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युवा पत्रकार अनुराग दीक्षित का सवाल- क्या कार्रवाई तभी होगी जब मीडिया प्रमुखता से खबर दिखाएगा?
अनुराग दीक्षित एंकर, लोकसभा टीवी ।। यकीनन मीडिया को लेकर जनता के मन में ढेरों सवाल हैं। सवाल साख को लेकर है और खबरों के चयन पर भी। सवाल जायज हो सकते हैं, लेकिन बुलंदशहर में हुए दुष्कर्म मामले ने मीडिया की गंभीर
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
अनुराग दीक्षित
एंकर, लोकसभा टीवी ।।
यकीनन मीडिया को लेकर जनता के मन में ढेरों सवाल हैं। सवाल साख को लेकर है और खबरों के चयन पर भी। सवाल जायज हो सकते हैं, लेकिन बुलंदशहर में हुए दुष्कर्म मामले ने मीडिया की गंभीरता को एक बार फिर दर्शाया है। ये मीडिया का प्रभाव ही है कि मामला लगातार संसद में उठा। सूबे के मुखिया ने सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया। अधिकारियों का निलंबन हुआ और मुख्यमंत्री ने पीड़ित परिवार से मिलने की पहल की।
वैसे उत्तर प्रदेश में 2014 में दुष्कर्म की 3,467 घटनाएं हुईं थी। औसतन हर दिन 10 घटनाएं! आंकड़ा 2 साल पुराना है और सरकारी भी। ना जाने कितने मामले ऐसे भी रहे होंगे जो पुलिसिया रजिस्टर में दर्ज ही नहीं हो सके। सवाल है कि देर से ही सही लेकिन क्या दुष्कर्म के हर मामले में अखिलेश सरकार इतनी ही चुस्ती दिखा सकी थी? जाहिर है नहीं। ऐसे में जरा सोचिए, अगर दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे अखबार अपने राष्ट्रीय संस्करणों के पहले पन्ने पर इस खबर को प्रमुखता से नहीं छापते तो क्या होता? अगर अजित अंजुम जैसे कुछेक वरिष्ठ पत्रकार सुबह उठते ही खबर का संज्ञान नहीं लेते तो क्या होता? शायद घटना चैनलों की स्पीड न्यूज में कहीं सिमट कर मर जातीं। तो क्या सत्ता को हर बार ऐसे ही जगाने के लिए मीडिया को खुद जागते रहना होगा?
ऐसे में पुलिस अधिकारियों पर हुआ एक्शन अगर न्यूज चैनलों की खबर का असर है तो मुख्यमंत्री के विवेक और संवेदनशीलता पर सवाल क्यों ना हो? तो क्या कार्रवाई तभी होगी जब मीडिया प्रमुखता से खबर दिखाएगा? ऐसे में अगर अपराध के खिलाफ मीडिया के व्यापक कवरेज से ही सरकारी फैसले और सख्ती तय होते हैं तो जनता के साथ है कौन- सरकार या मीडिया? न्याय की आस किससे है- सरकार से या मीडिया से? संवेदनशीलता कहां हैं- सत्ता में या मीडिया में? हालांकिं ऐसा नहीं कि मीडिया पर सवाल ना हों! यकीनन हमारी राष्ट्रीय मीडिया दक्षिण, पूर्वोत्तर या सुदूर कोनों में हुई बड़ी घटनाओं पर इतनी तत्परता नहीं दिखा पाती। आलोचना होनी चाहिए, लेकिन कम से कम इस मामले में नहीं।
अब न्यूज चैनलों पर शायद ‘तूतू-मैंमैं’ के बीच सत्ता के प्रवक्ता कुतर्क देते हुए बताएं कि दुष्कर्म मामलों में उनका प्रदेश तीसरे नंबर पर है, लिहाजा हालात अपेक्षाकृत बेहतर हैं। मामले को संसद में उठाने वाले भाजपा नेता भी शायद भूल जाएं कि दुष्कर्म मामलों में भाजपा शासित राजस्थान और मध्य प्रदेश अव्वल हैं। कांग्रेस भी निर्भया मामले को भुला दे। भुला देना भी चाहिए। राजनीति में नैतिकता की कोई गुंजाइश जो नहीं। शायद इसी के चलते अब मीडिया कवरेज पर ही सवाल खड़ा किया जा रहा है।
वैसे आखिर में एक निवेदन भी है। आजकल में अगर कोई संपादक अखिलेश यादव के नाम खुला पत्र लिखें तो जरूर पूछें कि बाकी संपादकों द्वारा पूर्व में लिखे गए पत्रों पर उन्होंने कोई संज्ञान लिया या नहीं। यकीनन पिछले पत्र भी कानून व्यवस्था पर ही रहे होंगे। उम्मीद है फिलहाल जागी हुई सरकार ईमानदार जबाव जरूर देगी। इस बीच सोती सत्ता को जगाने के लिए मीडिया के उस सक्रिय तबके का सादर आभार।
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