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बिहार में नई राजनीति की असली परीक्षा: आलोक मेहता

आर्थिक स्तर पर कई गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा शराबबंदी की नीति का भविष्य और राज्य की आर्थिक प्रगति की गति को बनाए रखना होगा।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 hours ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

करीब बीस वर्षों तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहने के बाद जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि राज्य के सामने अब असली चुनौतियां क्या होंगी। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी की सरकार को तत्काल कोई बड़ा खतरा दिखाई नहीं देता।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ पिछले वर्षों में बने राजनीतिक तालमेल के कारण केंद्र और राज्य के संबंधों में भी किसी बड़े टकराव की संभावना कम है। लेकिन राजनीतिक स्थिरता के बावजूद बिहार के सामने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर कई गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा शराबबंदी की नीति का भविष्य और राज्य की आर्थिक प्रगति की गति को बनाए रखना होगा।

शराबबंदी: सामाजिक सुधार का बड़ा प्रयोग

नीतीश कुमार द्वारा 2016 में लागू की गई पूर्ण शराबबंदी नीति भारत की सबसे चर्चित सामाजिक-राजनीतिक पहलों में से एक रही है। इस नीति का उद्देश्य केवल शराब की बिक्री पर रोक लगाना नहीं था, बल्कि घरेलू हिंसा, गरीबी, सामाजिक तनाव और अपराध जैसी समस्याओं को कम करना भी था। बिहार विधानसभा चुनाव 2015 के दौरान महिलाओं के बीच शराब के खिलाफ मजबूत जनभावना उभरी थी।

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं ने खुलकर शिकायत की थी कि शराब के कारण परिवार की आय बर्बाद होती है और घरेलू हिंसा बढ़ती है। इसी सामाजिक दबाव और चुनावी वादे के आधार पर 5 अप्रैल 2016 को बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई। इसके लिए बिहार मद्यनिषेध एवं उत्पाद अधिनियम 2016 बनाया गया, जिसके तहत शराब के निर्माण, बिक्री, भंडारण और सेवन को अपराध घोषित कर दिया गया।

सामाजिक प्रभाव और जन समर्थन

शराबबंदी लागू होने के बाद इसके कई सामाजिक प्रभाव सामने आए। विशेष रूप से महिलाओं के बीच इस नीति को व्यापक समर्थन मिला। अनेक गांवों में महिलाओं ने बताया कि शराबबंदी के बाद परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। पहले मजदूर वर्ग की आय का बड़ा हिस्सा शराब पर खर्च हो जाता था, लेकिन प्रतिबंध के बाद कई परिवारों ने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और घरेलू जरूरतों पर अधिक खर्च करना शुरू किया।

महिला स्वयं सहायता समूहों ने भी शराबबंदी को लागू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने की घटनाओं में कमी आई और कई क्षेत्रों में नशे से जुड़े झगड़ों में भी कमी देखी गई। इन सामाजिक परिवर्तनों ने बिहार की राजनीति में महिला मतदाताओं की भूमिका को और मजबूत किया और नीतीश कुमार की लोकप्रियता में भी वृद्धि हुई।

आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियां

हालांकि शराबबंदी से सामाजिक लाभ की चर्चा होती है, लेकिन इसके साथ कई आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियां भी सामने आईं। शराबबंदी लागू होने से पहले बिहार सरकार को शराब से लगभग चार से पांच हजार करोड़ रुपये का वार्षिक राजस्व मिलता था, जो बंद हो गया। इसके अलावा सबसे बड़ी चुनौती अवैध शराब तस्करी की रही है। बिहार की सीमाएं उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से लगती हैं, जिससे तस्करी को रोकना कठिन हो जाता है।

नेपाल की खुली सीमा भी इस समस्या को बढ़ाती है। कई स्थानों पर अवैध शराब के नेटवर्क सक्रिय पाए गए। इसके अलावा जहरीली शराब की घटनाओं ने भी इस नीति पर गंभीर सवाल खड़े किए। हजारों लोगों की गिरफ्तारी और अदालतों में बढ़ते मामलों के कारण न्यायिक और प्रशासनिक दबाव भी बढ़ा। बाद में सरकार को कानून में संशोधन कर कुछ प्रावधानों को नरम करना पड़ा।

आर्थिक विकास की दिशा

नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार की अर्थव्यवस्था में भी पिछले दो दशकों में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले हैं। वर्ष 2005 में जब उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाला, तब बिहार को देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिना जाता था। खराब कानून व्यवस्था, कमजोर बुनियादी ढांचा और उद्योगों की कमी राज्य की प्रमुख समस्याएं थीं। इसके बाद सरकार ने सड़क, पुल और बिजली जैसी आधारभूत सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया।

हजारों किलोमीटर सड़कों का निर्माण हुआ और बिजली आपूर्ति में सुधार हुआ। इससे गांवों और शहरों के बीच संपर्क बढ़ा और आर्थिक गतिविधियों को गति मिली। राज्य सरकार ने औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई नीतियां लागू कीं और कृषि आधारित उद्योगों, विशेषकर डेयरी और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को प्रोत्साहन दिया। छोटे और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए भी कई योजनाएं शुरू की गईं, जिनसे रोजगार के नए अवसर बने।

लालू राज से नीतीश राज तक

बिहार की राजनीति में पिछले तीन दशकों में दो प्रमुख दौर रहे हैं-लालू प्रसाद यादव का दौर और नीतीश कुमार का दौर। 1990 से 2005 के बीच के समय को अक्सर आलोचक “जंगलराज” के रूप में याद करते हैं, जब अपहरण और अपराध की घटनाओं को लेकर व्यापक चर्चा होती थी। इसके विपरीत 2005 के बाद नीतीश कुमार ने कानून-व्यवस्था सुधार को प्राथमिकता दी।

विशेष अदालतों के माध्यम से अपराधियों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई की गई और पुलिस व्यवस्था को मजबूत किया गया। इससे राज्य की छवि में कुछ हद तक सुधार हुआ और निवेश का माहौल बेहतर हुआ। भ्रष्टाचार के खिलाफ भी कुछ सख्त कदम उठाए गए, जिनमें अधिकारियों की संपत्ति जब्त करने जैसी कार्रवाई शामिल थी।

अब जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं, तो बिहार के लिए नई राजनीतिक परिस्थितियां बन रही हैं। राज्य की राजनीति में उनका प्रभाव अचानक समाप्त नहीं होगा, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रहते हुए भी कई नेताओं ने अपने राज्यों में प्रभाव बनाए रखा है। लेकिन आने वाले समय में बिहार की सरकार के सामने दोहरी चुनौती होगी।

एक ओर शराबबंदी जैसी सामाजिक नीति को प्रभावी बनाए रखना और दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति को तेज करना। यदि सरकार अवैध शराब के नेटवर्क पर नियंत्रण और औद्योगिक निवेश को बढ़ाने में सफल होती है, तो बिहार आने वाले वर्षों में विकास के नए चरण में प्रवेश कर सकता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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