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केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को पत्रकार अभिषेक उपाध्याय का करारा जवाब...
केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को पत्रकार अभिषेक उपाध्याय का करारा जवाब...
ट्विटर पर बिहार के शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी द्वारा मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को 'डियर' कहने पर विवाद शुरू हो गया। स्मृति ईरानी ने फेसबुक पेज पर एक लंबा चौड़ा जवाब पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने लिखा कि उनकी परवरिश एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुई जहां लड़कियां हर रोज स्कूल-कॉलेज से सीधे घर आती थी। उन्हें सिखाया जाता था कि राह चलते उन्हें कभी भी लड़
समाचार4मीडिया ब्यूरो
9 years ago
ट्विटर पर बिहार के शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी द्वारा मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को 'डियर' कहने पर विवाद शुरू हो गया। स्मृति ईरानी ने फेसबुक पेज पर एक लंबा चौड़ा जवाब पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने लिखा कि उनकी परवरिश एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुई जहां लड़कियां हर रोज स्कूल-कॉलेज से सीधे घर आती थी। उन्हें सिखाया जाता था कि राह चलते उन्हें कभी भी लड़कों को पलटकर जवाब नहीं देना है क्योंकि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। लोगों को इससे फर्क नहीं पड़ता था कि लड़के, लड़कियों को कितना अपमानित करते थे। सवाल ये है कि लड़कियों को जवाब क्यों नहीं देना चाहिए? लड़कियों को चुप रहने को क्यों कहा जाता है?
स्मृति ने अपने संघर्ष और उपलब्धियों का जिक्र करते हुए लिखा कि लोग मुझे आंटी नेशनल कहिए मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैं आलोचना का सामना करने में विश्वास करती हूं, इससे भागती नहीं। इसी संदर्भ में पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने अपने फेसबुक वाल पर उनके नाम एक खुला खत लिखा है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं:
परम श्रद्धेय स्मृति ईरानी 'जी',
बचपन से डिबेटर रहा हूं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लेकर नेशनल लेवल तक एक उम्र डिबेट करते हुए बिता दी है। हमेशा से ही डिबेट की शुरुआत इन शब्दों में मां सरस्वती को याद करके की है - 'परम श्रद्धेय मां शारदे।'
लीजिए सम्मान का वो चरम आपके नाम के पहले लगा देता हूं। कहीं ये आरोप न लगने पाए कि आपकी शान में गुस्ताखी कर रहा हूं। अब सीधे मुद्दे पर आता हूं। न जाने कौन सी तकलीफ हो गई कि 'डियर' का स्नेह भरा सम्बोधन भी आपको स्त्रीत्व की गरिमा से छेड़छाड़ करता हुआ लगा। आपने स्त्री मुक्ति के मुद्दे पर एक दनदनाता हुआ ब्लॉग दे मारा। अपनी मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि के दर्द के साथ।
मैं हैरान हूं। आपने कभी मध्यमवर्गीय लड़कियां देखी भी हैं क्या? हां वही लड़कियां जो रात के अंधेरों में जब घर की सारी लाइटें बन्द हो जाती हैं। टेबल लैंप की रौशनी में टिगनामेंट्री के equation हल करती हुई नीली बत्ती वाली गाड़ियों के ख्वाब देखती हैं। जो अपने दुपट्टे वाले पल्लू पर हमेशा अपने मां-बाप की उम्मीदों का वजन रखती हैं। जो शाम होते ही जल्दी घर लौटने की जद्दोजहद में बस की अगली सीटों पर झूल जाती हैं। जो बारात में भाइयों को झूमकर नाचता देख बस मनमसोस कर रह जाती हैं। जो हर तीज त्योहार अपने दो पांवो में लाल रंग का आलता लगा परम्परा की क्यारियों में केसर के फूलों सी महक उठती हैं। कॉलेज जाते हुए जिनकी सांसे एक अजनबी डर से तेज हो जाती हैं। जिनका भरी भीड़ में खिलखिलाकर हंसना भी अजनबी घूरती नजरों के नेजे (भाले) पर होता है। हां वही बेचारियां जो सीरियल की सुपरस्टार हिरोइनो में खुद का अक्स तलाशतीं हैं और एक रोज गुमनामियों के जंगलों में खो जाती हैं।
स्त्रीत्व इनके लिए अभिमान होता है, अहंकार नही। जिस दुनिया में चमक-दमक के परदों से निकले लोग अपनी 'इमेज' की खातिर 'छुई-मुई' में तब्दील हो जाते हैं। उसी दुनिया में ये छुई-मुई सी लड़कियां हालातों के काले तूफान के आगे एक रोज चट्टान बन जाती हैं।
परम श्रद्धेय स्मृति ईरानी जी, कभी स्त्री विमर्श पर बात करना हो तो इन लड़कियों के साथ दो रोज जीकर देखिएगा। 'डियर' को मुद्दा बना लेने और खुद को खुद ही 'आंटी नेशनल' लिख डालने से चर्चा तो जबरदस्त होती है पर स्त्री विमर्श नही होता!
सादर
(साभार: फेसबुक वॉल से)
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