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'दिलीप पडगांवकर की नई पीढ़ी के हर पत्रकार को सलाह- पत्रकार के साथ-साथ ‘प्रोडक्शन-मैन’ भी बनो'

वरिष्ठ पत्रकार और टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक दिलीप पडगांवकर का 72 वर्ष की उम्र में बीते शुक्रवार को पुणे में निधन हो गया था। पडगांवकर को याद करते हुए ‘जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड मॉस कन्युनिकेशन’ (JIMMC) के डायरेक्टर नलिनी रंजन मोहंती ने एक लेख लिखा है, जोकि दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुआ है, जिसे आप

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

वरिष्ठ पत्रकार और टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक दिलीप पडगांवकर का 72 वर्ष की उम्र में बीते शुक्रवार को पुणे में निधन हो गया था। पडगांवकर को याद करते हुए ‘जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड मॉस कन्युनिकेशन’ (JIMMC) के डायरेक्टर नलिनी रंजन मोहंती ने एक लेख लिखा है, जोकि दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुआ है, जिसे आप यहां भी पढ़ सकते हैं:

समय की नब्ज पर पैनी पकड़ वाला पत्रकार

इस खबर पर विश्वास करना अब भी मुश्किल है कि दिलीप पडगांवकर हमारे बीच नहीं रहे। 1989-90 में हुई उनसे पहली मुलाकात आज भी याद है। तब मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अपनी पीएचडी पूरी कर रहा था। फुर्सत मिलने पर मैं कभी-कभार अपने विचार टाइम्स ऑफ इंडिया को भेजा करता था। तब यह अखबार एजेंडा नाम से एक पेज निकाला करता था, जिसमें मुझे जगह मिलती थी। उस पेज की जिम्मेदारी चंदन मित्रा के पास थी। उन्होंने मुझसे कहा कि क्यों न मैं अखबार में उनके साथ काम करूं। मैं लेक्चरर बनने के सपने देख रहा था और पत्रकारिता का मुझे कोई आइडिया भी नहीं था। मगर अच्छे वेतन का लोभ मैं छोड़ न सका, और मैंने मंजूरी दे दी। मेरा पद सहायक संपादक का था, इसलिए नियुक्ति के लिए संपादक की मंजूरी जरूरी थी। इस तरह, मैं दिलीप पडगांवकर से मिला, जो अखबार के संपादक थे।

पडगांवकर साहब खबरों की नब्ज पर पैनी पकड़ रखते थे। पहली मुलाकात में उनसे करीब एक घंटे तक बात हुई और इस दरम्यान उन्होंने देश-दुनिया के तमाम तात्कालीन मुद्दों पर चर्चा की। खबरों की इतनी बारीक समझ बहुत कम लोगों में मैंने देखी थी। हालांकि जब मैं टाइम्स परिवार का हिस्सा बन गया, तो उनसे रोज बातें होने लगी। मुझे संपादकीय पेज पर ‘पत्र’ कॉलम की जिम्मेदारी दी गई थी, और यह कॉलम सीधे पडगांवकर के जिम्मे था। किन पत्रों को लेना है, किन्हें छोड़ना है, किनमें कितना संपादन करना है- सारा कुछ वह मुझे बताया करते थे। बीच-बीच में संपादकीय पेज पर मैं जो कुछ भी लिखता, संपादक होने के कारण वह कॉपी पडगांवकर के पास भी जाती थी। और वह उसकी अच्छाई और कमियों पर खुलकर अपनी राय मुझसे साझा करते। पत्रकारिता की मेरी शिक्षा-दीक्षा में जिन चंद लोगों को महत्वपूर्ण योगदान है, उनमें वह भी हैं।

दिलीप पडगांवकर सिर्फ खबरों को लेकर ही संजीदा नहीं रहते थे, बल्कि बदलते वक्त को भी बखूबी पहचानते थे। पत्रकारिता के चरित्र में आ रहे बदलाव को उन्होंने काफी पहले महसूस कर लिया था। वह कहा करते थे कि ‘दिलीप पडगांवकर जैसे राइटर-एडिटर (लेखन में अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय संपादक) की उपयोगिता आने वाले दिनों में नहीं रहने वाली।’ वह नई पीढ़ी के हर पत्रकार को यह सलाह दिया करते थे कि सिर्फ लेखन के बूते पत्रकारिता की ऊंचाई नहीं छू सकते। जरूरत ‘प्रोडक्शन-मैन’ बनने की है। यानी नई पीढ़ी के लिए पत्रकारिता की तमाम विधा सीखनी जरूरी है, जिसमें खबरों को इकट्ठा करने से लेकर उसके प्रकाशन, यहां तक कि वितरण तक शामिल है। विचारों के साथ-साथ रिपोर्टिंग की भी गहरी समझ जरूरी है। शायद इसीलिए वह मशविरा दिया करते, ‘मुझे आदर्श मत बनाओ। पत्रकारिता की दिशा समझो।’

पडगांवकर साहब की कमी इसलिए भी खलेगी, क्योंकि वह अभिव्यक्ति और व्यक्ति की आजादी के हिमायती थे। उनकी छवि एक ऐसे बौद्धिक की थी, जो बारीक समझ रखता है। उन्होंने यूं ही राजधानी के सबसे बड़े अखबार के संपादन को देश का दूसरा सबसे चुनौतीपूर्ण काम नहीं कहा था। अपने पत्रकारिता जीवन में वह बहुत व्यावहारिक रहे। हालांकि बहुत अनौपचारिक तरीके से पेश नहीं आते थे वह। शायद इसकी वजह काम का चरित्र या दबाव रहा होगा। मगर वह एक जानदार शख्स थे। हर शनिवार ऑफिस में सफेद कुर्ता-पैजामा पहनकर आते, और उसके ऊपर बंडी होती।

हालांकि बतौर संपादक वहां उनका कार्यकाल एक ऐसा समय भी था, जब सत्ता का केंद्र संपादकीय से प्रबंधन की ओर धीमे-धीमे बढ़ रहा था। उस समय पत्रकारिता और प्रबंधन एकाकार हो रहा था। उन्होंने दोनों से बखूबी सामंजस्य बनाया। वह समय के साथ चलना जानते थे। शायद वह समझ रहे थे कि आने वाले दिनों में प्रबंधन भी पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहा है। वह एकपक्षीय नहीं थे और इसे उन्होंने अपने जीवन में भी उतारा। वाकई आज दिलीप पडगांवकर को मुझ जैसे कई लोगों नम आंखों से याद कर रहे हैं, जिन्हें उन्होंने पत्रकार के रूप में गढ़ा और देश-दुनिया की एक नई समझ दी।

(साभार: हिन्दुस्तान)

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