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Always-On या Burst Campaign: मार्केटर्स किस रणनीति को दे रहे हैं ज्यादा तवज्जो?
जैसे-जैसे डिजिटल मीडिया पर खर्च बढ़ रहा है और कैंपेन ट्रैकिंग लगभग रियल-टाइम में होने लगी है, मार्केटर्स अब यह सोचने लगे हैं कि क्या पारंपरिक बर्स्ट-आधारित कैंपेन मॉडल आज भी सही है।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 2 hours ago
सुनिधि विजय, कॉरेस्पोंडेंट, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
जैसे-जैसे डिजिटल मीडिया पर खर्च बढ़ रहा है और कैंपेन ट्रैकिंग लगभग रियल-टाइम में होने लगी है, मार्केटर्स अब यह सोचने लगे हैं कि क्या पारंपरिक बर्स्ट-आधारित कैंपेन मॉडल आज भी सही है। कई दशकों तक ब्रैंड अपने मीडिया प्लान छोटे लेकिन हाई-इम्पैक्ट कैंपेन के आधार पर बनाते थे, जो अक्सर त्योहारों, प्रॉडक्ट लॉन्च या किसी खास सीजन में बढ़ने वाली मांग से जुड़े होते थे।
लेकिन अब डिजिटल प्लेटफॉर्म ब्रैंड्स को लगातार प्रदर्शन देखने, चलते-चलते कैंपेन को बेहतर बनाने और उपभोक्ताओं के साथ लंबे समय तक जुड़ाव बनाए रखने की सुविधा देते हैं। इसी वजह से इंडस्ट्री में एक नई बहस शुरू हो गई है- क्या ब्रैंड अब बर्स्ट कैंपेन (Burst Campaign) से हटकर हमेशा चालू रहने वाली (Always-on) मार्केटिंग की ओर बढ़ रहे हैं?
पहले यहां समझ लेते हैं कि 'बर्स्ट कैंपेन' व 'ऑलवेज-ऑन कैंपेन' होता क्या है। दरसलअ, कई कंपनियां त्योहार, प्रॉडक्ट लॉन्च या सीजन के समय ही बड़े विज्ञापन चलाती हैं। इसे ही बर्स्ट कैंपेन कहा जाता है। लेकिन, ऑलवेज-ऑन मार्केटिंग में ब्रैंड साल भर किसी न किसी रूप में एक्टिव रहता है- जैसे सोशल मीडिया पोस्ट, डिजिटल ऐड, कंटेंट, ऑफर या छोटे कैंपेन।
इंडस्ट्री के लीडर्स का कहना है कि यह बदलाव उतना सीधा नहीं है जितना दिखता है। डिजिटल टूल्स ने लगातार मार्केटिंग करना आसान जरूर बना दिया है, लेकिन बर्स्ट कैंपेन और ऑलवेज-ऑन रणनीति के बीच चुनाव अब भी काफी हद तक कैटेगरी की प्रकृति, खरीद के चक्र और मार्केटिंग बजट पर निर्भर करता है।
जिन कैटेगरी में चीजें बार-बार खरीदी जाती हैं, वहां लगातार जुड़ाव बनाए रखना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। लेकिन जिन कैटेगरी में खरीद कम या सिर्फ खास समय पर होती है, वहां हाई-इम्पैक्ट बर्स्ट कैंपेन अब भी बहुत जरूरी हैं।
सीसीएल प्रॉडक्ट्स के सीएमओ राजा चक्रबोर्ती ने कहा कि ऑलवेज-ऑन मार्केटिंग की ओर बढ़ने को सभी इंडस्ट्री में एक जैसा ट्रेंड नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा, “अगर आप एसी बेच रहे हैं, तो ऑलवेज-ऑन अप्रोच का ज्यादा मतलब नहीं बनता। जिन कैटेगरी में चीजें ज्यादा बार खरीदी जाती हैं, वहां हाल ही में दिखे विज्ञापन ज्यादा असर करते हैं। जबकि कम बार खरीदी जाने वाली कैटेगरी ज्यादा बड़े इवेंट्स और कैंपेन बर्स्ट पर निर्भर रहती हैं।”
बेवरेज, पैकेज्ड फूड और रोजमर्रा के FMCG प्रॉडक्ट्स जैसी कैटेगरी में बार-बार ब्रैंड दिखने से लोगों को ब्रैंड याद रहता है और खरीदने की आदत भी बनती है। इसलिए इन कैटेगरी में अक्सर ऐसा मीडिया प्लान बनाया जाता है जिसमें पूरे साल उपभोक्ताओं को ब्रैंड की याद दिलाई जाती रहती है।
लेकिन जिन कैटेगरी में खरीदने का समय लंबा होता है, जैसे कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, ऑटोमोबाइल या एयर कंडीशनर- वहां आम तौर पर खास समय पर जोरदार कैंपेन चलाए जाते हैं। ऐसे मामलों में ब्रैंड अपने कैंपेन को सीजनल डिमांड या बड़े सांस्कृतिक मौकों के साथ जोड़ते हैं, ताकि ज्यादा असर और पहुंच मिल सके।
हालांकि डिजिटल मीडिया ने लगातार जुड़ाव बनाए रखने का मौका दिया है, लेकिन मार्केटर्स का कहना है कि असल में यह रणनीति कितनी संभव है, यह काफी हद तक आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर करता है।
Nobel Hygiene के चीफ मार्केटिंग व ग्रोथ ऑफिसर कार्तिक जौहरी ने बताया कि ऑलवेज-ऑन मार्केटिंग का विचार बजट और क्रिएटिव क्षमता से जुड़ा होता है।
उन्होंने कहा, “अगर आप छोटी कंपनियों या नए स्टार्टअप्स से बात करें, तो वे ऑलवेज-ऑन रहना जरूर चाहते हैं, लेकिन अक्सर उनके पास इतना बजट नहीं होता कि वे इसे लगातार बनाए रख सकें। ऑलवेज-ऑन रहने के लिए मजबूत क्रिएटिव्स चाहिए जो भीड़ में अलग दिखें, और ऐसा बजट चाहिए जिससे आप प्रतिस्पर्धा कर सकें। और यह सब सस्ता नहीं होता।”
कार्तिक जौहरी का कहना है कि व्यवहार में ज्यादातर ब्रैंड आज भी लगातार मौजूद रहने और समय-समय पर बड़े कैंपेन चलाने का मिश्रण अपनाते हैं। पूरे साल एक ही तीव्रता से सक्रिय रहने की बजाय, मार्केटर्स कुछ ऐसे महीनों को चुनते हैं जब उपभोक्ता मांग और प्रॉडक्ट की उपलब्धता दोनों सबसे मजबूत होती हैं।
इसके बाद उन्हीं समयों में मीडिया निवेश बढ़ाया जाता है, जिससे मार्केटिंग कम्युनिकेशन, प्रॉडक्ट की उपलब्धता और उपभोक्ता मांग के बीच बेहतर तालमेल बन सके।
कई सेक्टर्स में आज भी सीजन का प्रभाव मीडिया रणनीति पर साफ दिखता है। उदाहरण के लिए, बेवरेज ब्रैंड्स को गर्मियों में ज्यादा मांग मिलती है, जबकि कुछ हेल्थकेयर और हाइजीन प्रॉडक्ट्स की मांग सर्दियों में बढ़ जाती है।
कार्तिक जौहरी ने कहा कि डिजिटल मीडिया ने जहां कैंपेन जल्दी लॉन्च करना और सांस्कृतिक मौकों पर तुरंत प्रतिक्रिया देना आसान बना दिया है, वहीं अब माहौल पहले से ज्यादा भीड़भाड़ वाला हो गया है। अगर ब्रैंड सिर्फ परफॉर्मेंस-आधारित मैसेजिंग पर निर्भर रहें, तो लंबे समय में वे अपनी ब्रैंड पहचान खो सकते हैं, खासकर अगर वे उपभोक्ताओं के साथ भावनात्मक जुड़ाव नहीं बना पाते।
उन्होंने कहा, “बहुत कम कंपनियां ऐसी हैं जो सिर्फ इसी तरीके पर दो-तीन साल से ज्यादा टिक पाई हों, क्योंकि लंबे समय में ब्रैंड को सिर्फ कन्वर्जन से ज्यादा किसी बड़े मकसद के लिए जाना जाना चाहिए।”
मार्केटर्स के अनुसार, परफॉर्मेंस मार्केटिंग और ब्रैंड-बिल्डिंग के बीच संतुलन बनाना आज की मीडिया रणनीति की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया है।
त्योहारों का महत्व अब भी बरकरार
इसी के साथ भारत में त्योहारों का समय आज भी मार्केटिंग कैलेंडर में बेहद अहम माना जाता है। दिवाली जैसे बड़े सांस्कृतिक मौके कई कैटेगरी में भारी मांग पैदा करते हैं, जिनमें ऑटोमोबाइल, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, फैशन और ज्वेलरी शामिल हैं।
इसी वजह से कई ब्रैंड पूरे साल सक्रिय रहने के बावजूद अपने सबसे बड़े कैंपेन और प्रॉडक्ट लॉन्च त्योहारों के समय ही करते हैं।
MiQ के चीफ कमर्शियल ऑफिसर वरुण मोहन का कहना है कि ऑलवेज-ऑन मार्केटिंग के बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि मांग के इन बड़े मौकों का महत्व कम हो गया है।
उन्होंने कहा, “इसका सीधा हां या ना में जवाब नहीं है, क्योंकि यह काफी हद तक कैटेगरी पर निर्भर करता है। कुछ कैटेगरी में मार्केटिंग काफी हद तक ऑलवेज-ऑन हो गई है। लेकिन त्योहारों के समय बिक्री में अब भी बड़ा उछाल आता है, इसलिए ब्रैंड्स को उन मौकों पर ज्यादा ध्यान देना पड़ता है।”
वरुण मोहन के अनुसार पहले कई ब्रैंड अपने अधिकतर मार्केटिंग प्रयास त्योहारों या खास प्रॉडक्ट लॉन्च के आसपास केंद्रित करते थे। लेकिन आज का मीडिया माहौल ब्रैंड्स को पूरे साल सक्रिय रहने का मौका देता है, जबकि बड़े कैंपेन अब भी उच्च मांग वाले मौकों के लिए रखे जाते हैं।
पिछले कुछ सालों के आंकड़े भी बताते हैं कि त्योहारों के समय खरीदारी का महत्व अब भी बना हुआ है। उदाहरण के लिए, दिवाली के दौरान ऑटोमोबाइल, रिटेल और लाइफस्टाइल ब्रैंड्स में लगातार मजबूत बिक्री देखी जाती है।
इसके साथ ही उपभोक्ताओं के व्यवहार में हो रहे बड़े बदलाव भी ब्रैंड्स को पारंपरिक कैंपेन समय से बाहर भी दिखाई देने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
आज के उपभोक्ता पहले के मुकाबले ज्यादा बार और ज्यादा मौकों पर खरीदारी कर रहे हैं। जो कैटेगरी पहले सिर्फ त्योहारों या खास अवसरों से जुड़ी होती थीं, उनमें अब पूरे साल मांग देखने को मिल रही है।
वरुण मोहन का कहना है कि यह बदलाव सिर्फ डिजिटल मीडिया की वजह से नहीं है, बल्कि जीवनशैली और खर्च करने के तरीके में आए बदलाव का भी नतीजा है।
उन्होंने बताया कि पहले कपड़ों जैसी कैटेगरी की खरीद अक्सर शादी, त्योहार या पारिवारिक समारोहों से जुड़ी होती थी। लेकिन अब उपभोक्ता ज्यादा बार खरीदारी कर रहे हैं, क्योंकि रिटेल चैनलों तक पहुंच आसान हो गई है और खरीदने के विकल्प भी बढ़ गए हैं।
ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स, इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग और सोशल कॉमर्स के बढ़ने से भी खरीदारी के मौके बढ़ गए हैं। रिटेलर्स अब पूरे साल कई सेल इवेंट चलाते हैं, जिससे उपभोक्ता त्योहारों का इंतजार करने की बजाय बार-बार खरीदारी करने लगते हैं।
इन्फ्लुएंसर्स और डिजिटल क्रिएटर्स ने भी फैशन, ब्यूटी, लाइफस्टाइल और रोजमर्रा के प्रॉडक्ट्स में नए ट्रेंड बनाकर इस बदलाव को और बढ़ावा दिया है।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन बदलावों ने ब्रैंड्स को पुराने सख्त कैंपेन चक्रों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है, जो पहले मार्केटिंग रणनीतियों की पहचान हुआ करते थे।
हाइब्रिड मॉडल
इंडस्ट्री एक्पर्ट्स का यह भी कहना है कि अब कई मार्केटर्स अलग-अलग समय पर चलने वाले कैंपेन की बजाय लेयर्ड रणनीति अपना रहे हैं। इसमें पूरे साल एक बेस लेवल पर लगातार जुड़ाव बनाए रखा जाता है और खास मौकों पर बड़े कैंपेन चलाए जाते हैं।
इसका नतीजा एक हाइब्रिड मॉडल के रूप में सामने आ रहा है, जिसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लगातार मौजूदगी ब्रैंड को लोगों के बीच प्रासंगिक बनाए रखती है, जबकि त्योहारों, खेल आयोजनों और प्रॉडक्ट लॉन्च के दौरान बड़े कैंपेन ज्यादा पहुंच और बिक्री की रफ्तार बढ़ाते हैं।
जैसे-जैसे डिजिटल मापन उपकरण और ज्यादा उन्नत हो रहे हैं और उपभोक्ताओं की मीडिया यात्रा कई प्लेटफॉर्म्स में बंटती जा रही है, मार्केटर्स का मानना है कि यह हाइब्रिड तरीका आगे और विकसित होगा।
बर्स्ट कैंपेन पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं है। बल्कि वे लगातार जुड़ाव वाली रणनीतियों के साथ मिलकर काम करेंगे, जिससे ब्रैंड उपभोक्ताओं के रोजमर्रा के मीडिया माहौल का हिस्सा बने रह सकें।
इस बदलाव के दौर में मार्केटर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे लगातार मौजूदगी और प्रभावशाली कैंपेन बर्स्ट के बीच सही संतुलन कैसे बनाएं—और यह संतुलन हर कैटेगरी, बजट और उपभोक्ता व्यवहार के हिसाब से अलग-अलग होगा।
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