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डॉ. वैदिक बोले, किन-किन के आगे नाक रगड़ने पर उन्हें पद्म पुरस्कार मिला होगा...
डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार ।। पद्म-सम्मान का महत्व क्या? भारत सरकार के पद्म पुरस्कारों पर हमेशा की तरह इस बार भी विवाद छिड़ गया है। पुरस्कारों के लिए लाइन में लगे रहे ज्यादातर लोगों ने चुप्पी धारण कर ली है, क्योंकि मुंह खोलकर वे अपनी बेइज्जती क्यों करवा
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार ।। पद्म-सम्मान का महत्व क्या?
भारत सरकार के पद्म पुरस्कारों पर हमेशा की तरह इस बार भी विवाद छिड़ गया है। पुरस्कारों के लिए लाइन में लगे रहे ज्यादातर लोगों ने चुप्पी धारण कर ली है, क्योंकि मुंह खोलकर वे अपनी बेइज्जती क्यों करवाएं। उन्हें इस बार नहीं मिला तो नहीं मिला। अगली बार वे फिर टिप्पस भिड़ाएंगे। लेकिन दो-तीन भारतीय खिलाड़ियों ने अपना मुंह खोल दिया है। उन्होंने अखबारों को कहा है कि कोई उन्हें बताए कि अब वे क्या करें, जिससे उन्हें ये पद्म-पुरस्कार मिल सके?
एक विश्व-चैम्पियन महिला का मानना है कि शायद उनका जन-संपर्क (पी.आर.) ढीला है। यहां जन-संपर्क का अर्थ है, चाटुकारिता, खुशामद, बेशर्मी, भिखारीपन आदि। जो इन कलाओं में पारंगत नहीं, वह मात खा जाता है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि भारत रत्न से लेकर पद्मश्री तक के सम्मान उन्हीं लोगों को मिलते हैं, जो इन दांव-पेंचों के उस्ताद होते हैं। अनेक अत्यंत सुयोग्य लोगों को भी ये सम्मान मिलते रहे हैं बल्कि उनकी वजह से ये सम्मान स्वयं सम्मानित होते हैं। लेकिन यह भी सच्चाई है कि ये सम्मान उन्हीं को मिलते हैं, जो इनके लिए आवेदन करते हैं या करवाते हैं।
इसमें भी कोई बुराई नहीं है लेकिन मैं यह मानता हूं कि वह सम्मान ही क्या सम्मान है, जो मांग कर लेना पड़े। सम्मान सच्चा वही है, जो बिन मांगे मिले। एक शायर ने क्या खूब कहा हैः
जो तू अता करे तो जहन्नुम भी है बहिश्त, मांगी हुई निजात मेरे काम की नहीं।
याने मांगकर लिया हुआ मोक्ष भी बेकार है। इसके अलावा, मैं एक दूसरी शर्त और भी जोड़ता हूं। पुरस्कार पाने वाले में पात्रता तो होनी ही चाहिए लेकिन पुरस्कार देने वाले में भी पात्रता होनी चाहिए या नहीं? पद्म-पुरस्कार देने वाले लोग कौन हैं? उनकी हैसियत क्या है? उनकी योग्यता क्या है? उनका चरित्र क्या है? ऐसे संदेहास्पद लोगों के आगे मैंने बड़े-बड़े पुरस्कार-इच्छुकों को नाक रगड़ते देखा है। ये पुरस्कारदाता सिर्फ इसलिए बन गए कि इन्होंने कुछ कुर्सियों पर कब्जा कर रखा है।
इसीलिए पद्म-पुरस्कारों की प्रतिष्ठा बहुत ही समित है। आप इन्हें लेकर अपनी अल्मारी में दबाए रख सकते हैं। न तो इन्हें आप अपने नाम के आगे-पीछे लगा सकते हैं और न ही पैड पर छपा सकते हैं। कुछ सज्जन इन पुरस्कारों को अपने नाम के साथ उछालते हैं तो लोग उन पर हंसते हैं। मेरे जो मित्र, मेरी बात का ज्यादा बुरा नहीं मानते और जिन्हें मेरे प्रेम में पूरा विश्वास है, उन्हें पद्म-पुरस्कार मिलने पर मैं बधाई का नहीं, सहानुभूति का पत्र लिखता हूं। पता नहीं, किन-किन के आगे नाक रगड़ने पर उन्हें यह पुरस्कार मिला होगा।
(साभार: नया इंडिया)
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