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जो बात आज अर्नब कह रहे हैं, अगर वह भीड़ का नारा बना तो सोचिए पत्रकारिता का क्या हाल होगा...
डॉ. मुकेश कुमार ये भारतीय मीडिया के इतिहास में संभवत पहली बार हो रहा है जब कोई पत्रकार, कोई संपादक कह रहा है कि उन पत्रकारों को जेल में डालो जो उसकी परिभाषा के हिसाब से राष्ट्रवादी नहीं हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। लाख असहमतियों के बावजूद पत्रकार इस हद तक नहीं जाते
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
डॉ. मुकेश कुमार
ये भारतीय मीडिया के इतिहास में संभवत पहली बार हो रहा है जब कोई पत्रकार, कोई संपादक कह रहा है कि उन पत्रकारों को जेल में डालो जो उसकी परिभाषा के हिसाब से राष्ट्रवादी नहीं हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। लाख असहमतियों के बावजूद पत्रकार इस हद तक नहीं जाते थे कि अपने साथियों के ख़िलाफ़ फतवे जारी करने लगें या विरोधी विचारों वाले पत्रकारों को जेल में ठूंसने के लिए उकसाने वाले वक्तव्य दे दें। एक लक्ष्मण रेखा थी जिसका पालन वह हर सूरत में वे करते थे। लेकिन शायद ये समय दूसरा है। ये बाज़ारू प्रतिस्पर्धा का समय है, सरकार को खुश रखने के लिए हर तरह का करतब करने का समय है। इसलिए ऊंचे पदों पर बैठे पत्रकार तमाम मर्यादाएं तोड़ने के लिए तैयार हैं।
हालांकि टाइम्स नाउ के संपादक अर्नब गोस्वामी द्वारा एंकरिंग के दौरान किए गए आह्वान का सबसे पहला और सबसे कड़ा विरोध एनडीटीवी की बरखा दत्त ने किया है और उसी के बाद से विवाद गरम हो गया, मगर इसे व्यक्तियों की आपसी टकराहट तक सीमित कर देना ख़तरे को कम करके आंकना होगा, बल्कि उसे नज़रअंदाज़ कर देना होगा। ये मसला किसी एक पत्रकार या किसी मीडिया संस्थान विशेष का नहीं है बल्कि दांव पर पूरा चौथा खंभा लगा है। जो बात आज अर्नब गोस्वामी कह रहे हैं अगर वह कल को भीड़ का नारा बन जाए तो सोचिए क्या हाल होगा।
और ये कोई कोरी आशंका नहीं है। अगर आप सोशल मीडिया पर हैं तो जानते होंगे कि वहां किस तरह से उन्मादी वातावरण बनाया गया है। स्वतंत्र विचार रखने वाले या सत्ता से असहमत पत्रकारों को वहां धमकियों और गालियों से नवाज़ा जा रहा है। इंटरनेट से निकलकर ये ज़हर अब आम लोगों में भी फैलने लगा है। कुछ राजनतिक दलों के संरक्षण में वह हिंसा का रूप भी अख़्तियार करता जा रहा है। ज़ाहिर है कि इस आशंकाओं से भरे इस माहौल में स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए पहले से संकुचित जगह और भी कम होती जाएगी। अभिव्यक्ति की आज़ादी बगैर किसी घोषित सेंसरशिप के ही बाधित हो जाएगी और तब संविधान तथा लोकतंत्र को कौन पूछेगा। जिसकी लाठी होगी वही सबको हांकेगा।
मुद्दा ये है कि क्या अर्नब या उन जैसे कुछ पत्रकार राष्ट्रवाद के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं वह पत्रकारिता है या नहीं? ये समझ लेना बेहद ज़रूरी है कि पत्रकारिता किसी दल या किसी विचारधारा की बंधुआ नहीं होती। वह प्रचारक की तरह काम नहीं करती, भले ही राष्ट्रवाद ही क्यों न हो। बल्कि राष्ट्रवाद से तो उसे बचाया जाना चाहिए क्योंकि राष्ट्रवाद तो अपने आप में एक बीमारी है। बकौल गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर राष्ट्रवाद तो मानवाता के विरूद्ध अपराध है। मीडिया को बचाना है तो उसे राष्ट्रवाद से भी बचाना होगा। और राष्ट्रवाद के नाम पर जो कुछ हमे बताया जा रहा है वह तो अंधराष्ट्रवाद है। वह मीडिया की आंखें बंद करने वाला नहीं फोड़ देने वाला राष्ट्र है। अगर मीडिया इस राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर काम करेगा तो वह देश का अहित ही करेगा।
पत्रकारिता का एकमात्र लक्ष्य सच्चाई को जनता के समक्ष रखना होता है। एक लोकतंत्र में उसकी ज़िम्मेदारी होती है कि वह किसी भी घटना के हर पक्ष को प्रस्तुत करे ताकि लोग अपने विवेक से सही-गलत का चयन कर सकें। इसलिए प्राइम टाइम में 'नेशन वान्ट टू नो' का शोर मचाकर कभी कश्मीर तो कभी पाकिस्तान के बहाने उन्माद फैलाना पत्रकारिता नहीं है। खास तौर पर तब तो ये और भी पत्रकारिता विरोधी हरकत है जब आप तथ्यों का तर्कों का चयन पक्षपातपूर्ण ढंग से करते हैं और अपने कार्यक्रमों के संचालन में सभी मेहमानों के साथ बराबर का व्यवहार नहीं करते। अर्नब की पत्रकारिता और एंकरिंग इस पत्रकारिता विरोधी पत्रकारिता का उपयुक्त उदाहरण है।
वास्तव में ये समय है कि समूचा मीडिया अर्नब के ख़िलाफ़ एकजुट हो और खुलकर विरोध करे। होना तो ये चाहिए कि टाइम्स के मालिकान खुद अर्नब को नियंत्रित करें। क्योंकि ये एक कड़वी सच्चाई है कि कोई भी संपादक अपने संस्थान की नीतियों के विरूद्ध नहीं जा सकता। अर्नब भी वही कर रहे होंगे जो उन्हे कहा गया है।
(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)
(साभार: दैनिक नवभारत)
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