होम / विचार मंच / पुण्य प्रसून का सवाल: क्या किसान-कारोबारियों के बीच खिंची हुई है मोटी लकीर?

पुण्य प्रसून का सवाल: क्या किसान-कारोबारियों के बीच खिंची हुई है मोटी लकीर?

पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार ।। देशभर के किसानों पर क़र्ज 12,60,000 करोड़ और तीन बरस में उद्योगपतियों को रियायत 1

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

पुण्य प्रसून बाजपेयी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

देशभर के किसानों पर क़र्ज 12,60,000 करोड़ और तीन बरस में उद्योगपतियों को रियायत 17,15,00,000 करोड़

तो देश की इकनॉमी का सच है क्या? क्योंकि एक तरफ 12 लाख 60 हजार करोड़ का कर्ज देशभर के किसानों पर है। जिसे माफ करने के लिये तमाम राज्य सरकारों के पास पैसा है नहीं। तो दूसरी तरफ 17 लाख 15 हजार करोड़ की टैक्स में माफी उद्योग सेक्टर को सिर्फ बीते तीन वित्तीय वर्ष में दे दी गई। यानी उद्योगों को डायरेक्ट या इनडायरेक्ट टैक्स में अगर कोई माफी सिर्फ 2013 से 2016 के दौरान ना दी गई होती तो उसी पैसे से देशभर के किसानो के कर्ज की माफी हो सकती थी। तो क्या वाकई किसान और कारोबारियों के बीच मोटी लकीर खिंची हुई है, या फिर किसान सरकार की प्रथामिकता में कभी रहा ही नहीं? ये सवाल इसलिये क्योंकि एक तरफ एनपीए या उद्योगों को टैक्स में रियायत देने पर सरकार से लेकर बैंक तक खामोश रहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ किसानों की कर्ज माफी का सवाल आते ही महाराष्ट्र से लेकर पंजाब के सीएम तक केन्द्रीय सरकार से मुलाकात कर पैसों की मांग करते हैं और केन्द्र सरकार किसानों का मुद्दा राज्य का बताकर पल्ला झाड़ती है तो एसबीआई चैयरमैन किसानों की कर्ज माफी की मुश्किलें बताती है।

किसान देश की प्राथमिकता में कहां खड़ा है, ये सवाल इसलिये जिस तरह खेती राज्य का मसला है, उसी तरह उद्योग भी राज्य का मसला होता है और इन दो आधारों के बीच एक तरफ केन्द्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने राज्यसभा में 16 जून 2016 को कहा, उद्योगों को तीन बरस [2013-2016] में 17 लाख 15 हजार करोड़ रुपए की टैक्स माफी दी गई। तो दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने नंवबर 2016 में जानकारी दी किसानों पर 12 लाख 60 हजार रुपए का कर्ज है, जिसमें 9 लाख 57 हजार करोड़ रुपए कमर्शियल बैक से लिये गये है।

और इसी दौर में ब्रिक्स बैंक के प्रेजिडेंट के.वी. कामत ने कहा कि 7 लाख करोड़ का एनपीए कमर्शियल बैंक पर है। यानी एक तरफ उद्योगों को राहत। दूसरी तरफ उघोगों और कॉरपोरेट को कर्ज देने में किसी बैंक को कोई परेशानी नहीं है। लेकिन किसानों के कर्ज माफी को लेकर बैंक से लेकर हर सरकार को परेशानी। जबकि देश का सच ये भी है कि जितना लाभ उठाकर उद्योग जितना रोजगार देश को दे नहीं पाते, उससे 10 गुना ज्यादा लोग खेती से देश में सीधे जुड़े हैं।

आंकड़ों के लिहाज से समझें तो संगठित क्षेत्र में महज तीन करोड़ रोजगार हैं। चूंकि खेती से सीधे जुड़े लोगों की तादाद 26 करोड़ है। यानी देश की इकनॉमी में जो राहत उद्योगों को, कॉरपोरेट को या फिर सर्विस सेक्टर में भी सरकारी गैर सरकारी जितना भी रोजगार है, उनकी तादाद 3 करोड़ है। जबकि 2011 के सेंसस के मुताबिक 11 करोड़ 80 लाख अपनी जमीन पर खेती करते हैं और 14 करोड़ 40 लाख लोग खेत मजदूर हैं। यानी सवा करोड़ की जनसंख्या वाले देश की हकीकत यही है कि हर एक रोजगार के पीछ अगर पांच लोगों का परिवार माने तो संगठित क्षेत्र से होने वाली कमाई पर 15 करोड़ लोगों का बसर होता है। वहीं खेती से होने वाली कमाई पर एक सौ दस करोड़ लोगों का बसर होता है और इन हालातों में अगर देश की इकनॉमी का नजरिया मार्केट इकनॉमी पर टिका होगा या कहे पश्चिमी अर्थवयवस्था को भी भारत अपनाये हुये है तो फिर जिन आधारों पर टैक्स में राहत उद्योगों को दी जाती है। या बैंक उद्योग या कॉरपोरेट को कर्ज देने से नहीं कतराते तो उसके पीछे का संकट यही है कि अर्थशास्त्री ये मान कर चलते है कि खेती से कमाई देश को नहीं होगी। उद्योगों या कॉरपोरेट के लाभ से राजस्व में बढ़ोत्तरी होगी।

यानी किसानों की कर्ज माफी जीडीपी के उस हिस्से पर टिकी है जो सर्विस सेक्टर से कमाई होती है। और देश का सच भी यही है खेती पर चाहे देश के सौ करोड़ लोग टिके है लेकिन जीडीपी में खेती का योगदान महज 14 फीसदी हैं। तो इन हालातों में जब यूपी में किसानों की कर्ज माफी का एलान हो चुका है तो बीजेपी शासित तीन राज्यों में हो क्या रहा है, जरा इसे भी देख लें। मसलन हरियाणा जहां किसान का डिफॉल्टर होना नया सच है। आलम ये कि हरियाणा के 16.5 लाख किसानों में से 15.36 लाख किसान कर्जदार हैं। इन किसानों पर करीब 56,336 करोड़ रुपए का कर्ज है, जो 2014-15 में 40,438 करोड़ रुपए था। 8.75 लाख किसान ऐसे हैं, जिन्होंने कमर्शियल बैंक, भूमि विकास बैंक, कॉपरेटिव बैंक और आणतियों से कर्ज लिया हुआ है और कर्ज के कुचक्र में ऐसे फंस गए हैं कि अब कर्ज न निगलते बनता है न उगलते।

किसानों की परेशानी ये है कि वो फसल के लिए बैंक से कर्ज लेते हैं। ट्रैक्टर, ट्यूबवैल जैसी जरुरतों के लिए जमीन के आधार पर भूमि विकास बैंक या कॉपरेटिव सोसाइटी से लोन लेता है। मौसम खराब होने या फसल बर्बादी पर कर्ज का भुगतान नहीं कर पाते, तो अगली फसल के लिए आढ़तियों के पास जाते हैं। और फिर फसल बर्बादी या कोई भी समस्या न होने पर डिफॉल्टर होने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। लेकिन-अब यूपी में जिस तरह किसानों का कर्ज माफ हुआ है, हरियाणा के किसान भी यही मांगने लगे हैं। और दूसरा राज्य है राजस्थान। जहां किसानों को कर्ज देने की स्थिति में सरकार नहीं है। लेकिन राजस्धान का संकट ये है कि एक तरफ कर्ज मांगने वाले किसानों की तादाद साढ़े बारह हजार है तो दूसरी तरफ वर्ल्ड बैंक से किसानों के लिये जो 545 करोड़ रुपए मिले लेकिन उसे भी सरकार खर्च करना भूल गई और इसी एवज में जनता का गाढ़ी कमाई के 48 करोड़ रुपए अब ब्याज के रुप में वसुधंरा सरकार वर्ल्ड बैंक को भरेगी।

दरअसल वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट की शुरुआत 2008 में हुई थी, जब वसुंधरा सरकार ने राजस्थान एग्रीकल्चर कॉम्पटेटिव्नेस प्रोजेक्ट बनाया था और फंडिंग के लिए वर्ल्ड बैंक को भेजा गया था। वर्ल्ड बैंक के इस प्रोजेक्ट के तहत कृषि, बागवानी, पशुपालन, सिंचाई और भूजल जैसे कई विभागों को मिलकर किसानों को कर्ज बांटने की योजना थी। वसुंधरा सरकार गई तो कांग्रेस की गहलोत सरकार आई और उसने 2012 में फंडिंग के लिए 832 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट वर्ल्ड बैंक को दिया। वर्ल्ड बैंक ने 545 करोड़ रुपए 1.25 फीसदी की ब्याज दर पर राजस्थान सरकार को दे दिए, लेकिन 2016 तक इसमें से महज 42 करोड़ ही सरकार किसानों को बांट पाई। यानी एक तरफ किसानों को कर्ज नहीं मिल रहा और दूसरी तरफ वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट के तहत जो 545 करोड़ रुपए में से जो 42 करोड़ बांटे भी गये वह किस रूप में ये भी देख लीजिए।

17 जिलों में यंत्र, बीज और खाद के लिए सिर्फ 14 लाख 39 हजार रुपए बांटे गए। फल, सब्जी, सोलर पंप के लिए 3 लाख 13 हजार रुपए। जल संग्रहण के लिए 7 लाख दो हजार रुपए बांटे गए। पशुपालन के लिए 2 लाख 19 हजार रुपए दिए। नहरी सिंचाई निर्माण के लिए 2 लाख 36 हजार रुपए दिए गए। और भू-जल गतिविधियों के लिए 11 लाख 50 हजार रुपए बांटे गए। यानी सवाल सरकार का नहीं सरोकार का है, क्योंकि अगर सरकार खजाने में पैसा होने के बावजूद जनकल्याण का काम सरकार नहीं कर सकती तो फिर सरकार का मतलब क्या है। और तीसरा राज्य महाराष्ट्र जहां बीते दस बरस से किसानो का औसत खुदकुशी का आलम यही है कि हर तीन घंटे में एक किसान खुदकुशी करता है। खुदकुशी करने वाले हर तीन में से एक किसान पर 10 हजार से कम का कर्ज होता है। हालात है कितने बदतर ये 2015 के एनसीआरबी के आंकडों से समझा जा सकता है। 2015 में 4291 किसानों ने खुदकुशी की, जिसमें 1293 किसानों की खुदकुशी की वजह बैंक से कर्ज लेना था। जबकि 795 किसानों ने खेती की वजह से खुदकुशी की। यानी खुदकुशी और कर्ज महाराष्ट्र के किसानों की बड़ी समस्या है, जिसका कोई हल कोई सरकार निकाल नहीं पाई।

और अब यूपी में किसानों की कर्ज वापसी के बीच महाराष्ट्र के देवेन्द्र फडणवीस सरकार पर ये दबाव पड़ना तय है कि वो भी महाराष्ट्र के किसानों के लिए कर्जवापसी की घोषणा करें, क्योंकि विपक्ष और सरकार की सहयोगी शिवसेना लगातार ये मांग कर रहे हैं और महाराष्ट्र में कई जगह धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं। यानी यूपी की कर्ज माफी किसानों के लिये राहत है या राजनीतिक के लिये सुकून। इसका फैसला भी अब हर चुनाव में होगा।

(साभार: फेसबुक वॉल से)

समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।


टैग्स
सम्बंधित खबरें

क्या पाकिस्तान अफगानिस्तान को हरा पाएगा: रजत शर्मा

तालिबान ने कहा कि उसके हमले में 55 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, इनमें से 23 सैनिकों की लाशें भी अफगान लड़ाके अपने साथ अफगानिस्तान ले गए।

1 day ago

2028 तक AI से बाज़ार में बर्बादी? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

अमेरिका में 100 में से 10 लोग जो white collar jobs करते हैं वो कुल खपत का 50% खर्च करते हैं। उदाहरण दिया गया है कि डेटा सेंटर में काम कर रहे एजेंट काम तो करेंगे लेकिन वो खर्च नहीं करेंगे।

2 days ago

वंदे मातरम् के खंडित स्वरूप पर सवाल : अनंत विजय

किसी कविता या गीत को खंडित करने का अधिकार रचनाकार के अलावा किसी अन्य को है? रचनात्मक संवेदना का सर्जनात्मक स्वतंत्रता की बात करनेवालों ने एक कृति को खंडित कर दिया।

2 days ago

शिक्षा के क्षेत्र में अराजकता की जिम्मेदारी किसकी: आलोक मेहता

मुख्य प्रश्न यही है, क्या इन गड़बड़ियों के लिए सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, या फिर मंत्रालय और उसके नेतृत्व को अपनी जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए?

2 days ago

PM मोदी की इजराइल यात्रा से किसे मिर्ची लगी: रजत शर्मा

दोनों देशों ने 27 समझौतों पर दस्तखत किए। दोनों देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स और क्वांटम कंप्यूटिंग में नई टेक्नोलॉजी पर काम करेंगे, आपसी सहयोग बढ़ाएंगे।

4 days ago


बड़ी खबरें

दुनिया को अलविदा कह गए वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व राज्यसभा सांसद एच.के. दुआ

वरिष्ठ पत्रकार, राजनयिक और पूर्व राज्यसभा सांसद एच.के. दुआ का बुधवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया।

5 hours ago

BSE व NSE ने इस मामले में 'बालाजी टेलीफिल्म्स' पर लगाया जुर्माना

टीवी और फिल्म प्रोडक्शन कंपनी बालाजी टेलीफिल्म्स (Balaji Telefilms Limited) पर स्टॉक एक्सचेंज ने जुर्माना लगाया है।

1 day ago

मैडिसन मीडिया सिग्मा की CEO वनिता केसवानी ने छोड़ा पद

मीडिया इंडस्ट्री से एक बड़ी खबर सामने आई है। वनिता केसवानी ने मैडिसन मीडिया सिग्मा (Madison Media Sigma) के सीईओ पद से इस्तीफा दे दिया है।

1 day ago

क्या पाकिस्तान अफगानिस्तान को हरा पाएगा: रजत शर्मा

तालिबान ने कहा कि उसके हमले में 55 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, इनमें से 23 सैनिकों की लाशें भी अफगान लड़ाके अपने साथ अफगानिस्तान ले गए।

1 day ago

वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी में शाजिया फ़ज़ल को मिली ये बड़ी जिम्मेदारी

ग्लोबल मीडिया और एंटरटेनमेंट कंपनी वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी (Warner Bros. Discovery) में शाजिया फ़ज़ल को बड़ी जिम्मेदारी मिली है

1 day ago