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वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक ने दी नरेंद्र मोदी को ये नसीहत...
‘जो शब्द सीमित करता है, वह संपूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है? याने हिंदूवादी होना राष्ट्रवादी होना नहीं है। हिंदूवादी होना, मुसलमानवादी होना, ईसाईवादी होना अपने आप में अच्छा हो सकता है लेकिन इनसे भी बेहतर है, राष्ट्रवादी होना।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘जो शब्द सीमित करता है, वह संपूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है? याने हिंदूवादी होना राष्ट्रवादी होना नहीं है। हिंदूवादी होना, मुसलमानवादी होना, ईसाईवादी होना अपने आप में अच्छा हो सकता है लेकिन इनसे भी बेहतर है, राष्ट्रवादी होना।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
राष्ट्रवाद और हिंदुत्व
भाजपा के प्रमुख कार्यकर्ताओं की एक बैठक में नरेंद्र मोदी ने कहा कि राष्ट्रवाद ही भाजपा की विचारधारा है। उसे जमकर पकड़े रहना है। नरेंद्र मोदी जैसे लोगों से हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे राष्ट्रवाद-जैसी अवधारणा की विशद् व्याख्या कर सकें। वे कोई चिंतक या विचारक नहीं हैं। वे तो एक सीधे-सादे कार्यकर्ता रहे हैं। उन्हें जो बताया जाता रहा है, उसे वे सरल शब्दों में दोहरा रहे हैं। वे कोई वीर सावरकर या गुरु गोलवलकर नहीं हैं, जो राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के संबंधों को सुपरिभाषित करें।
आज के भारत का यह ज्वलंत प्रश्न है कि राष्ट्रवाद का हम क्या मतलब निकालते हैं? क्या राष्ट्रवाद शब्द का अर्थ हिंदुत्व है? खुद हिंदू शब्द का अर्थ क्या है? क्या इस देश के मुसलमान, ईसाई, दलित और आदिवासी हिंदू नहीं हैं? जो हिंदू नहीं है, क्या वह राष्ट्रवादी नहीं हो सकता है?
पहले से चला आया सोच तो यही है कि सिर्फ हिंदू ही राष्ट्रवादी हो सकता है। मैं पूछता हूं कि हिंदू कौन है? आप किसे हिंदू कहेंगे और किसे अहिंदू? हिंदू शब्द हिंद से बना है। यह हिंद शब्द किसी भी प्राचीन संस्कृत ग्रंथ में नहीं है। यह शब्द अरब और फारस के मुसलमानों का दिया हुआ है। हिंद शब्द सिंध से बना है। वे ‘स’ को ‘ह’ बोलते हैं। सिंधु नदी के इस पार रहने वाले सभी लोग हिंदू हैं या हिंदी हैं।
इस हिसाब से हर भारतीय हिंदू है। चीन में हमारे लोगों को वे इंदुरैन कहते हैं याने हिंदू लोग। इस अर्थ में हिंदुत्व सभी को स्वीकार होगा याने हिंदुत्व राष्ट्रधर्म हो गया लेकिन यह जमीनी हकीकत नहीं है। किसी मुसलमान, ईसाई या सिख को आप हिंदू कहकर देखिए! आप कहेंगे क्या? यदि नहीं तो हिंदू शब्द सीमित हो गया। जो शब्द सीमित करता है, वह संपूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है? याने हिंदूवादी होना राष्ट्रवादी होना नहीं है। हिंदूवादी होना, मुसलमानवादी होना, ईसाईवादी होना अपने आप में अच्छा हो सकता है लेकिन इनसे भी बेहतर है, राष्ट्रवादी होना। राष्ट्रवाद इतना लंबा-चौड़ा और गहरा-ऊंचा है कि इसमें सभी समा सकते हैं। यदि सावरकरजी और गुरुजी आज हमारे बीच होते तो क्या वे इसी राष्ट्रवाद की हिमायत नहीं करते?
(साभार: नया इंडिया)
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