जमाने में नाकाम रहीं। ये पार्टी थी महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी। इस पार्टी की ओर से सीएम बनते थे दयानंद बांडोडकर और फिर शशिकला काकोडर। ये दोनों पिता-पुत्री थे।

 लेकिन 1979 में पार्टी में बगावत के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया, जो करीब 264 दिनों तक चला। इधर शशिकला से बगावत करने वाले एमजीपी के कद्दावर नेता प्रताप सिंह राणे ने एक नई पार्टी जॉइन कर ली, इस पार्टी का नाम था कांग्रेस(उर्स)। दरअसल इस पार्टी को कांग्रेस से तोड़कर साउथ के नेता देवराज उर्स ने शुरू किया। उर्स दो बार कर्नाटक के चीफ मिनिस्टर रह चुके थे।

जब 1969 में कांग्रेस में विभाजन हुआ तो वो इंदिरा गांधी के साथ खड़े रहे। मैसूर के कई राजकुमारों की शादियां उर्स कम्युनिटी से ही हुई थीं। ऐसे समय में जब बड़े-बड़े दिग्गज कांग्रेस नेता इंदिरा को छोड़कर कांग्रेस (ओ) में जा चुके थे, देवराज ने इंदिरा का कांग्रेस (आर) का नाता थामे रखा और 1971 के चुनाव में कर्नाटक की सारी लोकसभा सीटें कांग्रेस को दिलवा दीं।

लेकिन बाद में उनकी इंदिरा से भी बिगड़ गई और उन्होंने एक नई पार्टी बना ली, वो भी तब जब इमरजेंसी के बाद इंदिरा बुरी तरह हार गईं, इस पार्टी का नाम रखा इंडियन नेशनल कांग्रेस (उर्स)।

इस पार्टी में कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और गोवा के तमाम विधायक शामिल हो गए, हर किसी का इंदिरा से मोहभंग हो गया था। इस पार्टी में शामिल होने वाले कुछ बड़े नेताओं के नाम आपको चौंका देंगे, ये नाम थे शरद पवार, प्रियरंजन दास मुंशी, ए.के. एंटनी, यशवंतराव चाह्वाण, देवकांत बरुआ और के.पी. उन्नीकृष्णन। इसी लहर में गोवा के प्रताप सिंह राणे ने भी उर्स की कांग्रेस को जॉइन कर लिया। 1980 में इंदिरा कांग्रेस और कांग्रेस (उर्स) दोनों ने गोवा में चुनाव लड़ा।

दिलचस्प बात ये है कि इंदिरा गांधी ने भी गोवा में सभाएं की और ऐसी ही एक सभा में इंदिरा गांधी ने पहली बार इमरजेंसी लगाने के लिए गोवा और देशवासियों से माफी भी मांगी। लेकिन गोवा पर प्रताप सिंह राणे का रंग चढ़ा था, सभी इंदिरा से बगावत करने वाले देवराज (उर्स) के कायल थे। विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फिर गया, कांग्रेस के लिए इंदिरा के कैम्पेन के बावजूद एक भी सीट पर जीत ना हासिल होना शर्मनाक था। उस वक्त गोवा विधानसभा में कुल तीस सीटें होती थीं और जिनमें से बीस सीटें कांग्रेस (उर्स) ने जीत ली थी और 7 सीटें महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के हिस्से में आई थीं।

तीन सीटों पर निर्दलीय भी चुनाव जीत गए थे लेकिन कांग्रेस के हिस्से में एक भी सीट नहीं आई थी। इंदिरा ने इसे प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया।

वैसे भी 1980 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी केन्द्र की सत्ता में फिर से वापस आ चुकी थीं, उर्स के अरमानों पर पानी फिर गया था।  उनके सिपहसालारों को भविष्य डांवाडोल दिखाई दे रहा था। सबसे पहले ए.के. एंटनी ने पार्टी छोड़ी और कांग्रेस (ए) नाम से एक नई रीजनल पार्टी बना ली, उसके बाद शरद पवार जो कि देवराज उर्स की बीमारी के चलते कांग्रेस (उर्स) के प्रेसीडेंट बन चुके थे। पार्टी का नाम बदलकर कांग्रेस एस यानी कांग्रेस (सोशलिस्ट) रख लिया। हालांकि उससे पहले ही इंदिरा गोवा में अपना खेल शुरू कर चुकी थीं।

पीएम होने के नाते सीएम प्रताप सिंह राणे से उनका बात करना लाजिमी था। इंदिरा ने प्रताप सिंह राणे को प्रलोभन देना शुरू कर दिया।

गोवा में सत्ता उर्स के नाम पर आई थी, ऐसे में प्रताप सिंह का कोई भी फैसला लेना आसान नहीं था। इंदिरा के संम्पर्क में गोवा की कांग्रेस उर्स के कुछ सीनियर नेता और विधायक भी आने लगे।

प्रताप सिंह राणे को समझ आ गया था कि उनकी पार्टी केन्द्र स्तर पर कमजोर हो चुकी है और इंदिरा ताकतवर हो चुकी हैं। मुश्किल परिस्थितियों में अपनी पुरानी पार्टी एमजीपी से भी उन्हें समर्थन की उम्मीद नहीं थी।

 इंदिरा ने वादा किया था कि प्रताप सिंह राणे ही गोवा में कांग्रेस के सर्वेसर्वा होंगे, उनकी सीएम पोस्ट भी बरकरार रहेगी। ऐसे में प्रताप सिंह राणे ने बड़ा फैसला किया। वो फैसला जिसकी पूरे देश में मिसाल नहीं मिलती।

प्रताप सिंह राणे ने गोवा में कांग्रेस (उर्स) का वजूद ही खत्म कर दिया और पूरी की पूरी गोवा कांग्रेस उर्स का इंदिरा कांग्रेस में विलय कर दिया। दो तिहाई बहुमत से जीतने के बावजूद प्रताप सिंह राणे ने अपनी पार्टी का विलय दूसरी पार्टी में कर दिया और अब वो इंदिरा कांग्रेस के सीएम बन गए, जो बाद में असली कांग्रेस कहलाई।

 इंदिरा गांधी यहीं रुकने वाली नहीं थी, उस चुनाव में एमजीपी के सात विधायक जरूर थे, लेकिन उनकी नेता शशिकला चुनाव हार गई थीं।

शशिकला के हारते ही महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी एक तरह से नेतृत्व विहीन थी। कांग्रेस ने उसके पांच विधायकों को तोड़कर शामिल कर लिया। इंदिरा गांधी कांग्रेस के विपक्षियों का नामोंनिशान गोवा से मिटा देने के मूड में थी, इस बार चुनाव हारने वाली शशिकला पर डोरे डाले गए।

शशिकला को भी लग गया कि अब वो मेनस्ट्रीम पॉलटिक्स से दूर होने जा रही है और उसकी पार्टी का कोई भविष्य नहीं है और उन्होंने भी अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल होने का ऐलान कर दिया। लेकिन उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को ये रास नहीं आया। शशिकला पार्टी का विलय कांग्रेस में करना चाहती थी, लेकिन बाकी दो विधायकों ने साफ मना कर दिया। शशिकला को भी कांग्रेस में मनमाफिक जगह नहीं मिली, उन्होंने नई पार्टी खड़ी कर दी, पार्टी का नाम पिता के नाम पर रखा भाईसाहेब बांडोडकर गोमांतक पार्टी लेकिन 1984 के चुनाव में उसकी बुरी तरह हार हुई। खुद शशिकला दो जगहों से लडीं और हार गईं और वापस महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी में अपनी पार्टी के विलय के साथ शामिल हो गई। इधर दोबारा से बहुमत के साथ प्रताप सिंह राणे की सरकार आ गई।

 इस तरह इंदिरा गांधी ने बिना एक भी विधायक के प्रलोभन और दबाव के सहारे ना केवल गोवा में अपनी सरकार बना ली बल्कि अपनी पार्टी का ढांचा भी केवल एक इसी कदम से गोवा में मजबूती से खड़ा कर दिया। उसके बाद प्रताप सिंह राणे गोवा में कुल पांच बार मुख्रयमंत्री बने। ऐसे में लोग पर्रिकर या बीजेपी पर तमाम सवाल उठाएं, लेकिन इंदिरा गांधी के इस कदम को जानना उनके लिए वाकई दिलचस्प होगा।

(साभार: inkhabar.com)

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