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यही तो कमाल है लोहिया के लंबरदार 'नेताजी' का: अनुरंझन झा, वरिष्ठ पत्रकार

अनुरंझन झा वरिष्ठ पत्रकार ।। उत्तर प्रदेश का चुनाव इतना दिलचस्प पहले शायद ही कभी हुआ हो। प्रदेश में दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां पिछले तीन दशकों से अपना खम ठोकती रही हैं, बीजेपी और कांग्रेस बीच बीच में अपनी भूमि

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

अनुरंझन झा

वरिष्ठ पत्रकार ।।

उत्तर प्रदेश का चुनाव इतना दिलचस्प पहले शायद ही कभी हुआ हो। प्रदेश में दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां पिछले तीन दशकों से अपना खम ठोकती रही हैं, बीजेपी और कांग्रेस बीच बीच में अपनी भूमिका सत्ता में और सत्ता के बाहर भी निभाती रही है।

2012  में मायावती के शासन के पांच साल पूरे होने पर उनके जाने के आसार तो दिख रहे थे लेकिन अखिलेश इतनी बड़ी संख्या में सीटें जीतकर सत्ता पर काबिज होंगे इसका अदांजा पोल पंडित भी नहीं लगा पा रहे थे। युवा अखिलेश अपने नेताजी पिताजी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री बने। पांच सालों में अखिलेश के कामकाज के ब्यौरे पर जनता चुनाव में फैसला करेगी, और करना चाहिए। लेकिन इस परिवार के सियासी ड्रामे ने पूरे देश की नजर उत्तर प्रदेश पर टिका दी है।

अक्सर देखा गया है कि चुनावी प्रदेश में विपक्षी पार्टियां एक दूसरे पर आरोप लगाती है और वो मीडिया की सुर्खियां बनती है। लेकिन इस बार यूपी में ऐसा कुछ नहीं घट रहा है। दूसरी छोटी-बड़ी सभी पार्टियों को सुर्खियों में बने रहने के लिए, मीडिया की नजर में टिके रहने के लिए और जनता के जेहन में कुलबुलाते रहने के लिए कुछ न कुछ जुगत जुगाड़ करना पड़ रहा है। दरअसल सारी सुर्खियां सत्ताधारी परिवार और उनकी पार्टी ही बटोर ले जा रही है।

पिछले एक महीने में तेजी से बदले घटनाक्रम ने तो सारा का सारा ध्यान उत्तर प्रदेश की इस सियासी परिवार की तरफ घुमा दिया है। एक के बाद एक बयान कभी समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह के, कभी उनके भाई शिवपाल यादव के, कभी दूसरे भाई रामगोपाल यादव के तो कभी मुख्यमंत्री पुत्र अखिलेश यादव के। रही सही कसर उनकी पार्टी के दूसरे नेता जैसे बड़बोले आजम खान और तीखे तीर छोड़ने वाले अमर सिंह पूरी कर देते हैं।

हाल की घटनाएं हम सभी को याद है जिसमें एक बाद एक फैसले मुख्यमंत्री पुत्र लेते गए और सुप्रीमो पिताजी उसे पलटते गए। सारी कवायद चाचा की चाल को नाकाम करने के लिए था। लोगों के पिताजी, पिताजी होते हैं यहां अखिलेश यादव के पिताजी नेताजी हैं , मुख्यमंत्री पुत्र भी उन्हें उसी नाम से बुलाते हैं। जाहिर है जब पिताजी नेताजी हों तो फैसले पिताजी के न होकर नेताजी के होंगे और नेताजी क्यूंकि पिताजी हैं इसलिए विरासत का रास्ता भी साफ है। ऐसे में चाचाजी का चौकन्ना रहना भी लाजिमी हैं, चाचाजी कहते हैं वो नेताजी के साथ राजनीति में आरंभ से ही हैं, उनके कपड़े भी धोए हैं और उनको पानी भी पिलाया है। अब भी पानी पिला रहे हैं और यह तो हम सब की आंखों के सामने है इसलिए उनकी इस बात पर यकीन भी करना चाहिए। पहले भैयाजी, नेताजी थे अब नेताजी, पिताजी है इसलिए शिवपाल यादव अब नेताजी के कपड़े नहीं धोते, उनके बेटे को ही धोने के प्रयास में रहते हैं।

नेताजी कहते हैं चुनाव बाद तय होगा कि प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन होगा, पार्टी के विधायक फैसला करेंगे। मुख्यमंत्री पुत्र कहते हैं यूपी की जनता तय करेगी कौन बनेगा मुख्यमंत्री, वैसे नेताजी अनुभवी हैं जो कहा होगा ठीक ही कहा होगा। चाचाजी कहते हैं कुछ लोगों को विरासत में सब कुछ मिल जाता है। चाचाजी यहीं नहीं रुकते साथ ही जोड़ते हैं कि हमने नेताजी के कपड़े भी धोए हैं। नेताजी मुख्यमंत्री को बंद कमरे में क्या कहते होंगे नहीं मालूम लेकिन सरेआम बेटे की तरह ही डपटते हैं, कभी मुख्यमंत्री की तरह नहीं आंकते। हमें इस संदेश को समझना चाहिए।

जब आपको हमको यह लगता है कि नेताजी, नेताजी हैं तो वो पिताजी बन जाते हैं और जब आपको यह लगता है नेताजी, भैयाजी हैं तो वो नेताजी बन जाते हैं। यही तो कमाल है लोहिया के लंबरदार नेताजी का। जब हमें लगता है कि मुख्यमंत्री की बातों को काटकर नेताजी ने चाचाजी को तवज्जो दी है हम वहीं गच्चा खा जाते हैं क्योंकि वह नेताजी हैं। नेताजी मुख्यमंत्री की बातों को नहीं काटते, नेताजी बेटे की बातों को काटते हैं और पिताजी तो उनका ही खयाल रखेंगे, आज जब मुख्यमंत्री पुत्र को डांट मिल रही हो तो बेटा तो निश्चिंत है कल मौका मिला तो कुर्सी भी मिलेगी, क्योंकि नेताजी तो पिताजी हैं।

(साभार: मीडिया सरकार)

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