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वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन की कलम से: 2016 में मीडिया की चुनौती, विचारों का बढ़ेगा डर

अरविन्द मोहन, वरिष्ठ पत्रकार नया साल शुरु होते ही नए संकल्प,

समाचार4मीडिया ब्यूरो 10 years ago

अरविन्द मोहन, वरिष्ठ पत्रकार नया साल शुरु होते ही नए संकल्प, नई योजनाओं की चर्चा के संग साल भर के लिये एक भविष्यवाणी की बात भी शुरु हो जाती। और जाहिर तौर पर ज्योतिष ज्ञान के बगैर आगे के बारे में बोलना मुश्किल काम ही है। पर आप जिस काम को, जिस पेशे को ओढते-बिछाते हैं और वह भी तीस-साल चालीस साल से तो आपके लिए आगे की चीजें देखने बताने के लिए ज्योतिष होने की जरूरत नहीं है। यह ठीक है कि चीजों को या घटनाओं को उसी क्रम में बताना तो सम्भव नहीं है पर कामकाज और विकास या गिरावट की दिशा का संकेत करना मुश्किल नहीं हैं। पत्रकारिता 2016 में क्या करेगी, क्या दिशा लेगी, उसमें क्या बदलाव होंगे यह अंदाजा लगाना सम्भव है और आगे हम उसी की चर्चा करेंगे, और यह काम लेकिन परन्तु के साथ ही चलेगा पर कुछ बातें ज्यादा भरोसे के साथ कही जा सकती हैं और हम पहले उनकी चर्चा ही करने जा रहे हैं। भाजपायी मीडिया मैनेजमेंट कोई नई चीज नहीं है और न मुल्क ही इसे भूला है। पर अटल राज और मोदी राज के बीच काफी फासला है जिसे समझने की जरूरत है। फिर नरेन्द्र मोदी अपने आपमें एक परिघटना ही हैं-सो मीडिया पर उनका रंग काफी चढ़ा रहता था। शायद अरविन्द केजरीवाल उनसे भी आगे हैं-कुछ फुरसत भी ज्यादा हो सकती है और यह सच है कि दिल्ली और बिहार विधान सभा चुनावों ने मोदी के कद को छोटा करना शुरु कर दिया है। शुरु में लगा कि वे और अमित शाह बदलने लगे हैं पर बहुत फर्क नहीं है। इस साल चार राज्यों में चुनाव हैं और असम छोड़कर भाजपा का ज्यादा कुछ दांव पर नहीं है, इसलिए उस तरफ से तो नही पर साठ महीने के शासन में से बीस महीने बीत जाने के बाद अब अगले 12 महीनों में मोदी से मोह कम ही होगा क्योंकि सबको रोजगार, सबके खाते में पन्द्रह-बीस लाख रुपये तो आने से रहे। भाजपायी मीडिया मैनेजमेंट में सूचना प्रसारण मंत्री अरुण जेटली की भूमिका बड़ी रही है- मंत्री बनने से ही नहीं उसके पहले से ही मीडिया वालों का जमावड़ा उनके इर्द-गिर्द ही रहा करता है। पर अब वे खुद मुश्किल में हैं तो यह भी समझ में आ रहा है कि मीडिया में ही उनसे खार खाए बैठे लोगों की संख्या कितनी है। अरुण जेटली ने साल बीतते-बीतते एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि पत्रिका जर्नलिज्म संकट में है क्योंकि मीडिया ने न्यूज और व्यूज के पुराने बंटवारे को खत्म कर दिया है। सचमुच ऐसा हुआ है पर इससे टीवी और अखबारों पर असर न हो और पत्रिकाओं पर हो यह बात कुछ गले नहीं उतरती, और इस बंटवारे को बनाए रखने का काम कानून बनाकर नहीं हो सकता क्योंकि कानून से जो चीजें सम्भव हैं वह भी यह सरकार नहीं करा पाती। सम्भव है कि राहुल गांधी, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, सीताराम येचुरी और जयललिता जैसे लोग पहले से ज्यादा प्रमुखता पाएंगे। यह वर्ष अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव लाए न लाए, ओलंपिक का जरूर है, सो हमारे खिलाड़ी ज्यादा जगह लेंगे। असहिष्णुता की चर्चा कम हो जाएगी यह सम्भव नहीं लगता क्योंकि देश की राजनीति में ऐसे खिलाड़ियों की संख्या और प्रभाव बढ़ गया है जो आर्थिक कामकाज और नीतियों पर चर्चा नहीं कराना चाहते। उनको ऐसी बहसें सूट करती हैं एक चित्र, एक फिल्म, एक किताब जैसी चीजों के सहारे वे हंगामा मचा लेते हैं। अब तो राज का मामला है। पर सन 2015 की तरह फिर बडे पैमाने पर पुरस्कार वापसी की मुहिम चले यह सम्भव नहीं लगता। अब हर क्षेत्र में घटनाओं की दिशा क्या होगी उसका अनुमान लगाने की भी कोई जरूरत नहीं है। पर खुद मीडिया के विकास की दिशा का अन्दाजा तो लगाना ही पड़ेगा और बडे आराम से यह कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया का जोर बढ़ेगा-फैशन नहीं। फैशन तो मोदीजी और केजरीवाल के उभार के समय था और भारी अतिरिक्त सरकारी खर्च से भी इन दोनों सरकारों के कामकाज की कोई बहुत सकारात्मक छवि बनी हो यह नहीं माना जा सकता। कोई कह सकता है कि अगर प्रचार और सोशल मीडिया के मोर्चे पर मुस्तैदी न होती तो स्थिति शायद और खराब दिखती। उनका काम अपना है पर अभी ही सोशल मीडिया लडखड़ाते हुये और तरह-तरह के विचारों का अखाड़ा बनकर भी अखबारों और समाचार चैनलों के लिए खबर का एक बडा स्रोत बन चुका है। साथ ही इस सभी के विचारों और आचरण की दिशा तय कराने में भी यह एक बडी भूमिका में आ चुका है। अब इस मीडिया की किसी भी मुख्य खबर, बहस या प्रवृत्ति से मुख्य धारा की पत्रकारिता मुंह नहीं मोड सकती। इसके साथ यह भविष्यवाणी करने में भी हर्ज नहीं है कि वर्ष 2016 पेशेवर ढंग से ब्लॉग, न्यूजपोर्टल और साइट चलाने का नया चलन धडल्ले से चलाएगा। बीते साल और सम्भवत: उससे पहले एक साल में भी कुछ मीडिया हाउसों के पोर्टल और साइट से ठीकठाक कमाई की शुरुआत हो चुकी है। इसका शोर नहीं मचा पर अपेक्षाकृत कम खर्च वाला यह समाचार माध्यम अब घाटे वाले दौर से निकल गया है। टीवी 18 वाले राघव बहल के धूम धड़ाके से उतरने के साथ ही इस साल इसका शोर मचे और यह न्यूज-व्यूज के कारोबार की नई दिशा बने यह सम्भव है। अभी हाल-फिलहाल अखबार या टीवी चैनल का कोई ऐसा नया प्रोजेक्ट नजर नहीं आता जो इस साल या अगले साल भी गेमचेंजर की भूमिका निभा सके। इनका कामकाज बेहतर हो रहा है और जैसे-जैसे पाठक या दर्शक की पसंद का पता करने की व्यवस्था ज्यादा चुस्त-दुरुस्त होती जाएगी यहां भी बेहतर काम का दबाव बनेगा पर एक झटके में बदलाव वाली संभावना अभी नहीं दिखती। जैसा कि अरुण जेटली ने कहा है, न्यूज-व्यूज के अलगाव की बात सही है और यह सिर्फ पत्रिकाओं पर लागू नहीं होती। पर यह भी जरूरी है कि सरकार भी इस विभाजन को माने। अरुण जी के सर्वेसर्वा रहते हुये भी डेस्क पर काम करने वाले पत्रकारों का क्या हाल है यह बताने की जरूरत नहीं है। सरकार भी पत्रकारिता के नाम पर जो थोडी सुविधाएं देती है या नेता लोग माखन मिसरी बांटते हैं वह सब रिपोर्टिंग पक्ष के लोगों को ही जाती हैं और यह कहना सिर्फ पत्रिकाओं की चिंता से जुडा नहीं लगता। असल में आज की राजनीति और शासन में बैठे हर किसी को विचारों से डर लगता है। कल तक बिना विचार के राजनीति या सामाजिक काम की बात सोची भी नहीं जाती थी। विचार दिशा के साथ वह मानक भी तय करते हैं जो आपके कामकाज की समीक्षा का आधार बनते हैं, जरूरी बदलाव का रास्ता भी बताते हैं। पर आज हर वह आदमी विचार से डरता है जिसके पास कुछ खजाना है, सारी सुविधाएं हैं, सत्ता है, यह डर घटेगा नहीं बढता ही जाएगा, इसी का डर है।

 

 

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