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डॉ. वैदिक का सवाल- एमजे अकबर पर सोनिया-ममता-मायावती की चुप्पी का रहस्य क्या है?
यौन-शोषण के इतने अधिक आरोप उन पर लगे कि केंद्रीय मंत्री एम.जे. अकबर...
समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago
डॉ. वेदप्रताप वैदिक
वरिष्ठ पत्रकार ।।
यौन-उत्पीड़नः नेताओं की चुप्पी?
यौन-शोषण के इतने अधिक आरोप उन पर लगे कि केंद्रीय मंत्री एम.जे. अकबर को आखिरकार इस्तीफा देना ही पड़ा। इस्तीफा देने में उन्होंने 10 दिन लगा दिए। इन दस दिनों में भाजपा सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छवि काफी विकृत हुई। कई लोगों ने प्रश्न किए, अखबारों और टीवी चैनलों में, कि प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी का रहस्य क्या है?
मैं पूछता हूं कि सोनिया गांधी, ममता बनर्जी और मायावती की चुप्पी का रहस्य क्या मोदी की चुप्पी से भी गहरा नहीं है? क्या किसी भी प्रमुख नेता का बयान यौन-शोषण के विरोध में आया? हां, अकबर के विरोध में जरूर आया, लेकिन वह मूलतः अकबर के खिलाफ नहीं, भाजपा के खिलाफ था। वह बयान उन कांग्रेसी नेताओं ने दिया था, जिनकी महान पार्टी के अकबर कुछ साल पहले प्रवक्ता रह चुके थे। दूसरे शब्दों में नेताओं की इस चुप्पी का अर्थ समझना ही असली रहस्योद्घाटन है।
यूरोप के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक फ्रायड, एडलर और जुंग को आप पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि यह यौन-शोषण क्यों होता है और इसे कौन लोग करते हैं। यौन-शोषण या यौन-उत्पीड़न वही लोग करते हैं, जो सत्ता के भूखे होते हैं और जिनमें जबर्दस्त हीन-भाव होता है। ऐसे संस्कारहीन लोग पत्रकारिता, व्यापार, व्यवसाय, मजहबी संगठन, शिक्षा संस्थाओं और नौकरशाही में तो होते ही हैं, सबसे ज्यादा वे राजनीति में होते हैं। यौन-शोषण या यौन-उत्पीड़न सिर्फ पुरुष ही करते हों, ऐसा नहीं है।
शक्तिशाली औरतों द्वारा मर्दों के यौन-शोषण और उत्पीड़न की कथाएं हम कई उपन्यासों में तो पढ़ते ही हैं, व्यावहारिक जीवन में भी देखते आए हैं। जो लोग राजमहलों और सेठिया भवनों के अंतरंग जीवन से परिचित हैं, उन्हें कुछ समझाने की जरुरत नहीं है। इसीलिए कोई बड़ा नेता इस मुद्दे को मुद्दा बनाना ही नहीं चाहता। नेता को यह डर लगा रहता है कि कहीं वह खुद न फंस जाए, इस जाल में। भाजपा के नेताओं की चुप्पी तो मैं समझ गया लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को तो इस मामले में आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए थी। वह ‘संस्कार’ की श्रेष्ठता पर इतना जोर देता है। उसके स्वयंसेवकों की सरकार हो और वह इस तरह से दुम दबाती रहे तो लोग उसका क्या मतलब निकालेंगे? क्या देश में कोई नैतिक शक्ति रही ही नहीं?
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