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पत्रकारों को 'दलाल' कहना तो आसान है साहब, पर असलियत भी समझिए...

तरुण वत्स ।। पत्रकारिता आजकल ‘आलोचनात्मक’ हो गयी है। आप सरकार की आलोचना कर लेते हैं तो आप पत्रकार हैं और नहीं कर पाते हैं तो “भैया, कैसे पत्रकार हो?” नया शब्द चला है ‘दलाल’, मतलब पत्रकारों को ‘दलाल’ या ‘चट्टू’ कहने का। पहले ही मान लेता हूं कि हां भैया, इस पेशे के लोगों की वजह से ही ये नाम रख दिया गया है लेकिन बहुत से अभी भी ऐसे

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

तरुण वत्स ।। पत्रकारिता आजकल ‘आलोचनात्मक’ हो गयी है। आप सरकार की आलोचना कर लेते हैं तो आप पत्रकार हैं और नहीं कर पाते हैं तो “भैया, कैसे पत्रकार हो?” नया शब्द चला है ‘दलाल’, मतलब पत्रकारों को ‘दलाल’ या ‘चट्टू’ कहने का। पहले ही मान लेता हूं कि हां भैया, इस पेशे के लोगों की वजह से ही ये नाम रख दिया गया है लेकिन बहुत से अभी भी ऐसे हैं, जिन्हें पता ही नहीं कि ‘दलाल’ कैसे बना जाता है। यानि बड़े संस्थानों में काम करने वाले छोटे लोग, छोटे पत्रकार और निचले पद पर काम करने वाले ‘पत्रकार’, सही में दलाल नहीं होते। ‘कर्मचारी’ होते हैं लेकिन ‘दलाल’ नहीं होते। थोड़ी सी पुरानी बात है। आईबीएन-7 चैनल से बड़ी तादाद में पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। अचानक काफी लोगों का जीवन डगमगा गया था। करीब 300 से ज्यादा पत्रकार बाहर कर दिये गए थे। माना जाता है कि ये जो आम आदमी पार्टी वाले आशुतोष जी हैं न, इनकी नौकरी पर भी खतरा मंडरा गया था। मतलब सुनने में आया था लेकिन इनकी नौकरी सुरक्षित रही थी तब, बाद में सर ने पार्टी जॉइन कर ली और नेता बन गए थे। कुछ समय पहले दैनिक जागरण के करीब 300 कर्मचारी (जिसमें पत्रकार भी शामिल थे) जंतर मंतर पर धरने पर बैठे थे। मजीठिया वेज बोर्ड की मांग करने पर कई कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया था लेकिन किसी ने कहीं कोई खबर नहीं देखी। न चैनल पर, न अखबार में। सन्नाटा। राष्ट्रीय सहारा का दिल्ली संस्करण कर्मचारियों की हड़ताल के कारण कई दिनों तक नहीं छपा। तनख्वाह नहीं देने के कारण कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। आज भी भटक रहे हैं। कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें 12 महीनों की तनख़्वाह नहीं मिली है लेकिन कहीं कुछ दिखा। सन्नाटा। कई मीडिया संस्थानों ने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के बावजूद अब तक वेज बोर्ड लागू नहीं किया। बावजूद वह निष्पक्ष-निर्भीक होने का बेशर्म दावा ठोका करते हैं। कहीं कोई खबर नजर आई, कुछ दिखा। नहीं। सन्नाटा। शायद बहुत से लोग तो ये जानते भी नहीं होंगे कि वेज बोर्ड क्या है। पत्रकार क्यों इसके पीछे पड़े हैं। कुछ समय पहले लिखा था कि पत्रकारों की मौत पर किस तरह लोग तो क्या खुद मीडिया संस्थान भी चुप्पी साध लेते हैं। यह पत्रकारिता का अजीब दौर है और ऐसे में मीडिया संस्थानों का अपने पत्रकारों की हत्या तक पर चुप्पी साध लेना बहुत अखरता है। इस मामले में हिन्दुस्तान अखबार के पत्रकार राजदेव रंजन की मौत के बाद उनके लिए पूरी क्षमता के साथ खड़ा होना एक मिसाल कही जा सकती है। जब पहले कभी अखबार पढ़ते थे तो देखते थे कि कहीं छोटी मोटी एक खबर (एक कॉलम) में आ जाती थी कि इन पत्रकार साहब की हत्या हो गयी या कभी किसी की रिटायरमेंट की भी लेकिन तब किसी पत्रकार के मरने पर (रिपोर्टिंग के दौरान) दूसरा संस्थान उस खबर को अपने अखबार या चैनल में नहीं दिखाता था। मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले की रिपोर्टिंग करने वाले आज तक के पत्रकार अक्षय सिंह की मौत के बाद जरूर कुछ बदला और बहुत से लोग जागे। लगभग सभी चैनलों और अखबारों में चर्चा हुई। लोगों ने जाना कि कोई पत्रकार अपनी जान गंवा बैठा। मैं भी इस पेशे से हूं। न जाने क्यों मुझे लगता है कि अगर कल को मैं भी कहीं भगवान को प्यारा हो गया तो लोग मेरे बारे में चर्चा तक नहीं करेंगे यानि अपने ही पेशे के लोग। मैं तो अक्षय सिंह जैसा नहीं, न ही कोई बड़ा पत्रकार हूं, एक अदना सा ‘कर्मचारी’ हूं जिसको बहुत कम लोग जानते हैं। इस पेशे का एक बुरा पहलू यह भी है कि हर किसी के वकील बनने वाले पत्रकारों की आवाज उठाने वाला कोई नहीं होता और पत्रकार कौम भी ऐसा नहीं करती। ये मेरी बात नहीं, मेरे जैसे बहुत से लोगों की बात है। हर कोई सपना देखता है ‘बड़ा’ बनने का। नाम कमाने का। पत्रकारिता के जरिये कुछ पहचान बनाने का लेकिन बहुत कम लोग मुकाम हासिल कर पाते हैं और बहुत से लोग फिर इसी के जरिए पेट पालते हैं। ये जो पेट पालने वाले हैं न, इनसे जुड़ा होता है एक परिवार। परिवार के लोग। बच्चे। इस पेशे में जब मन मुताबिक नहीं मिलता तो भी चल जाता है लेकिन जब ‘कुछ नहीं’ मिलता तो बहुत दुख होता है। बुरा लगता है। बहुत बुरा। कम से कम इस पेशे से जुड़े लोगों के बारे में तो सोचिये। वो लोग जो ‘छोटे’ होते हैं, तनख्वाह की कोई ‘फिगर’ नहीं होती, सपनों से लबरेज और ऊंची उड़ान की सोचकर इस पेशे में आने वाले लोग। जिनकी पहचान कुछ लोगों तक ही सीमित होती है और सीमित सा होता है उनका दायरा भी। ये सन्नाटा बुरा होता है। बहुत बुरा…। (लेखक एक युवा पत्रकार है।)   समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।


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