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कहने को तो यह लड़ाई दो अंग्रेजी न्यूज चैनलों के सबसे जाने-पहचाने एंकरों के बीच है लेकिन...

जगदीश उपासने वरिष्ठ पत्रकार ।। सोशल मीडिया पर इन दिनों एक दिलचस्प ‘लड़ाई’ चल रही है। कहने को तो यह लड़ाई दो अंग्रेजी समाचार चैनलों के दो सबसे जाने-पहचाने एंकरों के बीच है लेकिन उनमें से एक पहला लेकिन बड़ा वार क

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

जगदीश उपासने

वरिष्ठ पत्रकार ।।

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक दिलचस्प ‘लड़ाई’ चल रही है। कहने को तो यह लड़ाई दो अंग्रेजी समाचार चैनलों के दो सबसे जाने-पहचाने एंकरों के बीच है लेकिन उनमें से एक पहला लेकिन बड़ा वार करके खामोश हो गया है जबकि दूसरे ने उस वार से उबरने को आकाश-पाताल कर रखा है। सो, क्लासिक अर्थ में यह लड़ाई नहीं है। इसलिए भी नहीं कि ‘पहला वार’ करने वाले ने अपना वार किसी खास को निशाना बनाकर नहीं किया। और मजा देखिए कि यह ‘लड़ाई’ ‘पहला वार’ करने वाले ने शुरू भी नहीं की है। इसकी शुरुआत भी ‘प्रेस की आजादी’ वगैरह का पुराना राग अलापने वाली ‘पीडि़त’ एंकर के एक ट्वीट से हुई।

‘दो एंकर हैं—‘टाइम्स नाउ’ के अरनब गोस्वामी और ‘एनडीटीवी’ की बरखा दत्त। दत्त ने 8 जुलाई को ट्वीट किया कि ‘स्कूल हेडमास्टर का बेटा, हिज़्बुल कमांडर बुरहान वानी जिसने सोशल मीडिया को युद्ध का हथियार बनाया, अनंतनाग में मारा गया। बड़ी स्टोरी।’ सोशल मीडिया में उबाल आ गया। हजारों ट्विटर योद्धाओं ने इसे कई हत्याओं में शामिल रहे वानी को आतंकवादी की बजाए हेडमास्टर का बेटा लिखना उसके लिए सहानुभूति बटोरने की भद्दी कोशिश माना। कुछ ने यह भी बता दिया कि वानी के पिता जिहादी विचारधारा वाले शख्स हैं जिनके नाम पर दत्त ने सहानुभूति का तड़का लगाने की कोशिश की। कश्मीर में वानी के मारे जाने के बाद भडक़े हिंसक उपद्रव के दौरान दत्त और उनके चैनल ने कश्मीरियों के समर्थन के नाम पर अलगाववादियों और उपद्रवियों का महिमामंडन जारी रखा।

इसी बीच गोस्वामी ने अपने शो में उन ‘छद्म उदारवादियों’ पर सवाल उठाए ‘जो कश्मीरियों को समर्थन के नाम पर पाकिस्तानी रुख की पैरवी कर रहे हैं’; ‘जो मारे गए आतंकवादी को हेडमास्टर का बेटा बता रहे हैं’; और ‘जब सशस्त्र बल आतंकियों से लोहा ले रहे थे तो जो उनके अभियान का ब्यौरा और रणनीतिक जानकारी का प्रसारण कर रहे थे’; और ‘जिन्होंने जेएनयू में ‘भारत की बर्बादी’ के नारे लगाने वालों का समर्थन किया।’ गोस्वामी की दलील थी कि इसके लिए जो दोषी पाएं जाएं, चाहे उनमें कुछ मीडिया में से भी हों, उनको सजा दी जानी चाहिए।’ ‘टाइम्स नाउ’ और ‘एनडीटीवी’ देखने वाले दर्शक जान गए कि गोस्वामी का इशारा किस ओर है। विडंबना यह कि एनडीटीवी इन्हीं सब इल्जामों के लिए सोशल मीडिया में निशाने पर रहा है।

गोस्वामी ने न दत्त का और न ही उनके चैनल का नाम लिया था। पहले तो दत्त ने कोई वितंडा खड़ा नहीं किया। लेकिन इसी बीच मुंबई हमले के मास्टर माइंड हाफिज़ सईद ने पाकिस्तान में टीवी इंटरव्यू में ‘कश्मीर में अच्छा काम करने के लिए’ खास तौर पर ‘बरखा दत्त और कांग्रेस नेताओं को धन्यवाद’ दिया। इससे वे सारे आरोप पुष्ट होते थे जो दत्त पर सोशल मीडिया में लग रहे थे और जिन्हें लेकर गोस्वामी ने ‘छद्म उदारवादियों’ पर सवाल उठाए थे। दत्त की साख सचमुच खतरे में थी। पाकिस्तान स्थित आतंकी सरगना का सर्टिफिकेट उनकी पत्रकारिता के ‘देश विरोधी’ रंग में रंगे होने के आरोपों को सच साबित करता था। सईद को तो वे गरिया नहीं सकतीं। सो, उन्होंने गोस्वामी के उस शो को निशाना बनाया। दत्त ने 27 जुलाई को ट्विट किया, ‘टाइम्स नाउ’ मीडिया का गला घोंटने और पत्रकारों पर मुकदमा चलाने और सजा देने की मांग कर रहा है। और यह शख्स पत्रकार है? अफसोस कि मैं भी उसी इंडस्ट्री से हूं जिससे वह है।’ गोस्वामी ने अपने शो में कहीं पर भी ऐसा कहीं नहीं कहा था।

दत्त के इस ट्वीट पर आम तौर पर उनके समर्थक माने जाने वाले दूसरे ‘उदारवादी’ पत्रकारों, ने भी सवाल उठाए, कुछ ने तो उनसे पूछा कि गोस्वामी ने गलत क्या कहा? इन ‘उदारवादी’ पत्रकारों में अधिकतर ऐसे थे जो सरकार की नीतियों पर भले सवाल उठाते हों लेकिन अपनी रिपोर्टिंग को जिन्होंने अर्द्धसत्य, सफेद झूठ, भौंडे प्रचार और तथ्यों से खिलवाड़ से दूर रखा है। तब दत्त को अपने समर्थन के लिए अपने पुराने दिनों के साथियों से अपील करनी पड़ी। वह भी नहीं मिला। अब वे ‘प्रेस की आजादी’ का राग अलाप रही हैं और इस बारे में बहस भी नहीं चाहतीं। लेकिन दत्त पर आतंकी सरगना सईद के सर्टिफिकेट से लगा दाग धुल नहीं रहा।

उधर गोस्वामी का रुख ‘राष्ट्र विरोधी घटनाओं और कार्रवाइयों’ को लेकर लगातार एक जैसा है, चाहे जेएनयू हों, या जादवपुर विवि या कश्मीर। ठीक वैसे ही जैसे उग्र बयानबाजी करने वाले धार्मिक-मज़हबी नेताओं, सरकारी सुविधाओं का दुरुपयोग करने वाले जनप्रतिनिधियों वगैरह पर उनके शो की एक जैसी लाइन होती है। धार्मिक-मज़हबी और सियासी नेता अक्सर उनके शो के प्रखर आलोचक होते हैं।

तथ्य यह भी है कि ‘एनडीटीवी’ की दर्शक संख्या लगातार घट रही है, जबकि ‘टाइम्स नाउ’ ने अपनी स्थिति और साख बनाए रखी है। एक तथ्य यह भी कि इन दोनों में से कोई भी चैनल दर्शक संख्या के लिहाज से टॉप पर नहीं है, टॉप पर तीन हिंदी न्यूज चैनल हैं। दर्शकों के हिसाब से तो अंग्रेजी न्यूज चैनल कहीं नहीं ठहरते। लेकिन नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों पर उनका असर जबरदस्त है। इसीलिए यह विवाद सोशल मीडिया में एक अच्छे खासे युद्ध में तब्दील हो गया है।

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