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पीली पर्चियों से भरा जन्मदिन मुबारक विष्णु नागर सर...
जन्मदिन की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं सर। आपकी मुस्कुराहट बरकरार रहे और आप अपना सिर खुजाते हुए, टेबल पर मुंह झुकाए...नमकीन खाते हुए...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago
पूजा मेहरोत्रा ।।
अक्सर, संपादकों के लिए कहा जाता है ‘एडिटर हू नेवर एडिट’...लेकिन आप सचमुच के संपादक हैं क्योंकि ‘यू एडिट ईच एंड एवरी क़ॉपी’। आप संपादकों के लिए कहे जाने वाले हर ज़ुमले से अलग वाले संपादक रहें हमेशा, आज संपादकों से मिलना प्रधानमंत्री से समय लेने से भी ज्यादा दुश्कर है ऐसे समय में आपसे किसी का भी मिलने आ जाना हमेशा से ही आसान रहा है। आप हमेशा ऐसे ही दाएं हाथ के बेहतरीन बल्लेबाज की तरह अपनी कलम चलाते रहें ऐसी मेरी दुआएं हैं।
वैसे तो हम पिछले आठ साल से एक-दूसरे को जानते हैं लेकिन मुझे याद नहीं कि मैनें कभी आपको जन्मदिन की शुभकामनाएं दी हों, हां लेकिन आपके लिए दुआएं मांगी जरूर है। मुझे याद आ रहा है दो वर्ष पहले जब आपके साथ दुखद घटना घटी थी और आप मैक्स पटपड़गंज में भर्ती थे, हमें दोपहर में घटना के बारे में पता चला और आधे घंटे के अंदर हम कई साथी आपका हाल-चाल लेने पहुंच गए थे। आज जब मैं आपके जन्मदिन के लिए ये शुभकामना संदेश लिख रहीं हूं तो आपको ये बता देना चाहती हूं कि अभी तक मैनें जितने भी संपादकों के साथ काम किया उसमें आप सबसे बेहतरीन हैं... हां, ये बात अलग है कि आप जब मेरी कॉपी पर पेन चला देते थे और इसमें मेरे कहे शब्द और मेरी स्टाइल को काट-काट कर अपने शब्द अपने स्टाइल में ढाल देते थे तो मैं चिढ़ जाती थी।
क्या मुझे लिखना नहीं आता है? क्या मैं एक लाइन भी सीधा नहीं लिख पाती हूं? तो मैंने अपने करियर के नौ साल में जो भी लिखा वो कूड़ा लिखा? ऐसे कई सवाल मेरे अंदर उमड़ा घुमड़ा करते थे। मैं आपकी एडिट की गई कॉपी से पहले अपनी कॉपी कई-कई बार पढ़ती और सर, सच बताती हूं मुझे अपना लिखा न तो सेंटेश ही खराब लगता और न ही उसे इतनी बुरी तरह से एडिट किए जाने की जरूरत ही महसूस होती थी, लेकिन अब जब संपादक साहब ने कॉपी को एडिट किया है तो किया वही जाएगा जिसे संपादक महोदय ने किया है। हम संपादित कर दिया करते थे। कई बार कुछ लाइनें छोड़ देते थे लेकिन उफ्फ आपकी नज़र... कहां बचती थी कॉपी फाइनल में कॉपी कट कर आ जाती थी... हां, लेकिन ये भी सच है कि मैं जितना चिढ़-चिढ़ कर अपनी कॉपी एडिट किया करती थी, उससे कहीं ज्यादा दूसरे साथियों की कॉपी देखा करती थी और हम सभी न्यूज़ रूम में एक दूसरे की कॉपी देख खूब हंसा करते थे।
सर, मैं अपनी हर कॉपी को आपकी एडिट की हुई पिछली कॉपी से सबक लेकर लिखने की कोशिश करती और आप हर बार उसे उतना ही रंग कर भेज देते। मुझे अच्छा नहीं लगता था। एक बार मैं अपने साथी के पास गई और शिकायती लहजे में कहा ये सर तो अपने ही शब्दों को हर बार नकार देते हैं, मैं तो परेशान हो गई हूं, इतना काम होता है, लेकिन यहां तो एक ही कॉपी में पांच कॉपी वाली मेहनत करा देते हैं। वो सीनियर महाशय भी कहां कम थे… मुंह पर हाथ कर बड़े ही मज़ाकिया अंदाज में कहा, पहले तो जो आपने उनका वो आशीर्वाद अपने डैसबोर्ड पर सजाया है इसे हटाइए। मैंने हटा दिया... फिर, मैं उनके पास गई वो बोले क्यों निराश हो रहीं हैं 'समोसा खाइए'। फिर उन्होंने मुझे मेरी स्टोरी की तारीफ़ में आए कई पत्र देते हुए कहा लीजिए इसे पढ़िए और कल का समोसा पक्का कीजिए... और फिर भी निराशा खत्म न हो तो उन्होंने जोर देते हुए कहा कि एक बार 'वसीम' (सर का पीए) के पास जाकर अपनी पीड़ा बताइए... मैंने ठीक वैसा ही किया। वसीम के पास गई। उसने मुझे एक कॉपी दिखाई जो छठी बार एडिट की जा रही थी और वो करेक्शन लगा-लगा कर परेशान था और मैं बल्लियों उछल रही थी... अब मैं नहीं बता सकती कि वो किसकी कॉपी थी लेकिन थी किसी संपादक महोदय की ही... सर, जब आपको ये पत्र लिख रहीं हूं तो सेक्टर 19 और 18 की हमारी सारी शैतानियां याद आ रहीं हैं। जब भी हमें समोसा खाना होता था तो हम किस तरह अपनी लिखी वाली कॉपी के अंदाज़ में आपको एक सादे कागज़ पर सिर्फ ‘समोसा’ लिख कर भेज देते थे और वो बिना एडिटिंग के सौ रुपए के साथ हमारे पास कॉपी के साथ कभी आप तो कभी सिर्फ रुपया आ जाया करता था।
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