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enba 2016: TRP पर क्या बोले पंकज पचौरी, अनुराधा प्रसाद, श्रीनिवासन जैन, राणा यशवंत

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।। टेलिविजन न्यूज के क्षेत्र में बेहतर काम करने वालों को सम्मानित करने के लिए 25 फरवरी को नोएडा के ‘रेडिसन ब्लू’होटल में बहुप्रतिष्ठित ‘एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स (enba) 2016’ का आयोजन किया

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

टेलिविजन न्यूज के क्षेत्र में बेहतर काम करने वालों को सम्मानित करने के लिए 25 फरवरी को नोएडा के ‘रेडिसन ब्लू’होटल में बहुप्रतिष्ठित ‘एक्सचेंज4मीडिया न्यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स (enba) 2016’ का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम के दौरान ‘Redefining TRPs: Trust & Respect Points’ थीम पर एक पैनल डिस्कशन (panel discussion) भी किया गया। पैनल डिस्कशन में न्यूज ब्रॉडकास्ट इंडस्ट्री से जुड़े कई बड़े नाम शामिल हुए। वरिष्‍ठ पत्रकार और कमेंटेटर माधवन नारायणन ने इसका संचालन किया।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए नारायणन ने मीडिया के बिजनेस में संतुलित पत्रकारिता की जरूरत पर बल दिया। उन्‍होंने कहा कि मीडिया में ‘लक्ष्‍मी’ और ‘सरस्‍वती’ के बीच तालमेल बनाए रखना चाहिए। इसको अलग-अलग करते हुए उन्‍होंने बताया कि पैसा यानी लक्ष्‍मी और पॉवर यानी पार्वती है। सरस्‍वती से आशय लोगों को विश्‍वसनीय न्‍यूज (credible news) देना है जो कभी-कभी इन दोनों शक्तिशाली ‘देवियों’ के बीच दबकर रह जाती है।

नारायणन की बात के जवाब में ‘बीएजी फिल्‍म्‍स एंड मीडिया लिमिटेड’ (B.A.G. Films & Media Limited) की चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्‍टर अनुराधा प्रसाद का कहना था कि ‘टीआरपी’ (TRPs) और विश्‍वसनीयता (credibility) के बीच सामंजस्‍य जरूरी है। अनुराधा प्रसाद ने कहा कि एक पत्रकार और उद्यमी होने के नाते वे यह कह सकती हैं कि आप क्रेडिबिलिटी के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं।

उनका कहना था, ‘यदि आपके पास पैसे नहीं हैं तो आप किसी भी आर्गनाइजेशन को नहीं चला सकते हैं और यदि आप जब किसी आर्गनाइजेशन को चला ही नहीं सकते हैं तो उस समय क्रेडिबिलिटी के बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं रह जाता है।’

कार्यक्रम में सक्रिय पत्रकारिता (active journalism) में वापसी की तैयारी में जुटे मीडिया वेंचर ‘गो न्‍यूज’ (Go News) के संस्‍थापक और एडिटर-इन-चीफ पंकज पचौरी से पीएम ऑफिस में उनके ए‍डवाइजरी रोल को लेकर क्रेडिबिलिटी के बारे में सवाल पूछा गया, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। इस सवाल के जवाब में एनडीटीवी इंडिया के लोकप्रिय शो ‘हम लोग’ के पूर्व प्रजेंटर पंकज पचौरी ने कहा कि क्रेडिबिलिटी का संकट उन्‍हें कभी नहीं रहा। उनसे पहले हरीश खरे और संजय बारू भी प्रधानमंत्री कार्यालय से पत्रकारिता में वापस लौट चुके हैं।

उत्‍तर प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनावों का उदाहरण देते हुए पंकज पचौरी का मानना था कि जब से चुनावी जंग वॉट्सएप पर शुरू हुई है, तब से अलग तरह की पत्रकारिता हो रही है। अब आप मेनस्‍ट्रीम मीडिया (MSM) में क्‍या कह रहे हैं, इसे कम लोग देख रहे हैं। ऐसे में यह बड़ा कारण है कि क्रेडिबिलिटी घट रही है। पचौरी का यह भी कहना था मेनस्‍ट्रीम मीडिया की बजाय लोगों ने अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के कैंपेन को ऑनलाइन ज्‍यादा फॉलो किया था।

वहीं, पचौरी की बातों से असहमति जताते हुए ‘इंडिया न्‍यूज’ (India News) के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत ने इस बात को मानने से इनकार कर दिया कि डिजिटल प्‍लेटफार्म पर लोगों की मौजूदगी बढ़ने के कारण मेनस्‍ट्रीम मीडिया की क्रेडिबिलिटी में अपने आप कमी आई है। यशवंत राणा के अनुसार, इन दोनों माध्‍यमों (mediums) में अंतर को अच्‍छे से समझने की जरूरत है।

राणा यशवंत का कहना था, ‘डिजिटल प्‍लेटफार्म टू-वे यानी ‘दो तरफा यातायात’ (two-way traffic) की तरह है जहां पर दोनों तरफ से कम्‍युनिकेशन होता है। जबकि टेलिविजन और प्रिंट ‘एकतरफा यातायात’ (single-way platform) है।’

उन्‍होंने कहा कि अपने पत्रकारिता के कॅरियर में न्‍यूज ब्रॉडका‍स्‍ट इंडस्‍ट्री में काम करते हुए उन्‍होंने ‘ईमानदारी’ (honesty), ‘अखंडता’ (integrity) और ‘विश्‍वसनीयता’ (credibility) को एक सूत्र में बांधकर रखा है। उन्‍होंने स्‍वीकार किया कि टीआरपी को क्रेडिबिलिटी के पैमाने से जोड़कर नहीं देखना चाहिए लेकिन उन्‍होंने इस बात पर भी जोर दिया कि क्रेडिबिलिटी से समझौता करके टीआरपी को लंबे समय तक बनाए नहीं रखा जा सकता है।

 न्यूज बिजनेस (The business of news)

’ मीडिया प्लानर्स की जरूरतों का जिक्र करते हुए अनुराधा प्रसाद ने बताया कि कैसे वे टीआरपी डाटा को लेकर काम करते हैं। अनुराधा के अनुसार, मीडिया प्‍लानर्स को टीआरपी ओर क्रेडिबिलिटी में 75:25 का अनुपात है। टीआरपी की ओर बढ़े इस रुझान के बारे में अनुराधा का कहना था, ‘आखिर मीडिया प्‍लानर्स के लिए क्‍या मापदंड होंगे। क्‍योंकि आप किसी भी व्‍यक्ति की क्रेडिबिलिटी की तुलना दूसरे व्‍यक्ति से कर सकते हैं लेकिन जब बात नंबर गेम की आती है तो इस बारे में कोई सवाल नहीं कर सकता है क्‍योंकि कोई नंबर वन होगा, कोई दो नंबर पर और कोई तीसरे नंबर पर और इसमें फिर सवाल उठाने की गुंजाइश नहीं रह जाती है।’

हालांकि पचौरी ने अनुराधा प्रसाद की इस बात का जोरदार खंडन किया। उन्‍होंने कहा कि सिर्फ कुछ न्‍यूज चैनलों को छोड़कर जो मुश्किल से मुनाफा कमा रहे हैं, देश में अधिकांश न्‍यूज चैनल घाटे में चल रहे हैं। ऐसे समय में जब लोग ज्‍यादा टेलिविजन सेट खरीद रहे हैं, ऐसे में भी अंग्रेजी न्‍यूज में 17 प्रतिशत और हिन्‍दी न्‍यूज में छह प्रतिशत तक की कमी आई है।

टेलिविजन न्‍यूज में 1000-1500 करोड़ रुपये के एडवर्टाइजमेंट की बात करते हुए उन्‍होंने कहा कि टीआरपी में भी काफी बढ़ोतरी हुई। पचौरी के अनुसार, टीआरपी ज्‍यादा होना इस बात की गारंटी नहीं है कि न्‍यूज मीडिया सफल होगा और पैसे कमाएगा, जैसे कि हम ‘टाइम्‍स नाउ’ को देख सकते हैं। चैनल को 11 वर्षों में करीब 545 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। देश में शीर्ष चैनल (top channel) के रूप में इसने पांच साल तक राज किया लेकिन लोग इसके कंटेंट के लिए भुगतान नहीं कर रहे थे।’

इस मौके पर यशवंत राणा ने चैनल की कमाई (revenues) और खर्चों (expenses) के बीच के संबंधों को बेहतर तरीके से समझाने की कोशिश की। उन्‍होंने इस बात पर जोर दिया कि टीआरपी की बात करें तो चैनल नंबर वन की कुर्सी हासिल कर सकता है और इसके अनुसार रेवेन्‍यू भी बढ़ा सकता है लेकिन इसका कोई फायदा नहीं होगा, जब तक कि यह अपने खर्चों पर लगाम नहीं लगाएगा।

उनका कहना था, ‘यदि आप एक पैसा कमाते हैं और तीन पैसे खर्च करते हैं तो आपका चैनल हमेशा घाटे में रहेगा और इसमें आपकी ही गलती है।’ न्‍यूज बिजनेस के बारे में उनका कहना था कि बिजनेस और न्‍यूज को हमेशा साथ रखकर चलने की जरूरत है।

 स्वच्छंद, राष्ट्रवादी पत्रिका का उदय और न्यूज को एंटरटेनमेंट के रूप में रखना (Rise of opinionated, nationalistic journalism and news as entertainment)

इस परिचर्चा में थोड़ी देर से शामिल हुए ‘एनडीटीवी’ (NDTV) के मैने‍जिंग एडिटर श्रीनिवासन जैन ने हल्‍के-फुल्‍के अंदाज में कहा कि वह सेरेमोनियल मैनेजिंग एडिटर (ceremonial Managing Editor) हैं जो सिर्फ अपने न्यूज शो Truth vs Hype को मैनेज करने के सिवाय कुछ नहीं करते हैं।

न्यूज वेंचर ‘रिपब्लिक’ के संस्‍थापक एवं वरिष्‍ठ पत्रकार अरनब गोस्‍वामी के विवादित स्‍टाइल (controversial style) का जिक्र करते हुए उन्‍होंने सुझाव दिया कि न्‍यूज में हमेशा रिपोर्टिंग और विश्‍लेषण के साथ रखे जाने वाले सुझाव, दोनों के लिए जगह होनी चाहिए लेकिन अरनब गोस्‍वामी ने इस ट्रेंड में बदलाव किया है। उन्‍होंने कहा, ‘समस्‍या यह है कि ‘Newshourification’ ने प्राइम टाइम के बैलेंस को एक तरफ झुका दिया है, जिससे एक तरह की विषमता की स्थिति हो गई है जहां पर आपकी राय को ज्‍यादा तवज्‍जो दी गई है। इस कारण से शाम को सात से रात 11 बजे तक प्राइम टाइम में सिर्फ ओपिनियन ही छाया रहता है। उन्‍होंने कहा कि ओपिनियन ज्‍यादा होने से न सिर्फ इसकी क्‍वॉलिटी में कमी आई बल्कि न्‍यूज शो पर आने वाले गेस्‍ट की क्‍वॉलिटी भी खराब होती है। ऐसे में पत्रकारिता के मूल्‍यों में भी कमी आती है।

इस पर गोस्वामी के बचाव में आते हुए माधवन नारायणन ने स्‍पष्‍ट किया कि गोस्‍वामी सिर्फ ‘theatrics’ होने से कहीं आगे हैं। उन्‍होंने रवीश कुमार के प्रजेंटेशन के स्‍टाइल का हवाला देते हुए कहा कि यह ‘antidote to the Arnab style’ है। उन्‍होंने ‘जनरुचि’ (public interest) की पत्रकारिता करने के लिए अरनब गोस्‍वामी की तारीफ भी की।

कार्यक्रम में राणा यशवंत इस बात से सहमत थे कि किसी भी व्‍यक्ति को अपनी बात रखने का और  किसी से भी संबंध मेंटेन रखने का हक है लेकिन उसे इन बातों की अनुमति कतई नहीं देनी चाहिए जिससे उसकी पत्रकारिता प्रभावित हो। यशवंत ने कहा, ‘जब मैं कोई न्‍यूज कर रहा हूं तो उस समय मुझे सिर्फ एक पत्रकार की तरह होना चाहिए। दिक्‍कत तब आती है जब कोई पत्रकार प्रवक्‍ता (spokespersons) की तरह बात करने लगता है।’

यशवंत ने उन दिनों को भी याद करते हुए कहा कि एक जमाना था जब भारतीय न्‍यूज मीडिया में राखी सावंत और राजू श्रीवास्‍तव छाये रहते थे और हेडलाइंस पर तक अपनी पकड़ रखते थे। उन्‍होंने बताया कि वर्ष 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद इस तरह की चीजों में काफी बदलाव हुआ।

नारायणन द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्‍या पत्रकार को ‘राष्‍ट्रवादी (nationalists) अथवा ‘विचारक’ (thinkers) होना चाहिए, पचौरी ने कहा कि उन्‍हें ‘ग्लोबल’ (global) होना चाहिए क्‍योंकि उन्‍हें सभी जगह से रिपोर्टिंग करनी है।

पुराने समय को याद करते हुए उन्‍होंने कहा कि ‘बीबीसी वर्ल्‍ड सर्विस’ (BBC World Service) में ‘नेशनलिज्‍म’ के लिए कोई स्‍थान नहीं था और 69 देशों में इसके पत्रकार काम कर रहे थे। उसी दौरान ‘आईआरए’ (Irish Republican Army) पर बीबीसी की पॉलिसी को लेकर बीबीसी में हड़ताल हुई थी। पचौरी का कहना था कि इस हड़ताल के कारण बीबीसी वर्ल्‍ड सर्विस के स्‍टूडियो में 48 घंटे के लिए सन्‍नाटा छा गया था।

 न्यूज का भविष्य (The future of news)

पैनल डिस्‍कशन जब समाप्ति की ओर पहुंचा नारायणन ने फाइनेंसियल जर्नलिस्‍ट के रूप में अपने अनुभवों के आधार पर कुछ सुझाव भी दिए। उन्‍होंने न्‍यूज चैनलों के लिए उसी तरह से ‘क्रेडिबिलिटी रेटिंग्‍स’ (credibility ratings) पर बल दिया जैसे फाइनेंसियल मार्केट में बॉन्‍ड या फिक्‍स्‍ड डिपॉजिट रखे जाते हैं। नई-नई टेक्‍नोलॉजी की भूमिका के बारे में बात करते हुए उन्‍होंने सुझाव दिया कि क्रेडिबिलिटी को मापने के लिए कोई तकनीकी युक्‍त किसी प्रणाली पर जोर दिया।

‘ट्रोलिंग’ और ‘ऑनलाइन अब्‍यूज’ (trolling and online abuse) का जिक्र करते हुए जैन ने इस बात पर खेद जताया कि न्‍यूज मीडिया दो भागों में बंट गई है। एक तो ऐसे पत्रकार हैं जो उन पत्रकारों को ट्रोल (troll) करते हैं जिन्‍हें संस्‍थान से सीधा फायदा होता है। उनके शब्‍दों में, ‘partisan journalism’ नया नहीं था लेकिन कुछ लोगों ने दूसरों के मुकाबले इसे ‘better job of concealing it’ बना दिया।

जैन ने कहा, ‘ऐसा कोई भी मामला नहीं हुआ है जब न्‍यूज चैनल और एंकर सरकार के प्रवक्‍ता बन गए हों।’ मुश्किल परिस्थितियों का जिक्र करते हुए उन्होंने रिपोर्ट की गई स्‍टोरी और रिपोर्टर्स की वकालत की। उन्‍होंने कहा कि प्राइम टाइम टेलिविजन किसी भी अखबार के पहले पेज की तरह होता है। हालांकि अखबार के फ्रंट पेज पर लगभग 12 स्‍टोरी होती हैं, प्राइम टाइम में सिर्फ ओपिनियन होते हैं और उन्‍होंने इसमें बदलाव की इच्‍छा जताई। उन्‍होंने उम्‍मीद जताई कि पॉलिटिकल रिपोर्टिंग से न्‍यूज रूम को अलग रखा जाएगा।

यशवंत का मानना था कि एडिटर्स को व्‍यूअर्स की पसंद और उसकी जरूरतों के बारे में अंतर को समझना चाहिए। उनका कहना था कि हालांकि व्‍युअर्स को उनकी पसंद के अनुसार न्‍यूज उपलब्‍ध कराना काफी महत्‍वपूर्ण है लेकिन उनकी जरूरतों का ध्‍यान रखना भी एक पत्रकार की जिम्‍मेदारी होती है। यशवंता का कहना था, ‘आप अपनी टीम के प्रति कितने संवेदनशील हो सकते हैं? एक लीडर के रूप में आप कितने संवेदनशील हो सकते हैं? देश के प्रमुख मुद्दों और लोगों के स्‍वभाव को लेकर आपकी समझ क्‍या है?, यह काफी महत्‍वपूर्ण बात है।’

सोशल मीडिया के उदय से बेफिक्री जताते हुए उन्‍होंने इस बात को मानने से इनकार कर दिया कि ब्रॉडकास्‍ट और प्रिंट का अंत होने वाला है। उनका मानना था कि न्‍यूज मीडिया का भविष्‍य इस बात पर बहुत ज्‍यादा निर्भर है कि पत्रकारों को कितनी एडिटोरियल की आजादी है और एडिटोरियल व सेस टीम के बीच किस तरह के रिश्‍ते हैं।

पचौरी का कहना था कि मीडिया को भी ग्‍लोबल ट्रेंड (global trends) अपनाना होगा। उन्‍होंने कहा कि प्रतिष्ठित विदेशी मीडिया ब्रैंड जैसे- ‘The Guardian’, ‘The New York Times’ और ‘New Yorker’ डिजिटल ऑपरेशंस द्वारा अपने ट्रेडिशनल बिजनेस को आगे बढ़ा रहे हैं, घरेलू मीडिया को भी कुछ नया करना चाहिए।

पचौरी ने कहा कि मेनस्‍ट्रीम मीडिया को अपने खर्चो में कटौती करने के लिए महंगे माइक्रोफोन की खरीद के मुकाबले अपने कर्मचारियों पर कैंची नहीं चलानी चाहिए।

पचौरी का कहना था,  ‘आपको नए-नए विचार लेकर आने होंगे ताकि आप पत्रकारिता की लागत को कम कर सकते हैं और तब आपको टीआरपी, मार्केटिंग और एडवर्टाइजमेंट डिपार्टमेंट का पीछा करने की जरूरत नहीं होगी।’ लोगों के उचित प्रशिक्षण की वकालत करते हुए उन्‍होंने कहा, ‘डिजिटल के आने से चीजें बदलने वाली हैं और न्‍यूज टेलिविजन इंडस्‍ट्री से जुड़े सभी लोगों के लिए यह एक चेतावनी है। किसी भी दिन आपके पैरों के नीचे से चादर खिंच सकती है।’

बता दें कि enba अवॉर्ड 2016 ‘जी राजस्थान न्यूज’  द्वारा powered था।

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