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पत्रकार बृजेंद्र पटेल की खरी-खरी: मोदीजी आपको अवाम का ये सवाल बुरा लग सकता है, पर वाजिब है...'
<p style="text-align: justify;"><strong>बृजेंद्र एस. पटेल</strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong>एडिटर, 'कैम्पसपोस्ट डॉट इन' (Campuspost.in)</strong></p> <p style="text-align: justify;">मैंने नरेंद्र मोदी को रविवार को तीसरी बार सुना। 2007 में फिरोजाबाद में। फिर 2014 के चुनाव से पहले आगरा के इसी कोठी मीना बाजार पर, जहां आज तीसरी बार
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
बृजेंद्र एस. पटेल
एडिटर, 'कैम्पसपोस्ट डॉट इन' (Campuspost.in)
मैंने नरेंद्र मोदी को रविवार को तीसरी बार सुना। 2007 में फिरोजाबाद में। फिर 2014 के चुनाव से पहले आगरा के इसी कोठी मीना बाजार पर, जहां आज तीसरी बार सुना। पिछली बार सुना था तब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। भावी प्रधानमंत्री के रूप में देश की उम्मीद की…। स्वप्नलोक के देवदूत जैसे। उन्हें तब मंच पर देखा था। बेहद उल्लास का वातावरण था। कल्याण, राजनाथ जैसे यूपी के कद्दावर नेता साथ थे। नरेंद्र मोदी मंच पर आए थे तो लगा था सूरज निकला…। चेहरे की भाव भंगिमा से लेकर भाषण की हर लाइन….गोया क्रांतियुग का सूत्रपात। नरेंद्र मोदी ने हर वो बात कही थी, जिसकी 10 साल से शासन कर रही कांग्रेस के पास कोई काट नहीं थी।
मैं गवाह हूं, नरेंद्र मोदी ने तब कहा था, देश का काला धन विदेश में है। उन्होंने यहां तक कहा कि विदेशों में इतना काला धन है, यदि आ जाए तो हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए आ जाएंगे। कई घोटालों में डूबी यूपीए सरकार से निजात दिलाने के लिए वे आगरा के लोगों से बोले थे, एनडीए की सरकार बनेगी तो यमुना पर बैराज बनेगा। आगरा में इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनेगा। इंटरनेशनल स्टेडियम और आईटी पार्क बनेगा। उन्होंने आगरा के जूता, पेठा, आलू, पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए भी सपने दिखाए। स्वप्नलोक में डूबी भीड़ ने नरेंद्र मोदी को तब बहुत सराहा था।
मैं रविवार को उसी सभा स्थल पर फिर गया। नरेंद्र मोदी का भाषण कवर करने। अब माहौल बदला था। अव्वल मंच का नजारा दूसरा था। न राजनाथ, न कलराज? पिछली बार वाले स्थानीय नेता भी मंच पर नहीं थे। पहले पुरुषोत्तम खंडेलवाल और दीपक खरे की टीम थी। इस बार श्याम भदौरिया और विजय शिवहरे के हाथ में कमान। हालांकि भीड़ जितनी तब थी, उतनी आज। अंतर सिर्फ इतना था तब गंभीर थी और आज हुल्लड़बाज। तब भाषण सपने दिखाने वाला था। इस बार का गोया सोते से किसी ने अचानक उठा दिया हो भाषण देने को। भाषण शैली बिल्कुल उलट। पहली बार भाषण में आगरा की जनता से जो वायदे किए थे उन्हें शायद आज याद नहीं रहे? पिछली बार उन्हें याद था कि ये मुगलों का शहर है और यहां ताजमहल समेत तीन विश्वदाय स्मारक हैं। इस बार भूल गए? तब उन्हें याद था यहां हर साल 40 लाख पर्यटक आते हैं, 800 होटल और 200 इंपोरियम हैं। इस बार भूल गए? तब उन्हें याद था आगरा में 200 से ज्यादा शू एक्सपोर्टर और 6 हजार जूता के छोटे कारखाने हैं। इनमें दो लाख कारीगर हैं। सरकार बनते ही इनके लिए योजना बनाएंगे। प्रधानमंत्री बनकर आए तो भूल गए? तब उन्हें याद था यहां TTZ है, यहां बिजली 24 घंटे मिलनी चाहिए। अब भूल गए? तब उन्हें याद था आगरा में पानी की किल्लत है। यमुना बैराज बनाएंगे। अब भूल गए? तब याद था आगरा में आईटी पार्क बनाएंगें और सरकार बनी तो आगरा में धुंआ रहित उद्योग को बढावा देंगे। इस बार इस पर बोलना भूल गए? तब बोल थे आगरा में इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाएंगे। इस बार बोलना भूल गए? पिछली बार कहा था आगरा में इंटरनेशनल स्टेडियम बनाएंगे। इस बार बताना भूल गए कि इस पर कोई प्रगति है भी या नहीं?
मुझे लगा कि मंच पर आगरा के एसपी सिंह बघेल, श्याम भदौरिया, विजय शिवहरे, बाबूलाल, योगेंद्र उपाध्याय, जगन प्रसाद गर्ग याद दिलाएंगे। इन सबसे ज्यादा याद दिलाने की जिम्मेदारी सांसद रामशंकर कठेरिया की बनती थी। उन्हें प्रधानमंत्री से ठीक पहले बोलने का मौका भी मिला, वो भी कह नहीं पाए?
हां, एक बात नरेंद्र मोदी को याद रही। काला धन। फर्क देखिए तब और आज के कालाधन पर उनके भाषण में। तब कहा था विदेशों में काला धन जमा है। भाइयों बहिनों, उनकी सरकार बनी तो 100 दिन के भीतर भारत ले आएंगे। ये काला धन इतना है कि हर भारतीय के खाते में 15 लाख जमा हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आज के भाषण में विदेशों में जमा काले धन का उल्लेख तक नहीं हुआ और न ही 15 लाख रुपए हर भारतीय के खाते में जमा होने का…। उनकी बात से लगा कि एनडीए की सरकार भी यूपीए की सरकार की तरह विदेशों में जमा काले धन की बात नहीं करेगी? ये सवाल चैंकाता है। सरकार की नीयत पर सवाल भी खड़ा होता है। उन्होंने ये भी बताना जरुरी नहीं समझा कि विदेशों जमा काला धन कब तक आएगा? नहीं आएगा तो क्यों नहीं आएगा? अगर ऐसा है तो चुनावी सभाओं में ये वायदा क्यों किया था कि विदेशों में जमा काला धन 100 दिन में लाएंगे? ये वायदा खिलाफी नहीं तो क्या है? मुझे सभा में किसी ने कहा देशी घी दिखाकर डालडा थमा दिया।
नरेंद्र मोदी, सियासत में कितने मंजे खिलाड़ी हैं, मैं आज देखकर जान पाया। या कहें कि वे अब बीजेपी में वन मैन आर्मी हैं। मेरा अब तक आंकलन था, बामपंथी दलों की तरह भाजपा भी सामुहिक सहमति पर आधारित पार्टी है। ऐसा कई बार लगा। अटल जी भी अपने काल खंड में जनसंघ और भाजपा के सर्वमान्य और निर्विवाद नेता रहे हैं, पर भाजपा में उनको कोई तानाशाह की संज्ञा नहीं दे पाया। आज की सभा में भाजपा की आत्मा एक व्यक्ति के शरीर में अवतरित दिखी। मंच से किसी ने नहीं कहा... भाजपा जिंदाबाद। सिर्फ मोदी के जयकारे। लगा, अब भाजपा का मतलब मोदी है? सिर्फ मोदी? यही कारण है कि स्वतंत्र देव सिंह और लक्ष्मीकांत बाजपेयी जैसे नेता पब्लिक से मोदी-मोदी का नारा लगवाते रहे?
जो मोदीमय भीड़ दिखी। उस भीड़ के लिए न पार्टी, न विचारधारा। सोच के केंद्र में व्यक्तिवाद..। बिल्कुल मायावती की तर्ज पर। मंच पर मोदी। मंच के नीचे मोदी। मंच के सामने मोदी। मोदी, सिर्फ मोदी। इस सबके बावजूद नरेंद्र मोदी बेहद तनाव में दिखे। उनके भाषण से लेकर चाल तक में दिखा, वे मंच पर अकेले खड़े हैं और सामने उनके भक्तों की भीड़। ठीक वैसा ही नजारा जैसा इसी मैदान में मैंने 1993 में सात दिन तक दैनिक जागरण में रिपोर्टिंग के दौरान बापू आशाराम के प्रवचन में देखा था।
हां, पिछली मीटिंग में जिन नेताओं के चेहरे मंच पर चस्पा थे, उनमें आडवाणी जी का चेहरा नहीं था। शायद तब वे नरेंद्र मोदी के लिए छद्म चुनौती थे। अब आडवाणी जी सिर्फ नरेंद्र मोदी की अनुकंपा से ही देश के प्रथम नागरिक का घर पा सकते हैं। आडवाणी जी के लिए ये शुभ संकेत है, उनका मंच पर फोटो लगा। इस फोटो के कई और भी मायने हैं। मोदी जी को काले धन के मामले में अपनों की भी मदद की जरूरत है। कम से कम उन घर वालों की, जो बुजुर्ग हैं और उनकी अनदेखी करने की तोहमत नरेंद्र मोदी पर लगती है। शायद उन्हें भी आडवाणी जी से नोटबंदी और काला धन के मुद्दे पर सकारात्मक समर्थन की उम्मीद बंधी है।
मुझे मोदी की लोकप्रियता से कोई दिलचस्पी नहीं। पर आज जो भीड़ देखी, उसमें मोदी का जादू नजर आया। करीब एक लाख लोगों के कदम कोठी मीना बाजार तक पहुंचे। ऐसे में जब मुझे लगता है, हर व्यक्ति के लिए एक एक मिनट कीमती है, लोग पूरा दिन किसी नेता का भाषण सुनने में देंगे? कहना आसान है, भीड़ पैसे से ढोई जा सकती है। मैं भी 35 साल से रैलियां देख रहा हूं। बेशक भीड़ ढोई जा सकती है, पर भीड़ से घंटों नारे नहीं लगवाए जा सकते हैं। यकीनन। भीड़ सिर्फ भेड़ बकरियों की तरह सड़क पर चल और सभा स्थल पर बैठ सकती है। ऐसा नहीं कि आज भीड़ ढोकर नहीं लाई गई। बेशक लाई गई। जो लोग दूर दराज से आए, उनमें ज्यादातर युवा थे। वे सब वाहन और भोजन की व्यवस्था होने पर आए। उनके चेहरे पर नोटबंदी का तनाव नहीं था। मुमकिन है उन्हें इस समस्या से फर्क नहीं पड़ा है, या कहें कि वे इसके होने वाले घातक परिणामों से वाकिफ नहीं हैं।
एक बात और, बड़ा परिवर्तन। आज की रैली में भाजपा का परंपरागत वोट गायब दिखा। खासकर शहरी अंचल का। ये भाजपा के लिए डराने वाली बात है। पर रैली में जो पिछड़ा वर्ग उमड़ा, उससे लगा कि आगरा देहात और आसपास के इलाकों में इस बार सपा और बसपा को भाजपा कड़ी चुनौती देगी। मुझसे विधायक छोटेलाल वर्मा ने खुद कहा था कि वे भाजपा में शामिल हो रहे हैं। संकेत राजा अरिदमन सिंह के परिवार से भी दिए गए थे। लगता है दोनों की बात नहीं बनी।
नरेंद्र मोदी का नोटबंदी का फैसला कुछ भी कर सकता है। वो जो 50 दिन मांग रहे हैं। इसे इस तरह समझिए 50 ओवर का मैच। दूसरी टीम खेल चुकी है। अब नरेंद्र मोदी को बैटिंग करनी है। टीम में धोनी हैं। टीम में न कोहली हैं और न रहाणे है, न शिवर धवन और न ही जडेजा। दूसरे छोर पर उमेश यादव, भुवनेश्वर सरीखे बल्लेबाज हैं। लक्ष्य 350 रन का है। पहले 10 ओवर मे 50 रन भी नहीं बने हैं। जैसे धोनी पर भरोसे का तगमा है, वैसे भक्तों की भीड़ की आंख पर लगे चश्मे में चिलचिलाती धूप में मैदान पर रनों के काले बादल बरसने की उम्मीद दिखती है।
नरेंद्र मोदी की गर्जना में अब जो स्वर है। उसमें आत्मविश्वास ओझल है। भीड़ को फिर भी भरोसा है। भारत वैसे भी आस्था का देश है। मैच जीतने के लिए भगवान और पीर पूजते हैं। खिलाड़ियों की मेहनत से मिली जीत का श्रेय भगवान और पीर बाबा को देते हैं। नोट बंदी से जो हालात बिगड़े हैं, ठीक उसी तरह उम्मीद करते हैं कि कयास लगा रहे अर्थशास्त्रियों का गणित फेल हो जाए। भगवान करे।
वैसे मोदी गरीबों के लिए भाषण में बहुत अच्छी बातें करते हैं। वे आज रेल हादसे में मरे लोगों की बात तो करते हैं। पर नोट बंदी में मरने वालों का उल्लेख नहीं करते। ये उनके संवेदनहीन स्वभाव को रेखांकित करता है। उन्हें नहीं लगता देश के जिन गरीबों के लिए सपने दिखा रहे हैं। फिलहाल दस दिन से, उनमें से तमाम ऐसे हैं जिनके घर में चूल्हे बुझे हैं। जिस ईमानदार की बात करते हैं, उस ईमानदार के काम में मंदी छा गई है। उस ईमानदार का इलाज नहीं हो पा रहा है। उस ईमानदार को खेती के लिए बीज और खाद नहीं मिल पा रही है। बात 50 दिन के साथ देने की करते हैं। जनता कष्ट उठाये। हां उठा लेगी। पहले खुद लाल बहादुर शास्त्री बनो प्रधानमंत्री जी। जनता एक टाइम खाना भी छोड़ देगी। ये भारत है। हमने दस दिन कारोबार में मंडी उठाई। बैंक की लाइन में खड़े होकर जान दी। खेतों में दस दिन काम रोका। 10 दिन इलाज में तकलीफें उठाईं। आपका क्या त्याग रहा इन 10 दिनों में? बताएं प्रधानमंत्री जी? तकलीफें उठाने का ठेका सिर्फ जनता के पास है। सरकारी सुविधाओं की मौज करने का अधिकार सिर्फ राजनेताओं और अफसरों को है? अवाम का ये सवाल बुरा लग सकता है, पर वाजिब है। बाकी आपकी मर्जी।
(साभार: Campuspost.in)
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