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वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर कहिन: जानिए मै आपको यह करुण कथा क्यों याद दिला रहा हूं?
<p style="text-align: justify;">'इंसानी फितरत गुजरी दुश्वारियों को भूलकर अगले उन्माद की ओर बढ़ चलने की अभ्यस्त है। इसीलिए कुछ लोग जंग के तराने छेड़ते हैं और अवाम उसका खामियाजा उठाता है।' हिंदी दैनिक अखबार हिन्दुस्तान में अपने आलेख के जरिए ये कहना है <strong>वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दुस्तान अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर</strong> का। हिंदी पत्रकारिता पर
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
'इंसानी फितरत गुजरी दुश्वारियों को भूलकर अगले उन्माद की ओर बढ़ चलने की अभ्यस्त है। इसीलिए कुछ लोग जंग के तराने छेड़ते हैं और अवाम उसका खामियाजा उठाता है।' हिंदी दैनिक अखबार हिन्दुस्तान में अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दुस्तान अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर का। हिंदी पत्रकारिता पर उनका ये आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
निरर्थक बहस हमारी नियति नहीं
क्या आपको ‘लिटिल ब्वॉय’ और ‘फैट मैन’ याद हैं? ये किसी ‘कॉमिक बुक’ के पात्र नहीं, बल्कि उन परमाणु बमों के नाम हैं, जिन्होंने अगस्त, 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी में इंसानी इतिहास की सबसे बड़ी तबाही रची थी। इनके प्रहार से लगभग सवा लाख लोग मारे गए और लाखों घायल हुए। बरसों तक विस्फोट से उत्पन्न ‘रेडिएशन’ लोगों को तरह-तरह से लीलता रहा। उस हमले के घाव आज तक जापान के लोगों को टीस देते हैं।
मैं आपको यह करुण कथा क्यों याद दिला रहा हूं? वजह साफ है। आजकल हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में जंग के अलाव भभकाने की कोशिश की जा रही है। ऐसा करने वाले भूल गए हैं कि युद्ध इंसानियत के लिए हमेशा त्रासद साबित हुए हैं। इनमें न केवल सैनिक मारे जाते हैं और उनके परिवार तबाह होते हैं, बल्कि आम आदमी को भी लंबे समय तक खामियाजा भुगतना पड़ता है। कैसे? भारत ने पहली लड़ाई चीन से 1962 में लड़ी थी। अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज के मुताबिक, उस जंग के बाद भारत की अर्थव्यवस्था महज दो फीसदी की रफ्तार से घिसट रही थी। उस युद्ध से उपजे घावों को भारत ठीक से सहला नहीं पाया था कि पाकिस्तान ने 1965 में हम पर जंग थोप दी। परिणाम? हिन्दुस्तानी विकास दर 3.7 फीसदी तक नकारात्मक हो गई। इसी तरह, 1971 में ‘बांग्लादेश मुक्ति संग्राम’ में हिस्सेदारी भले ही पाकिस्तान के दो फाड़ करने में कामयाब हो गई हो, पर हमारी बढ़ोतरी की रफ्तार 0.9 फीसदी के सिहरन भरे आंकड़े तक फिसल चुकी थी।
कारगिल की जंग पर आते हैं। 1999 में अरबों रुपये उलीचने के बाद ‘ऑपरेशन विजय’ अंजाम पर पहुंचा, पर खर्च का सिलसिला नहीं थमा। संसद पर हुए आतंकवादी हमले के बाद वाजपेयी सरकार ने एहतियातन नौ महीने तक सात लाख भारतीय सैनिकों को सीमाओं पर तैनात रखा। पाकिस्तान ने भी ऐसा ही किया। ‘स्ट्रैटेजिक फोरसाइट ग्रुप’ के एक अध्ययन के अनुसार, भारत ने दिसंबर 2001 से जनवरी 2002 के बीच महज एक महीने में इस सरंजाम पर 40 अरब रुपये खर्च किए, तो पाकिस्तान ने 42 अरब रुपये का मुद्रा भंडार इस तामझाम पर न्योछावर कर दिया था। उन दिनों मैं एक राष्ट्रीय चैनल का संपादक था। वस्तुस्थिति जानने की नीयत से मैंने एक शाम जम्मू से सटी सीमा पर बिताई। उन दिनों लगभग हर रात एक-दूसरे पर निरर्थक गोलाबारी की जाती और सैनिकों का तनाव चरम पर जा पहुंचता। दोनों ओर के तोपची नहीं जानते थे कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? उन्हें हुक्म देने वाले यह समझाने में असमर्थ थे कि वे ऐसा क्यों करवा रहे हैं!
उस रात निरर्थक गोलाबारी से कोई सैनिक तो हताहत नहीं हुआ, पर दो निर्दोष नागरिक जरूर खेत रहे। युद्ध के हालात में सीमावर्ती गांव खाली करा लिए जाते हैं, पर किसान दिन में कृषि कार्य के लिए आते-जाते रहते हैं। उस शाम एक बाप-बेटी को खेतों पर काम करते देर हो गई थी। उन्होंने रात घर में गुजारने का फैसला किया। वे नहीं जानते थे कि यह निर्णय मौत से अनकहा-अनसुना अनुबंध है। देर रात एक पाकिस्तानी बम उनके घर आ गिरा। उन्हें जान की गुहार लगाने का मौका तक नहीं मिला। वे क्यों मारे गए? उनका कसूर क्या था? उनकी मौत पर किसी नामवर ने अफसोस तक जाहिर नहीं किया। ऐसे लोगों के बलिदान को शहादत का दर्जा नहीं दिया जाता। हमारे राजनेताओं को आम आदमी की त्रासदी दिखाई नहीं देती। वे उन्माद फैलाते हैं, हम शिकार होते हैं।
मुझे सीमा पर बिताए उन चंद घंटों के दौरान एहसास हो गया था कि लड़ाई का इंतजार कितना मारक, थकाऊ और खर्चीला होता है!
खर्च पर याद आया। भारत ने कारगिल झड़प के बाद दो वित्तीय वर्ष सभी करदाताओं से पांच फीसदी सुरक्षा सरचार्ज वसूला। उधर, पाकिस्तान ने अपने बंदरगाहों का इस्तेमाल करने वाले जहाजियों और बीमा कंपनियों से बड़े पैमाने पर ‘वॉर रिस्क सरचार्ज’ उगाहा। दोनों देशों की विकास दर लंगड़ा गई और रक्षा खर्च में अनाप-शनाप बढ़ोतरी करनी पड़ी। पाकिस्तान ने अपनी कुल जीडीपी का 24 फीसदी तक हिस्सा रक्षा संसाधन जुटाने पर खर्च किया, जबकि भारत ने 15 प्रतिशत। इसके बावजूद बड़बोले रक्षा विशेषज्ञ इसे नाकाफी बताते रहे। पता नहीं, उनकी नजर बदहाल स्कूलों, अस्पतालों और अवाम पर क्यों नहीं गई?
बात-बेबात युद्ध राग अलापने वाले लोग इस सच को बिसरा देते हैं कि दोनों मुल्कों को जंग नहीं, बल्कि इमदाद की रोशनी चाहिए।
इससे जुड़ी एक और बात। उरी हमले पर भारत की जवाबी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद हिन्दुस्तान में अनोखी, पर घातक प्रवृत्ति दिखाई दी। सैनिक कार्रवाई पर सवाल उठाए गए, उसे सियासी दलदल में घसीटने की कोशिश की गई। संसार के सबसे बडे़ लोकतंत्र के राजनेताओं की यह अपरिपक्वता स्तब्ध कर देने वाली थी। कुछ मीडिया संस्थानों ने इस आत्मघाती लपट में घी डालने की कोशिश की। पाक प्रधानमंत्री और कमांडर इन चीफ जब युद्धमुद्रा में बैठे थे, तब तमाम दलों के सूरमा कीचड़ की होली खेल रहे थे। ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद रचा गया यह शाब्दिक महाभारत लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है।
हमारे शब्दवीर क्या यह नहीं जानते कि सैनिकों की भावनाएं आहत होकर कभी-कभी उन्हें गलत कदम उठाने के लिए मजबूर कर देती हैं?
एक आंखों-देखा उदाहरण। ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के बाद रामगढ़ छावनी में कुछ लोगों ने ऐसी अफवाहें उड़ा दीं, जिनसे सिख सैनिकों का बड़ा तबका आहत हो गया। उन्होंने अपने सर्वोच्च अधिकारी ब्रिगेडियर जनरल आर एस पुरी की हत्या कर दी। राह चलते निजी ट्रकों-बसों पर कब्जा जमाया और लगभग बारह सौ किलोमीटर दूर स्थित दिल्ली की ओर चल पड़े। दो दिन बाद इलाहाबाद के गंगा तट पर भारतीय फौज के दस्तों ने रोका, तो उन्होंने बिना किसी संघर्ष के हथियार डाल दिए। क्यों?
शास्त्रीपुल के पास स्थित एक मैदान में घुटनों के बल बैठे हुए वे विद्रोही जैसे आत्मग्लानि के दावानल में झुलस रहे थे। उनके सिर झुके हुए थे। वह वक्त उनके लिए सजा-ए-मौत से भी ज्यादा कठोर था। भारतीय फौजी जांबाज होता है, बगावती नहीं। हमारा हर सैनिक अपना नाम बलिदानियों की सूची में दर्ज कराना चाहता है। भगोड़ों और विद्रोहियों से उसे नफरत होती है। अपनी भूल का एहसास उनको अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। जब कभी वह लम्हा मेरे दिमाग में कौंधता है, तो मन में प्रार्थना उभरती है, ईश्वर! ऐसे मंजर दोबारा मत दिखाना। वे दिन फौज और गणतंत्र की गरिमा को कलंकित करने वाले थे।
पर करें क्या? इंसानी फितरत गुजरी दुश्वारियों को भूलकर अगले उन्माद की ओर बढ़ चलने की अभ्यस्त है। इसीलिए कुछ लोग जंग के तराने छेड़ते हैं और अवाम उसका खामियाजा उठाता है।
इस बार ऐसा न हो, इसके लिए जरूरी है कि आमजन उन्माद से बचें और सरकार को अपना काम करने दें। हमारी फौज ने 29 सितंबर को पाक पोषित आतंकियों को घुसकर मारा, जरूरत हुई तो फिर मारेंगे। सैनिक कार्रवाई और सैनिकों पर बेमतलब की बहसबाजी करने वालों को बता दूं, ‘फैट मैन’ और ‘लिटिल ब्वॉय’ आज के परमाणु हथियारों के मुकाबले बहुत कम घातक थे। खुदा न ख्वास्ता कभी परमाणु युद्ध हुआ, तो मालूम नहीं कि उसकी गाथा कहने और सुनने को कितने लोग बचेंगे?
(साभार: दैनिक 'हिन्दुस्तान')
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