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वरिष्ठ पत्रकार निर्मलेंदु की शोभा डे को खरी-खरी, बोले-पशु माफी नहीं मान सकता लेकिन इंसान...

निर्मलेंदु कार्यकारी संपादक, दैनिक राष्ट्रीय उजाला ।। शोभा जी आपने 19 तारीख को लिखा कि माफी मांगने की नौटंकी नहीं कर सकतीं। आपके इस जवाब से ऐसा लगता है कि ज

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

निर्मलेंदु

कार्यकारी संपादक,

दैनिक राष्ट्रीय उजाला ।।

शोभा जी आपने 19 तारीख को लिखा कि माफी मांगने की नौटंकी नहीं कर सकतीं। आपके इस जवाब से ऐसा लगता है कि जो लोग माफी मांगते हैं, वे नौटंकी करते हैं। वैसे, आप सही कह रही हैं कि आपको माफी नहीं मांगनी चाहिए, क्योंकि माफी तब मांगी जाती है, जब किसी को अपनी गलती का अहसास हो। लेकिन आपको अपनी गलती का लगता है कि अहसास ही नहीं है। इसका मतलब यही हुआ कि जो हमें बचपन से पढ़ाया जाता है, वह गलत है। हमारे बड़े-बुजुर्ग गलत हैं। तहजीब गलत है। शिक्षा गलत है। सभ्यता गलत है। भारतीय संस्कार गलत है। इतना अहंकार क्यों? माफी मांगना तो भारत की परंपरा है।

यहां पढ़ें: वरिष्ठ पत्रकार निर्मलेंदु ने मशहूर लेखिका शोभा डे को यू दिखाया आइना…

दरअसल, मनुष्य और अन्य प्राणियों में तो आहार, निद्रा, भय और मैथुन एक समान ही हैं, लेकिन ईश्वर ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में बुद्धि केवल और केवल मनुष्य को ही विशेष रूप से दी है। इसीलिए पशु माफी नहीं मांग सकते, लेकिन इंसान गलती करने पर माफी तो मांग ही सकते हैं। प्रभु की बनाई हुई इस बेजोड़ शक्ति से ही मानव संसार के ऊपर राज कर रहा है, बल्कि यदि यह कहें कि राज करता रहेगा, तो शायद गलत नहीं होगा। मेरी समझ से मानव कहलाने के लिए हमारे अंदर निम्न चार गुण होने चाहिए और वे हैं- विनम्रता, कृतज्ञता, गलती का अहसास, सहिष्णुता, जो कि हम सभी में होनी चाहिए।

खासकर एक लेखक को नम्र, और गलती करने पर उसका अहसास होना चाहिए। लेखक एक शिक्षक है, वह दूसरों को सिखाता है, पढ़ाता है, दुनिया के बारे में बताता है, भले-बुरे का बोध कराता है। लेखक का काम है, गलत को गलत और सही को सही बताना। लेकिन यदि हम खुद गलत हैं, तो हम दूसरों को गलत कैसे बता सकते हैं। हमें राजेश खन्ना की एक फिल्म का एक हिट गाना याद आ गया। फिल्म है रोटी।

यार हमारी बात सुनो, ऐसा एक इंसान चुनो

जिसने पाप न किया हो, जो पापी न हो।

मतलब यह है कि ऐसा कोई इंसान नहीं है, जिसने गलती न की हो। हम आप एयरकंडीशन में बैठ कर लिखते हैं। कभी-कभी जाने अनजाने में गलत भी लिख देते हैं। टिप्पणी करना बहुत आसान काम है, लेकिन सही कर्म का निष्पादन करना, कठिन काम है, जो कि हम नहीं करते। यह भी एक कटु सच है कि कभी-कभी तो बिना स्पॉट में जाकर ही हम निपटा देते हैं। हालांकि आपके इस बार के ट्वी में आपके बदले सुर नजर आ रहे थे, लेकिन माफी मांगना भी एक कला है मैडम। बचपन से हमारे बड़े बुजुर्ग हमें यही सिखाते हैं, गलती करने से हमें माफी मांग लेनी चाहिए। दिल से माफी मांग लेने से पाप धुल जाते हैं, लेकिन आपका नौटंकी वाला तर्क समझ से परे है।

रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि मानव के अंदर जो कुछ सर्वोत्तम है, उसका विकास प्रशंसा तथा प्रोत्साहन के द्वारा ही किया जा सकता है, अपमान करके नहीं। उन्होंने कहा था कि यदि तुम चाहते हो कि दूसरे तुम्हारी प्रशंसा करें, तो पहले तुम दूसरों की प्रशंसा करना सीखो। हमें इस बात का भी ध्यान रखना पड़ेगा कि हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होगी, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होगा, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति और अधिक बलवती होती जाएगी। श्रीराम शर्मा आचार्य ने कहा था कि जो बच्चों को सिखाते हैं, उन पर बड़े खुद अमल करें, तो यह संसार स्वर्ग बन जाएगा। अब अगर बड़े ही गलत करें, तो बच्चों से हम क्या उम्मीद रखें?

याद रखें, समय का सबसे बड़ा दोस्त है भाग्य, लेकिन अकेले भाग्य ही सब कुछ नहीं होता। दरअसल, हमारे अच्छे और बुरे कर्म ही हमारे भाग्य की रेखा लिखते और बदलते रहते हैं। इसीलिए हमें हमेशा अच्छे कर्म करना चाहिए, ताकि भाग्यरूपी दोस्त का साथ हमेशा हमें मिलता रहे। भाग्य और कर्म दोनों एक दूसरे के अच्छे दोस्त हैं, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दोनों अधूरे हैं, क्योंकि कर्म किए बिना भाग्य साथ नहीं देता, और भाग्य के बगैर कर्म की अपनी कोई गति ही नहीं होती। हां, यदि मनुष्य के अच्छे कर्म हैं, तो भाग्य उससे कभी नहीं रूठता। आज किसी के पास सब कुछ है, पैसा है, ऐश-ओ-आराम है, नौकर-चाकर है, लेकिन कल का क्या भरोसा।

माफी मांगने से इंसान छोटा नहीं, और, और, और बड़ा बन जाता है। अहंकार माफी का दुश्मन है, अहंकार को हमें अपने आसपास फटकने नहीं देना चाहिए। दरअसल, अहंकार कमजोर व्यक्तियों का दिशा निर्धारण करता है, जबकि बुद्धिमान व्यक्ति अहंकार पर अपना प्रभुत्व जीवन भर बनाए रखने में सक्षम होते हैं। दरअसल, अहंकार उस ऐसिड के समान है, जो उस बर्तन को भी जला देता है, जिसमें वह स्वयं रखा होता है।


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