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अटल बिहारी वाजपेयी और मोदी में कैसे है दिन-रात का फर्क, बताया वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास ने
‘वाजपेयी-आडवाणी खामोख्याली में अधिक रहे वहीं नरेंद्र मोदी-अमित शाह पल–पल इस चिंता में रहते हैं कि चुनाव की अगली परीक्षा कैसे पास करनी है’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हरिशंकर व्यास का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘वाजपेयी-आडवाणी खामोख्याली में अधिक रहे वहीं नरेंद्र मोदी-अमित शाह पल–पल इस चिंता में रहते हैं कि चुनाव की अगली परीक्षा कैसे पास करनी है’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हरिशंकर व्यास का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
वाजपेयी व मोदी के फर्क में दिन-रात!
मुझे यह विचार टीवी चैनलों पर सुधींद्र कुलकर्णी का चेहरा देख, उनको सुन कर आया। ध्यान रहे वे वाजपेयी राज में पीएमओ का चेहरा थे। सो याद हो आया कि वाजपेयी ने आपरेशन पराक्रम, कारगिल, सेना को सीमा पर तैनात करा आर-पार की लड़ाई के कई हुंकारे मारे थे। मगर वैसी वाह नहीं हुई जैसी इस 29 सितंबर 2016 को नरेंद्र मोदी की हुई है? क्यों? एक तो पाकिस्तान में, उसके कब्जे वाले कश्मीर में घुस कर भारतीय सेना से मारक हमला करवाने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। संसद पर हमले पर भी नहीं। यह ध्यान रहे कि कारगिल की लड़ाई में भी भारत के सैनिक पाकिस्तान नियंत्रित इलाके में नहीं घुसे थे। भारतीय सेना की लड़ाई अपनी ही सीमा में थी। उस नाते भारत ने, मोदी सरकार ने पहली बार, दो टूक शब्दों में अपनी यह नीति, अपना यह सिद्धांत 29 सिंतबर को घोषित किया है कि वह आ रहे आतंकियों, या भारत केंद्रित आतंकी कैंपों पर पाकिस्तान में घुस कर हमले का अधिकार रखता है।
उस नाते नरेंद्र मोदी और उनके सेटअप की हिम्मत, कामयाबी अटलबिहारी वाजपेयी के वक्त और उनके सेटअप से अधिक दमदार प्रमाणित हुई है। वजह कई हैं। पहली वजह अमित शाह की राजनैतिक सलाह है। आईना दिखाने की हिम्मत है। हां, मैं मानता हूं कि लालकृष्ण आडवाणी भी तब वाजपेयी को ऐसी हिम्मती कार्रवाई की सलाह नहीं दे सकते थे। वाजपेयी के इर्द-गिर्द जसवंतसिंह, जार्ज फर्नांडिज आदि सब शाईनिंग इंडिया देखने और उससे चुनाव जीत लेने के मुगालते में रहे। मगर अमित शाह और नरेंद्र मोदी एक तरफ खुद कोर वोटों के मनोविज्ञान के पारखी हैं तो इसके साथ में ये ज्यादा खांटी हिंदू राष्ट्रवादी घुट्टी लिए हुए भी हैं।
दूसरी वजह नरेंद्र मोदी के इर्दगिर्द निराकार या सख्त नीति के पैरौकारों का होना है। अटलबिहारी वाजपेयी के वक्त पंचायत या इधर-उधर के प्रपंची अधिक थे। सुधींद्र कुलकर्णी जैसे वामपंथी- नेहरू के आईडिया ऑफ इंडिया में रमे जब वाजपेयी के प्रधानमंत्री दफ्तर में कुर्सी पाए हुए थे, उनके भाषण लिखने, उन्हें विचार देने के काम में थे तो संयम की बात अपने आप हावी थी। ऐसे ही प्रमुख सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र कई मामलों में बेजोड़ थे बावजूद इसके वे उस विदेश मंत्रालय की बैकग्राउंड वाले अफसर थे जो कूटनीति में ज्यादा विश्वास रखता है। वहीं आज उनकी जगह अजीत डोभाल पुलिसिया-जासूस बैकग्राउंड वाले हैं तो उसका भी असर अपने आप बनेगा।
मोटी और प्राथमिक बात राजनैतिक लीडरशीप और देश के मनोविज्ञान को समझने का उसका सामर्थ्य है। वाजपेयी-आडवाणी खामोख्याली में अधिक रहे वहीं नरेंद्र मोदी-अमित शाह पल–पल इस चिंता में रहते हैं कि चुनाव की अगली परीक्षा कैसे पास करनी है। लोगों की नब्ज क्या कह रही है?
वैसे फर्क का एक कारण वक्त भी है। सन् 2000 और सन्ा 2016 की दुनिया का फर्क भी दिन-रात का है। आज दुनिया में पाकिस्तान जितना बदनाम है सन् 2000 में नहीं था। दुनिया में आज इस्लाम और इस्लामी उग्रवाद के जितने ठिकाने हैं उन्हें खत्म करने की वैश्विक राय बनी हुई है। फिर भारत ने पाकिस्तान के उग्रवादियों, जिया उल हक के छाया युद्ध की पीड़ा को लगातार पिछले तीस सालों से प्रचारित किया है उससे पाकिस्तान के खिलाफ भारत की कार्रवाई अपने आप न्यायोचित बनी हुई है। आज पूरी दुनिया चाहती है कि पाकिस्तान की ठुकाई हो, उसे चिंता सिर्फ यह है कि ठुकाई ऐसे कायदे से हो जिसके सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। इस मामले में दुनिया और खास कर अमेरिका, पश्चिमी देशों के लिए नरेंद्र मोदी उम्मीदों के नायक हैं सो उनको आज जैसा समर्थन है वह वाजपेयी को नहीं था।
सो दिन-रात के फर्क के कई कारण, कई कारक हैं। चाहे तो कह सकते हैं नरेंद्र मोदी-अमित शाह भाग्य के धनी हैं!
(साभार: नया इंडिया)
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