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तो क्या मोदी की ‘महफिल’ में आडवाणी की नहीं होगी कोई जगह?
पिछले पांच कार्यकाल से गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र की नुमाइंदगी करने वाले लालकृष्ण आडवाणी की जगह...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
मोदी को नहीं चाहिए आडवाणी
अमर आनंद
वरिष्ठ पत्रकार।।
पिछले पांच कार्यकाल से गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र की नुमाइंदगी करने वाले लालकृष्ण आडवाणी की जगह उनकी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने ले ली है। अमित शाह अब खुद यहां से पार्टी के उम्मीदवार होंगे। 91 साल के आडवाणी की उम्र के हिसाब से अगर इसे देखा जाए तो ऐसा लगता है कि उन्हें एक तरफ से सक्रिय राजनीति से संन्यास लेना चाहिए और आराम करना चाहिए। इसलिए पार्टी का ये फैसला गलत नहीं लगता। दूसरी तरफ पार्टी की अपने अध्यक्ष को गांधीनगर से खड़ाकर राज्य में चुनावी माहौल बनाने के हिसाब से भी यह बात सही लगती है, क्योंकि विधान सभा चुनाव में राहुल गांधी और हार्दिक पटेल की जुगलबंदी ने पार्टी की जीत मुश्किल कर दी थी और अब ये दोनों एक ही पार्टी का हिस्सा हैं। 2019 के चुनावी समर में 2014 की तरह ही अपनी जीत को दुहराने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ बीजेपी अगर देखा जाए तो अपनी रणनीति के हिसाब से गलत नहीं है। यानी 2004 और 2009 में पार्टी की चुनावी रणनीति की कमान संभालने वाले और 2009 में पीएम इन वेटिंग कहे जाने वाले आडवाणी इस बार एमपी इन वेटिंग भी नहीं रह जाएंगे।
जैसा कि देखा और समझा जा रहा है, रामलाल के साथ मिलकर जिन मुरली मनोहर जोशी ने आडवाणी को सीट छोड़ने के लिए राजी किया, उनका पत्ता भी साफ होने जा रहा है और इसके लिए जोशी को भी तकरीबन मना लिया गया है। आडवाणी और जोशी बीजेपी बीजेपी के 'अनमोल धरोहर' माने जाते रहे हैं, जिन्होंने राम मंदिर निर्माण यात्रा और एकता यात्रा जैसी यात्राओं से देश में बीजेपी के लिए विपरीत माहौल में भी जनता को पार्टी से जोड़ने का काम किया था।
प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी इन यात्राओं का अटूट हिस्सा रहे हैं और पार्टी की आवाज को लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने वाले नेताओं में रहे हैं। उन्हीं मोदी को दोबारा पीएम बनाने की जुगत में जुटी पार्टी को मोदी के इन दोनों मार्गदर्शक नेताओं की दरकार तकरीबन नहीं के बराबर रह गई है। 80 पार कर चुके यूपी के सांसद कलराज मिश्रा से ये कहलवा लिया गया कि वह अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे। यानी मार्गदर्शक मंडल के नेताओं का मूकदर्शक बनकर पार्टी के साथ जुड़े रहने या पार्टी में ही निष्क्रिय रहने जैसी स्थिति दिखाई पड़ रही है।
2005 में पाकिस्तान में मज़ार पर ज़िन्ना की तारीफ करने के बाद उलटी गिनती का सामना कर रहे आडवाणी अटल के बाद पार्टी के सबसे बड़े नेता माने जाते रहे हैं, उनकी पीएम और उसके बाद राष्ट्रपति बनने की मंशा के आगे कभी खुद अटल खड़े रहे तो कभी खुद नरेंद्र मोदी। 2015 में नरेंद्र मोदी को पहले चुनाव समिति का अध्यक्ष और फिर पीएम उम्मीदवार बनाए जाने के दौरान आडवाणी की नाराजगी या रूठ जाने ने उनके सियासी सफर की दिशा ही मोड़ दी। पीएम पद से दूर हो चुके आडवाणी की राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति जैसे पदों के लिए जो स्वाभाविक दावेदारी हो सकती थी, उन्हें पार्टी खारिज करती चली गई और वो मार्गदर्शक मंडल के एक सामान्य नेता और सामान्य सांसद बनकर रह गए। अब बदले हुए हालात में आडवाणी सांसद भी नहीं रह जाएंगे।
देश ने संसद परिसर के कुछ समारोहों और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान की तस्वीरों में आडवाणी की कथित 'उपेक्षा' वाली तस्वीरें देखीं। इससे उलट इन पांच सालों में मोदी और आडवाणी की मुलाकात की एकाध खुशनुमा तस्वीरें भी नजर आईं और अब ये साफ नजर आ रहा है कि मोदी की 'महफिल' में आडवाणी के लिए कोई जगह नहीं होगी। तो क्या ऐसा मान लिया जाए कि 'मंदिर वहीं बनाएंगे' के आडवाणी के दौर से अब तकरीबन 'मंदिर नहीं बनाएंगे' के मोदी-शाह के दौर में पहुंची बीजेपी को अब आडवाणी की जरूरत नहीं रह गई है। 1989-92 के दौरान राम मंदिर आंदोलन की रथ यात्रा में एक तरह से पार्टी के महारथी आडवाणी के रथ के सारथी मोदी को पार्टी का महारथी बन जाने के बाद पार्टी के इस पुराने महारथी रास नहीं आ रहे हैं। सियासत आज एक ऐसे दौर में पहुंच चुकी है, जहां विरोधी दल समाजवादी पार्टी के सांसद और बुजुर्ग नेता मुलायम सिंह यादव का आशीर्वाद फिर से प्रधानमंत्री बनने के लिए तो मायने रखता है, अपनी ही पार्टी के बुजुर्ग नेता आडवाणी का सानिध्य और आशीर्वाद नहीं।
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