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‘नक्सलवाद जैसी राष्ट्रीय समस्या पर सही सवाल पूछना मीडिया का धर्म है’

लगभग ढाई दशक पूर्व जब बेअंत सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री थे, तो सुरेंद्र नाथ पंजाब के राज्यपाल थे...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

पी. के. खुराना

वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार ।।

जब नक्सलवाद भी बने मलाई

लगभग ढाई दशक पूर्व जब बेअंत सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री थे, तो सुरेंद्र नाथ पंजाब के राज्यपाल थे। वे अगस्त 1991 में पंजाब के राज्यपाल बनाए गए थे। नवंबर 1993 में उन्हें हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया। जुलाई 1994 में हिमाचल प्रदेश जाते समय उनका हेलिकाप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया और वह इस हादसे में मारे गए। कहा जाता है कि राज्यपाल सुरेंद्र नाथ के आकस्मिक स्वर्गवास के बाद राजभवन में उनके कमरों में अकूत नकद धनराशि पाई गई।

उल्लेखनीय है कि वे सन् 1991 में राज्यपाल बने थे और तब पंजाब में कोई चुनी हुई सरकार नहीं थी क्योंकि जून 1987 से ही राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू था, जो 25 फरवरी, 1992 तक चला। इस दौरान सुरेंद्र नाथ ही राज्य के सर्वेसर्वा थे। कहा जाता है कि उनके कमरों में जो पैसा मिला वह उन्हें राज्य के मुखिया के रूप में आतंकवाद से निपटने के लिए दिया जाता रहा था,जिसका कोई हिसाब किताब नहीं मांगा जाता था। इस प्रकरण की चर्चा इसलिए कि देश के जिन राज्यों में नक्सलवाद या आतंकवाद है, वहां भी केंद्र की ओर से राज्य को बहुत बड़ी सहायता धनराशि दी जाती है और उसका कोई हिसाब भी नहीं मांगा जाता।

नक्सलवाद को लेकर छत्तीसगढ़ फिर से चर्चा में है। इस बार एक फोटो पत्रकार भी नक्सली हमले का शिकार हुए,इसलिए मीडिया में नक्सलवाद की कुछ ज़्यादा ही चर्चा है। इससे पहले भी इसी साल अप्रैल में छत्तीसगढ़ के बक्सर इलाके में नक्सली हमला हुआ और 25 जवान शहीद हो गए। मार्च और अप्रैल के दो महीनों में ही 36 जवान शहीद हुए। बहुत शोर मचा। विपक्ष को राजनीति करने का एक और मुद्दा मिला और मीडिया और सोशल मीडिया के शोर के साथ विपक्ष का शोर भी शामिल हो गया। आरोप लगाए गए, तंज कसे गए। सत्तापक्ष की ओर से श्रद्धांजलियों और फूलमालाओं की रस्म के बाद नक्सलियों के लिए चेतावनियां जारी की गईं,बैठकें हुईं,लेकिन इन सबके बाद दोष मढ़ने के लिए ‘विच-हंट’ यानी बलि का बकरा तलाश कर लिया जाता है। क्या आप जानते हैं कि यह बलि का बकरा कौन होता है?

जी हां, आपने सही सोचा, बलि का बकरा साधनहीन, बेबस, गरीब आदिवासियों को बना दिया जाता है, जो न विरोध कर पाते हैं और न अपने आप को निर्दोष साबित कर सकते हैं। यह एक स्थापित सी कार्यप्रणाली है। आदिवासियों के कई परिवारों को नक्सली कह देना पुलिस और प्रशासन के लिए बहुत आसान है। छत्तीसगढ़ छोटा सा राज्य है और रमन सिंह डेढ़ दशक से प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। वे ही नहीं प्रदेश के उनके पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी कहते थे कि बस्तर को विकास की आवश्यकता है और विकास के अभाव में वहां नक्सलवाद पनप रहा है। रमन सिंह आज भी यही दोहराते हैं और बस्तर में विकास के अभाव को नक्सलवाद के जन्म का कारण बताते हैं। इतना कहते हुए वे सिर्फ यह बताना भूल जाते हैं कि बस्तर के विकास की जिम्मेदारी किसकी है? सवाल है कि क्या बस्तर का विकास करने के लिए डोनल्ड ट्रंप को बुलाया जाएगा या यह जिम्मेदारी राज्य प्रशासन की है?

सच तो यह है कि आदिवासियों का विकास करने के बजाय, उन्हें शिक्षा, चिकित्सा सेवा और रोजगार देने के बजाय उन्हें परेशान करने के नए-नए कानून बनाए जाते हैं ओर इसमें जितना दोष राज्य सरकार का है, उतना ही केंद्र का भी है। गरीब आदमी को सड़क और टेलीफोन से पहले रोटी चाहिए। आदिवासियों की स्थायी आय वाले रोजगार के लिए कुछ करने के बजाय नरेंद्र मोदी की सरकार ने वन की उपज का समर्थन मूल्य घटा डाला और राज्य सरकार ने भी आग में घी डालते हुए महुआ की नई नीति बनाकर आदिवासियों पर एक और शिकंजा कस डाला है। ये बेबस बेजुबान आदिवासी सरकारी अधिकारियों,सुरक्षा बलों और नक्सलियों सभी के साझा शिकार हैं। आरोप तो यहां तक हैं कि खुद नक्सलियों को भी सरकार से अथवा कुछ चुनिंदा अधिकारियों से आर्थिक सहायता मिलती है। हिमाचल प्रदेश सरकार को ऊपरी हिमाचल के विकास के नाम पर अलग से पैसा मिलता है, आतंकवाद ग्रस्त राज्यों को आतंकवाद के उन्मूलन के लिए अतिरिक्त पैसा मिलता है, नक्सल समस्या से जूझ रहे राज्यों को समस्या के समाधान के लिए पैसा मिलता है। छत्तीसगढ़ को हर साल लगभग 200 करोड़ रुपया नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए दिया जाता है और इस सारे धन के खर्च का कोई हिसाब नहीं दिया जाता। जहां इतनी बड़ी धनराशि मिल रही हो और हिसाब-किताब की जिम्मेदारी शून्य हो तो नक्सलवाद कौन खत्म करना चाहेगा।

सच तो यह है कि हमारे देश में नक्सलवाद और आतंकवाद राजनीतिज्ञों और सरकारी अधिकारियों की मौज का साधन बन गया है। यही कारण है कि कोई राजनीतिज्ञ नक्सलवाद का खात्मा नहीं चाहता। न पुलिस, न अधिकारी, न राजनीतिज्ञ और न नक्सली नेता। सबकी मौज है,सबकी मलाई है। किसी को विदेश से धन मिलता है तो किसी को सरकार से। नक्सलवाद के इस अर्थशास्त्र को समझे बिना आप नक्सलवाद की असलियत को नहीं समझ सकते। नक्सलवाद की इस असलियत को समझेंगे, तभी आपको समझ में आएगा कि इतने दशकों बाद भी इस समस्या का कोई समाधान क्यों नहीं हो रहा।

पुलिस खुद आदिवासियों के घर जलाती है और फिर उन्हें नक्सलवादी करार दे देती है। नक्सलवाद और आतंकवाद जैसी समस्याओं के खात्मे के तरीके को समझने के लिए हमें इतिहास में झांकना होगा। सुपर कॉप माने जाने वाले पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल सन् 1958 में पुलिस सेवा में शामिल हुए और उन्हें उत्तर-पूर्व के दो राज्यों असम और मेघालय में सेवा का मौका मिला। सन् 1984 में वे अपने गृह राज्य पंजाब वापस आ गए। गिल को पंजाब में आतंकवाद के खात्मे का श्रेय दिया जाता है।

तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह ने केपीएस गिल को आतंकवाद के खात्मे के लिए पूरा समर्थन दिया और मीडिया तथा मानवाधिकार संगठनों की बहुत सी आलोचनाओं के बावजूद यह समर्थन जारी रखा। हालांकि आतंकवादियों ने बाद में उनसे बदला लेने के लिए 31 अगस्त, 1995 को एक बम धमाके में उनकी हत्या कर दी, लेकिन बेअंत सिंह के रवैये के कारण पंजाब हमेशा के लिए आतंकवाद के अभिशाप से मुक्त हो गया। उन्हीं सुपर कॉप केपीएस गिल को रमन सिंह सरकार ने नक्सली समस्या के उन्मूलन के लिए सलाहकार नियुक्त किया था लेकिन केपीएस गिल ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट कहा था कि खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह ने उन्हें नक्सली मामलों का सलाहकार बनाने के बाद कुछ भी करने से मना करते हुए कहा था कि वे वेतन लेते रहें और मौज करते रहें, परिणाम यह है कि हम नक्सलवाद का हौवा बनाकर निर्दोष आदिवासियों को उजाड़ने और मार गिराने में लगे हुए हैं जबकि नक्सली समस्या ज्यों की त्यों है। मीडिया भी इस समस्या की जड़ को समझने के बजाए सिर्फ अपने एक सहकर्मी की हत्या का शोक मनाने में मशगूल है। नक्सलवाद का शिकार बने किसी व्यक्ति के परिवार को आर्थिक सहायता देना या सरकारी नौकरी देना फौरी राहत तो है, समस्या का हल नहीं है। मीडिया की ओर से सवाल यह होना चाहिए कि सरकार ने केपीएस गिल की सेवाओं का उपयोग क्यों नहीं किया? इस डेढ़ दशक में नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं? नक्सलवाद के खात्मे के लिए सरकार के पास क्या योजना है? नक्सलवाद जैसी गंभीर राष्ट्रीय समस्या पर सरकारी बयान या प्रेस नोट छापने से पहले सवाल पूछना, खासकर सही सवाल पूछना मीडिया का धर्म है, और देश का भला इसी में है कि मीडिया सही सवाल पूछे।

यह समझना आवश्यक है कि यदि पंजाब में आतंकवाद की प्रभावी रोकथाम संभव थी तो छत्तीसगढ़ या देश के अन्य राज्यों में जारी नक्सलवाद का उन्मूलन भी संभव है। यह विशुद्ध राजनीतिक इच्छाशक्ति और कानून-व्यवस्था का मामला है। थोड़ी सी कल्पनाशीलता से इस पर काबू पाया जा सकता है। नक्सलवाद और आतंकवाद से निपटने के लिए मजबूती और जवाबदेही दोनों की आवश्यकता है, तभी यह समस्या खत्म होगी और आतंकवाद तथा नक्सलवाद से छुटकारा मिलेगा।


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